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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

मत लादिए : अपने सपने बच्चों के कंधे !

     मत लादिए : अपने सपने बच्चों के कंधे !

                                        अगर पिछली पीढ़ी को भी देखें तो यह होता चला आ रहा है कि अगर पिता किन्हीं कारणों से अपने सपने पूरे नहीं कर पाया तो उन्हें वह अपने बच्चों में साकार होता हुआ देखना चाहता है। ये सोच कोई गलत नहीं है कि पिता अपने सपनों को पूरा करने के लिए बच्चों को पढाई के लिए वो सारी सुविधाएँ मुहैय्या कराता है, जो किसी कारणवश उसका पिता या अभिभावक न दे पाएं हों या फिर दुर्भाग्यवश वे उससे वंचित रह गए हों। बच्चों से अपेक्षा तो समझ आती है लेकिन अपने सपनों को पूरा करने के लिए बच्चों की रुचि या इच्छा जाने बगैर दबाव डालना सरासर अन्याय है।

         बच्चों की रुचि जानें :--             

      आज बच्चों में बचपन से ही उनकी रुचियाँ मुखरित होने लगती हैं बल्कि कहिये वे थोड़े से समझदार होते ही बताने लगते हैं कि  मैं तो ये बनूँगा। समय के साथ उनमें परिवर्तन भी होता है और उनकी पसंद भी बदल जाती है। वह बेफिक्र बचपन अपने आदर्श खुद ही बना लेते हैं और वे किसी भी क्षेत्र के हो सकते हैं। 

                     माता-पिता उनको अपने अनुसार करिअर बनाने का सपना देख रहे हैं तो वे अपने घर का माहौल उसी तरह से बना कर रखते हैं कि बच्चे को यही बनाना है। उसकी पढ़ाई और रुचि का अनदेखा कर, वे सपने देखने लगते हैं और फिर उस पर भविष्य की इमारत बनाने लगते है।

 

ऐसा भी होता है :-- 

                        एक  माता-पिता डॉक्टर हैं और उन्होंने अपना नर्सिंग होम बनाया है, लेकिन उनके बाद कौन देखेगा? ये सवाल उनको बहुत तेजी से परेशान कर रहा था। अब दो बेटियों में से एक तो डॉक्टर बनाना ही होगा। कई बार उसने सीधे रास्ते से मेडिकल में प्रवेश के लिए एंट्रेंस दिलाया लेकिन कोई सफलता नहीं मिली आखिर में उन्होंने एक निजी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन करवा ही दिया।  अरुचि से वह कहाँ तक पढ़ती? उसने पढाई में रूचि की जगह अन्य चीजों में रूचि लेना शुरू कर दिया। परिणाम वह बार बार फेल हुई। अपने सपने पूरे न होते देख कर माँ-बाप ने डाँटा भी कि  हम इतना पैसा इसलिए खर्च कर रहे हैं कि  जल्दी से डॉक्टर बन कर नर्सिंग होम सँभाल सको। पढ़ने वाली पीढ़ी किशोर ही होती है और कभी तो वह अनिच्छा से उनके सपनों को पूरा करने में अपनी रुचियों को बलिदान कर देती है और कभी अंदर से विद्रोह करके आत्महत्या तक चले जाते हैं।  वे अपने  सपनों का बोझ ढोते ही रहते हैं। ऐसे बोझ को डालने से अच्छा है कि उनको अपने सपनों को उन्हें जीने दिया जाय। 

समय के साथ बदलें :--

            दशकों के अंतराल के बाद सब कुछ बदल गया है, शिक्षा का स्वरूप, शिक्षा का तरीका और उसकी विभिन्न शाखायें। अपने सपनों के लिए जहां मेडिकल के क्षेत्र में सिर्फ एमबीबीएस करना ही एकमात्र विकल्प था, सलेक्शन नहीं हुआ तो लोग उसको फेलियर समझते थे लेकिन आज इतने सारे विकल्प सामने आ चुके हैं कि प्रगति के तमाम रास्ते उन्हें उच्च पदों तक पहुंचा देते है। आप अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन लाइए और उन्हें अपनी इच्छानुसार करियर बनाने दीजिए। 

           आज की आने वाली पीढ़ी बहुत ही संवेदनशील भी है और उनमें सहनशीलता भी अपने अभिभावकों के अनुरूप मानीं है और इसी को समझते हुए अभिभावकों को उनकी रुचि और रुझान को देखते हुए अपेक्षा  चाहिए और उनको उनका जीवन जीने और करिअर बनाने का अवसर देने का प्रयास करना चाहिए।  


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