प्रकाशनार्थ

अपनी सोच का शब्दों से श्रृंगार करें और फिर बाँटें अपने विचर और दूसरे से लें. कितना आसन है उन सबसे लड़ना जो हमें दुश्वार लगते हैं. कोई दिशा आप दें और कोई हम दें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि सूक्ति सार्थक हो जायेगी.

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

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इस विषय की  सार्थकता  क्या है? इस प्रश्न का सामना करने के लिए मैं पूरी तरह से तैयार हूँ. अभिभावक  इस देश के भविष्य को दिशा निर्देश देन...
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सोमवार, 15 मार्च 2010

दायित्व बनाम क़ानून!

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                            समाज में  संस्कार, संस्थाएं और उनसे बनी हमारी संस्कृति में बिखराव झलकने लगा है. इसको हम ज़माने का तकाजा या पश्चिम...
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शुक्रवार, 12 मार्च 2010

तरवा चाट चमचा भये - चमचा बन भये ...............

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           ये नेतन कि जातउ  न बड़ी खुशामद चाहत है, नेतन कि तारीफ के पुल बांधत रहौ धीरे धीरे गाँव से निकर के शहर और शहर  से निकर के दिल्ली प...
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बुधवार, 10 मार्च 2010

महिला आरक्षण विधेयक!

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                              महिला दिवस पर महिला आरक्षण विधेयक का , जो पिछले १४ वर्षों से लंबित पड़ा हुआ है, वही हश्र हुआ जो इतने वर्षों ...
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

'अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी'

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                                         कुछ खबरें कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं और वही विषय एक विचारणीय विषय होता है.                    ...
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शनिवार, 26 दिसंबर 2009

संबोधन - कितने अपने और कितने पराये!

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समाज में परिवार , मित्र और औपचारिक परिचय सबमें एक तारतम्य होता है और इसके लिए ही सामाजिक संबंधों का अपना महत्व है। हमारी संस्कृति में पुरा...
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गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

विकलांग दिवस - एक संदेश!

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आज अंतर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस है! एक ऐसा वर्ग , जो सामान्य से इतर है किंतु वे बेचारे नहीं है - इसके लिए इतिहास लिख...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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