प्रकाशनार्थ

अपनी सोच का शब्दों से श्रृंगार करें और फिर बाँटें अपने विचर और दूसरे से लें. कितना आसन है उन सबसे लड़ना जो हमें दुश्वार लगते हैं. कोई दिशा आप दें और कोई हम दें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि सूक्ति सार्थक हो जायेगी.

रविवार, 3 अप्रैल 2011

या देवी सर्वभूतेषु ..............

›
कल से वासंतिक नवरात्रि का शुभारम्भ और साथ ही भारतीय नव संवत्सर का भी। वैसे तो नवरात्रिहमारे लिए बहुत ह...
18 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

अपराध बोध: न्याय कर पा रहे हैं?

›
ये मेरा नितान्त निजी विचार है और इसी लिए ये मेरी सोच पर ही लिख रही हूँ। ब्लॉग का निर्माण , उस पर लिखना और साझा ब्...
10 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ऐसा क्यों?

›
              भारतीय समाज की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार बेटी विदा होकर पति के घर ही जाती है. उसके माँ बाप उसके लालन पालन शिक्षा दीक्षा मे...
9 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

खाकी क्या संवेदनाएं हर लेती है?

›
                         पुलिस (खाकी) की छवि पूरे देश में कैसी भी हो? लेकिन यहाँ उ. प्र. में कानपुर की खाकी के किस्से से वाकिफ हूँ और उनको ...
14 टिप्‍पणियां:
मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

दूसरा विवाह !

›
                                                               विवाह को हम चाहे एक संस्कार समझें या फिर जीवन की जरूरत , इसके साथ बहुत सारी...
9 टिप्‍पणियां:
शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ऐसा भी क्या?

›
                         अनुशासन और सख्ती माँ बाप अपने बच्चों को संस्कारित और सुसंस्कृत बनाने के लिए रखना चाहते हैं और ये अपने बच्चों के हित...
15 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 17 नवंबर 2010

आदर्शवाद का ढोंग !

›
                              मैंने अपने जीवन में ऐसा कोई काम शायद जानबूझ कर नहीं किया कि लोग मुझ पर अंगुली उठा सकें लेकिन                 ...
21 टिप्‍पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
रेखा श्रीवास्तव
मैं अपने बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगी कि २५ साल तक आई आई टी कानपुर में कंप्यूटर साइंस विभाग में प्रोजेक्ट एसोसिएट के पद पर रहते हुए हिंदी भाषा ही नहीं बल्कि लगभग सभी भारतीय भाषाओं को मशीन अनुवाद के द्वारा जन सामान्य के समक्ष लाने के उद्देश्य से कार्य करते हुए . अब सामाजिक कार्य, काउंसलिंग और लेखन कार्य ही मुख्य कार्य बन चुका है. मेरे लिए जीवन में सिद्धांत का बहुत बड़ी भूमिका रही है, अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया. अगर हो सका तो किसी सही और गलत का भान कराती रही यह बात और है कि उसको मेरी बात समझ आई या नहीं.
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें
Blogger द्वारा संचालित.