प्रकाशनार्थ

अपनी सोच का शब्दों से श्रृंगार करें और फिर बाँटें अपने विचर और दूसरे से लें. कितना आसन है उन सबसे लड़ना जो हमें दुश्वार लगते हैं. कोई दिशा आप दें और कोई हम दें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि सूक्ति सार्थक हो जायेगी.

रविवार, 18 सितंबर 2011

गाड़ी के दो पहिये !

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हम ये तो सदियों से सुनते चले आ रहे हें कि पति और पत्नी गाड़ी के दो पहिये होते हें और जब दोनों मेंसामंजस्य होगा तो जीवन रुपी सफर मे...
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

रक्षा बंधन त्यौहार या अहसास !

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rakshaa बंधन हम एक पर्व की तरह से मनाते हैं एक निश्चित दिन लेकिन ये एक अहसास भी है - बहन के द्वारा भाई की कलाई पर बंधा हुआ रेशमी धाग...
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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

लोकतंत्र में सुधार चाहिए!

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पिछले दिनों केंद्र सरकार ने अपने पोर्टल पर और फेसबुक के सहारे इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा प्रणाली के विषय में मत संग्रह ...
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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

विकल्प हैं - उन्हें खोजें !

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मेरी कल की पोस्ट " कल का सच - जो आज देखा " आज की एक समस्या है , जिसे आम तौर पर हम कल झे...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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