प्रकाशनार्थ

अपनी सोच का शब्दों से श्रृंगार करें और फिर बाँटें अपने विचर और दूसरे से लें. कितना आसन है उन सबसे लड़ना जो हमें दुश्वार लगते हैं. कोई दिशा आप दें और कोई हम दें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि सूक्ति सार्थक हो जायेगी.

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

विकल्प हैं - उन्हें खोजें !

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मेरी कल की पोस्ट " कल का सच - जो आज देखा " आज की एक समस्या है , जिसे आम तौर पर हम कल झे...
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कल का सच - जो आज देखा !

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मैंने एक कहानी पढ़ी - लिखने वाला एक युवा लेखक लेकिन उसने जो भी लिखा इतना यथार्थ था कि खुद मुझे ...
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सोमवार, 18 जुलाई 2011

खुद भी सुसंस्कृत बनें !

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वैसे तो माँ - बाप के लिए जैसे ही किसी नए मेहमान के आने की बात सामने आती है , वे उसके भविष्य के लिए उसके नामकारण, शिक्षा और संस्कारों के ल...
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गुरुवार, 26 मई 2011

एक पहल ऐसी भी !

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अक्सर अख़बार में देखने को मिलता है कि किसी गरीब या फिर बीमारी से तबाह हो चुके व्यक्ति को आर्थिक सहायता की जरूरत है । म...
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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

परिवार संस्था पर संकट !

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परिवार संस्था आदिकाल से चली आ रही है और उसके अतीत को देखें तो दो और चार पीढ़ियों का एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं थ...
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मेरे बारे में

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रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
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