शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

अग्नि निष्पक्ष होती है!

हम रोज नए ब्लॉग देख रहे हैं और इसके साथ ही ब्लॉग पर कमेन्ट में अपना प्रचार करने का काम कर रहे हैं रोज पढ़ती हूँ , मेरे पास उनके उत्तर में लिखने को कुछ भी नहीं होता हैं क्या हमारे पास धर्म और संप्रदाय के ऊपर आरोप प्रत्यारोप के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होता है रोज नए ब्लॉग नए ऐलान के साथ - ऐसा नहीं है कि इसमें ऊर्जा खर्च नहीं होती है या फिर हमारी बौद्धिक का उपयोंग नहीं होता है
हम अपनीइस क्षमता का सकारात्मक दिशा में उपयोग क्यों नहीं कर रहे हैं ? इस समाज में और मानव जीवन में बहुत सारी विसंगतियां और विकृतियाँ भी है ऐसा नहीं हैकि हम उन बातों से वाकिफ नहीं है हम फिर क्यों नहीं अपनी अभिव्यक्ति क्षमता को प्रयोग करके सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रयोग कर रहे हैं देश में भी हैं ऐसी कितनी ही समस्याएं फिर हम सुलगते हैं धधकते हैं या फिर धू धू करके क्यों नहीं जल रहे हैं? आस्था को आहत फिर दूसरों पर आरोप प्रत्यारोप लगा कर हम क्या हासिल कर सकते हैं?
'हम सुलगते हैं , हम धधकते हैं क्यों नहीं सब कुछ जला देते हैं या फिर
सब कुछ जलाकर रख कर दें'
इस
तरह के विचार अभिव्यक्त करके खुद अपने में अंतराग्नि रखने वाले उसको दावानल में बदलने की सोच कोकार्य रूप देना चाहते हैं लेकिन ये भूल जाते हैं कि दावानल चुन चुन कर उन्हीं लोगों को नहीं जलाएगी जिन्हें आपजलाना चाहते हैं - अग्नि बहुत निष्पक्ष होती है और वह सबको जलाकर राख कर देती हैवह आपको और हमें भीनहीं छोड़ेगी चाहे हम अपनी तरफ से कितने ही अग्निशमन के यन्त्र रखे रहें
आप इस लेखनी से आग लगाना चाहते हैं तो फिर ऐसी आग लगाइए जिसमें मानव मन कीसंकीर्णता जल कर भस्म हो जायेसामाजिक कुरीतियों को जलाकर ख़त्म कर दिया जायसंस्कृति के गिरतेमूल्यों को फिर से चमकने का प्रयास कीजियेवे सामाजिक संस्थाएं जो इसका आधार हैं उनके स्तम्भ मजबूतकरने के लिए कलम चलाइये जिससे मानव समाज और जाति का भला हो सकेमानव में मानव के प्रति प्रेम कीअगन लगायेंहम क्यों किसी के विश्वासों के आधार पर बाँटेंहम सभी जिन पांच तत्वों से बने हैं वे सभी में मौजूदहैं और ख़त्म होने के बाद सभी को उसी में मिल जाना है
अपनी इस कलम को सार्थक कीजियेमैंने ऐसे किसी भी ब्लॉग कासमर्थन नहीं करती जो मानव कोइस आधार पर बांटने की बात करता हो या फिर दूसरे की भावनाओं को आहत करने के लिए कुछ भी लिखता हो
अगर कुछ दे सकें तो अच्छा दीजिए अच्छा सोचिये और अच्छा ही लिखिएइसमें ही हमारी रचनाधर्मिता कीगरिमा है और उसकी सफलता हैकोई भी सराहे लेकिन अगर हम अपने लक्ष्य को मान कर चलते हैं तो सौ नहींएक तो हमारे प्रयास को स्वीकार करके अपना मार्ग बदल कर सही पथ पर चलने लगा तो जीवन भर का प्रयाससफल मानती हूँ
इस विषय में सोचें और मनन करें कुछ अच्छा ही मिलेगा

16 टिप्‍पणियां:

मीनाक्षी ने कहा…

कई बार जो हम कहना चाहते हैं किसी दूसरे द्वारा लिखा पढकर लगता है..यही तो ....यही तो हम कहना चाहते हैं....
"अगर कुछ दे सकें तो अच्छा दीजिए अच्छा सोचिये और अच्छा ही लिखिए। "
काश..... सभी ऐसा सोचें....

ajit gupta ने कहा…

रेखा जी, साहित्‍य का अर्थ ही होता है जो समाज के हित में हो। जिस लेखन से समाज में विष का संचार हो वो लेखन तो उचित नहीं है। ब्‍लागिंग का क्षेत्र खुला है इसलिए लोग अपने आक्रोश को भी यहाँ व्‍यक्‍त करते हैं।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

अजित जी,

वो साहित्य जो किताबों में संचित है, उतना प्रसारित नहीं हो पा रहा है जितना की ब्लॉग जो अब साहित्य न सही कम से कम किसी विषय को व्यापक रूप से चर्चा का विषय तो बना ही रहा है. जो मन आया लिख देना भी या आक्रोश व्यक्त करना भी जरूरी है लेकिन जो समाज को किसी विभीषिका में झोंकने के लिए माहौल तैयार करे वो तो समजोचित या मानवोचित नहीं कहा जाएगा. मैंने अपनी बात कही है उसको थोप नहीं रही.

ashish ने कहा…

अच्छा लिखिए , अच्छा सोचिये और अच्छा बनिए . . हम सहमत है . सोचिये हम अपने बाद इस समाज को क्या देकर जायेंगे .

Udan Tashtari ने कहा…

अगर कुछ दे सकें तो अच्छा दीजिए अच्छा सोचिये और अच्छा ही लिखिए


-बिल्कुल सही एवं सार्थक बात!!

मनोज कुमार ने कहा…

अगर कुछ दे सकें तो अच्छा दीजिए अच्छा सोचिये और अच्छा ही लिखिए।
सही कहा। यही प्रयास भी रहता है अपना तो।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ब्लॉग में लिखा हुवा देर तक उपलब्ध रहता है आने वाली पीडी को ... इसलये सोच समझ कर ही लिखना अच्छा है ... सार्थक लिखा है ..

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

sarthak kathan to hai...par man kahan sarthak soch pata hai..:)

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत सही.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" ने कहा…

क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ. आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें

निर्मला कपिला ने कहा…

बिलकुल सही बात कही। धन्यवाद।

BrijmohanShrivastava ने कहा…

चारो तरफ तो आदमी को विभिन्न तरीकों से बांटा जारहा है एसे में यदि ब्लाग भी बांटने के काम करने लगे तो बडी मुश्किल होगी फिर स्थिति यह होगी कि
’’इस आग को कैसे कहें ये घर है हमारा
जिस आग को हम सब ने मिल कर हवा दी है।
विषय वाकई चिन्तन और मनन करने योग्य है क्योंकि यह आग जो आपके अनुसार निष्पक्ष होती है वह किसी को भी न तो छोडती है न ही छोड़ेगी । सभी को सोचना चाहिये

daanish ने कहा…

किसी का
किसी भी तरह से
कभी कुछ बुरा ना होने देने का प्रयास भी
कुछ अच्छा करने जैसा ही है ...

Abnish Singh Chauhan ने कहा…

इस सुन्दर आलेख हेतु आपको साधुवाद.

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

rekha ji.. bahut dino se logon ke blogs pe aapke comment padta tha.. aaj aap ka blog dekha...aapke dusre blogs bhi padhe.. aapki is racna se main purnataya sahmat hoon...lekin rakha ji duniya mein hazaron log janam lete hain..kal purush koi birla hi hota hai...mujhe nahi lagta blog pe kuch bhi likhne se desh aur samaj ko koi fark padega.. kal purush ki tarah shashwat bichar hi waqt ke kasauti pe khare utrenge..dev aur aasuri shaktiyan satat sangharsh rat rahi hai.. bijay devon ki hi hogi...haan devtaon mein devatav ho unme devatav ka bhram na ho to...main bhi yada kada kuch kuch likhta rahta hoon...aap hindi se barso se judi hain..aap mere blog my unveil emotions per sadar amantrit hain... mujhe ummid hai aap mere margdarshan avashya karengi

Rakesh Kumar ने कहा…

अगर कुछ दे सकें तो अच्छा दीजिए अच्छा सोचिये और अच्छा ही लिखिए। इसमें ही हमारी रचनाधर्मिता कीगरिमा है और उसकी सफलता है। कोई न भी सराहे लेकिन अगर हम अपने लक्ष्य को मान कर चलते हैं तो सौ नहींएक तो हमारे प्रयास को स्वीकार करके अपना मार्ग बदल कर सही पथ पर चलने लगा तो जीवन भर का प्रयाससफल मानती हूँ।
इस विषय में सोचें और मनन करें कुछ अच्छा ही मिलेगा

बहुत अच्छे विचार हैं आपके.सकारात्मक उर्जा का पोषण करते हुए.
मेरे ब्लॉग पर दर्शन दीजियेगा.