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शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

विकृति को समझें !

                         चर्चा में रहने के लिए कुछ तो ऐसी चर्चा कर लेंगे कि लोग वाह वाह न करें गालियाँ ही दें। बदनाम हुआ तो क्या नाम होगा? ये तो एक अलग बात है लेकिन ये सबके पीछे इंसान की दिमागी हालत और उसकी स्थिति भी देखने के जरूरत पड़ती है। इस रास्ते पर चलने वाले कुछ तो मानसिक विकृति का शिकार ही कहे जायेंगे, लेकिन ऐसे लोगों को शह देने वाले वाह वाह जरूर करते हैं लेकिन पीछे आलोचना भी करते हैं। 
                        चर्चा में रहने के लिए अगर हम ऐसी हरकतें करें कि लोग खीज़ कर गालियाँ देने लगें तो उस विकृति के शिकार इंसान को एक सुकून मिलता है, भले ही उसकी बातों से किसी को कितना ही दुख हो? वास्तव में वह होता है जिसकी दूसरी प्रशंसा होती है लेकिन जो श्रेष्ठता ग्रंथि का शिकार होते हैं उनकी कोशिश होती है कि अपनी ही बातों से दूसरों को हीन साबित करने की कोशिश करें बगैर ये जाने कि इन बेसिर पैर की बातों का क्या असर होगा? लेकिन स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भावना उनमें इतनी बलवती होती है कि वे उचित और अनुचित के अंतर को भूल जाते हैं। ये एक प्रकार के मानसिक विकार का असर होता है और इसको दूसरे शब्दों में मानसिक विकृति भी कह सकते हैं। 
                    ये आवश्यक नहीं है कि इसका रोगी इस बात को समझने वाला हो, कभी कभी वह बिलकुल अनभिज्ञ होता है। तब तो विदेश में जाकर बसने वाले कुछ भारतीय उसी देश के गुणगान करने लगते हैं और अपने देश की बेदखली। वहाँ सुविधाओं अलग है और वह देश बहुत पूरा है लेकिन वे भूल जाते हैं कि कैसे ही क्यों न हो? उस मिट्टी की महक और रगों में बहते हुए खून में मिट्टी, हवा और पानी का अंश है। यहाँ की भाषा तो जाहिलों की भाषा लगने लगती है, उनकी माँ और बाप इतने बड़े अंग्रेज थे कि बेटे को संबोधन अंग्रेजी में ही मॉम और डैड ही सिखाया गया होगा। ये भूल जाते हैं कि इस धरती पर जो धर्म ग्रन्थ रचे गए उन पर अंग्रेजी वाले भी शोध कर रहे हैं। यहाँ की भाषा सीखने रहे हैं और हिंदी में ग्रन्थ लिख रहे हैं। इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि अपने ही देश के जन्मे लोग अपनी ही भाषा का अपमान कर रहे हों और उसी भाषा में और जमीन पर जहाँ वे रहते हैं। 
                   ये भी एक मानसिक विकृति का ही परिणाम ये है कि हर ऐसे विकार वाले लोग अपने को समाज में भी अकेले ही पाते हैं और अपनी जाति को को यह कह कर दबाते हैं कि मेरे बराबर का इस समाज में कोई है ही नहीं, केवल तो मैं किसी लिफ्ट ही नहीं देता है। लेकिन वह ये भूल जाते हैं कि उनकी मनोविज्ञान को समझने वाले भी लोग इस समाज में हैं। ऐसे कोडिंग की कोई जरूरत नहीं है, न ही उन्हें इलाज की जरूरत होती है, हालांकि केवल वह काउंसलिंग ही क्यों न हो।
इसलिए अस्थिरता वालों से सावधान रहना और अपनी ऊर्जा उनकी बातों में हरगिज जाना न करें।

गुरुवार, 7 जून 2012

उठ जाग मुसाफिर !

               
                      क्या पढ़े लिखे और इस विकासशील भारत में जनता  अपने अधिकारों और कर्तव्यों से इतना अधिक विमुख है कि सरकार के किसी भी कदम का न तो  विरोध  कर सकते हैं और न ही उनसे कोई सवाल करने का अधिकार रखते हैं। वे  सरकार चुनते समय अपने विवेक को ताक  में रख कर बटन दबा कर चले आते हैं। लेकिन मैं यह क्यों भूल रही हूँ कि बटन दबाने के बाद जो चुने जाते हैं उनके ही रास्ते  और इरादे बदल जाते हैं। वे पांच साल के बादशाह बन जाते हैं और वह भी निरंकुश बादशाह फिर ठगा सा जनमत कुछ कर ही नहीं सकता है। 
                   पिछले दिनों आई रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15 वीं विधान सभा के पूरे 5 वर्ष के  89 दिवस सत्र  चले .  जब कि  एक वर्ष में 365 दिन में  अगर 30 दिन भी कार्य होता तो 5 साल में 150 कार्य दिवस होते लेकिन वह भी नहीं हो सका। जो 89 दिवस सदन में कार्य  हुआ  और 403 विधायकों में से सिर्फ 5 ऐसे थे जो की पूरे 89 दिन उपस्थित थे और इनके समेंत 20 विधायक ऐसे थे जो 88 दिन उपस्थित थे। इसमें से 1 को को छोड़ कर  शेष  सभी सत्तापक्ष  के विधायक थे। शेष कहाँ रहते हैं और क्या करते रहे इसके बारे में न सदन ने कभी जानने की कोशिश की और नहीं उन लोगों ने इस बारे में सूचित करने की कोई जरूरत समझी। उनके  वेतन भत्ते में कभी कोई  नहीं की जाती है क्योंकि प्रदेश का अस्तित्व  उनसे ही   है, नहीं तो प्रदेश अनाथ हो जाएगा। ये सिर्फ एक प्रदेश की स्थिति  है  इस बारे में हमें संसद और शेष सभी राज्यों के विधान सभाओं  की स्थिति के बारे में जानकारी उपलब्ध करायी जाए . लोक में जागरूकता जब तक नहीं आएगी तब तक अपना अर्थ सार्थक नहीं कर  पायेंगे .
                    प्रजातंत्र में सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ही हम अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं लेकिन वही प्रतिनिधि अपने दल के कठपुतली बन जाएँ तो ठगे तो हम जाते हैं। चुने हुए प्रतिनिधि तो अपनी जुगाड़ में कहीं और घूमते फिरते हैं सदन की कार्यवाही या उसमें अपनी उपस्थिति से उनको कोई भी मतलब नहीं होता है और नहीं सदन के अध्यक्ष इस विषय में कोई कदम उठता है . सरकारी कार्यालयों और बच्चों के स्कूल में उपस्थिति की तरह से हमारे विधायकों और सांसदों की उपस्थिति का भीएक रिकार्ड होना चाहिए और उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उन्हें चुनने वालों को पूरा अधिकार है कि  वे अपने प्रतिनिधि की कार्य प्रणाली से पूरी तरह से वाकिफ रहें। ताकि भविष्य में उनसे इस बारे में दुबारा आने पर सवाल तो किया ही जा सके। अन्धानुकरण अधिक दिन नहीं चल सकता है। वर्षों से विधायक और सांसदों के पद पर काबिज लोगो को अब जनमत क्यों नकार रहा है? सिर्फ इस लिए कि  उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए कुछ किया ही नहीं . कुछ माननीय अपनी नीयत सिर्फ इस इरादे से स्पष्ट कर देते हैं कि वे सिर्फ अपने और अपने क्षेत्र के विकास में में रूचि रखते हैं। 
                  अब हमें जागरूक होने की जरूरत है , पांच साल सिर्फ इसलिए हम चुप नहीं बैठ सकते हैं कि  हम उन्हें झेलने के लिए मजबूर है नहीं हमें उनकी गतिविधियों पर निगाह रहने का पूरा पूरा अधिकार होता है। अपनी बात उनके द्वारा संसद में उठाये जाने की बात को लेकर बात करने तक। वे ही हमारा माध्यम हैं और उन्हें अपने  क्षेत्र से जुड़े मामले को उठाना ही होगा। बस एक दूसरे का हाथ थाम  का शक्ति को बढ़ाना होगा और आवाज को बुलंद करना होगा फिर कल हम सुधार  की आशा कर सकते हैं. हम कोई राजनैतिक दल के सदस्य नहीं है लेकिन हम उस विधा से जुड़े हैं कि हम एक दूसरे तक अपनी बात को  पहुँचा तो सकते हैं और सोचने के लिए मजबूर भी कर सकते हैं। 
  

शुक्रवार, 1 जून 2012

विचार करें !

   अगर घर में बेटियाँ हें तो उनके विवाह के लिए आज नहीं कल सोचना है और ये कोई एक या दो दिन का सम्बन्ध नहीं है . इस जीवन भर के रिश्ते की बुनियाद भी मजबूत होनी चाहिए. आज कल लगभग सभी लड़कियाँ आत्मनिर्भर होकर जीने को अधिक महत्ता प्रदान करती हें और होना भी चाहिए क्योंकि आज की बदलती सोच ने अब पति और पत्नी दोनों को समान रूप से काम और जिम्मेदारियों  को उठाने की राह दिखाई है. इस परिवार और विवाह संस्था को स्थायित्व देने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार है - हमारी प्रगतिशील और परिपक्व सोच. इसके लिए हम पूरी तरह से जिम्मेदार हें क्योंकि आज भी ८० प्रतिशत विवाह माता पिता द्वारा ही किये जाते हैं . आज भी हर माँ बाप का ये सपना होता है कि जिस लड़के के साथ हम अपनी बेटी का रिश्ता करने जा रहे हैं उसका घर और परिवार हमसे अच्छे स्तर का हो. वह सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से ही तुलना करता है और आज भी मध्यम वर्ग का पिता कुछ न कुछ कर्जदार होकर बेटी के हाथ पीले कर रहा है.
                  उस घर में जाकर बेटी को कितना सामंजस्य स्थापित करके रहना पड़ता है इसके विषय में कम ही पता चल पाता है. क्योंकि दूर के ढोल सुहाने होते हैं और कुछ लोगों के तो दोहरे चेहरे होते हैं. इन चेहरे पर चढ़े नकाब के लिए शिक्षा दीक्षा भी कोई भूमिका अदा नहीं करती है क्योंकि संस्कार भी कुछ होते हैं और मैं नहीं समझ पाती हूँ कि ये मनुष्य किस मिट्टी के बने होते हैं? जो शादी के पहले कुछ और बोलते हैं और शादी होने के बाद कुछ और बोलने लगते हैं. 
                     मैं बहुत लम्बे चौड़े दायरे की बात नहीं कर रही हूँ . बस अपने इर्द गिर्द बसने वाले कुछ परिवारों की बात कर रही हूँ. कुछ उन बेटियों की बात कर रही हूँ जो मुझसे बहुत करीब से जुड़ी हें. सभी उच्च शिक्षित और सभ्य सुसंस्कृत परिवारों में विवाह के बाद पहुंची हैं. पिछले दिनों मैंने अपनी बेटी से बात करनी चाही तो उसका फ़ोन व्यस्त आ रहा था. जब वह फ्री हुई तो उसने मुझे मिलाया. मैंने उससे पूछा कि कहाँ व्यस्त थी? इस समय तो हमारे बात करने का समय होता है तो बोली - 'मम्मी हमारा "आओ सखी चुगली करें" क्लब बना है उसमें हम सब यानि जिनकी अभी या कुछ दिन पहले शादी हुई है अपनी अपनी ससुराल में बैठ कर अपनी समस्याएं शेयर करके हैं और मैं उन सबको कंसोल करती हूँ और रास्ते बताती हूँ कि कैसे इन हालातों से निबटा जाय? (वैसे बताती चलूँ कि मेरी दोनों ही बेटियों में काउंसिलिंग करने का गुण मेरी ही तरह से आया है.) वैसे वह अपनी और सहेलियों की बातें मुझसे बराबर शेयर करती हैं और तभी निष्कर्ष के तौर पर ये लेख लिखने की बात दिमाग में आई.
                              उसकी एक सहेली सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है और उसकी शादी फरवरी में हुई है. वैसे तो वह दिल्ली में ही रहती है लेकिन एक डॉक्टर से हम शादी करने से पहले ये सोच कर चलते हैं कि उसका क्या दायरा है? उससे हम कितनी पुरातन पंथी परम्पराओं को निभाने के लिए मजबूर कर सकते हैं. लेकिन हमारी सोच अपने बेटे या बेटी के उच्च शिक्षित होने से बदल नहीं जाते हैं लेकिन फिर भी समय और हालात के साथ हमें सामंजस्य स्थापित करना चाहिए. हम बाहर से दिखाने के लिए बहू को बेटी की तरह रखने की हामी तो भर लेते हैं लेकिन बाद में जो माँ का चोला उतार कर सास का रूप धारण करते हैं तो बहू भी आसमान से उतर कर जमीन पर खड़ी होती है और विस्फारित नेत्रों से देखती रह जाती है. उस बच्ची की डॉक्टर ननद है और घर में जब वह चाय लेकर जाती है तो वह कहती है -' जरा सिर ढक कर जाना पापा जी को चाय देने जा रही हो.'  जब कि हकीकत ये है तो उसको साड़ी पहनना शादी के चार दिन पहले सिखाया गया था. सच ये है कि वह अभी ठीक से दोनों हाथ से काम करते हुए सिर पर पल्ला संभाल नहीं पाती है. ये बात मुझे भी कुछ खली कि एक डॉक्टर और दूसरी डॉक्टर से इस तरह की बात कर रही है. क्या हम अपने को सिर्फ उदारवादी दिखाने का नाटक करते हैं? कल वह मेरे पास आई थी और बोली कि गाँव में कोई पूजा है तो वहाँ जा रहे हैं और वहाँ पर तो सास जी ने कहा है कि मुँह ढक कर रहना होगा. अगर कहा है तो रहना ही होगा. इतनी  गर्मी  और फिर भरी  साड़ी भी पहननी  होगी क्योंकि  नई  बहू पहली  बार  गाँव जा रही है उस पर मुँह ढक कर रहना. सोच कर ही डर  लगा  रहा है.
                          सास के दो चेहरे ओ अक्सर ही देखने को मिल जाते हैं. मेरे साथ एक लड़की वनस्थली से एम टेक करते समय आई आई टी में प्रोजेक्ट करने आई थी. वह कानपुर की रहने वाली थी इसलिए प्रोजेक्ट में उसको जॉब मिल गयी और वह एम टेक पूरा करने के बाद मेरे ही प्रोजेक्ट में जॉब भी करने लगी. वह पापा के ट्रान्सफर वाले जॉब के कारण शुरू से ही हॉस्टल में पढ़ी थी. इत्तेफाक से वह मंगली थी और उसके लिए उसके पापा मंगली वर ही खोज रहे थे. उनको एक ठीक ठाक एम बी ए लड़का मिल गया. जब शादी तय हुई तो वह बाहर जॉब कर रहा था. उनकी सास का शुरू में जो व्यवहार था उससे यही लगता था कि उनके घर में बेटी नहीं है इसलिए वह बहू के रूप में बेटी मिल रही है .बेटी बहुत खुश रहेगी. बाकी कुछ जानने और समझने की जरूरत ही नहीं समझी गयी. लोकल शादी हुई थी इसलिए नौकरी छोड़ने की बात उसने सोची भी नहीं थी . शुरू शुरू में सास लंच बना कर देती और फिर कुछ दिन बाद उसके लिए खाना बना कर जाना. उसका घर इतना दूर था कि उसकी अगर ऑफिस की बस छूट  गई तो उसको ३ घंटे आने में लगते थे और इसलिए ऑफिस में देर तो वहाँ उसको उत्तर देना होता था. रोज रोज वह घर का रोना नहीं रो सकती थी. घर में उसको सास मुँह ढक कर रहने के लिए मजबूर करती. अगर उसको सबके साथ टीवी भी देखना हो तो मुँह ढका होना चाहिए. फिर सोने से पहले सास के पैर भी दबाने पड़ते . वह रात १२ बजे सोने जाती और सुबह ४ बजे उठ जाती. ऑफिस में सारे दिन कंप्यूटर पर काम करना होता . उसके मम्मी पापा अगर छुट्टी के समय बस स्टॉप पर आकर मिल लेते . इसी समय वह गर्भवती हुई , तब तो उसके लिए काम और घर मुश्किल होने लगा. शुरू के दिन की परेशानियाँ और घर के माहौल  से वह टूटने लगी थी. आखिर उसके मम्मी पापा अपने घर ले आये लेकिन उसके पति को माँ उससे मिलने केलिए नहीं आने देती.  उसका पति भी ऑफिस में लंच टाइम में आकर मिलता. उसको बेटा हुआ तो दादी का मन डोला और उसको घर ले गयी. फिर शुरू हुआ बच्चे को रखने के लिए समस्या. आया वह रख नहीं सकती थी, खुद वह देखेंगी नहीं. फिर दबाब बढ़ा कि नौकरी छोड़ दो. उसने नौकरी छोड़ दी और एक वह लड़की जिसके माँ बाप ने एम टेक तक शिक्षा दिलवाई उसके ससुराल वालों की सोच के लिए वह सिर्फ एक गृहणी बना दी गयी. रोज रोज की किच किच परेशान होकर उसके पति ने बाहर दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली और पत्नी और बेटे को लेकर चला गया. तब जाकर उस लड़की को सुकून मिला.
                              ये दो किस्से सिर्फ इसलिए कि लड़कियों  के माँ बाप अपनी ओर से सुयोग्य वर और अच्छा घर देखते हैं लेकिन इसके साथ ही उस घर के लोगों की सोच और विचारों को जानने का भी प्रयास करें तो बेटी के सुखद भविष्य के लिए अधिक उचित होगा. घर का स्तर , ऊपर दिखने वाला व्यवहार और उनके आतंरिक स्वरूप के विषय में जल्दी पता नहीं चल पता है. इसलिए शादी तय करने के बाद इतना समय अवश्य लें कि उनके बारे में अच्छी तरह से पता लगा लें. वह आपके अपने स्रोत होंगे जिन्हें प्रयोग करके आप पता लगायें. बेटी की शादी एक या दो दिन की बात नहीं होती है और हमारे दिए संस्कारों के कारण वह ऐसे लोगों के बीच कितना तनाव झेलती है इसको मैंने उस लड़की से जाना है. .
                              अपनी बेटी के भावी जीवन के बारे में हमें सोचना है तो हमेशा ये देखना चाहिए कि उस परिवार में वैचारिक परिपक्वता होनी चाहिए. आर्थिक स्तर भी समान होना चाहिए बल्कि यह एक महत्वपूर्ण आधार है क्योंकि बहुत बड़े घर में बेटी देना चाहे वह कामकाजी हो या फिर घरेलु उसके सुख और आत्मसम्मान के लिए ये जरूरी है कि समकक्ष आर्थिक स्तर का परिवार हो. अगर आपने बड़े घर की बेटी ले ली तो वह आपके घर में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पायेगी . फिर या तो वह आपको बात बात पर अपने घर का बखान करके नीचा दिखाएगी या फिर वह अपने घर जैसे माहौल की अपेक्षा करेगी. ये आवश्यक नहीं है कि जिसे आप उचित समझें उसे आपकी  बेटी भी समझे इस लिए उसके सामने हर बात स्पष्ट रूप से बता देनी चाहिए. जीवन उसको गुजारना है इसलिए वह आगे आने वाले स्थितियों से निपटने केलिए मानसिक रूप से तैयार रहेगी.
                              ये सारी बाएँ सिर्फ बेटी की शादी के लिए ही लागू नहीं होती बल्कि बेटे की शादी के लिए भी लागू होती है. लड़की भी हमेशा अपने बराबरी के परिवार और सभ्य सुसंस्कृत परिवार की लेनी चाहिए. हम आजकल नेट के माध्यम से रिश्ते अधिक खोजते हैं और फिर उसमें दी हुई जानकारियाँ कितनी सच और कितनी गलत होती हैं , ये बात तो तभी पता चलती है जब कि हकीकत से दो चार होना पड़ता है. इसलिए रिश्ते से पहले अपनी सारी इन्द्रियां सजग रख कर ही निर्णय लेने चाहिए. परिवार की सुख और शांति के लिए सिर्फ एक पक्ष नहीं बल्कि दोनों पक्षों की भलाई होती है.

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

संस्कार कैसे देते हें?

जीवन मूल्यों में हो रहे परिवर्तन  ने हमारी संस्कृति को विकृत  रूप  में प्रस्तुत  करना  शुरू  कर  दिया है. एक  मिसाल बनकर विश्व में अपना  परचम फैलाने वाली भारतीय संस्कृति के आधार परिवार, पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की गरिमा को अब लज्जित होने के लिए हम ही उसको इस हद तक पहुंचा रहे  है. आज हम खुद  ही अपने  पारिवारिक  मूल्यों की दुहाई  देने  में कतराने  लगे  हैं क्यों ? क्योंकि  हम अपने नैतिक  और पारिवारिक मूल्यों को खोते  चले  जा  रहे हैं ( संचित भी है, इस बात  से  इनकार  नहीं है लेकिन  अब खोने  का  पलड़ा  भारी है. ) 
                       ऐसा नहीं है पहले भी ऐसा होता था लेकिन उसका प्रतिशत इतना कम  था कि संयुक्त परिवार में वह नगण्य के बराबर होता था और ऐसे उदाहरण सामने आ नहीं पाते थे. . वैसे इसके लिए उत्तरदायी हम ही हुआ करते हें.
                             संस्कार कोई गिफ्ट आइटम नहीं है कि जिसे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को गिफ्ट पैक बना कर देते हें - उन्हें बहुत कुछ समझाने की जरूरत नहीं होती है , वे आज बहुत समझदार है और उसके अनुसार ही आचरण करते हें. आज की नई पीढ़ी और वह पीढ़ी जो अभी अपने पैरों पर चलने के लिए तैयार हो रही है वह वही ग्रहण कर रही है जो हम उसको दिखा रहे हें.
                             हमारी अपनी सोच, व्यवहार और आचरण ही  उनके लिए संस्कार बन जाते हें . इस विषय में वह लघुकथा सबसे अच्छा उदाहरण है कि 'दादा के निधन के बाद पिता ने उनके खाने वाले बर्तन उठा कर फ़ेंक दिए और उनका बेटा जाकर उन्हें वापस उठा लाया. पिता के ये पूछने पर  कि इन फेंके हुए बर्तनों को वह क्यों उठा लाया? तो बेटे ने उत्तर दिया कि कल जब आप बूढ़े हो जायेंगे तो ये ही बर्तन आपके काम आयेंगे. '
                             आज संयुक्त परिवार टूटते टूटते बिखर गए  हैं.  कहीं अगर माता पिता को साथ रखा तो तिरस्कृत करके रखा या फिर उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया. बच्चों ने वही देखा और वही ग्रहण किया. जो हमने उनको दिखाया  वही उन्होंने  संस्कार समझ  कर अपना  लिया . 
  बाद में हम सिर धुन कर रोते हैं  कि पता नहीं आज कल के बच्चों को क्या हो गया है? माँ - बाप की बात सुनते ही नहीं है, आप जब बड़े हो गए तब अपने सुनना बंद किया था और आप के बच्चों ने बचपन से ही क्यों? क्योंकि अब वे प्रगति पर हें और उनकी बुद्धि पिछली पीढ़ी से कहीं अधिक तेज है. ज्यादातर लोगों की ये सोच होती है कि हम जो कर रहे हें वह सही है लेकिन अगर वही बच्चों के द्वारा किया जाता है तो हमें कितना बुरा लगता . इसी लिए आचार्य श्री राम शर्मा की एक उक्ति है - जो व्यवहार आपको अपने लिए पसंद नहीं है तो वह आप दूसरों के साथ   भी न करें. लेकिन ऐसा होता कहाँ है? हम खुद सम्मान और सर आँखों पर बिठाये जाने की अपेक्षा रखते हें और माँ - बाप को अपने मित्रों से मिलाने में भी शर्म महसूस करते हें . क्यों? इसलिए कि हमारे पिता कभी क्लर्क होते थे और माँ एक गृहणी थी. उनको   बाहर के  आचार व्यवहार से परिचय ही नहीं होता है. वह तो अपना पूरा जीवन आपको पढ़ाने और लिखाने   में लगी रही. पिता ने अपनी आय को आपकी पढ़ाई में लगा दिया और खुद अपने लिए नई साइकिल भी नहीं खरीद सके, कभी मिल गया तो ऑफिस के बाद पार्ट टाइम जॉब भी कर लिया ताकि पढ़ाई के साथ साथ आपकी अच्छी खिलाई पिलाई भी कर सकें. इसे हमने उनके फर्ज मान हाशिये में रख दिया और खुद के अच्छी पढ़ाई के बाद जब नौकरी मिली तो उनको अपने बराबर बिठाने में शर्म महसूस करने लगे. हमारे जीवनसाथी ने भी यही समझा कि पति की कमाई पर तो उसका ही हक है , माँ बाप को कोई आशा भी नहीं करनी चाहिए ।
 
                               यही जो कुछ हम दिखा रहे हें वह हमारे बच्चे ग्रहण कर रहे हें . यही संस्कार बन रहे हें उन्हें कुछ भी सीखना नहीं पड़ता है . पहले नानी दादी उन्हें अपने साथ लिटा कर श्रवण कुमार और लक्ष्मण जैसे पुत्र और भाई की कहानी सुनाया करती थी. और बाल मन पर वह गहराई से बैठ जाया करती थी. आज क्या आपके पास टीवी देखने या फिर अपने मित्र मंडली के साथ गपशप करने अलावा भी कुछ है . बच्चे भी साथ साथ टीवी से चिपके  रहना  चाहते  हें. उन्हें कब सिखाया  जाए  और क्या सिखाया  जाए ?अब इसके लिए तो हमें ही सोचना होगा की बच्चों को गलत संस्कार न मिल पायें और वे मानवता और नैतिक मूल्यों के मूल्य को समझें लेकिन ये होगा तभी जब हम उन्हें समझा पायें. चलिए कोशिश करते हैं.

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

विपरीत प्रभाव !

कन्या के जन्म से लेकर उसके जीवन के निर्धारण तक का अधिकार पुरुष वर्ग अपने हाथ में लिए रहा हैतब अधिक अच्छा था जब वह अधिक उन्नत जीवन नहीं जी रहा थावह कृषि और व्यापार में लगा था लेकिन आम घरों में अगर लड़कियाँ अधिक हें तो लड़के की आशा में प्रयास बंद नहीं करते थे लेकिन लड़कियों की हत्या नहीं करते थेमन मलिन भले कर लें लेकिन उनका जीवन नहीं हरते थे
हम जैसे जैसे सुशिक्षित और सम्पन्न होते जा रहे हें हमारी मानसिकता क्या क्रूरता की ओर नहीं जा रही है? या फिर ये कहें कि पहले इस तरह की घटनाएँ प्रकाश में नहीं आती थीं और आज मीडिया के सशक्त होने के साथ ही घटनाएँ सामने आने लगी हेंकल पलक एक अत्याचार का शिकार होकर जीवन लीला समाप्त कर चल दी और आज आफरीन सिर्फ तीन माह की बच्ची अपने पिता के अमानुषिक व्यवहार का शिकार हो कर दुनियाँ से कूच कर गयी किस लिए क्योंकि उसके पिता को बेटी नहीं बेटा चाहिए था और बेटी होने पर उसने उस नन्ही सी जान को सिगरेट से जलाया , उसके सिर को दीवार से पटक कर उसके मष्तिष्क को क्षत विशत कर दिया और वह कोमा में चली गयीएक हफ्ते के अन्दर वह जिन्दगी की जंग हार कर और अपनी माँ की गोद सूनी करके चली गयी
पुरुष जाति में बच्चियों के प्रति पाशविकता की भावना क्यों घर करने लगी है ? अगर वह पिता है तो उसको बच्ची चाहिए ही नहीं तो या तो उसको जन्म से पहले ही मार दो और अगर नहीं मारी तो पैदा होने पर मार देंइन सबसे ऊपर उठ कर वे लोग हें जो बच्चियों को अबोध बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बना रहे हें और फिर उनकी हत्या कर भाग जाते हेंये काम तो आदिम युग में भी नहीं किया जाता थाआज हम अपनी प्रगति और सक्षमता का ढिंढोरा पीट रहे हें और अपने को २१वी सदी का प्रगतिशील व्यक्ति मानते हें लेकिन हमारी सोच तो जितने हम ऊँचे पहुँचने का दावा करते हें उससे कई गुना नीचे जा रही हैइसके कारणों की ओर कभी मनोवैज्ञानिक तौर पर अगर विश्लेषण किया गया है तो यही पाते हें कि व्यक्ति सारी प्रगति और उपलब्धियों के बाद भी उसकी आकांक्षाएं इतनी बढ़ चुकी हें कि वह उनको पूरा कर पाने के कारण कुंठित हो रहा है और वह कुंठाएं कहाँ और कैसे निकलती हें ? इसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है
अपने से अधिक बलशाली या फिर बराबरी के व्यक्ति से अगर वह उलझने की कोशिश करेगा तो शायद वह अपनी कुंठा निकल पाए इसलिए वह अपना शिकार अबोध और किशोर वय की ओर जाति हुई बच्चियों पर मौका पाकर निकालने की कोशिश करता हैजब एक तरह की घटना सामने आती है तो फिर उस तरह की छिपी हुई कई घटनाएँ सामने आना शुरू हो जाती हेंये जरूरी ही नहीं है कि वे कुंठित ही हों , वे दकियानूसी भी हो सकते हेंकितने स्थानों पर बेटे की चाह में बेटियों की बलि दे दी जाती है बगैर ये जाने कि क्या इसका कोई औचित्य है?
हम बेटी बचाओ अभियान चला रहे हें क्योंकि अगर बेटी होंगी तो ये सृष्टि आगे कैसे चलेगी? क्या हम बेटियाँ इसी लिए बचाने की गुहार लगा रहे हें कि कल कोई वहशी उन बच्चियों से दुराचार कर उनकी हत्या कर दे? हम बेटियों का जीवन सुरक्षित कैसे करें? वे कोई कागज की गुडिया तो नहीं हें कि हम उन्हें डिबिया में बंद कर छिपा लेंउनके जीवन के लिए उनकी शिक्षा और प्रगति भी जरूरी है तो फिर कौन सा ऐसा कदम हो कि वे सुरक्षित रहेंक्या पैदा होते ही उनको पुरुषों के साए से दूर रखा जाय? क्या उनके साथ माँ को साए की तरह से हमेशा साथ रहना होगा ? क्या फिर से हम अतीत में जाकर पर्दा प्रथा को अपना लें? लड़कियों को शिक्षा के नाम पर सिर्फ गीता और रामायण पढ़ने भर की शिक्षा लेकर उन्हें परिवार को बढ़ाने भर के लिए जीवित रखें?
इतने सारे सवाल है और इनके उत्तर आज भी हमारे पास नहीं है क्योंकि अब हम नेट युग में जी रहे हें , आभासी दुनियाँ में जी रहे हें और बगैर मिले और देखे भी अपनी दुनियाँ को विस्तृत कर रहे हें फिर अतीत में जाने की बात बेमानी है लेकिन ये भी सत्य है कि हमें अब लड़कियों के जीवन और अस्मिता की रक्षा के लिए भी कुछ सोचना होगाउनके प्रति हो रहे दुराव और दुराचार के खिलाफ उठाये जा रहे कदमों के विपरीत प्रभाव पर अंकुश लगा होगा

मंगलवार, 20 मार्च 2012

हम खुद कितने भ्रष्ट है?

अन्ना के आंदोंलन को अभी ख़त्म नहीं होना है और अभी वह लौ बुझी भी नहीं है लेकिन हम जो कल उनके अनशन के साथ थे और पूरा देश एक आवाज पर खड़ा था । वह लोग राजनीति से दूर थे और अपने अपने निवास स्थल से ही उनका समर्थन कर रहे थे। किसलिए क्योंकि हम भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हें।
आज नए वातावरण में जब उत्तर प्रदेश में चुनाव हो चुके हैं और नई सरकार अपने घोषणा पात्र के अनुसार बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ते को देने के लिए प्रतिबद्धता को दुहरा रहा है। चुनाव परिणाम के आने के पहले ही सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण के लिए आधी रात से भीड़ लगनी शुरू हो गयी फिर अचानक एक नया मोड आया कि ये भत्ता ३५ साल से ऊपर के बेरोजगारों को मिलेगा लेकिन इससे भीड़ काम नहीं हुई बल्कि पंजीकरण के लिए आने वालों की उम्र बढ़ गयी। और इससे एक बात और बढ़ गयी कि भ्रष्टाचार के दरवाजे सामने से खुलने लगे। वह जो कल भ्रष्टाचार के विरोध में सिर पर अन्ना टोपी लगाये घूम रहे थे वही पंजीकरण करा रहे थे।
पंजीकरण कराने वाले कौन लोग हें ? जो इसकी पात्रता को पूरा नहीं कर रहे हें लेकिन सरकारी मुफ्त का धन लेने में कोई हर्ज नहीं है।
१। प्राइवेट नौकरी करने वाले ।
२। गृहणी जो न कभी पंजीकृत थी और न कभी उन्होंने नौकरी के लिए सोचा था।
३। अपने धंधा करने वाले लोग जिनकी आय उस मिलने वाले भत्ते से कई गुण ज्यादा है।
४। वह लोग जो पैतृक संपत्ति से होने वाली आय से अपना गुजारा वर्षों से कर रहे हें।
क्या वास्तव में कोई भी व्यक्ति जो परिवार की जिम्मेदारी वाला है ३५ वर्ष की आयु तक घर में बैठा होगा। वह कुछ भी करे करता जरूर है। मेहमत की कमाई में विश्वास रखने वाले तो ग्रेजुएट होकर भी रिक्शा चला रहे हैं। सेल्स मैन का काम कर रहे हैं या फिर कुछ और। (अपवाद इसके भी हो सकते हैं लेकिन जो लाखों की संख में लोग पंजीकरण करवा रहे हें सभी बेरोजगार तो बिल्कुल भी नहीं हैं।
आज मेरा एक परिवार में जाना हुआ। वे मेरे अन्तरंग हैं, उनकी आर्थिक स्थिति से मैं भलीभांति परिचित भी हूँ। मेरी उपस्थिति में ही उनके घर के नीचे के तल में रहने वाले किरायेदार की पत्नी ने आक़र पूछा कि ऑफिस से अंकल का फ़ोन आया है कि इतने सारे फार्म जमा नहीं हो पाएंगे किसी लेडीज को आना पड़ेगा तो कुछ जल्दी हो सकती है क्योंकि वहाँ पर लाइन नहीं लम्बी है और अगर किसी को दे कर जमा करवाता हूँ तो १०० प्रति फार्म लग रहा है। क्या करना है जल्दी से पूछ कर बतलाइये।
जब वे चली गयी तो मैंने उस परिवार की बहू से पूछा कि कौन कौन फार्म भर रहा है तो उसने बताया कि वह उसकी विवाहित ननद उसके पति और खुद उस बहू के पति। उनके तीन मंजिले मकान में ३ किरायेदार और एक पोर्शन में वह खुद रहती हें। वह एक पौश इलाके में रहने वाला परिवार है।
मैंने पूछा कि क्या तुम लोग भी इसके लिए पंजीकरण करवा रहे हो?
-हाँ नीचे वाले अंकल हें तो उन्होंने कहा कि फार्म आसानी से जमा हो जाएगा और फिर जो बन पड़ेगा पूरा कर दूँगा। फिर अगर सबको मिल गया तो कम से कम मोबाइल का खर्च तो निकल ही आएगा। मुफ्त का मिलेगा कुछ करना तो है नहीं ।
मुझे उनकी बात कहीं से भी सही नहीं लगी वे महिलायें जिन्होंने कोई भी ऐसी शिक्षा नहीं पायी है जिससे कि नौकरी कर पातीं। छोटी मोटी नौकरी करना तो उस बड़ी बिल्डिंग के मालिक के बच्चों की इज्जत के अनुरुप भी नहीं थी लेकिन अगर मुफ्त में मिल जाए तो कुछ बुरा भी नहीं है।
ये सिर्फ एक लोग की सोच है और कितने ही लोग ऐसे होंगे जो कि इस मुफ्त सरकारी धन के लिए लालायित हो रहे होंगे और लेंगे भी।
इसके लिए लाखों लोगों ने पंजीकरण करवाया है कितने लोग वाकई इसके लिए पात्रता पूरी करने वाले होंगे और कितने तो फर्जी ही इसको लेते रहेंगे। जब हम खुद इतने भ्रष्ट सिर्फ एक हजार रुपये के लिए हो सकते हें तो फिर बड़े बड़े घोटाले करने वाले क्या बुरा कर रहे हें? हम उनसे अलग कहीं भी नहीं है। सरकारी धन को इस तरह से हासिल करके हम खुद को भ्रष्ट घोषित कर रहे हें।

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

२ अक्टूबर !

आज दो अक्टूबर है और देश में छुट्टी भी है वैसे तो कई लोग इस कलेंडर को गालियाँ दे रहे हें कि एक छुट्टी चली गयी अगर सोमवार को पड़ता तो किसी को दो और किसी को तीन छुट्टियाँ मिल जाती खूब मस्ती करते या फिर घूमने निकल जातेठीक भी है बेचारे सरकारी कर्मचारी रात दिन मेहनत करते हें तो छुट्टियों का इन्तजार क्यों करें?
आज देश में इस छुट्टी का लाभ उठाने वाले लोगों में से कितनों ने गाँधी जी और शास्त्री जी को याद किया होगा , उनके जन्मदिन के उपलक्ष में ही तो छुट्टी ले रहे हेंउन्हें याद कर लें यही बहुत है और अगर उनके चरित्र औरउनके मार्ग पर चलना तो दूर शायद इतिहास में उनके सद्कार्यों के वर्णन का ' ' भी याद करके अपने बच्चों कोबता दें तो इस दिन की छुट्टी मेरी दृष्टि में सार्थक हो जाएगी लेकिन ऐसा भी नहीं होता हैवे गुजरे ज़माने के लोग थे औरआज के ज़माने में अगर गाँधी या शास्त्री की तरह चलने लगें तो हम भी उनकी तरह से बिना कपड़ों के और शास्त्री जी कीतरह से अच्छे खासे रेल मंत्री थे और रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे डाला.ये आदर्शों का जमाना जा चुकाहै और ये आदर्श सिर्फ किताबों और उपदेशों में अच्छे लगते हेंवास्तव में ये कालातीत हो चुके हेंअरे यहाँ तो अबजमाना है कि करो खुद और डंके की चोट पर करो और बलि का बकरा किसी और को बना कर हलाल करवा दो
मानवता , नैतिकता और आत्मा की आवाज की परिभाषा भी बदल चुकी हैअब कोई आत्मा दूसरे के हित के बारेमें नहीं सोचती है सब अपने बारे में सोचते हेंगाँधी की तरह एक लंगोटी में जीना नहीं चाहते बल्कि इतना इकठ्ठा करलेना चाहते हें कि आने वाली सात पीढियां खा सकेंउसी संसद में जहाँ गाँधी और शास्त्री की तस्वीरे मुस्करा रही हें , उनके साए में ही बैठ कर ये नेता साजिशें रचा करते हेंदेश को बेचने की साजिश, उसको खोखला बनाने की साजिश औरदेश में जितने भी लोग हों सबके बीच में एक दीवार खड़ी करने की साजिशजिसे जहाँ मौका मिला अपने भविष्य कोसुरक्षित करने की जुगाड़ में लगा रहता है और आज के दिन की गरिमा को कहीं भी किसी को भी बनाये रखने की जरूरतनहीं है

आज उन दो महान आत्माओं को याद करते हुए सोच रही हूँ कि वे जरूर जहाँ भी होंगी अपने त्यागऔर संघर्ष पर आंसूं बहा रही होंगी कि उन्होंने क्या सोचा था और आज देश क्या हो गया है? पूरा देश ऐसा है ये तो नहीं हैलेकिन कितने प्रतिशत है जो गाँधी और शास्त्री के प्रति कृतज्ञ हें या फिर उनके त्याग के मूल्य को समझ रहे हेंखैर ये तोदुनियाँ है - हम सभी लिखने वाले तो कलम से उनके प्रति आदर और श्रद्धा प्रकट कर ही सकते हें