आदिगुरु शंकरचार्य !
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापर:
अर्थात - ब्रह्म ही सत्य है यह जगत मिथ्या है जीव और ब्रह्म एक दूसरे से भिन्न नहीं है ।
यही आदि गुरु शंकराचार्य का यह प्रमुख उपदेश था।
सनातन धर्म के महान दार्शनिक और धर्म प्रवर्तक आदिगुरु शंकराचार्य को ही माना जाता है। उन्होंने ही हिंदू धर्म के पुनरुत्थान और अद्वैत वेदांत दर्शन को स्थापित करने के लिए बीड़ा उठाया था। उस समय बौद्ध, जैन तथा अन्य सनातन धर्म पर आघात करने वाले मतों को शास्त्रार्थ करके उसका स्थान सर्वोच्च रखा।
जन्म एवं संन्यास -- उनको भगवान शिव का अवतार माना जाता है। उनका जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को सन 788 में केरल राज्य के एर्नाकुलम जिले में कावड़ी नामक गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी मां का नाम आर्याम्बा और पिता का नाम शिवगुरु था। कहा जाता है कि उनके माता-पिता के विवाह के कई वर्ष तक संतति प्राप्त न होने पर उन्होंने भगवान शिव की आराधना की और पुत्र प्राप्ति की प्रार्थना की, जिससे उन्हें उसके परिणामस्वरुप पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
7 वर्ष की आयु में उन्हें पितृशोक की प्राप्ति हुई , लेकिन माँ ने उनकी शिक्षा दीक्षा की समुचित व्यवस्था की। इसके पश्चात ही उन्होंने संन्यास ग्रहण करने की इच्छा प्रकट की लेकिन मां ने उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। किंतु एक समय नर्मदा नदी में स्नान करते हुए एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया और उनको पानी के अंदर खींचने लगा, तब शंकर ने अपनी मां को आवाज देकर कहा कि या तो आप मुझे संन्यासी बनने की अनुमति दे दें या फिर यह मगरमच्छ मुझको खा जाएगा। उस हालत में मांँ सहमत हो गई और मगरमच्छ ने उनका पैर छोड़ दिया। अपने वचन के अनुसार माँ को 8 वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण करने की अनुमति देनी पड़ी। संन्यास ग्रहण करने के समय उन्होंने अपनी मांँ की जिम्मेदारी अपने परिजनों को सौंपते हुए वचन लिया कि उनकी मांँ की पूरी देखभाल करेंगे और अंत में उनकी अंत्येष्ट भी वही करेंगे। इसके बाद वह गुरु की तलाश में निकल गए। हिमाचल के बीच में बद्रीनाथ के पास एक आश्रम में उन्हें गुरु स्वामी गोविंद भागवत्पाद मिले, जो कि उनके गुरु बने।
गुरु ने उनसे प्रश्न किया कि वह कौन है?
शंकर ने उत्तर दिया - ना तो वह अग्नि है ना वायु है ना पृथ्वी है और ना ही जल है बल्कि हर रूप में अंदर की आत्मा अमर है। बाद में उन्होंने अपना परिचय दिया। गुरु गोविंदपाद ने उस महत्वाकांक्षी बालक से प्रभावित होकर दीक्षा देकर संन्यासी बना दिया। शंकर ने अद्वैत वेदांत दर्शन को सीखा और इस ज्ञान का बहुत प्रचार एवं प्रसार किया।
उन्होंने इसके बाद वाराणसी में जाकर भागवत गीता ब्रह्म सूत्र और उपनिषदों के ऊपर टिप्पणी की।
उनके जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं:--
प्रथम घटना -वाराणसी में शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ गंगा स्नान कर विश्वनाथ मंदिर जा रहे थे कि उनके सामने एक चांडाल अपने चार कुत्तों के साथ आ गया। चांडाल को छूना या उसकी छाया पड़ना भी अशुभ माना जाता था। शंकराचार्य ने कहा कि वह सामने से हट जाए लेकिन उसने हटने से इनकार कर दिया और कहा कि हे संन्यासी आप किसको हटने को कह रहे हैं शरीर को या आत्मा को ? यदि शरीर को तो हम दोनों का ही शरीर पंचतत्त्वों से बना है और यदि आत्मा को तो वह हर प्राणी में एक ही ब्रह्म (परमात्मा) विद्यमान है।'
उस चाण्डाल से इस अकाट्य तर्क को सुनकर शंकराचार्य निरुत्तर को गए और उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि ये कोई साधारण मनुष्य नहीं अपितु स्वयं भगवन शिव हैं , जो उनकी परीक्षा लेने आये हैं और वे दंडवत हो गये। उन्होंने उसे अपना गुरु मान लिया।
दूसरी घटना हुई जब उनको ज्ञात हुआ कि उनकी माताजी अस्वस्थ है तो वह कलाड़ी के लिए चल पड़े। वहाँ जाकर उन्होंने अपनी माँ को अंतिम समय में मुक्ति देने का वचन दिया और माँ के निधन के पश्चात उन्होंने उनकी अंत्येष्टि करने की ठानी, लेकिन ब्राह्मण समाज के अनुसार संन्यास लेने के बाद उसका परिवार से कोई संबंध नहीं रह जाता है अतः वे नहीं कर सकते। शंकराचार्य ने इस बात के विपरीत अपनी योग शक्ति से अग्नि प्रकट करके अपनी मांँ का अंतिम संस्कार किया।
तीसरी महत्वपूर्ण घटना - उनकी मंडन मिश्र जो कुमारिल भट्ट के शिष्य थे, के साथ की थी। मंडन मिश्र के साथ शास्त्रार्थ में यह तय हुआ था कि यदि मंडन मिश्र हारेंगे तो वह संन्यास ग्रहण कर लेंगे और अगर शंकराचार्य हारेंगे तो वह विवाह करके गृहस्थ जीवन ग्रहण करेंगे। इसमें जीत शंकराचार्य की हुई , लेकिन मंडन मिश्र की पत्नी भी विदुषी थी तो उन्होंने शंकराचार्य से कहा कि जब तक वह अर्धांगिनी है जब तक शास्त्रार्थ में उनको नहीं हराएंगे तब तक यह हार पूरी नहीं होगी। शंकराचार्य ने उनके साथ भी शास्त्रार्थ किया और भारती ने उनसे गृहस्थ जीवन और कामसूत्र के बारे में कुछ प्रश्न पूछे जिससे बाल ब्रह्मचारी शंकराचार्य जीत न पाये और वह उनसे पराजित हुए। लेकिन मंडन मिश्र ने संन्यास ग्रहण कर लिया।
प्रमुख मठ :--
चार मठ: सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए भारत के चारों कोनों में चार प्रसिद्ध मठ स्थापित किए:
ज्योतिर्मठ - बद्रिकाश्रम (उत्तराखंड)
गोवर्धन पीठ - पुरी (ओडिशा)
शारदा पीठ - द्वारका (गुजरात)
श्रृंगेरी पीठ - श्रृंगेरी (कर्नाटक)
प्रमुख रचनाएँ :--
आदि शंकराचार्य ने कई कालजयी ग्रंथों की रचना की। उनकी रचनाओं को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है:
1. भाष्य (टीकाएँ - प्रस्थानत्रयीपर):
2. ब्रह्मसूत्र भाष्य: अद्वैत दर्शन को स्थापित करने वाला सबसे प्रमुख ग्रंथ
3. उपनिषद भाष्य: ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य और बृहदारण्यक उपनिषदों पर प्रामाणिक टीका।
गीता भाष्य:-- श्रीमद्भगवद्गीता का अद्वैतपरक विश्लेषण।
प्रकरण ग्रंथ:-- (दार्शनिक और सैद्धांतिक पुस्तकें)।
विवेक चूड़ामणि:-- अद्वैत वेदांत का सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण स्वतंत्र ग्रंथ।
उपदेशसाहस्री:-- गद्य और पद्य में आध्यात्मिक शिक्षाओं का संकलन।
अपरोक्षानुभूति, आत्मबोध, और वाक्यवृत्ति।
स्तोत्र साहित्य (भक्तिपूर्ण रचनाएँ):
भज गोविन्दम् (मोहमद्गर):-- सांसारिक मोहमाया से मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला प्रसिद्ध स्तोत्र।
कनकधारा स्तोत्र:-- माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए रचा गया स्तोत्र।
सौन्दर्य लहरी:-- देवी स्तुति और तंत्र विद्या से संबंधित अद्भुत काव्य।
निर्वाण षटकम्, दक्षिणामूर्ति स्तोत्र, और महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र।
महापरिनिर्वाण -- शंकराचार्य का महापरिनिर्वाण 32 वर्ष की आयु में 820 ईस्वी में केदारनाथ में हुआ। उन्होंने इस नश्वर शरीर को त्यागकर हीअले की गुफाओं में 'कैवल्य' को प्राप्त किया। केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे उनकी समाधि स्थल को पूजा जाता है।
