रविवार, 12 अगस्त 2012

क्या है मानसिक व्यभिचार ?

                        व्यभिचार शब्द बचपन से सुनती आ रही हूँ और इस शब्द का तब अर्थ भी नहीं पता था जब से इसको सुना. हम जैसे जैसे बड़े होते गए इसके अलग अलग रूपों के विषय में पढ़ सुन कर जानकारी हासिल करते रहे. इसका क्षेत्र कितना विकसित और बड़ा हो सकता है इसके बारे में तो मैं आज भी नहीं बता सकती हूँ , लेकिन फिर भी मानव मनोविज्ञान के थोड़े बहुत जानकारी रखने के कारण कुछ तो समझ ही सकती हूँ. जिन रिश्तों और संबंधों को इंसान खुले तौर पर नैतिक रूप में बना कर भी अपने जीवन में अगर असंतुष्ट होता है तो वह अपने मन में कुछ कुंठाएं पाल लेता है क्योंकि औरों को देख कर और उनके मन में कौन से मानक उसके संतुष्ट होने के बन जाते हैं अगर उन्हें पूरा होते नहीं पाता है तो वह कुंठित हो जाता है और अपनी कुंठाओं को वह किसी न किसी तरीके से निकालता है. जो वह पाना चाहता है और नहीं प्राप्त कर पाता है तो उसके प्रति वह कुंठा पाल लेता है. यही कुंठा अगर व्यक्ति के जीवन में अपने दांपत्य जीवन को लेकर हो या  फिर उसकी संगति आरम्भ से ही गलत लोगों के साथ पड़ जाय तो फिर ऐसे लोगों की मनःस्थिति कुछ अलग ही बन जाती है. वैसे तो कुंठा किसी भी कारण से मन में आ जाती है लेकिन अगर व्यक्तिगत जीवन में ऐसा कुछ निजी रिश्तों को लेकर हो तो वह मानसिक व्यभिचार को जन्म देती है.
                           ये पहले भी होता था और कुंठित युवकों और पुरुषों की संख्या शायद इतनी ज्यादा नहीं थी क्योंकि मैं आज से ४० साल पहले  की बात कर रही हूँ जब कि संचार के साधन में सिर्फ पत्र ही हुआ करते थे. जब पहली बार कादम्बिनी में कविता प्रकाशित हुई तो आने वाली फैन  मेल में कुछ मानसिक व्यभिचार में सुख खोजने वाले लोग भी होते थे. कुछ पत्र बेहद अश्लील भाषा में लिखे होते थे जिनका कोई भी मतलब नहीं होता था. लेकिन उन लोगों की कुंठा को साफ प्रदर्शित करते थे. ऐसे पत्रों के आने पर ही मेरे लिखने पर पाबन्दी की बात उठी थी लेकिन बाद में मेरी मेल पहले भाई साहब देखते फिर मुझे मिलती थी.  आज के संचार के साधनों के बढ़ने के बाद ये व्यभिचार भी बढ़ रहा है क्योंकि उनके आप आज ऐसे कितने साधन है, जो उनकी कुंठाओं को शांत करने का वायस बन रहे हैं. कहीं मित्रता की आड़ में ये काम चल रहा है और ये अब सिर्फ पुरुषों तक ही कायम नहीं है बल्कि अब तो इसको  हाई प्रोफाइल की महिलायें भी अपनाने लगी हैं.इसमें आने वाले लोग अच्छी आमदनी वाले ही होते हैं जो पैसे के बल पर अपने मन की कुंठाओं को शांत कर पाते  हैं या फिर अपने समय को बिताने का एक साधन बना लेते हैं .  आप पत्र और पत्रिकाओं में देख सकते हैं कि मित्र बनाओ.

कुछ विज्ञापन जैसे के तैसे मैं उद्धृत कर रही हूँ :


१. सुप्रिया फ्रेंडशिप सोबर लेडीज /जेंट्स फ्रेंड एंड अर्न मानी  इन इंडिया /अब्रोड डायरेक्ट एड्रेस और टेलीफ़ोन नं संपर्क करें -- मोबाइल नं ००००००००/००००००००

२. फ़ोन-ए-फ्रेंड  कार्ड आपके शहर में मेम्बरशिप स्टार्ट /मेक फ्रेंड्स मेल / फीमेल डायरेक्ट फ़ोन एंड एड्रेस. मोबाइल नो. ००००००००००/००००००००००
                    इस खेल में कमाई का भी एक साधन बना कर इसको हवा दी जा रही है . समस के सहारे ये दोस्ती किस तरह से इंसान को मानसिक संतुष्टि देती है ये सिर्फ एक मानसिक व्यभिचार का एक स्रोत बन चुका है. कुछ sms ऐसे मुझे भी देखने को मिले हैं . कुछ ऐसे लोगों के विषय में मुझे भी पता है जो दोस्ती बढ़ाने के साथ साथ अपने परिवार के विषय में कभी भी कुछ नहीं बताते हैं खुद को एकाकी बता कर सहानुभूति जीतने के प्रयास के साथ ही वे धीरे धीरे अपनी बातों में वे अश्लीलता को शामिल करने लगते हैं और दूर से सिर्फ फ़ोन पर बात करके या फिर sms करके ही अपनी कुंठाओं को शांत कर पाते हैं.इसके लिए जो पक्ष कुंठित होता है वह उसकी कीमत देने के लिए तैयार होता है और उसके भी बहुत से स्रोत बन चुके हैं.  ये खेल व्यापक तौर पर चल रहा है. एक खेल सिर्फ एक तरफ का नहीं होता है जहाँ पर मित्रता को सहारा बनाया जाता है वहाँ पर ये अपराध का वायस भी बन जाता है. परिवार के टूटने का कारण भी बन जाता है.

14 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

सही कहा आपने

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

रेखा दी ...कितना सही से विश्लेषण कर के लेख लिखा हैं आपने ...बहुत ही सटीक ..

आए दिन हम औरतों को इस बात से गुज़रना पड़ता हैं

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

हाँ ,यह तो मैंने भी देखा है .लगता है कुछ लोगों को सहज जीवन अच्छा ही नहीं लगता !

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

प्रतिभा जी , आप सही कह रही हें लेकिन यह एक मानसिक स्थिति होती है, जो प्रौढ़ावस्था में विकसित होती है. उस विषय में मैंने एक लेख डाला भी था. लोग अपने महत्व को अपनी ही नज़रों में बढ़ाने के लिए इस तरह की हरकत करते हें. खुद अपने जीवन में भले ही संतुष्ट हों या न हों लेकिन नैतिक मूल्यों का कोई अस्तित्व होता है. सिर्फ पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी वैसे हाई प्रोफाइल लोग इस काम में अधिक संलग्न होने हैं , जिन्हें रोटी और पैसे की कमी नहीं होती है. राजनीति में फैले हुए सेक्स स्कैंडल इसी बात का प्रमाण हैं.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सटीक विश्लेषण ...

DrZakir Ali Rajnish ने कहा…

सही कहा आपने। यह समस्‍या दिन-ब-दिन बढती ही जा रही है।

............
कितनी बदल रही है हिन्‍दी !

वाणी गीत ने कहा…

कुंठित मनोवृति का सटीक विश्लेषण !

ZEAL ने कहा…

beautifully written..

Shah Nawaz ने कहा…

समाज में इस तरह के कुंठित मनोवृति के लोग हमेशा से रहे हैं.... यह अलग बात है कि आज यह संख्या पहले के मुकाबले कहीं अधिक है... मनोरंजन के साधनों एवं इंटरनेट पर जिस तरह से सेक्स को परोसा जाता है, उससे इस तरह की विकृतियाँ गंभीर मानसिक बिमारी का रूप ले लेती है.... ऐसे कुंठित लोग हमेशा से समाज के लिए नुक्सान साबित होते हैं, दर असल ऐसे लोगो को मानसिक इलाज की आवश्यकता होती है...

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

शाह नवाज़ जी,

अपने बिल्कुल सही कहा लेकिन मानसिक रोग से ग्रस्त अपने को ऐसा मानता कब है? कितने प्रौढ़ लड़कियों पर ममता दिखाने का दिखावा करते हें और पीठ पर फिरता हुआ हाथ क्या बोल रहा है? ये बात उस बच्ची से ही जानी जा सकती है. ऐसे लोग करीबी रिश्तों को भी न जाने किस नजर से देखते हैं . मैंने कितने ऐसे केस देखे हैं जहाँ पर लड़कियाँ अपने वृहत परिवार में ही सुरक्षित नहीं है. इसको हम लोग क्या कहेंगे?

रचना ने कहा…

naari blog par kyun nahin diyaa yae aalekh rekha ji

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

मुझे लगा कि लोग इसको नारी ब्लॉग पर पता नहीं सही समझें या नहीं ये एक मनोविज्ञान से सम्बंधित तथ्य था. बस इसी लिए नहीं तो वह ब्लॉग भी मेरा ही है.

ZEAL ने कहा…

Great post !--Great Analysis !

सतीश सक्सेना ने कहा…

आपका यह लेख आवश्यक और उत्कृष्ट है, मगर मुझे शक है जिन्हें समझना चाहिए वे इस पर गंभीरता से ध्यान देंगे !
बधाई आपको !