प्रकाशनार्थ

अपनी सोच का शब्दों से श्रृंगार करें और फिर बाँटें अपने विचर और दूसरे से लें. कितना आसन है उन सबसे लड़ना जो हमें दुश्वार लगते हैं. कोई दिशा आप दें और कोई हम दें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि सूक्ति सार्थक हो जायेगी.

सोमवार, 28 मई 2018

वक्त : सावधान रहने का !

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                          संतान माता पिता या अभिभावकों के लिए सबसे प्रिय होती है और उसके लिए ही वो कठिन परिश्रम करते है और अपने सुख को भूल...
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शनिवार, 12 मार्च 2016

लकीरें !

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                                    ये तो विश्वास की बात है कि हमारे जीवन में लकीरों का कितना महत्व है और हमारे हाथ की लकीरें को पढने वाले...
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

साँझ जीवन की : रोशन करें हम !

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                                                       दिन के बाद जब साँझ आती तो दिन का अवसान होने को होता है और फिर रात और नयी स...
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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

नववर्ष : प्रथम दिवस !

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                         जीवन में अनुभव से धारणा बनती है और धीरे धीरे जब ये अनुभव बार बार होते जाते हैं तो ये धारणाएं मन में अपनी  गहरी पैठ...
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गुरुवार, 15 मई 2014

संयुक्त परिवार दिवस !

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                                    संयुक्त परिवार कल आने वाली पीढ़ी इतिहास के पन्नों पर पढ़ेगी जैसे हम अपने इतिहास में गुजरे ज़माने की पर्दा ...
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मंगलवार, 6 मई 2014

नयी पीढ़ी का स्वरूप !

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                                       कभी कभी कोई एक पंक्ति या फिर एक कमेंट पूरे के पूरे आलेख की पृष्ठभूमि तैयार कर जाती है. किस सोच ...
शनिवार, 12 अप्रैल 2014

सब ठीक हो जाएगा !

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                                 हमारी सोच सकारात्मक हो तो हमें अपने जीवन में परिणाम भी अच्छे मिलते हैं।  ये बात हमें दार्शनिकों , बड़े बूढ़ो...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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