पिछले दिनों केंद्र सरकार ने अपने पोर्टल पर और फेसबुक के सहारे इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा प्रणाली के विषय में मत संग्रह किया - जान सामान्य के विचार जानने के लिए यह एक बहुत ही अच्छा तरीका रहा। इस तरीके के पढ़ते पढ़ते ऐसा ही ख्याल आया कि पुरानी परिभाषाओं को परिमार्जित करके नया कलेवर दिया जा सकता है। लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप की जो दुर्दशा हो रही है, उससे हर कोई वाकिफ है। वंशानुगत दलों की बागडोर सभांलने वाले राजनेता और भावनाओं में बहने वाला मतदाता को जो अपने छाले जाने का अहसास होता तब तक वह पांच साल के लिए मजबूर हो चुका होता है। फिर भले ही वे अपने प्रतिनिधि को उनके ही पेट में लात मारकर अपनी तिजोरियां भरते हुए देखें या फिर निरंकुश शासक बन आने ही घर को कांचन महल बनाकर अंगूठा दिखाते रहें।
उनके चुने हुए प्रतिनिधि दलों के निर्जीव मुहरे होते हैं। जिन्हें पार्टी हाई कमान अपनी इच्छानुसार नाचता रहता है और सत्ता पर काबिज पटरी अपनी इच्छानुसार विधेयक बनाकर पेश करती रहती है। जिसमें लाभान्वित चाहे कोई भी न हो लेकिन अपनी सत्ता के भविष्य में काबिज रहने की संभावनाओं को पुख्ता करने के साधन जुटाए जाते हैं।
अब लोकतंत्र को वास्तव में जनता के लिए जनता के द्वारा शासन की परिभाषा को सत्य तो होने दीजिये। उसके अब सुधार की जरूरत हो रही है। जब समय के साथ हर क्षेत्र में क्रांति हो रही है फिर ये क्षेत्र अछूता क्यों रहे? अब इसको भी परिमार्जित किया जाना चाहिए। अब विधेयक का प्रारूप तैयार करने के बाद सदन में रखने से पूर्व ठीक इसी तरह से सरकारी पोर्टल और अन्य सोशल नेट वर्क पर डाल कर जनमत संग्रह होना चाहिए। ये सारे विधेयक सिर्फ सदन या संसद में लागू नहीं होने है। ये बनाये तो उनके प्रतिनिधियों के द्वारा ही हैं लेकिन उसके ही गले को काटने की तैयारी भी की जा रही है। ये सत्य है की ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग इन सब चीजों से वाकिफ नहीं है, वे कैसे भाग ले सकते हैं तो इसके लिए ग्राम पंचायतों में कंप्यूटर की व्यवस्था होनी चाहिए । ऐसे विधेयक या नए विधेयक की सम्पूर्ण रूपरेखा सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित या प्रदर्शित की जानी चाहिए । टी वी तो आजकल हर घर में है चाहे वे झुग्गी झोपड़ी में ही क्यों न रहते हों? उसकी जानकारी दी जानी चाहिए। सिर्फ जानकारी नहीं बल्कि उसमें मतदान के लिए भी रूचि जाग्रत किया जाना चाहिए। आरम्भ में इस प्रक्रिया को जटिल कह कर रद्द किया जा सकता है लेकिन इसको सहज भी बनाया जा सकता है। अपनी राय देने के साथ राय देने वाले का नाम और मतदाता संख्या का उल्लेख भी हो तो उसकी उपयोगिता और उसकी सत्यता को आँका जा सकता है। नहीं तो ये टी वी सीरियल की तरह फर्जी या फिर कई कई बार वोटिंग करके जनमत का मखौल उठाया जा सकता है। अगर इस प्रक्रिया को अपना लिया जाय तो फिर किसी अन्ना हजारे या रामदेव को अनशन या प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। किसी विधेयक को न्यायालय में चुनौती देकर न्यायिक सक्रियता के दायरे में नहीं लाया जाएगा। सदन के बहुमत पर ये मतदान भरी पड़ेगा। विधेयक की सार्थकता को समझाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग ही अगर इसमें शामिल हो जाता है तो फिर इसके सार्थक होने में संदेह नहीं किया जा सकता है। विधेयक राजनेताओं के स्वार्थ पूर्ति के लिए नहीं बल्कि प्रजा के कल्याण के लिए बनाये जाते हैं। यहाँ संसद में सत्तारूढ़ दल अपनी मनमानी और अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अपने अधिकारों का दुरूपयोग नहीं कर पायेंगे। सार्वजनिक तौर पर रखे गए विधेयक में सुधार भी प्रस्तावित किये जा सकते हैं। इस प्रक्रिया से गुजर कर जो विधेयक बनेगा वह लोकहित में होगा।
यहाँ कुछ विषयों को तुरुप का पत्ता बना कर बाजी हमेशा अपने पक्ष में ही नहीं रखी जायेगी।
सत्तारूढ़ दल के निरंकुश होते रवैये पर अंकुश लगाया जाना जरूरी है। लोक विरोध करता हुआ छटपटाता रहता है और हासिल उसको कुछ भी नहीं होता है। लोकपाल बिल, सांप्रदायिक हिंसा निषेध बिल के लिए किसी अन्ना हजारे या कालेधन के लिए किसी रामदेव बाबा को इस तरह से अनशन न करने पड़ते और न ही सरकार के कुकृत्यों के द्वारा लोक को लज्जित होना पड़ा।
अब लोक को ही जागरूक होना पड़ेगा, तभी तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ये जागरूकता हस्तांतरित होगीऔर फिर आज नहीं तो कल आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ समाज और सरकार मिल सकेगी । एक काले कारनामों से रहित और लोकहित के लिए सोचने वाली सरकार। क्या ऐसा संभव है? असंभव तो कुछ भी नहीं है और मुझे लगता है किआने वाली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से अधिक विस्तृत सोच रखती है। फिर इसके लिए ये प्रस्ताव कैसा है?
शुक्रवार, 5 अगस्त 2011
मंगलवार, 26 जुलाई 2011
विकल्प हैं - उन्हें खोजें !
मेरी कल की पोस्ट "कल का सच - जो आज देखा" आज की एक समस्या है, जिसे आम तौर परहम कल झेलेंगे क्योंकि ये आज की पीढ़ी है जिसमें से सभी तो नहीं लेकिन कुछ तो हैं जो बिल्कुल ऐसे ही बच्चों केलिए विकल्प खोज कर अपने काम को कर रही हैं। इसके विकल्प नहीं है ऐसा नहीं है - विकल्प हैं लेकिन हम उसकोअब महसूस करने के लिए तैयार नहीं है। हमारी प्राचीन संस्कृति ऐसे ही नहीं परिवार संस्था को अस्तित्व में रखे है। बच्चे आज भी अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध करते हैं। कई बार तो अपने भविष्य को दांव पर लगा कर माता पिता केलिए नौकरी चुन लेते हैं।
संयुक्त परिवार - आज संयुक्त परिवार की परिभाषा लम्बे चौड़े परिवार की नहीं रह गयी है बल्कि घर में बच्चों के दादादादी को ही शामिल कर लिया जाय तो वह संयुक्त हो जाता है। चाचा और बुआ अगर अविवाहित हैं तो इसमें आ जातेहैं। फिर होने को तो कई भाई एक साथ एक व्यवसाय में लग कर उसको चलाते रहते हैं। बात हम सिर्फ नौकरी पेशामाता पिता की कर रहे हैं। आप की ये कोशिश होनी चाहिए की अगर संभव है तो बच्चे को दादा दादी के पास ही छोड़ें। अगर आप शहर में ही अलग रह रहे हैं तो भी वह अपने पोते को रखने से इंकार नहीं करेंगे। लेकिन अपनी सोच किमेरा बच्चा दादा दादी के पास बिगड़ जाएगा उसको वे अपने तरीके से सिखायेंगे ( आप उसको कुछ और सीखना चाहती हों) लेकिन वह वहाँ सुरक्षित और प्यार के बीच रहेगा। आपके दूर रहने पर भी उसे प्यार से वंचित नहीं होनापड़ेगा।
कितनी बहुएँ हैं जो बच्चो को कृच में छोड़ना पसंद करती हैं और दादा दादी तरसते रहते हैं। उस समय आप ही दोषी हैं , बच्चे के उस सवाल के कि पैसे से प्यार नहीं मिलता है।
पाश्चात्य संस्कृति - दोनों कामकाजी लोग अपने जीवन स्तर को अलग ढंग से बनाने के पक्षधर भी देखे गए हैं। वो दोनों नौकरी कर रहे हैं एक बेहतर जीवन जीने के लिए लेकिन अपने जीवन का सुख खोने के लिए नहीं।
'अब तुम बड़े हो गए हो , अपने कमरे में सोओ।'
'मम्मी सारे दिन काम करती है रात में तो उसे चैन लेने दिया करो।'
'प्लीज इस समय मुझसे कुछ मत बोलो, मैं अकेले रहना चाहती हूँ।'
'तुम जाओ दोस्तों के संग खेलो , मुझे परेशान मत करो।'
ये आम जुमले हैं, मैं मानती हूँ कि आप दिन भर में थक कर आती हैं लेकिन वह बच्चा भी तोदिन भर अकेले रहता है और चाहता है कि कब मम्मी आये और वह उसके साथ बैठे। उसकी गोद में खेले। उससे आपअपनी थकान या परेशानी की आड़ में उनका प्यार तो नहीं छीन रहीं है। अगर परिवार बनाया है तो अतिरिक्तदायित्वों और परिश्रम आपकी नियति बन चुकी है। फिर अपनी झुंझलाहट आप बच्चे पर निकलें तो वह खुदबखुद दूरहो जायेगा।
उसे भी समय चाहिए और आप आकर कुछ देर के लिए उसे गोद में लेकर प्यार कर लें आप कोआराम करना है तो उसको लेकर बेड पर लेट जाइए उसे भी लिटा लीजिये । देखिये उसके सानिंध्य में आप की थकानकितनी जल्दी उतर जाती है और वह कितना खुश हों जाता है? ये आपसे जोड़ने का एक तरीका है। दिन भर वह अलगरहता है तो उसके लिए माँ एक नियामत होती है।
अपनी पार्टी ये चीज तो कामकाजी ही नहीं बड़े घरों की महिलाओं के लिए एक मनोरंजन का साधनहोता है , के लिए बच्चों को छोड़ देना अकलमंदी नहीं है। उन्हें बड़ा होने का इन्तजार कीजिये और अपने बच्चे केमनोविज्ञान का भी आपको ज्ञान होना चाहिए कुछ बच्चे अतिसंवेदनशील होते हैं उनको दूसरे ढंग से देखना पड़ता है। उनके साथ बातचीत की भाषा और लहजा भी उनको आहत कर सकता है तो एक माता पिता होने के नाते इस बात काध्यान तो जरूर रखें। उन्हें ये अहसास न होने दें कि वे पता नहीं क्यों उन्हें डिस्टर्ब करने के लिए आ जाते हैं। बाल मनउस कच्ची मिट्टी की तरह होता है की जिस पर एक बार जो छाप बन गयी न तो फिर जीवन भर नहीं मिट पाती है।
कामकाजी होने के साथ बच्चों को पर्याप्त समय दें। छुट्टी में उन्हें उनकी तरह से जीने का हक़दीजिये। आप रोज निकलती हैं तो आप को लगेगा की एक छुट्टी का दिन मिला है तो आराम कर लें लेकिन वे रोजएक ही जीवन जीते हाँ या घर में रहते हैं या फिर क्रच में - उन्हें भी तो चेंज चाहिए और फिर ऐसे क्षणों में वे अपनेआप को आपके बहुत करीब पाते हैं।
अगर कर सकती हों और आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े तो कुछ सालों का आप ब्रेक भी लेसकती हैं और फिर दुबारा जॉब शुरू कर सकती हैं और नहीं संभव है तो फिर कोशिश ये करें कि बच्चे माँ की कमीदूसरे लोगों या फिर बेजान खिलौने में खोजने के लिए मजबूर न हों। ऐसे बच्चों को दूसरे लोग बरगला भी लेते हैं औरउनको गलत रास्ते पर भी ले जाने से नहीं चूकते हैं।
जिनके भविष्य के लिए आप इतना परिश्रम कर रहे हैं और कल को वो आपको ही कटघरे में खड़ाकरके सवाल पूछे तो फिर आपकी सारी मेहनत और प्रयास असफल हों जाता है। बच्चों को दूर न करें । यथासंभवउन्हें अपने करीब रखें। जब उनकी उम्र दूर जाने की होती है तो फिर तो वे दूर चले ही जाते हैं।
बच्चों को कभी भी प्रताड़ित करने के लिए उन्हें ऐसे न कहें -
'बहुत परेशान करोगे तो होस्टल में डाल दूँगा।'
'एक ही शहर में रहते हुए उन्हें होस्टल में यथासंभव न डालें।'
'घर की छत के नीचे जो सुख और प्यार है वह कहीं और नसीब नहीं होता, इस बात का अहसासे आप भी करें औरउन्हें भी करने दें। प्यार देंगे तो प्यार मिलेगा - दूरियां बनायेंगे तो फिर प्यार की आशा कैसे कर सकते हैं? वे वहीसीखते हैं जो हम उनको सिखाते हैं या बातें सिर्फ बोल कर ही नहीं सिखाई जाती है बल्कि इसको तो वे हमारे व्यवहार से भी सीख जाते हैं।
संयुक्त परिवार - आज संयुक्त परिवार की परिभाषा लम्बे चौड़े परिवार की नहीं रह गयी है बल्कि घर में बच्चों के दादादादी को ही शामिल कर लिया जाय तो वह संयुक्त हो जाता है। चाचा और बुआ अगर अविवाहित हैं तो इसमें आ जातेहैं। फिर होने को तो कई भाई एक साथ एक व्यवसाय में लग कर उसको चलाते रहते हैं। बात हम सिर्फ नौकरी पेशामाता पिता की कर रहे हैं। आप की ये कोशिश होनी चाहिए की अगर संभव है तो बच्चे को दादा दादी के पास ही छोड़ें। अगर आप शहर में ही अलग रह रहे हैं तो भी वह अपने पोते को रखने से इंकार नहीं करेंगे। लेकिन अपनी सोच किमेरा बच्चा दादा दादी के पास बिगड़ जाएगा उसको वे अपने तरीके से सिखायेंगे ( आप उसको कुछ और सीखना चाहती हों) लेकिन वह वहाँ सुरक्षित और प्यार के बीच रहेगा। आपके दूर रहने पर भी उसे प्यार से वंचित नहीं होनापड़ेगा।
कितनी बहुएँ हैं जो बच्चो को कृच में छोड़ना पसंद करती हैं और दादा दादी तरसते रहते हैं। उस समय आप ही दोषी हैं , बच्चे के उस सवाल के कि पैसे से प्यार नहीं मिलता है।
पाश्चात्य संस्कृति - दोनों कामकाजी लोग अपने जीवन स्तर को अलग ढंग से बनाने के पक्षधर भी देखे गए हैं। वो दोनों नौकरी कर रहे हैं एक बेहतर जीवन जीने के लिए लेकिन अपने जीवन का सुख खोने के लिए नहीं।
'अब तुम बड़े हो गए हो , अपने कमरे में सोओ।'
'मम्मी सारे दिन काम करती है रात में तो उसे चैन लेने दिया करो।'
'प्लीज इस समय मुझसे कुछ मत बोलो, मैं अकेले रहना चाहती हूँ।'
'तुम जाओ दोस्तों के संग खेलो , मुझे परेशान मत करो।'
ये आम जुमले हैं, मैं मानती हूँ कि आप दिन भर में थक कर आती हैं लेकिन वह बच्चा भी तोदिन भर अकेले रहता है और चाहता है कि कब मम्मी आये और वह उसके साथ बैठे। उसकी गोद में खेले। उससे आपअपनी थकान या परेशानी की आड़ में उनका प्यार तो नहीं छीन रहीं है। अगर परिवार बनाया है तो अतिरिक्तदायित्वों और परिश्रम आपकी नियति बन चुकी है। फिर अपनी झुंझलाहट आप बच्चे पर निकलें तो वह खुदबखुद दूरहो जायेगा।
उसे भी समय चाहिए और आप आकर कुछ देर के लिए उसे गोद में लेकर प्यार कर लें आप कोआराम करना है तो उसको लेकर बेड पर लेट जाइए उसे भी लिटा लीजिये । देखिये उसके सानिंध्य में आप की थकानकितनी जल्दी उतर जाती है और वह कितना खुश हों जाता है? ये आपसे जोड़ने का एक तरीका है। दिन भर वह अलगरहता है तो उसके लिए माँ एक नियामत होती है।
अपनी पार्टी ये चीज तो कामकाजी ही नहीं बड़े घरों की महिलाओं के लिए एक मनोरंजन का साधनहोता है , के लिए बच्चों को छोड़ देना अकलमंदी नहीं है। उन्हें बड़ा होने का इन्तजार कीजिये और अपने बच्चे केमनोविज्ञान का भी आपको ज्ञान होना चाहिए कुछ बच्चे अतिसंवेदनशील होते हैं उनको दूसरे ढंग से देखना पड़ता है। उनके साथ बातचीत की भाषा और लहजा भी उनको आहत कर सकता है तो एक माता पिता होने के नाते इस बात काध्यान तो जरूर रखें। उन्हें ये अहसास न होने दें कि वे पता नहीं क्यों उन्हें डिस्टर्ब करने के लिए आ जाते हैं। बाल मनउस कच्ची मिट्टी की तरह होता है की जिस पर एक बार जो छाप बन गयी न तो फिर जीवन भर नहीं मिट पाती है।
कामकाजी होने के साथ बच्चों को पर्याप्त समय दें। छुट्टी में उन्हें उनकी तरह से जीने का हक़दीजिये। आप रोज निकलती हैं तो आप को लगेगा की एक छुट्टी का दिन मिला है तो आराम कर लें लेकिन वे रोजएक ही जीवन जीते हाँ या घर में रहते हैं या फिर क्रच में - उन्हें भी तो चेंज चाहिए और फिर ऐसे क्षणों में वे अपनेआप को आपके बहुत करीब पाते हैं।
अगर कर सकती हों और आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े तो कुछ सालों का आप ब्रेक भी लेसकती हैं और फिर दुबारा जॉब शुरू कर सकती हैं और नहीं संभव है तो फिर कोशिश ये करें कि बच्चे माँ की कमीदूसरे लोगों या फिर बेजान खिलौने में खोजने के लिए मजबूर न हों। ऐसे बच्चों को दूसरे लोग बरगला भी लेते हैं औरउनको गलत रास्ते पर भी ले जाने से नहीं चूकते हैं।
जिनके भविष्य के लिए आप इतना परिश्रम कर रहे हैं और कल को वो आपको ही कटघरे में खड़ाकरके सवाल पूछे तो फिर आपकी सारी मेहनत और प्रयास असफल हों जाता है। बच्चों को दूर न करें । यथासंभवउन्हें अपने करीब रखें। जब उनकी उम्र दूर जाने की होती है तो फिर तो वे दूर चले ही जाते हैं।
बच्चों को कभी भी प्रताड़ित करने के लिए उन्हें ऐसे न कहें -
'बहुत परेशान करोगे तो होस्टल में डाल दूँगा।'
'एक ही शहर में रहते हुए उन्हें होस्टल में यथासंभव न डालें।'
'घर की छत के नीचे जो सुख और प्यार है वह कहीं और नसीब नहीं होता, इस बात का अहसासे आप भी करें औरउन्हें भी करने दें। प्यार देंगे तो प्यार मिलेगा - दूरियां बनायेंगे तो फिर प्यार की आशा कैसे कर सकते हैं? वे वहीसीखते हैं जो हम उनको सिखाते हैं या बातें सिर्फ बोल कर ही नहीं सिखाई जाती है बल्कि इसको तो वे हमारे व्यवहार से भी सीख जाते हैं।
कल का सच - जो आज देखा !
मैंने एक कहानी पढ़ी - लिखने वाला एक युवा लेखक लेकिन उसने जो भी लिखा इतना यथार्थथा कि खुद मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब कल यही उत्तर मिलने वाला है। कहानी में एक युवा पुत्र नेअपने माता - पिता को एक पत्र लिखा था, उनके इस बात की दुहाई देने के लिए कि मुझे तुम्हारी अब जरूरत है , मेरे पास पैसा बहुत है और विदेश से नौकरी छोड़ कर यहाँ आ जाओ।
लिखने वाले की कलम की धार देखने काबिल थी, जो जो तथ्य उसने प्रस्तुत किये उससे उसनेअपने ही माता पिता को कटघरे में खड़ा कर दिया जिसके लिए कोई सफाई न मैं पेश कर सकती हूँ और न वह माँबाप कर पाए होंगे। वह भावी पीढ़ी के लिए एक कटु सत्य है और उसको झेलना ही होगा। आज की पीढ़ी जो जीवनस्तर, आधुनिक सुख सुविधाओं और सोसायटी में अपनी जगह बनाने के लिए जिस तरह से भाग रही है औरजीवन को एन्जॉय करना चाह रही है , उसके लिए बहुत कुछ खो भी रही है।
अगर हम अपनी पीढ़ी की बात करें तो हमारी कामकाजी होने के बाद भी अपने मध्यमवर्गीयपारिवारिक मूल्यों का वहन करती रही। काम के बाद बच्चों को अपने सीने से लगाकर सुलाया है। घर पर नहीं रहीतब भी आया के आँचल में नहीं दिया। संयुक्त परिवार के परिवेश में जिया । इसके लिए हमने अपने तन, मन औरधन तीनों से कीमत भी चुकाई लेकिन बच्चों के लिए 'घर' का अर्थ 'घर ' ही रहने दिया। माँ नहीं है तो बाबा दादी हैं , ताई या चाची हैं। उनको खाना निकाल कर तो दिया। स्कूल से आने पर अपने पास सुला तो लिया। नहीं तो अपनेभाई बहनों के संग सुरक्षित घर के माहौल में बच्चे रहे।
आज के बच्चे भी वही दिल लेकर पैदा होते हैं और उनके दिल भी हमारे बच्चों के तरह से ही धड़कतेहैं। वे भी चाहते हैं कि कुछ पल माँ के साए में गुजरें। ममता के अर्थ नहीं बदल जाते - हमारी सोच ने उसे बदलदिया है। आज की युवा पीढ़ी अर्थ के पीछे दौड़ रही है। अधिक से अधिक कामना और सुख सुविधाओं को जुटानायद्यपि वह ये सब सिर्फ अपने लिए नहीं कर रही है बल्कि बच्चों के लिए भी कर रही है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर मेंअच्छे स्कूल में पढ़ाना , आधुनिक जीवन मूल्यों के अनुसार बच्चों के अलग बेडरूम को अच्छे से सजाना औरउनके जरा सा बड़ा होते ही अलग कमरे में डाल देना। चाहे बच्चा रात में डर के मारे सो न पाए लेकिन उसे पाश्चात्यसंस्कृति के अनुसार जीना है। फिर हम भारतीयता कि दुहाई क्यों देने लगते हैं?
नौकरी के चलते छुट्टी के ख़त्म होते ही बच्चे को डे केयर सेंटर में छोड़ना होता है क्योंकि घर मेंकिसी को रहना नहीं होता है और आया के सहारे छोड़ने से अच्छा है कि बच्चा कई बच्चों के साथ रहे। सुबह जबबच्चा सोना चाहता है तब ऑफिस जाने की जल्दी में जल्दी से बच्चे को कभी कभी तो फ्रेश कराये बिना ही सेंटर मेंछोड़ दिया जाता है और बच्चा कई बार रोता रह जाता है। बच्चे को आया को पकड़ा कर माँ चल देती है. ये माँ केलिए मजबूरी ही सही लेकिन बच्चे के दिल में माँ के प्रति पलने वाला प्यार कहीं खोने लगता है। वह उसके पासरहता ही कितना है? माँ बाप को लगता है कि बच्चे को अच्छे से अच्छा मुहैया करवा रहे हैं तो उसको कोई भीशिकायत नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर माँ का आँचल और बाप का साया ही न मिला तो बच्चा निर्जीव चीजों केसाथ दोस्ती कर अपने संवेदनाओं को उनके साथ ही जोड़ लेता है और फिर अगर माँ उसके खिलौने कहीं उठा कररख भी दे तो वह रो रो कर उनकी मांग करता है तब उसको माँ नहीं अपने लिए वही जरूरी लगने लगते हैं।
रात में कभी कभी माँ पापा को पार्टी में जाना होता है और वे बच्चे को घर में बंद करके चल देते हैंक्योंकि पार्टी की औपचारिकता के अनुसार बच्चे वहाँ नहीं ले जा पाते हैं । एक वह अवसर भी बच्चों के सानिंध्य का छिन जाता है। उस नन्हे से मन की आत्मा कितनी आहत हुई ये हम नहीं समझ पाते हैं।
-हम बढ़िया से बढ़िया सामान मुहैया कराते हैं , हम कमाते किसके लिए हैं? इन्हीं बच्चों के लिए न।
-तुम्हारे किसी और दोस्त के पास हैं इतनी सारे खिलौने या फिर ऐसे समान - शायद नहीं लेकिन उनके पास कुछऔर होता है जो उसके पास नहीं होता है।
अगर कहें कि ये उनकी मजबूरी होती है , दोनों न कमायें तो खर्च कैसे उठायें? जीवन स्तर अच्छाकैसे बनायें? अपने फ्रेंड सर्किल में अपनी प्रतिष्ठा कैसे बना पायेंगे? पर इसकी कीमत बाल मन चुका रहा होता है। जब उसको माता पिता का प्यार नहीं मिला तो उसके मन में उनके प्रति प्यार कहाँ से आएगा? लगाव कैसे होगा?
बच्चे थोड़े से बड़े होते हैं , टी वी, कंप्यूटर, आई पोड से सुसज्जित कर दिए जाते हैं और फिर उन्हें किसी की जरूरतभी नहीं रहती है। अपने नेट से बनाये फ्रेंड सर्किल और अपनी बातें शेयर करने के लिए उनके पास बहुत से विकल्पआ जाते हैं फिर उन्हें किसी की जरूरत भी नहीं होती है। होस्टल, अपनी पढ़ाई और फिर कैरियर के लिए कोशिशकरना उनको और अधिक दूर कर लेता है।
अब कहीं उनके लिए अपनी मित्र मंडली ही सबसे बड़ी सहारा और दिशा देने वाली होती है। जॉबलगने पर छुट्टियों में वे घर आने कि बजाय घूमने के लिए निकल जाना अधिक पसंद करते हैं। क्योंकि उनकोलगता है घर जाने पर कोई दोस्त तो मिलेगा नहीं घर में रहकर करेंगे क्या? इसलिए बेहतर है कि टूरिस्ट प्लेस परजाकर छुट्टियाँ बिता आते हैं।
जब उन्हें हमारे साथ की जरूरत थी हम पैसे के पीछे भागते रहे और साथ ही अपनी सोसायटी मेंजगह बनाने के लिए हमारी गतिविधियाँ भी जारी रहनी चाहिए थी उसमें बच्चों के लिए कोई जगह नहीं थी। अबबच्चों के दिल में हमारे लिए कोई जगह नहीं है। उस बच्चे का एक उत्तर बहुत अच्छा लगा था। 'पापा पैसा आजमेरे पास भी बहुत है लेकिन इस पैसे से प्यार नहीं मिलता । जैसे आपने मेरे लिए सारी आधुनिक सुविधाएँ खरीदकर घर में कैद कर दिया था । मैं आप लोगों को और पैसे भेज देता हूँ। जो आपको चाहिए हो लेटेस्ट फैशन का लेलीजिये। लेकिन हमारे पास वह प्यार है ही नहीं हो हमें आपसे जोड़ सके। मार्था ने नौकरी छोड़ दी है क्योंकि वहअपने बच्चे को अधिक महत्वपूर्ण समझती है। पापा वह तो विदेशी है लेकिन उसके अन्दर ममता और प्यार दोनोंही है। ये प्यार हम बच्चे को किसी भी कीमत पर खरीद कर नहीं दे सकते हैं। हम तो आपको वही दे सकते हैं जोआपने हमें दिया। हम कहाँ से लायें जो हमें आपसे मिला ही नहीं। आशा करता हूँ कि आप मुझे क्षमा कर देंगे। '
आने वाली पीढ़ी को दोष किस बिला पर दें। अगर बच्चा माँ के आँचल की गर्मी महसूस नहीं कर सकातो फिर आज वह कशिश कहाँ से लाएगा? अभी समय है हमें इसके विकल्प खोज लेने चाहिए और सोचना चाहिएकि अगर हमें आज ये उत्तर मिल रहा है तो फिर हमने अपने माता पिता को तो आँचल की छाँव में पालने के बाद भीकुछ नहीं दिया।
लिखने वाले की कलम की धार देखने काबिल थी, जो जो तथ्य उसने प्रस्तुत किये उससे उसनेअपने ही माता पिता को कटघरे में खड़ा कर दिया जिसके लिए कोई सफाई न मैं पेश कर सकती हूँ और न वह माँबाप कर पाए होंगे। वह भावी पीढ़ी के लिए एक कटु सत्य है और उसको झेलना ही होगा। आज की पीढ़ी जो जीवनस्तर, आधुनिक सुख सुविधाओं और सोसायटी में अपनी जगह बनाने के लिए जिस तरह से भाग रही है औरजीवन को एन्जॉय करना चाह रही है , उसके लिए बहुत कुछ खो भी रही है।
अगर हम अपनी पीढ़ी की बात करें तो हमारी कामकाजी होने के बाद भी अपने मध्यमवर्गीयपारिवारिक मूल्यों का वहन करती रही। काम के बाद बच्चों को अपने सीने से लगाकर सुलाया है। घर पर नहीं रहीतब भी आया के आँचल में नहीं दिया। संयुक्त परिवार के परिवेश में जिया । इसके लिए हमने अपने तन, मन औरधन तीनों से कीमत भी चुकाई लेकिन बच्चों के लिए 'घर' का अर्थ 'घर ' ही रहने दिया। माँ नहीं है तो बाबा दादी हैं , ताई या चाची हैं। उनको खाना निकाल कर तो दिया। स्कूल से आने पर अपने पास सुला तो लिया। नहीं तो अपनेभाई बहनों के संग सुरक्षित घर के माहौल में बच्चे रहे।
आज के बच्चे भी वही दिल लेकर पैदा होते हैं और उनके दिल भी हमारे बच्चों के तरह से ही धड़कतेहैं। वे भी चाहते हैं कि कुछ पल माँ के साए में गुजरें। ममता के अर्थ नहीं बदल जाते - हमारी सोच ने उसे बदलदिया है। आज की युवा पीढ़ी अर्थ के पीछे दौड़ रही है। अधिक से अधिक कामना और सुख सुविधाओं को जुटानायद्यपि वह ये सब सिर्फ अपने लिए नहीं कर रही है बल्कि बच्चों के लिए भी कर रही है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर मेंअच्छे स्कूल में पढ़ाना , आधुनिक जीवन मूल्यों के अनुसार बच्चों के अलग बेडरूम को अच्छे से सजाना औरउनके जरा सा बड़ा होते ही अलग कमरे में डाल देना। चाहे बच्चा रात में डर के मारे सो न पाए लेकिन उसे पाश्चात्यसंस्कृति के अनुसार जीना है। फिर हम भारतीयता कि दुहाई क्यों देने लगते हैं?
नौकरी के चलते छुट्टी के ख़त्म होते ही बच्चे को डे केयर सेंटर में छोड़ना होता है क्योंकि घर मेंकिसी को रहना नहीं होता है और आया के सहारे छोड़ने से अच्छा है कि बच्चा कई बच्चों के साथ रहे। सुबह जबबच्चा सोना चाहता है तब ऑफिस जाने की जल्दी में जल्दी से बच्चे को कभी कभी तो फ्रेश कराये बिना ही सेंटर मेंछोड़ दिया जाता है और बच्चा कई बार रोता रह जाता है। बच्चे को आया को पकड़ा कर माँ चल देती है. ये माँ केलिए मजबूरी ही सही लेकिन बच्चे के दिल में माँ के प्रति पलने वाला प्यार कहीं खोने लगता है। वह उसके पासरहता ही कितना है? माँ बाप को लगता है कि बच्चे को अच्छे से अच्छा मुहैया करवा रहे हैं तो उसको कोई भीशिकायत नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर माँ का आँचल और बाप का साया ही न मिला तो बच्चा निर्जीव चीजों केसाथ दोस्ती कर अपने संवेदनाओं को उनके साथ ही जोड़ लेता है और फिर अगर माँ उसके खिलौने कहीं उठा कररख भी दे तो वह रो रो कर उनकी मांग करता है तब उसको माँ नहीं अपने लिए वही जरूरी लगने लगते हैं।
रात में कभी कभी माँ पापा को पार्टी में जाना होता है और वे बच्चे को घर में बंद करके चल देते हैंक्योंकि पार्टी की औपचारिकता के अनुसार बच्चे वहाँ नहीं ले जा पाते हैं । एक वह अवसर भी बच्चों के सानिंध्य का छिन जाता है। उस नन्हे से मन की आत्मा कितनी आहत हुई ये हम नहीं समझ पाते हैं।
-हम बढ़िया से बढ़िया सामान मुहैया कराते हैं , हम कमाते किसके लिए हैं? इन्हीं बच्चों के लिए न।
-तुम्हारे किसी और दोस्त के पास हैं इतनी सारे खिलौने या फिर ऐसे समान - शायद नहीं लेकिन उनके पास कुछऔर होता है जो उसके पास नहीं होता है।
अगर कहें कि ये उनकी मजबूरी होती है , दोनों न कमायें तो खर्च कैसे उठायें? जीवन स्तर अच्छाकैसे बनायें? अपने फ्रेंड सर्किल में अपनी प्रतिष्ठा कैसे बना पायेंगे? पर इसकी कीमत बाल मन चुका रहा होता है। जब उसको माता पिता का प्यार नहीं मिला तो उसके मन में उनके प्रति प्यार कहाँ से आएगा? लगाव कैसे होगा?
बच्चे थोड़े से बड़े होते हैं , टी वी, कंप्यूटर, आई पोड से सुसज्जित कर दिए जाते हैं और फिर उन्हें किसी की जरूरतभी नहीं रहती है। अपने नेट से बनाये फ्रेंड सर्किल और अपनी बातें शेयर करने के लिए उनके पास बहुत से विकल्पआ जाते हैं फिर उन्हें किसी की जरूरत भी नहीं होती है। होस्टल, अपनी पढ़ाई और फिर कैरियर के लिए कोशिशकरना उनको और अधिक दूर कर लेता है।
अब कहीं उनके लिए अपनी मित्र मंडली ही सबसे बड़ी सहारा और दिशा देने वाली होती है। जॉबलगने पर छुट्टियों में वे घर आने कि बजाय घूमने के लिए निकल जाना अधिक पसंद करते हैं। क्योंकि उनकोलगता है घर जाने पर कोई दोस्त तो मिलेगा नहीं घर में रहकर करेंगे क्या? इसलिए बेहतर है कि टूरिस्ट प्लेस परजाकर छुट्टियाँ बिता आते हैं।
जब उन्हें हमारे साथ की जरूरत थी हम पैसे के पीछे भागते रहे और साथ ही अपनी सोसायटी मेंजगह बनाने के लिए हमारी गतिविधियाँ भी जारी रहनी चाहिए थी उसमें बच्चों के लिए कोई जगह नहीं थी। अबबच्चों के दिल में हमारे लिए कोई जगह नहीं है। उस बच्चे का एक उत्तर बहुत अच्छा लगा था। 'पापा पैसा आजमेरे पास भी बहुत है लेकिन इस पैसे से प्यार नहीं मिलता । जैसे आपने मेरे लिए सारी आधुनिक सुविधाएँ खरीदकर घर में कैद कर दिया था । मैं आप लोगों को और पैसे भेज देता हूँ। जो आपको चाहिए हो लेटेस्ट फैशन का लेलीजिये। लेकिन हमारे पास वह प्यार है ही नहीं हो हमें आपसे जोड़ सके। मार्था ने नौकरी छोड़ दी है क्योंकि वहअपने बच्चे को अधिक महत्वपूर्ण समझती है। पापा वह तो विदेशी है लेकिन उसके अन्दर ममता और प्यार दोनोंही है। ये प्यार हम बच्चे को किसी भी कीमत पर खरीद कर नहीं दे सकते हैं। हम तो आपको वही दे सकते हैं जोआपने हमें दिया। हम कहाँ से लायें जो हमें आपसे मिला ही नहीं। आशा करता हूँ कि आप मुझे क्षमा कर देंगे। '
आने वाली पीढ़ी को दोष किस बिला पर दें। अगर बच्चा माँ के आँचल की गर्मी महसूस नहीं कर सकातो फिर आज वह कशिश कहाँ से लाएगा? अभी समय है हमें इसके विकल्प खोज लेने चाहिए और सोचना चाहिएकि अगर हमें आज ये उत्तर मिल रहा है तो फिर हमने अपने माता पिता को तो आँचल की छाँव में पालने के बाद भीकुछ नहीं दिया।
सोमवार, 18 जुलाई 2011
खुद भी सुसंस्कृत बनें !
वैसे तो माँ - बाप के लिए जैसे ही किसी नए मेहमान के आने की बात सामने आती है , वे उसके भविष्य के लिए उसके नामकारण, शिक्षा और संस्कारों के लिए सपने बुनने लगते हैं (अपवाद इसके भी हो सकते हैं.) . जब वह दुनियाँ में आ जाता है तो फिर वह उसके इर्द गिर्द अपने जीवन को समेट लेते हैं. फिर मुँह से पहले शब्द के निकलने के साथ ही उसको अपने अनुसार ही शब्दों को सुनने के लिए लालायित रहते हैं. लेकिन ये पेरेंटिंग की जरूरत बच्चों को जितनी जरूरी है उतनी ही अपने आपको भी एक आदर्श ढांचे में ढाल कर रखने की जरूरत भी होती है. बच्चे सिर्फ वह नहीं देखते हैं जो आप उन्हें समझाते हैं बल्कि वे वह भी देखते हैं जो आप उनको अपने कार्यों के द्वारा दिखाते हैं. अपने व्यवहार को भी संयत रखने की बराबर जरूरत होती है. मेरी एक परिचित के घर में उनके मायके वाले अक्सर ही आते रहते हैं और कभी बीमार होने पर यहाँ पर रुके भी रहते हैं. लेकिन उनकी सास-ससुर अगर आ जाते हैं तो उनका प्रयास रहता है कि वह कुछ दिन बाद देवर या जेठ के घर चले जाएँ. बच्चे इस बात को बहुत ही बारीकी से नोटिस में लेते रहे. एक बार उनके पिता जी आये उनको दमे की बीमारी थी. ये सब चीजें सिखाने से नहीं आती हैं बल्कि बच्चों के द्वारा ग्रहण करने की होती हैं. जो हम उन्हें अपरोक्ष रूप से दिखाते हैं. कुछ प्रतिशत की बात छोड़ दें तो बच्चे घर से ही ग्रहण करते हैं और वही अपने जीवन में उतार लेते हैं. हमें तो बच्चों को सुसंस्कृत बनाने के लिए खुद को भी संयमित और सुसंस्कारित होने की जरूरत होती है. इसी लिए कहा जाता है कि बच्चे कोटि स्लेट की तरह से होते हैं और कुछ हम खुद लिख देते हैं और कुछ वे खुद ग्रहण कर लेते हैं . बच्चों के बिगड़ने पर हम उन्हें दोष नहीं दे सकते हैं. अपने गिरेबान में अगर खुद ही झांक कर आकलन कर लें तो बहुत अच्छा होगा न किसी को दोष देंगे और न कोई दोषी होगा.
वह कई महीने तक रहे और एक दिन उनकी बेटी ने कह दिया - मम्मी जब दादी यहाँ रहती थी और उनको खांसी आती थी तो आप कहती थीं कि इससे इन्फेक्शन लग सकता है और अब नाना जी के रहने से कोई इन्फेक्शन नहीं हो रहा है.
उन लोगों ने सोचा भी नहीं होगा कि उनकी अपनी बेटी जिसे वे संस्कार दे रहे हैं और अपनी बातों पर कभी ध्यान नहीं देते हैं कि हम क्या कर रहे हैं? उस बच्ची के कथन ने उन्हें आइना दिखा दिखा दिया. मेरे विचार से अगर हम अच्छे संस्कारित बच्चों की उम्मीद करते हैं तो हमें अपनी ओर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी होता है.
ऐसी कहानी तो बहुत सुनी हैं और देखा भी है कि अगर घर में बच्चे अपने माता पिता को जैसा करते हुए देखते हैं वैसे ही करने कि उनकी सोच बनती है. नहीं मालूम ये कथा है लेकिन एक लघु कथा में पढ़ा था --
एक बच्चे के दादा जी का निधन हो गया तो उनके सारे समान को पिता ने घर से बाहर फ़ेंक दिया , बच्छा ये सब देखता रहा और बाहर जाकर उस कटोरे को उठा लाया जिसमें उसकी माँ दादा जी को खाना देती थी. जब उसके पिता ने देखा तो उससे पूछा - ये क्यों उठा कर लाये हो? इसको फ़ेंक दो न.'
'नहीं पापा जब आप बूढ़े हो जायेंगे न तब हम भी तो आपको इसी में खाना देंगे. इसी लिए उठा लाया.'
ये भी हमें कुछ सबक दे जाती है. देखने में बहुत छोटी सी बात है लेकिन कितनी गहराई से इसको सोचा जा सकता है और इसके परिणाम को सोच कर देंखें तो हमें यह बता जाता है कि हमारा व्यवहार ही बच्चों को कुछ सिखा जाता है.
मेरे एक मित्र बड़े परमार्थी हैं , उन्होंने कभी किसी भी जरूरतमंद को निराश नहीं किया. एक बार वे कुछ आर्थिक परेशानी में थे और उनकी बहन बीमार पड़ी , गंभीरता की स्थिति में बहन को उनके साथ की जरूरत महसूस हुई , उसने कहा कुछ भी नहीं लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें सहायता करनी चाहिए. उन्होंने अपने घर में बात की. उनकी बच्ची अपनी गोलक उठा कर लायी उसमें जामा किये हुए २००० रुपये पिता को दिए और कहा कि आप बुआ को ये दे दीजिये मेरे पास तो बेकार ही पड़े हैं न, उनके काम आ जायेंगे. '
गुरुवार, 26 मई 2011
एक पहल ऐसी भी !
अक्सर अख़बार में देखने को मिलता है कि किसी गरीब या फिर बीमारी से तबाह हो चुके व्यक्ति कोआर्थिक सहायता की जरूरत है। मीडिया ने उसको सुर्ख़ियों में ला दिया तो फिर कुछ न कुछ उसको सहायता मिलही जाती है और नहीं तो कितने दम तोड़ देते हैं , कितने घरों के चिराग बुझ जाते हैं और कितने घरों के चूल्हे मेंपानी पड़ जाता है। डॉक्टर जरूरत बता कर हट जाते हैं क्योंकि उनकी भी अपनी सीमायें होती हैं। वे अपने प्रयाससे जितना कर सकते हैं कर देते हैं लेकिन जरूरी धन तो वे नहीं जुटा सकते हैं। उस परिवार की हालात क्या होतीहै? ये तो कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है किन्तु सिर्फ पैसे के अभाव में हम किसी अपने को मरते हुए देखते रहें - इस विवशता का भान मनुष्य को खुद ही जीते जी मार देता है।
अभी पिछले दिनों एक घटना हुई कि एक महिला खिलाडी रेल से गिर कर अपना पाँव गवां बैठी । उसको पहले लखनऊ और फिर एम्स दिल्ली ले जाया गया। उसकी सहायता के लिए क्रिकेट खिलाडी युवराज वहरभजन सिंह ने एक एक लाख रुपये दिए। ये उसके खिलाडी होने के नाते या फिर उसकी सहायता मानवता केनाते करने का भाव उपजा ये तो वही बता सकते हैं लेकिन मेरे मन में जरूर ये विचार उपजा और जो एक लेख केरूप में आप लोगों के विचारार्थ प्रस्तुत है।
एक आम आदमी इससे अधिक भयावह स्थितियों से गुजरता है और किसी से सहायता नहींमिलती है। वह असहाय से अपने बेटे , बेटी , माता -पिता या पति को अपनी आँखों के समक्ष तिल तिल मरते हुएदेखता रहता है और कुछ भी नहीं कर पाता है। इतना सब लिखने का मेरा उद्देश्य मात्र एक विचार है जो कौंधा तोसोचा कि इसके बारे में सब से विचार करवाया जाय। क्या एक पहल ऐसी नहीं हो सकती है कि एक आपातकालीनकोष की स्थापना की जाय, जो इस तरह के लोगों के जीवन को बचाने में प्रयोग की जा सके । प्रश्न यह है कि वे लोगजो करोड़ों और लाखों रुपये कमा रहे हैं, उनके लिए कुछ हजार रुपये की राशि कुछ भी नहीं है और वे दे भी सकतेहैं। मंदिरों में करोड़ों का दान देने वाले इसमें भी कुछ दान दे सकते हैं । अगर हम यथार्थ की बात करें तो हर आस्थामें विश्वास रखने वाला ये जानता है कि ईश्वर या वह सर्वशक्तिमान यही कहता है कि मैं जीव में ही बसता हूँ औरजीव के प्रति दया मेरी सबसे अच्छी पूजा है। उसकी सेवा ही मेरी सेवा है। फिर मंदिरों में हम किस लिए इतना दानदेते हैं? अगर हम सिर्फ कुछ अंश ऐसे कोष में दान दे दें तो उससे कितने लोगों का जीवन बचाया जा सकता है। वेजो करोड़ों रुपये आयकर में दे सकते हैं वे इसमें भी दे सकते हैं। एक विशाल कोष तैयार होगा जिससे कितने गरीबोंके घर के रोटी कमाने वाले और कितने असहायों के सहाय बच सकते हैं।
प्रश्न यह है कि ऐसे कोष की पहल किस के अंतर्गत हो? ऐसे एक कोष कि स्थापना मानवाधिकारआयोग के अंतर्गत होनी चाहिए । जिसमें धन जमा करने वालों को आयकर से मुक्त धन देने का प्राविधान हो, इससे लाभ प्राप्त करने के लिए एक डॉक्टर की टीम सिफारिश करेगी वह टीम कहीं की भी हो सकती है। अब प्रश्न येहै कि इसके लिए पात्रता कैसे निर्धारित कि जा सकती हैं क्योंकि यहाँ भी रसूख वाले येन केन प्रकारेण इससे धनराशि प्राप्त करने के लिए जीभ लपलपाने लगेंगे। फर्जी प्रमाणपत्र और निर्धनता दिखाने वाले पैसे वालों की कमीनहीं है। इसके लिए मरीज कि स्थिति और उसके तीमारदारों कि स्थिति डॉक्टर से छिपी नहीं होती है और अगरडॉक्टर का पैनल इस पर विचार करते हुए अनुशंसा करे तो इसकी कार्यवाही आगे बढाई जाए , वही टीम मरीज केबारे में पूरा पूरा विवरण प्रस्तुत करके उसके लिए अनुमानित सहायता राशि के लिए लिख सकती है और फिरआयोग का डॉक्टर का पैनल इसकी आवश्यकता पर विचार करते हुए जारी करने कि सिफारिश करे।
कितने जीवन इससे बच सकते हैं, जो करोड़ों कमा रहे हैं उनके लिए छोटी सी राशि देना कोई बड़ीबात नहीं है और इसके साथ ही खुद को जनसेवक कहलाने वाले हमारे विधायक और सांसद जो साल में सिर्फ कुछदिन अपनी ड्यूटी के लिए संसद या विधानसभा में आते हैं और शेष पूरे वर्ष का वेतन लेते हैं उनके वेतन सेअनिवार्यतः वर्ष में कुछ दिनों का वेतन इस कोष में जमा करवाने की सिफारिश भी की जानी चाहिए। सच्चीजनसेवा इसी में है। तभी उनका जनसेवक कहलाने का कुछ अंश तक अर्थ जाना जा सकता है। मेरे विचार से येप्रस्ताव विचारणीय होना चाहिए।
अभी पिछले दिनों एक घटना हुई कि एक महिला खिलाडी रेल से गिर कर अपना पाँव गवां बैठी । उसको पहले लखनऊ और फिर एम्स दिल्ली ले जाया गया। उसकी सहायता के लिए क्रिकेट खिलाडी युवराज वहरभजन सिंह ने एक एक लाख रुपये दिए। ये उसके खिलाडी होने के नाते या फिर उसकी सहायता मानवता केनाते करने का भाव उपजा ये तो वही बता सकते हैं लेकिन मेरे मन में जरूर ये विचार उपजा और जो एक लेख केरूप में आप लोगों के विचारार्थ प्रस्तुत है।
एक आम आदमी इससे अधिक भयावह स्थितियों से गुजरता है और किसी से सहायता नहींमिलती है। वह असहाय से अपने बेटे , बेटी , माता -पिता या पति को अपनी आँखों के समक्ष तिल तिल मरते हुएदेखता रहता है और कुछ भी नहीं कर पाता है। इतना सब लिखने का मेरा उद्देश्य मात्र एक विचार है जो कौंधा तोसोचा कि इसके बारे में सब से विचार करवाया जाय। क्या एक पहल ऐसी नहीं हो सकती है कि एक आपातकालीनकोष की स्थापना की जाय, जो इस तरह के लोगों के जीवन को बचाने में प्रयोग की जा सके । प्रश्न यह है कि वे लोगजो करोड़ों और लाखों रुपये कमा रहे हैं, उनके लिए कुछ हजार रुपये की राशि कुछ भी नहीं है और वे दे भी सकतेहैं। मंदिरों में करोड़ों का दान देने वाले इसमें भी कुछ दान दे सकते हैं । अगर हम यथार्थ की बात करें तो हर आस्थामें विश्वास रखने वाला ये जानता है कि ईश्वर या वह सर्वशक्तिमान यही कहता है कि मैं जीव में ही बसता हूँ औरजीव के प्रति दया मेरी सबसे अच्छी पूजा है। उसकी सेवा ही मेरी सेवा है। फिर मंदिरों में हम किस लिए इतना दानदेते हैं? अगर हम सिर्फ कुछ अंश ऐसे कोष में दान दे दें तो उससे कितने लोगों का जीवन बचाया जा सकता है। वेजो करोड़ों रुपये आयकर में दे सकते हैं वे इसमें भी दे सकते हैं। एक विशाल कोष तैयार होगा जिससे कितने गरीबोंके घर के रोटी कमाने वाले और कितने असहायों के सहाय बच सकते हैं।
प्रश्न यह है कि ऐसे कोष की पहल किस के अंतर्गत हो? ऐसे एक कोष कि स्थापना मानवाधिकारआयोग के अंतर्गत होनी चाहिए । जिसमें धन जमा करने वालों को आयकर से मुक्त धन देने का प्राविधान हो, इससे लाभ प्राप्त करने के लिए एक डॉक्टर की टीम सिफारिश करेगी वह टीम कहीं की भी हो सकती है। अब प्रश्न येहै कि इसके लिए पात्रता कैसे निर्धारित कि जा सकती हैं क्योंकि यहाँ भी रसूख वाले येन केन प्रकारेण इससे धनराशि प्राप्त करने के लिए जीभ लपलपाने लगेंगे। फर्जी प्रमाणपत्र और निर्धनता दिखाने वाले पैसे वालों की कमीनहीं है। इसके लिए मरीज कि स्थिति और उसके तीमारदारों कि स्थिति डॉक्टर से छिपी नहीं होती है और अगरडॉक्टर का पैनल इस पर विचार करते हुए अनुशंसा करे तो इसकी कार्यवाही आगे बढाई जाए , वही टीम मरीज केबारे में पूरा पूरा विवरण प्रस्तुत करके उसके लिए अनुमानित सहायता राशि के लिए लिख सकती है और फिरआयोग का डॉक्टर का पैनल इसकी आवश्यकता पर विचार करते हुए जारी करने कि सिफारिश करे।
कितने जीवन इससे बच सकते हैं, जो करोड़ों कमा रहे हैं उनके लिए छोटी सी राशि देना कोई बड़ीबात नहीं है और इसके साथ ही खुद को जनसेवक कहलाने वाले हमारे विधायक और सांसद जो साल में सिर्फ कुछदिन अपनी ड्यूटी के लिए संसद या विधानसभा में आते हैं और शेष पूरे वर्ष का वेतन लेते हैं उनके वेतन सेअनिवार्यतः वर्ष में कुछ दिनों का वेतन इस कोष में जमा करवाने की सिफारिश भी की जानी चाहिए। सच्चीजनसेवा इसी में है। तभी उनका जनसेवक कहलाने का कुछ अंश तक अर्थ जाना जा सकता है। मेरे विचार से येप्रस्ताव विचारणीय होना चाहिए।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
