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शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (1 )

अधूरे   सपनों की कसक (1)


                     नींद में देखे गए सपने तो मिथ्या होते है , आँख खुली और वे भी ओझल हो गए लेकिन कुछ सपने हम जागती आखों से भी देखते हैं और वे सपने हमारे जीवन की दिशा को निर्धारित करने वाले होते हैं . फिर भी जीवन के प्रारंभिक चरण में देखे गए सपने मन मष्तिष्क पर ऐसे बैठे होते हैं की उन्हें पूरा करने के लिए प्रयास तो हम करते हैं लेकिन फिर भी कभी कभी वे हमारे वश में  रह जाते हैं और हम उनके टुकड़ों को लेकर दूसरी दिशा में चल देते हैं। ऐसा लगभग सभी के साथ होता होगा कुछ लोगों के साथ न भी हुआ होगा , कुछापने सपनों के अवशेष को अपने दिल में छिपाए ही रहना चाहते हैं। फिर चलिए आज रूबरू होते हैं साधना वैद जी के सपने से ---

 साधना वैद


वो सपना जो साकार न हो सका

कैसी दुखती रग छेड़ दी है आपने आज ! हर रोज ही तो ये आँखें ना जाने कितने सपने देखती हैं और हर रोज ना जाने कितने सुकुमार सपने साकार होने से पहले ही काल कवलित हो जाते हैं ! कुछ इतनी गहरी और स्थाई टीस देकर जाते हैं कि जीवन भर के लिये वे ज़ख्म हरे ही रह जाते हैं और कुछ इतनी खामोशी से चले जाते हैं कि उनके टूटने की आवाज़ तक सुनाई नहीं देती !
वह सपना जिसके साकार न हो पाने का दर्द समय के इतने लंबे अंतराल के दौरान तिल भर भी कम नहीं हो सका वह मैंने अपने कैरियर के सन्दर्भ में देखा था ! बच्चों के लिये सबसे बड़े आदर्श उनके माता-पिता होते हैं ! माँ का नाम अपने समय के प्रसिद्ध साहित्यकारों में सम्मान के साथ लिया जाता था और वे उन दिनों प्रचलित कवि सम्मेलनों में मंच पर सुशोभित कवियों में एक परिचित नाम हुआ करती थीं ! बाबूजी न्यायाधीश के पद पर आसीन थे ! वे एक बहुत ही रौबदार एवं आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे ! काला कोट, सफ़ेद पतलून, टाई और हैट लगा कर जब वे रास्ते पर निकलते थे तो लोग अदब से सर झुका कर सामने से हट जाया करते थे ! उनका यह सम्मान और रुआब मुझे बहुत चमत्कृत करता था ! और तभी से मन में इस सपने ने आकार ले लिया था कि मैं भी बड़ी होकर बाबूजी की तरह जज ही बनूँगी !
हमारा एक छोटा सा परिवार था उन दिनों ! माँ, बाबूजी, मेरी बड़ी दीदी, मेरे बड़े भाई और स्वयं मैं ! बाबूजी की लाड़ली बेटी होने के कारण मैं अक्सर उनके साथ कोर्ट चली जाती थी और उनके चैंबर में बड़ी सी आरामकुर्सी पर लेटे-लेटे या तो चन्दा मामा, नंदन, पराग आदि पढ़ती रहती थी या फिर कागजों पर उन दिनों प्रचलित लाल नीली पेंसिलों से आड़ी तिरछी लकीरें खींच चित्रकला का शौक पूरा किया करती थी ! चैंबर से सटे हुए बड़े से हॉल में बाबूजी का कोर्ट रूम हुआ करता था जहाँ ऊपर डायस पर एक बहुत बड़ी सी मेज़ के साथ बाबूजी की कुर्सी होती थी ! मेज़ पर ढेर सारी फाइलें, क़ानून की किताबें, कलमदान, ढेर सारे होल्डर्स, अर्धचंद्राकार ब्लौटर और भी ना जाने कितनी तरह की चीज़ें सजी रहती थीं ! जो मुझे सबसे अधिक आकर्षित करता वह था एक हथौड़ा ! उसका उपयोग मेरे सामने बाबूजी ने कभी किया या नहीं मुझे याद नहीं है लेकिन बड़े होने पर फिल्मों में ‘ऑर्डर-ऑर्डर’ कर फ़िल्मी जजों को मेज़ पर ठोकते हुए खूब देखा है ! बीच-बीच में जब मैं बोर हो जाती तो कुर्सी बाबूजी के कोर्ट रूम के दरवाज़े के पास खींच परदे की आड़ से मुकदमें की कार्यवाही को बड़े ध्यान से देखती रहती ! वकीलों की धुआँधार बहस, वादी प्रतिवादियों से उनका क्रॉस एग्जामिनेशन, गवाहों के बयान सब कुछ मुझे बड़ा दिलचस्प लगता ! बीच-बीच में अगर बहस पटरी से उतरती दिखती तो अनुशासन में रहने के लिये और मुद्दे से ना भटकने के लिये बाबूजी सख्त लहजे में सबको चेतावनी देते और फ़ौरन कोर्ट रूम में सन्नाटा छा जाता ! तब मुझे अपने बाबूजी पर बहुत अभिमान होता था ! बड़े-बड़े लोग उनसे डरते थे और उनका बहुत आदर करते थे ! तभी से मेरे मन में बड़े होकर जज बनने की ख्वाहिश ने जन्म लिया ! जज का कार्य बहुत ही ईमानदारी और जिम्मेदारी वाला होता है ! सच्चे को न्याय मिले और अपराधी को सज़ा इससे बढ़ कर और सामाजिक न्याय क्या हो सकता है ! मैंने सारी-सारी रात बाबूजी को एकाग्र होकर जजमेंट्स लिखते देखा है ! जब घर में सभी सदस्य आराम से नींद के आगोश में लुढ़के होते बाबूजी मोटी-मोटी क़ानून की किताबों में मुकदमें से जुड़े मुद्दों के सन्दर्भ ढूँढते और दत्तचित्त हो शांत मन से उनका तार्किक विश्लेषण कर अपना फैसला लिखते ! सुबह जब हम जागते देखते बाबूजी अपने काम में लगे हुए हैं ! बाबूजी का वह रूप हमेशा से मेरे लिये बहुत प्रेरक रहा है ! मेरे मन में भी तब से यही सपना आकार ले रहा था कि मैं भी बड़ी होकर जज बनूँगी और किसीके प्रति अन्याय नहीं होने दूँगी !
लेकिन वह कहते हैं ना ‘अपने मन कछु और है कर्ता के कछु और’ ! चाहने मात्र से ही भला क्या होता है ! अपने सपने को साकार करने के लिये मैंने ग्रेजुएशन के बाद उज्जैन में विक्रम यूनीवर्सिटी में एम ए इंग्लिश लिटरेचर में और माधव कॉलेज की ईवनिंग क्लासेज़ में एल एल बी में दोनों में एक साथ एडमीशन लिया ! दोनों कोर्सेज़ में मेरी पढाई बढ़िया चल रही थी ! मुझे पढ़ाने वाले मेरे प्रोफेसर्स मेरी प्रगति से बहुत संतुष्ट थे और मुझे बहुत प्रोत्साहित भी करते थे ! लेकिन उन्हीं दिनों मेरे विवाह के लिये भी कई जगह बात चल रही थी ! बाबूजी रिटायर हो चुके थे ! ससुराल वालों के इस आश्वासन के साथ कि विवाह के बाद मेरी पढ़ाई जारी रखी जायेगी मुझे शादी का जोड़ा पहना कर विवाह मंडप में बैठा दिया गया ! लेकिन उसके बाद मेरी पढ़ाई में जो ब्रेक लगा वह स्थाई हो गया ! इसके लिये किसीको दोष देना अनुचित होगा ! शायद परिस्थितियाँ ही ऐसी विषम थीं कि मेरी पढ़ाई को जारी रख पाना संभव नहीं था ! मेरी माँ और बाबूजी भी बहुत दुखी हुए ! हालात इस तरह से यू टर्न ले लेंगे यह कल्पना तो उन्होंने भी नहीं की थी ! एक न्यायाधीश की बेटी, और हर अन्याय के खिलाफ लड़ने का संकल्प धारण करने वाली लड़की अपने प्रति होने वाले इस अन्याय का प्रतिकार नहीं कर पाई और जीवन भर अपनी हार का यह ज़ख्म अपने सीने में छिपाये रही ! यह सपना मेरे दिल के इतना करीब था कि आज भी मैं हर बात को, हर घटना को, हर किस्से को उसी नज़र से देखती हूँ कि अगर मेरे बाबूजी के कोर्ट रूम में यह मुकदमा चल रहा होता तो इसका क्या स्वरुप होता और वे क्या करते ! स्वयं को कभी जज के रूप में, तो कभी वकील के रूप में, कभी वादी प्रतिवादी के रूप में तो कभी गवाह के रूप में पाती हूँ और उसी आधार पर हर बात का विश्लेषण करने लगती हूँ ! मैं वास्तविक जीवन में तो जज नहीं बन पाई लेकिन आज भी हर पल हर क्षण मेरे अंदर मेरा सपना साँस लेता है शायद इसीलिये ना तो मैंने कभी किसीके प्रति खुद अन्याय किया ना होते हुए देख सकी और शायद अपने सपने को इसी रूप में प्रतिफलित होते देख मैं सुख से जी पा रही हूँ !


अधूरे सपनों की कसक !

      कुछ सपने इंसान के जीवन  बचपन से ही बनते बिगड़ते रहते हैं। कभी हालात , कभी घर वालों की मर्जी, कभी नियति के प्रहार कुछ भी कर सकते हैं। वो सपने जो किशोरावस्था के साथ कुछ बनने के सपने- हर मन में सजने लगते हैं, यह जरूरी नहीं है कि  वे सपने किसी व्यवसाय से जुड़े हों , घर परिवार से जुड़े हों या फिर खुद अपने से जुड़े हों। हाँ वे सपने जीवन में कहीं गहरी पैठ रखते हैं और यह भी होता है कि कभी कभी वे सपने अधूरे रह जाते हैं लेकिन उन अधूरे सपनों की कसक जब किसी और के उस सपने को पूरा होते देखते हैं तो अपने मन में उठती है . इसमें  उससे इर्ष्या का भाव नहीं होता है बल्कि अपने अधूरे सपने की याद ताजा हो जाती है। वैसे उनके अधूरे रह जाने से यह नहीं कि  जीवन की गति रुक जाए या फिर जीवन में दूसरी उपलब्धियां नगण्य हो जाएँ। फिर हम जो भी बन जाते हैं उसमें भी सपनों की जगह होती है लेकिन वो बालपन के सपने या युवा मन के सपने जब याद आते हैं तो कुछ अन्दर से दरकने की आवाज आती है, कसकने की आवाज आती है। ऐसे ही अपने कुछ लोगों के सपनों की एक श्रंखला लेकर आपके सामने आ रही हूँ। 
                     इस श्रंखला के लिए आप सभी को खुला आमंत्रण भी दे रही हूँ की आप इसमें शामिल होकर हमें अनुग्रहीत करें। अपने साथियों के सहयोग से ही इसको मैं आगे बढ़ने का सपना देख रही हूँ और फिर आप सभी भी इसमें अपने साथियों से सपनों की कसक को महसूस कर सकते हैं।  इसके लिए आपको कल तक का इन्तजार करना पड़ेगा . कल इसके लिए पहली कड़ी लेकर आ रही हूँ .

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

संबोधन, रिश्ते और अपनत्व !

                              परिवार और रिश्तों का जो सम्बन्ध  है वह प्रेम , स्नेह और सामीप्य से जुड़ा  है। हम आधुनिक बनने की लालसा में और उससे अधिक खुद को माडर्न देखने की झूठी शान में डूबते हुए वह खोते चले जा रहे हैं , जो हमारी शान रही है और जिसे पाने के लिए सब तरसते हैं।  
                              भारत में परिवार और विवाह जैसी संस्था विदेशों में एक सुखद आश्चर्य के रूप में देखी  जाती है और उसमें बसने वाला प्रेम और एकसूत्र में बंधे रहने की भावना तो और भी अधिक अनुकरणीय समझी जाती है। वह बात और है कि  अब हम उनके पीछे दौड़ कर अपने को आधुनिक कहलाने में ज्यादा गर्व महसूस करने लगे हैं। वह यहाँ आकर हमारी संस्कृति के अनुसार शादी करना चाहते हैं और हमारे परिवार में आकर उसकी परम्पराओं को अपनाने के लिए लालायित रहते हैं।
                                आज सुबह ही ऐसा कुछ सामने आया कि  मन किया कि  हम अपने आपको ही सुधारें और उनको सुधारने का प्रयास करें जो अपने संस्कृति और संस्कारों से भटक रहे हैं। समझाना हमारा काम है और मानना उनका। सुबह मेरी पारिवारिक मित्र परिवार की पोती मेरे पास आई और बोली दादू आपको "पुंटी " ने बुलाया है। पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया फिर मैंने पूछा ये 'पुंटी ' कौन है?  अरे दादू पूनम आंटी को हम ही पुंटी  कहते हैं।एक तो एक साथ रहते हुए चाची को आंटी कहना और फिर वह भी नाम लेकर।  घर के बड़े लोगों ने भी रोकने या टोकने की जरूरत नहीं समझी , जबकि वे लोग बहुत अधिक आधुनिक नहीं है।  हाँ आधुनिकता ओढ़ने का काम जरूर करते हैं। 
                               वह तो कह कर चली गयी लेकिन मेरे लिए एक सवाल छोड़ गयी कि उस परिवार में अभी सिर्फ दो बेटों की शादी हुई है . मेरे लिए अपने ही परिवार की तरह से है। बड़े बेटे के बच्चे हैं छोटे की पत्नी को आंटी कहने के लिए नाम जोड़ कर उन लोगों ने उसे 'पुंटी ' बना दिया और घर वाले उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिए कभी टोका नहीं . आंटी शब्द हमने अंग्रेजी भाषा से ही लिया है और अंकल भी क्योंकि उनके यहाँ चाहे जो रिश्ता हो वह अंकल और आंटी में ही निहित होता है और हमारे यहाँ के संबोधन रिश्तों की अलग परिभाषा ही नहीं देता है बल्कि उसकी गरिमा भी बताता है साथ ही पैत्रिक परिवार या मातृ परिवार किस से सम्बंधित रिश्ता है इसको भी स्पष्ट करता है। और ये शब्द बच्चे घर से बाहर  जाकर नहीं सीखते हैं बल्कि इन्हें तो घर में बाबा, दादी, नाना , नानी , माता पिता ही उनको वाणी ज्ञान होते ही सिखाते हैं कि  ये आपके ये हैं। अगर हम बच्चों को चाहे चाचा हो, मामा हो या फिर मौसा या फूफा जो सबको अंकल ही कहने की शिक्षा देते हैं तो ये हमारी कमी है। जो अपनत्व अपने भारतीय संबोधन में है वह विदेशी या अंग्रेजी से आये संबोधन में नहीं है। 
      हम आधुनिक बनें लेकिन किस दृष्टि से -- अपनी कुरीतियों के बहिष्कार के लिए, अपने बच्चों में लिंग भेद को छोड़ कर सबको समान प्यार और हक देने के लिए , उनकी समान शिक्षा और अधिकार देने के लिए और उनकी तरह से ही  स्वयं अपने कामों के लिए आत्मनिभर होने के लिए बने। ये नहीं कि  आप छोटे छोटे कामों के लिए पत्नी या बहू पर निर्भर रहें  , उसे भी इंसान समझ कर उसके काम में हाथ बंटा लें तो आपकी भारतीयता कम नहीं होती। हम दोहरी मानसिकता पाल कर आधुनिक और विदेशी संस्कृति के अनुयायी बन रहे हैं तो यह तो वह हुआ  'दोऊ  दीन  से गए पांडे , हलुआ मिला न मांडे  ' . 
                      शायद मैं विषय से भटक रही हूँ , इन संबोधन में भी एक प्यार और अपनत्व झलकता है जो सिर्फ भारतीय संस्कृति में ही मिलता है और कहीं भी ये देखने को नहीं मिलेगा। अगर बड़े छोटों को बेटा और बेटी कहकर बुलाते हैं तो  ही वह हमारा रक्त सम्बन्धी न हो लेकिन एक अपनत्व से जोड़ने का अहसास जरूर दे जाता है। हमारी ग्रामीण संस्कृति में आज भी चाहे वह जाति  का कोई भी हो, छोटा और बड़ा सब एक रिश्ते से बंधे और संबोधन से बंधे होते हैं। हमारे बुंदेलखंड में तो ये आज भी है। नाम लेकर बुलाना तो बहुत कम होता है। बड़े हैं तो चाचा और दादा और महिला हुई हुई तो चाची  या दादी कह कर संबोधन करते हैं चाहे वह परिचित हो या न हो। हमारे मुंह से उतने ही शब्द निकलते हैं चाहे हम ए बुढ़िया कहें या चाची  या अम्मा कहें . लेकिन इन शब्दों में हमारी तहजीब  और तमीज छिपी रहती है जो मुंह से निकलते ही  जाहिर  हो जाती है।आज की पीढ़ी यह भी कह कर बड़ों को झिड़क देती है।  एक घटना मुझे याद है - मैं बैंक में खड़ी थी और मुझसे आगे एक वृद्ध जिन्हें शायद खड़े होने में तकलीफ भी हो रही थी क्योंकि वह बार बार आकर खड़े हो जाते और फिर बेंच पर बैठ जाते।  कई पीछे के लोग काम करवा कर चले गए तो वह काउंटर पर आकर उस लड़की से बोले बेटा मैं बहुत देर से खड़ा हूँ मेरा काम कब होगा ? ये बुढऊ यहाँ रिश्तेदारी बनाने का काम मत करो , जो काउंटर पर आगे खड़ा होगा उसका ही काम होगा। मैं सुनकर अवाक रह गयी।  मानवता के आगे कोई रिश्ता या धर्म नहीं होता है।  एक बुजुर्ग को इस तरह से बोलना शायद हमारे संस्कारों की छवि दिखा रहा था।  ये तो हमारी भारतीयता का प्रतीक नहीं है।  इन रिश्तों में कोई खून का संबंध जरूरी नहीं है बल्कि अपनेपन की जरूरत होती है और यही अपनापन समाज की डहरी नींव का प्रतीक है ।
                      अगर हम कम शिक्षित लोगों की बात करें तो वो आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए मिल जायेंगे। लेकिन हम चाहे आधुनिक न भी हों, उच्च शिक्षित  न भी हों लेकिन खुद को आधुनिकता के लिबास में लपेटे हुए बच्चों को अंकल आंटी, ग्रांड माँ , ग्रांड पा बोलना जरूर सिखा देते हैं। फिर बच्चे अगर भावनात्मक रूप से न जुड़ पायें तो इसमें हम उनको दोष क्यों दें? हम ही उनके मन में दूर रहने वाले संबोधनों के बीज बो रहे हैं फिर कल को वे हमें भी उस नजर से देखना शुरू कर देते हैं तो हमें कष्ट क्यों होता है? आज जिस जगह पर हमारे बुजुर्ग या बराबर के लोग खड़े हैं कल वहीँ हम भी खड़े होंगे और तब शायद ये अनुभव करें कि हमने ही गलत सिखाया।  
                     अगर हम अपने सदियों से चले आ रहे रिश्तों की गहन बंधन और उसमें बसे प्यार को देखे तो वह बंधन सदैव अटूट रहता है। भले ही हम दो घरों में रहे लेकिन वो संबोधन हमें बांधे रहने में पूरी तरह से सक्षम हैं। चलो हम ही कुछ बच्चों में कैसे ही ये संस्कार डालें कि  कम से कम हम संबोधन  तो अपने रख ही सकते हैं। मैं तो परिवार की बात कर रही हूँ लेकिन हमारे मित्रों के बीच भी अंकल और आंटी कहने का रिवाज नहीं है।  बच्चे चाचा चाची या फिर मामा और मामी और मौसा मौसा ही कहते हैं और फिर हम आपस में जितना जुड़े हैं वो कहने की बात नहीं है। इसमें कोई  पैसा या स्तर कभी भी आड़े नहीं आया क्योंकि बचपन के मित्र एक स्तर के नहीं होते हैं लेकिन परिवारों के बीच वही अपनत्व है।  यही भारतीयता है और इसको कायम रखना हमारे हाथ में है।  

बुधवार, 8 अगस्त 2012

निर्माण का आधार !

                        
                      औरों  की बात तो मैं नहीं जानती लेकिन अपने बारे में निश्चित तौर पर कह सकती हूँ कि किसी भी रचना की नींव  कभी एक दिन में नहीं रखी जाती है. हाँ कविता के विषय में जरूर कहा जा सकता है कि किसी घटना या एक वाकया ने अंतर को छुआ और रच गयी लेकिन कोई भी गद्य लेख कई घटनाओं और अनुभवों का संयोजन होती है. जिसमें सिर्फ और सिर्फ सत्य का आधार मान कर किसी सन्देश  का संचार होता है. अपने स्वभाव और अपने कार्य के अनुरुप तमाम लोगों के अनुभव और उन सबके साम्य को मिलते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर ही किसी नई रचना का सृजन होता है.                               
                             पिछले दिनों मेरे एक लेख पर हमारे कुछ शुभचिंतक ब्लोगर साथियों ने कुछ और ही सोच लिया और फिर किसी और बन्धु को फोन करके बताया कि मैंने उनको इंगित करते हुए लेख लिखा है. वे मेरे अन्तरंग थे और उन्होंने सीधे मुझसे संपर्क कर ये बात पूछी और वह काफी समझदार और निकट सम्बन्ध रखने वाले थे , जिनसे कोई बात कहनी होती है तो मैं उन्हें भला बुरा भी कह देने का हक रखती हूँ. ये बात उन्हें पता थी तभी मुझसे पूछ डाला. मैंने उन्हें विस्तार से समझ दिया और उसे उस आधार को भी बता दिया जिससे प्रेरित होकर मैंने उसे लिखा था.
                             सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विषयों पर लिखना मेरी रूचि में शामिल है और ये सभी विषय मेरी रूचि के साथ साथ मेरे अध्ययन में भी शामिल रहने वाले विषय हें. इन विषयों पर मैं सिर्फ ब्लोगर बनने के बाद ही नहीं लिख रही हूँ बल्कि इन पर मैं पत्र - पत्रिकाओं में भी लिखती रही हूँ. इसलिए किसी के लेखन को व्यक्ति विशेष से जोड़ कर देखना गलत है. कितने संयोग होते हें जो आपस में मिल जाते हें और कितने लोगों की जीवन चर्या भी मिल जाती है लेकिन इसका आशय यह बिल्कुल भी नहीं है कि वह किसी विशेष से ही सम्बंधित हो. इस लिए एक रचना को सिर्फ रचना की दृष्टि से ही पढ़ा जाय न कि उसके तार जहाँ आपको सही लगे वहाँ जोड़ कर देख लें. ये बात सिर्फ मेरे लेखन की ही बात नहीं है बल्कि औरों के साथ भी होती है. अरे हम सब बुद्धिजीवी है तो उसकी गरिमा का तो ख्याल रखना चाहिए.

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

विकृति को समझें !

                         चर्चा में रहने के लिए कुछ तो ऐसी चर्चा कर लेंगे कि लोग वाह वाह न करें गालियाँ ही दें। बदनाम हुआ तो क्या नाम होगा? ये तो एक अलग बात है लेकिन ये सबके पीछे इंसान की दिमागी हालत और उसकी स्थिति भी देखने के जरूरत पड़ती है। इस रास्ते पर चलने वाले कुछ तो मानसिक विकृति का शिकार ही कहे जायेंगे, लेकिन ऐसे लोगों को शह देने वाले वाह वाह जरूर करते हैं लेकिन पीछे आलोचना भी करते हैं। 
                        चर्चा में रहने के लिए अगर हम ऐसी हरकतें करें कि लोग खीज़ कर गालियाँ देने लगें तो उस विकृति के शिकार इंसान को एक सुकून मिलता है, भले ही उसकी बातों से किसी को कितना ही दुख हो? वास्तव में वह होता है जिसकी दूसरी प्रशंसा होती है लेकिन जो श्रेष्ठता ग्रंथि का शिकार होते हैं उनकी कोशिश होती है कि अपनी ही बातों से दूसरों को हीन साबित करने की कोशिश करें बगैर ये जाने कि इन बेसिर पैर की बातों का क्या असर होगा? लेकिन स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भावना उनमें इतनी बलवती होती है कि वे उचित और अनुचित के अंतर को भूल जाते हैं। ये एक प्रकार के मानसिक विकार का असर होता है और इसको दूसरे शब्दों में मानसिक विकृति भी कह सकते हैं। 
                    ये आवश्यक नहीं है कि इसका रोगी इस बात को समझने वाला हो, कभी कभी वह बिलकुल अनभिज्ञ होता है। तब तो विदेश में जाकर बसने वाले कुछ भारतीय उसी देश के गुणगान करने लगते हैं और अपने देश की बेदखली। वहाँ सुविधाओं अलग है और वह देश बहुत पूरा है लेकिन वे भूल जाते हैं कि कैसे ही क्यों न हो? उस मिट्टी की महक और रगों में बहते हुए खून में मिट्टी, हवा और पानी का अंश है। यहाँ की भाषा तो जाहिलों की भाषा लगने लगती है, उनकी माँ और बाप इतने बड़े अंग्रेज थे कि बेटे को संबोधन अंग्रेजी में ही मॉम और डैड ही सिखाया गया होगा। ये भूल जाते हैं कि इस धरती पर जो धर्म ग्रन्थ रचे गए उन पर अंग्रेजी वाले भी शोध कर रहे हैं। यहाँ की भाषा सीखने रहे हैं और हिंदी में ग्रन्थ लिख रहे हैं। इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि अपने ही देश के जन्मे लोग अपनी ही भाषा का अपमान कर रहे हों और उसी भाषा में और जमीन पर जहाँ वे रहते हैं। 
                   ये भी एक मानसिक विकृति का ही परिणाम ये है कि हर ऐसे विकार वाले लोग अपने को समाज में भी अकेले ही पाते हैं और अपनी जाति को को यह कह कर दबाते हैं कि मेरे बराबर का इस समाज में कोई है ही नहीं, केवल तो मैं किसी लिफ्ट ही नहीं देता है। लेकिन वह ये भूल जाते हैं कि उनकी मनोविज्ञान को समझने वाले भी लोग इस समाज में हैं। ऐसे कोडिंग की कोई जरूरत नहीं है, न ही उन्हें इलाज की जरूरत होती है, हालांकि केवल वह काउंसलिंग ही क्यों न हो।
इसलिए अस्थिरता वालों से सावधान रहना और अपनी ऊर्जा उनकी बातों में हरगिज जाना न करें।

गुरुवार, 7 जून 2012

उठ जाग मुसाफिर !

               
                      क्या पढ़े लिखे और इस विकासशील भारत में जनता  अपने अधिकारों और कर्तव्यों से इतना अधिक विमुख है कि सरकार के किसी भी कदम का न तो  विरोध  कर सकते हैं और न ही उनसे कोई सवाल करने का अधिकार रखते हैं। वे  सरकार चुनते समय अपने विवेक को ताक  में रख कर बटन दबा कर चले आते हैं। लेकिन मैं यह क्यों भूल रही हूँ कि बटन दबाने के बाद जो चुने जाते हैं उनके ही रास्ते  और इरादे बदल जाते हैं। वे पांच साल के बादशाह बन जाते हैं और वह भी निरंकुश बादशाह फिर ठगा सा जनमत कुछ कर ही नहीं सकता है। 
                   पिछले दिनों आई रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15 वीं विधान सभा के पूरे 5 वर्ष के  89 दिवस सत्र  चले .  जब कि  एक वर्ष में 365 दिन में  अगर 30 दिन भी कार्य होता तो 5 साल में 150 कार्य दिवस होते लेकिन वह भी नहीं हो सका। जो 89 दिवस सदन में कार्य  हुआ  और 403 विधायकों में से सिर्फ 5 ऐसे थे जो की पूरे 89 दिन उपस्थित थे और इनके समेंत 20 विधायक ऐसे थे जो 88 दिन उपस्थित थे। इसमें से 1 को को छोड़ कर  शेष  सभी सत्तापक्ष  के विधायक थे। शेष कहाँ रहते हैं और क्या करते रहे इसके बारे में न सदन ने कभी जानने की कोशिश की और नहीं उन लोगों ने इस बारे में सूचित करने की कोई जरूरत समझी। उनके  वेतन भत्ते में कभी कोई  नहीं की जाती है क्योंकि प्रदेश का अस्तित्व  उनसे ही   है, नहीं तो प्रदेश अनाथ हो जाएगा। ये सिर्फ एक प्रदेश की स्थिति  है  इस बारे में हमें संसद और शेष सभी राज्यों के विधान सभाओं  की स्थिति के बारे में जानकारी उपलब्ध करायी जाए . लोक में जागरूकता जब तक नहीं आएगी तब तक अपना अर्थ सार्थक नहीं कर  पायेंगे .
                    प्रजातंत्र में सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ही हम अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं लेकिन वही प्रतिनिधि अपने दल के कठपुतली बन जाएँ तो ठगे तो हम जाते हैं। चुने हुए प्रतिनिधि तो अपनी जुगाड़ में कहीं और घूमते फिरते हैं सदन की कार्यवाही या उसमें अपनी उपस्थिति से उनको कोई भी मतलब नहीं होता है और नहीं सदन के अध्यक्ष इस विषय में कोई कदम उठता है . सरकारी कार्यालयों और बच्चों के स्कूल में उपस्थिति की तरह से हमारे विधायकों और सांसदों की उपस्थिति का भीएक रिकार्ड होना चाहिए और उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उन्हें चुनने वालों को पूरा अधिकार है कि  वे अपने प्रतिनिधि की कार्य प्रणाली से पूरी तरह से वाकिफ रहें। ताकि भविष्य में उनसे इस बारे में दुबारा आने पर सवाल तो किया ही जा सके। अन्धानुकरण अधिक दिन नहीं चल सकता है। वर्षों से विधायक और सांसदों के पद पर काबिज लोगो को अब जनमत क्यों नकार रहा है? सिर्फ इस लिए कि  उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए कुछ किया ही नहीं . कुछ माननीय अपनी नीयत सिर्फ इस इरादे से स्पष्ट कर देते हैं कि वे सिर्फ अपने और अपने क्षेत्र के विकास में में रूचि रखते हैं। 
                  अब हमें जागरूक होने की जरूरत है , पांच साल सिर्फ इसलिए हम चुप नहीं बैठ सकते हैं कि  हम उन्हें झेलने के लिए मजबूर है नहीं हमें उनकी गतिविधियों पर निगाह रहने का पूरा पूरा अधिकार होता है। अपनी बात उनके द्वारा संसद में उठाये जाने की बात को लेकर बात करने तक। वे ही हमारा माध्यम हैं और उन्हें अपने  क्षेत्र से जुड़े मामले को उठाना ही होगा। बस एक दूसरे का हाथ थाम  का शक्ति को बढ़ाना होगा और आवाज को बुलंद करना होगा फिर कल हम सुधार  की आशा कर सकते हैं. हम कोई राजनैतिक दल के सदस्य नहीं है लेकिन हम उस विधा से जुड़े हैं कि हम एक दूसरे तक अपनी बात को  पहुँचा तो सकते हैं और सोचने के लिए मजबूर भी कर सकते हैं। 
  

शुक्रवार, 1 जून 2012

विचार करें !

   अगर घर में बेटियाँ हें तो उनके विवाह के लिए आज नहीं कल सोचना है और ये कोई एक या दो दिन का सम्बन्ध नहीं है . इस जीवन भर के रिश्ते की बुनियाद भी मजबूत होनी चाहिए. आज कल लगभग सभी लड़कियाँ आत्मनिर्भर होकर जीने को अधिक महत्ता प्रदान करती हें और होना भी चाहिए क्योंकि आज की बदलती सोच ने अब पति और पत्नी दोनों को समान रूप से काम और जिम्मेदारियों  को उठाने की राह दिखाई है. इस परिवार और विवाह संस्था को स्थायित्व देने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार है - हमारी प्रगतिशील और परिपक्व सोच. इसके लिए हम पूरी तरह से जिम्मेदार हें क्योंकि आज भी ८० प्रतिशत विवाह माता पिता द्वारा ही किये जाते हैं . आज भी हर माँ बाप का ये सपना होता है कि जिस लड़के के साथ हम अपनी बेटी का रिश्ता करने जा रहे हैं उसका घर और परिवार हमसे अच्छे स्तर का हो. वह सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से ही तुलना करता है और आज भी मध्यम वर्ग का पिता कुछ न कुछ कर्जदार होकर बेटी के हाथ पीले कर रहा है.
                  उस घर में जाकर बेटी को कितना सामंजस्य स्थापित करके रहना पड़ता है इसके विषय में कम ही पता चल पाता है. क्योंकि दूर के ढोल सुहाने होते हैं और कुछ लोगों के तो दोहरे चेहरे होते हैं. इन चेहरे पर चढ़े नकाब के लिए शिक्षा दीक्षा भी कोई भूमिका अदा नहीं करती है क्योंकि संस्कार भी कुछ होते हैं और मैं नहीं समझ पाती हूँ कि ये मनुष्य किस मिट्टी के बने होते हैं? जो शादी के पहले कुछ और बोलते हैं और शादी होने के बाद कुछ और बोलने लगते हैं. 
                     मैं बहुत लम्बे चौड़े दायरे की बात नहीं कर रही हूँ . बस अपने इर्द गिर्द बसने वाले कुछ परिवारों की बात कर रही हूँ. कुछ उन बेटियों की बात कर रही हूँ जो मुझसे बहुत करीब से जुड़ी हें. सभी उच्च शिक्षित और सभ्य सुसंस्कृत परिवारों में विवाह के बाद पहुंची हैं. पिछले दिनों मैंने अपनी बेटी से बात करनी चाही तो उसका फ़ोन व्यस्त आ रहा था. जब वह फ्री हुई तो उसने मुझे मिलाया. मैंने उससे पूछा कि कहाँ व्यस्त थी? इस समय तो हमारे बात करने का समय होता है तो बोली - 'मम्मी हमारा "आओ सखी चुगली करें" क्लब बना है उसमें हम सब यानि जिनकी अभी या कुछ दिन पहले शादी हुई है अपनी अपनी ससुराल में बैठ कर अपनी समस्याएं शेयर करके हैं और मैं उन सबको कंसोल करती हूँ और रास्ते बताती हूँ कि कैसे इन हालातों से निबटा जाय? (वैसे बताती चलूँ कि मेरी दोनों ही बेटियों में काउंसिलिंग करने का गुण मेरी ही तरह से आया है.) वैसे वह अपनी और सहेलियों की बातें मुझसे बराबर शेयर करती हैं और तभी निष्कर्ष के तौर पर ये लेख लिखने की बात दिमाग में आई.
                              उसकी एक सहेली सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है और उसकी शादी फरवरी में हुई है. वैसे तो वह दिल्ली में ही रहती है लेकिन एक डॉक्टर से हम शादी करने से पहले ये सोच कर चलते हैं कि उसका क्या दायरा है? उससे हम कितनी पुरातन पंथी परम्पराओं को निभाने के लिए मजबूर कर सकते हैं. लेकिन हमारी सोच अपने बेटे या बेटी के उच्च शिक्षित होने से बदल नहीं जाते हैं लेकिन फिर भी समय और हालात के साथ हमें सामंजस्य स्थापित करना चाहिए. हम बाहर से दिखाने के लिए बहू को बेटी की तरह रखने की हामी तो भर लेते हैं लेकिन बाद में जो माँ का चोला उतार कर सास का रूप धारण करते हैं तो बहू भी आसमान से उतर कर जमीन पर खड़ी होती है और विस्फारित नेत्रों से देखती रह जाती है. उस बच्ची की डॉक्टर ननद है और घर में जब वह चाय लेकर जाती है तो वह कहती है -' जरा सिर ढक कर जाना पापा जी को चाय देने जा रही हो.'  जब कि हकीकत ये है तो उसको साड़ी पहनना शादी के चार दिन पहले सिखाया गया था. सच ये है कि वह अभी ठीक से दोनों हाथ से काम करते हुए सिर पर पल्ला संभाल नहीं पाती है. ये बात मुझे भी कुछ खली कि एक डॉक्टर और दूसरी डॉक्टर से इस तरह की बात कर रही है. क्या हम अपने को सिर्फ उदारवादी दिखाने का नाटक करते हैं? कल वह मेरे पास आई थी और बोली कि गाँव में कोई पूजा है तो वहाँ जा रहे हैं और वहाँ पर तो सास जी ने कहा है कि मुँह ढक कर रहना होगा. अगर कहा है तो रहना ही होगा. इतनी  गर्मी  और फिर भरी  साड़ी भी पहननी  होगी क्योंकि  नई  बहू पहली  बार  गाँव जा रही है उस पर मुँह ढक कर रहना. सोच कर ही डर  लगा  रहा है.
                          सास के दो चेहरे ओ अक्सर ही देखने को मिल जाते हैं. मेरे साथ एक लड़की वनस्थली से एम टेक करते समय आई आई टी में प्रोजेक्ट करने आई थी. वह कानपुर की रहने वाली थी इसलिए प्रोजेक्ट में उसको जॉब मिल गयी और वह एम टेक पूरा करने के बाद मेरे ही प्रोजेक्ट में जॉब भी करने लगी. वह पापा के ट्रान्सफर वाले जॉब के कारण शुरू से ही हॉस्टल में पढ़ी थी. इत्तेफाक से वह मंगली थी और उसके लिए उसके पापा मंगली वर ही खोज रहे थे. उनको एक ठीक ठाक एम बी ए लड़का मिल गया. जब शादी तय हुई तो वह बाहर जॉब कर रहा था. उनकी सास का शुरू में जो व्यवहार था उससे यही लगता था कि उनके घर में बेटी नहीं है इसलिए वह बहू के रूप में बेटी मिल रही है .बेटी बहुत खुश रहेगी. बाकी कुछ जानने और समझने की जरूरत ही नहीं समझी गयी. लोकल शादी हुई थी इसलिए नौकरी छोड़ने की बात उसने सोची भी नहीं थी . शुरू शुरू में सास लंच बना कर देती और फिर कुछ दिन बाद उसके लिए खाना बना कर जाना. उसका घर इतना दूर था कि उसकी अगर ऑफिस की बस छूट  गई तो उसको ३ घंटे आने में लगते थे और इसलिए ऑफिस में देर तो वहाँ उसको उत्तर देना होता था. रोज रोज वह घर का रोना नहीं रो सकती थी. घर में उसको सास मुँह ढक कर रहने के लिए मजबूर करती. अगर उसको सबके साथ टीवी भी देखना हो तो मुँह ढका होना चाहिए. फिर सोने से पहले सास के पैर भी दबाने पड़ते . वह रात १२ बजे सोने जाती और सुबह ४ बजे उठ जाती. ऑफिस में सारे दिन कंप्यूटर पर काम करना होता . उसके मम्मी पापा अगर छुट्टी के समय बस स्टॉप पर आकर मिल लेते . इसी समय वह गर्भवती हुई , तब तो उसके लिए काम और घर मुश्किल होने लगा. शुरू के दिन की परेशानियाँ और घर के माहौल  से वह टूटने लगी थी. आखिर उसके मम्मी पापा अपने घर ले आये लेकिन उसके पति को माँ उससे मिलने केलिए नहीं आने देती.  उसका पति भी ऑफिस में लंच टाइम में आकर मिलता. उसको बेटा हुआ तो दादी का मन डोला और उसको घर ले गयी. फिर शुरू हुआ बच्चे को रखने के लिए समस्या. आया वह रख नहीं सकती थी, खुद वह देखेंगी नहीं. फिर दबाब बढ़ा कि नौकरी छोड़ दो. उसने नौकरी छोड़ दी और एक वह लड़की जिसके माँ बाप ने एम टेक तक शिक्षा दिलवाई उसके ससुराल वालों की सोच के लिए वह सिर्फ एक गृहणी बना दी गयी. रोज रोज की किच किच परेशान होकर उसके पति ने बाहर दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली और पत्नी और बेटे को लेकर चला गया. तब जाकर उस लड़की को सुकून मिला.
                              ये दो किस्से सिर्फ इसलिए कि लड़कियों  के माँ बाप अपनी ओर से सुयोग्य वर और अच्छा घर देखते हैं लेकिन इसके साथ ही उस घर के लोगों की सोच और विचारों को जानने का भी प्रयास करें तो बेटी के सुखद भविष्य के लिए अधिक उचित होगा. घर का स्तर , ऊपर दिखने वाला व्यवहार और उनके आतंरिक स्वरूप के विषय में जल्दी पता नहीं चल पता है. इसलिए शादी तय करने के बाद इतना समय अवश्य लें कि उनके बारे में अच्छी तरह से पता लगा लें. वह आपके अपने स्रोत होंगे जिन्हें प्रयोग करके आप पता लगायें. बेटी की शादी एक या दो दिन की बात नहीं होती है और हमारे दिए संस्कारों के कारण वह ऐसे लोगों के बीच कितना तनाव झेलती है इसको मैंने उस लड़की से जाना है. .
                              अपनी बेटी के भावी जीवन के बारे में हमें सोचना है तो हमेशा ये देखना चाहिए कि उस परिवार में वैचारिक परिपक्वता होनी चाहिए. आर्थिक स्तर भी समान होना चाहिए बल्कि यह एक महत्वपूर्ण आधार है क्योंकि बहुत बड़े घर में बेटी देना चाहे वह कामकाजी हो या फिर घरेलु उसके सुख और आत्मसम्मान के लिए ये जरूरी है कि समकक्ष आर्थिक स्तर का परिवार हो. अगर आपने बड़े घर की बेटी ले ली तो वह आपके घर में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पायेगी . फिर या तो वह आपको बात बात पर अपने घर का बखान करके नीचा दिखाएगी या फिर वह अपने घर जैसे माहौल की अपेक्षा करेगी. ये आवश्यक नहीं है कि जिसे आप उचित समझें उसे आपकी  बेटी भी समझे इस लिए उसके सामने हर बात स्पष्ट रूप से बता देनी चाहिए. जीवन उसको गुजारना है इसलिए वह आगे आने वाले स्थितियों से निपटने केलिए मानसिक रूप से तैयार रहेगी.
                              ये सारी बाएँ सिर्फ बेटी की शादी के लिए ही लागू नहीं होती बल्कि बेटे की शादी के लिए भी लागू होती है. लड़की भी हमेशा अपने बराबरी के परिवार और सभ्य सुसंस्कृत परिवार की लेनी चाहिए. हम आजकल नेट के माध्यम से रिश्ते अधिक खोजते हैं और फिर उसमें दी हुई जानकारियाँ कितनी सच और कितनी गलत होती हैं , ये बात तो तभी पता चलती है जब कि हकीकत से दो चार होना पड़ता है. इसलिए रिश्ते से पहले अपनी सारी इन्द्रियां सजग रख कर ही निर्णय लेने चाहिए. परिवार की सुख और शांति के लिए सिर्फ एक पक्ष नहीं बल्कि दोनों पक्षों की भलाई होती है.