प्रकाशनार्थ

अपनी सोच का शब्दों से श्रृंगार करें और फिर बाँटें अपने विचर और दूसरे से लें. कितना आसन है उन सबसे लड़ना जो हमें दुश्वार लगते हैं. कोई दिशा आप दें और कोई हम दें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि सूक्ति सार्थक हो जायेगी.

बुधवार, 10 जुलाई 2013

संस्कार कोई गिफ्ट पैक नहीं !

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                                आज कल चल रहे समाज के वीभत्स वातावरण को देख कर आत्मा काँप जा रही है . हम किस उम्र की बात कहें ? सवा साल ...
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रविवार, 7 जुलाई 2013

पहली बार केक काटा !

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                           कभी इस तरह से सोचा ही नहीं कि जन्मदिन कैसे मनाया जाय ? अपने से तो कोई प्रोग्राम बनाया नहीं जाता और मैं खुद अपनी ...
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मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

विश्व के सामने नारी !

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                          विश्व पटल पर "नारी" ब्लॉग आप सबके सामने  आया है . अपने  अस्तित्व के लिए सिर्फ ये ब्लॉग   ही नहीं बल्कि...
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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

उत्तर खोजें !

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                     ये प्रश्न सिर्फ मेरे मन में ही उठा है या और भी लोगों के मन में उठा होगा ये तो मैं नहीं जानती लेकिन अपने समाज और युवाओं...
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गुरुवार, 29 नवंबर 2012

अधूरे सपनों की कसक : एक विश्लेषण और उपलब्धि !

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                              अधूरे सपनों की कसक को लेकर चली थी कि सबके आधे अधूरे सपनों से दो चार होंगे और फिर सोचेंगे कि  इन सपनों के सजने...
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शनिवार, 3 नवंबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (26) !

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                  सपने तो सपने हैं चाहे छोटे हों या बड़े , हर मन में बसते हैं . उम्र के साथ ये भी बढ़ाते जाते हैं। कभी हमने बच्चों से पूछा ...
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शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (25) !

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                    सपने की बात करे  तो फिर सपने अपने अपने  और अलग अलग शब्दों में व्यक्त किये जाते हैं    क्योंकि ये वह चीज है जो निजी हो...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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