चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

पेरेंटिंग : कब तक और कैसी हो?

          माता-पिता बनने के साथ ही मनुष्य में अपने बच्चे के लिए दिशा निर्देश देने के भाव उभरने लगते है बल्कि ये भी कह सकते हें कि इससे पहले भी माँ के गर्भवती होने से ही अपने आने वाले अंश को लेकर माता-पिता उत्साहित होते हें, उसके लिंग से लेकर नामकरण और भविष्य निर्धारण इसके लिए मूल बिंदु होते हें  हर माँ बाप का अपना सपना होता है कि उसका बच्चा उससे अधिक प्रगति करे, उसका जीवन स्तर उनसे बेहतर हो और इसके लिए वे रात-दिन मेहनत से लेकर अपने शौक त्यागने तक के लिए तैयार होते हें

        सवाल इस बात का है कि बचपन से किशोर होने तक - जो हम उन्हें सिखाते और दिखाते हें (इसमें हमारा अपना व्यवहार, सामाजिक सरोकार , हमारे संस्कार जाते हें) उन सब को वह ग्रहण करते हें लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि जो हम उन्हें दिखाते हें वह उनकी नजर में उचित ही होहम भी कहीं गलत हो सकते हैं लेकिन हमें अपने विवेक का हमेशा प्रयोग करना चाहिए और अगर हम विवेकपूर्ण व्यवहार करते हैं तो ये सारी बातें हम पर लागू होती ही नहीं है।  अपनी दृष्टि से हम अपने विचारों , संस्कारों और परिवेश के अनुसार ही व्यवहार करते हें और स्वयं हम कभी कभी अपने को  सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च समझाने के झूठे अहंकार में डूबकर किसी की सलाह मनाते हें और ही अपने समकक्ष किसी को पाते हें अपने को विश्लेषित करना भी हमें पसंद नहीं होता है

        यहाँ बात मैं पेरेंटिंग की कर रही थी, जब तक हमारे बच्चे हम पर आश्रित होते हें, हम उन्हें अपनी इच्छानुसार चलाते रहते हें और फिर भविष्य में भी ऐसा ही चाहते हें किन्तु बुद्धि और विवेक सबमें अपना अपना होता है, अगर हम उन्हें अपनी इच्छानुसार चलना चाहते हें तो यह सर्वथा गलत है लेकिन इस मामले में पुरुष की तुलना में स्त्रियाँ अधिक दखलंदाजी करती हुई पाई जाती हें

        पिछले दिनों मेरी एक आत्मीय की बेटी की सगाई हुई घर पर उसकी माँ ने उसके सास के बारे में कोई कमेन्ट किया तो वह तुरंत बोली 'मेरी सास के बारे में कुछ मत कहिये' माँ को यह सुनकर बुरा लगा और तुरंत ही बोली - 'अब बड़ी सास वाली हो गयी मैंने इतने दिनों तक पाला पोसा और पढ़ाया लिखाया उसका कुछ नहीं '

'हाँ, मैं अपनी सास के साथ वह सब नहीं करूँ-गी जो अपने दादी के साथ किया आपने तो अपने आगे किसी को कुछ समझा ही नहीं '

मैं वहाँ थी - मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगा क्योंकि उनके विषय में मुझसे अधिक कोई नहीं जानता है

दखल दें :-

           इस विषय में पिता समस्या कम ही पैदा करते हें क्योंकि अधिकाँश पिता इस मुद्दों से दूर ही रहते हें वे बच्चों के करियर को लेकर भले ही दखल दें लेकिन माएँ कभी कभी बहुत अधिक जुड़ाव रखते हुए बेटियों के ससुराल में भी प्रवेश कर जाती हें खुद इस तरह की बातें करते हुए देखा और सुना है --

- 'तुम्हारी सास ऑफिस जाते समय लंच बना कर देती है या नहीं'

-'तुम ही क्यों करती हो? परिवार तो सास का है, जितना बन जाए करो और समय से ऑफिस निकलो'

-'नौकरी छोड़ने की सोचना भी नहीं, मैंने इतना पैसा घर में बैठ कर चूल्हा चौका करने के लिए खर्च नहीं किया है'

-मेरी बेटी को ससुराल वालों ने नौकरानी बनाकर रखा है, सुबह से शाम तक अकेली खटती रहती है'

         ये सही पेरेंटिंग नहीं है, अगर इस तरह की दखलंदाजी की तो आप अपनी बेटी का हित नहीं बल्कि अहित कर रही हें अगर नए घर में जाकर बेटी कुछ अधिक व्यस्त रहती है तो उसे ऐसी बातें कह कर गलत भाव भरे नए घर में जाकर कुछ कुछ सामंजस्य करना ही पड़ता है, उसको अपने को इस वातावरण में ढलने का प्रयास करने दीजिये ससुराल वालों पर आक्षेप करें उसके सुख और शांति की कामना करें।आप भी किसी की बेटी को अपने घर में लाएंगी और फिर क्या आप इन सब बातों को दूसरी माँ से सुनना पसंद करेंगी।  शायद नहीं और यही कुछ चीजें होती हैं , जो कि परिवार को तोड़ने का काम भी करता है।  

गलत दिशा दिखाएँ:-

        अपने बच्चों के सुखी और शांतिपूर्ण जीवन देने के स्थान पर कहीं आप और व्यवधान डालने वाली पेरेंटिंग तो नहीं कर रही हें आप दिन में दो चार बार बेटी के ससुराल में फ़ोन करके उसकी गतिविधियाँ जानने की इच्छुक तो नहीं रहती हें खबर देने तक तो ठीक है लेकिन उस पर अपने कमेन्ट और सलाह तो नहीं दे रही हें 
-'अरे उनके बच्चे हैं तो ब्रेकफास्ट क्यों बनाती है? जल्दी तैयार होकर ऑफिस निकाल जाया कर, भले वहाँ थोड़ी देर जल्दी पहुँच जाए'

-'क्या सबका नाश्ता उनके कमरे में पहुंचाना , ये क्या बात हुई? एक जगह लगा सब अपना अपना नाश्ता खुद ले सकते हें '

-'अभी तेरी सास कोई बूढी तो है नहीं, सबको नाश्ता तो तैयार करके दे ही सकती है '

        ये कुछ सलाहें हें, जो माँँएँ अपनी बेटियों को दिया करती है, मैं मानती हूँ कि इसके पीछे छिपा उनका बेटी के प्रति प्यार ही होता है किन्तु वे यह क्यों भूल जाती कि अब उनकी बेटी दूसरे परिवार से जुड़ चुकी है और ऐसी सलाहें उसको भ्रमित कर सकती है वे चाहते हुए भी सही ढंग से काम नहीं कर पाती हैं। ये सलाहें बेटी के घर में और मन में दरार डालने का काम कर सकती हें इस समय इस तरह की पेरेंटिंग की जरूरत नहीं होती है बल्कि उसको सही दिशा निर्देश देने की जरूरत होती है कि वह अपने परिवार के सदस्योंं के बीच अपनत्व स्थापित कर अपना बना सके नए परिवार में कुछ परेशानियाँ अवश्य हो सकती हें लेकिन धीरे धीरे वे उसको अपने अनुरुप ढाल कर जीना सीख जाती हें शादी के बाद वह एक बेटी के लिबास से निकाल कर एक बहू, भाभी, पत्नी के लिबास को भी धारण करती है और उससे जुड़े सभी लोगों की कुछ अपेक्षाएं होती हें उसके अनुरुप खुद को ढलने दीजिये


दोहरे मापदंड अपनाएं:-


पेरेंटिंग सिर्फ बेटी के लिए ही नहीं होती बल्कि बहू के लिए भी होती है आप अपनी पेरेंटिंग से इज्ज़त भी पा सकती हें और गलत होने पर सम्मान खो भी सकती हें अधिकांश परिवारों में देखा है कि बहू और बेटी के लिए अलग अलग नियम लागू होते हें मेरी समझ नहीं आता कि ऐसा क्यों किया जाता है? मेरी ही छोटी बहन की शादी जिस परिवार में हुई , मुझे कुछ ऐसा ही देखने को मिला उसकी सास ने बताया कि हमारे यहाँ शादी के बाद की विदा (चौथी) महीने बाद होती है लेकिन चौथी की रस्म के लिए आने वाला समान एक हफ्ते के अन्दर ही भेज दिया जाता है हमने वैसे ही किया क्योंकि बेटी देकर हम उनके नियम और क़ानून से बंधे होते हें कुछ साल बाद जब उनकी बेटी की शादी हुई तो चौथी की विदा चौथे दिन ही हो कर गयी क्यूंकि बेटी की विदा तो चौथे दिन ही हो जाती है
इस तरह का व्यवहार  बहू के मन में मलिनता लाने वाला होगा है, अपने व्यवहार और मापदंडों में दोनों रिश्तों के लिए संतुलन बनाये रखें दोनों का जीवन आप से ही जुड़ा हुआ है उनके प्रति आपकी पेरेंटिंग में फर्क आपके सम्मान के लिए विपरीत भाव लगा सकता है बहू का मौन आज नहीं तो कल मुखरित होकर आपके सामने ही आने लगेगा और शायद तब आपको बुरा लगेगा


आपको सलाह :-

**अगर आप इस दृष्टि से विषय से सम्बद्ध होती हें और पेरेंटिंग के इस ढंग को अपना रही हें तो फिर आपके लिए कुछ सलाह जरूर देना चाहूंगी 

**अपनी बेटी और बेटे के लिए पेरेंटिंग आपका अधिकार है लेकिन तभी तक - जब तक वह सही दिशा देने वाला हो 

**बेटी अपने घर चली गयी तो आप उसका रिमोट अपने हाथ में मत रखिये अगर दे सकती हें तो उसे धैर्य और सहनशीलता के लिए निर्देशित कीजिये

**रिश्तों की गरिमा और उनसे जुड़े दायित्वों को सीखिए उसके घर की सुख शांति के लिए कामना कीजिये 

**उसके पारिवारिक जीवन को सुखपूर्ण बनाने की दिशा में ले जाने की सलाह दें  

               इसलिए  हम कितने ही प्रगतिशील हो, आधुनिक हो, जीवन मूल्यों की जो महत्ता है वह कभी भी कम नहीं होती सामाजिक संस्थाओं - विवाह, परिवार और व्यवहार में आने वाले मापदंडों के महत्व को हम नकार नहीं सकते पेरेंटिंग इन्हीं में से एक है और जब तक सृष्टि रहेगी, माता- पिता और बच्चों  का रिश्ता रहेेेेगा ,तब तक पेरेंटिंग भी रहेगी  लेकिन उसे सदैव सकारात्मक दिशा की ओर ले जायें। बच्चों का सुखी भविष्य ही आपके सुख का आधार है ।

रविवार, 17 मार्च 2019

आ चुका है सावधान रहने का समय !

संतान माता पिता या अभिभावकों के लिए सबसे प्रिय होती है और उसके लिए ही वो कठिन परिश्रम करते है और अपने सुख को भूल जाते हैं।  उनके सुन्दर भविष्य की कल्पना करना उनका सबसे बड़ा सपना होता है।  भविष्य के लिए सपनों वो बच्चे भी देखते हैं लेकिन वह उनके जीवन की वह उम्र होती है , जिसे किशोर वय  कहते हैं और इसमें वे इतने अनिश्चय के दौर से गुजर रहे होते हैं कि कभी वे ऐसा निर्णय ले बैठते हैं जो न उनके लिए उचित  होता है और न अभिभावकों के लिए है।
                       जब बच्चे जीवन के इस मोड़ पर होते हैं , तब उनके लिए परीक्षा का वह समय आ जाता है जिसमें अपनी अपेक्षा के अनुसार परिणाम की आशा करते हैं और कुछ बच्चे तो अपने माता पिता के सपनों को पूरा करने के लिए सब कुछ लगा लेते हैं।   उनकी उम्र के हिसाब से भी बहुत नाजुक होता है और माता पिता के लिए भी ये बहुत कठिन घडी होती है।  इस उम्र में वे कोई ऐसी परीक्षा दे रहे होते हैं , जो उनके आगे के भविष्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होता है या फिर शिक्षा की नींव बनती है।  पहली हो या दूसरी या फिर भविष्य के सपनों से जुडी कोई भी परीक्षा , उनके लिए जीवन मरण का प्रश्न बन जाती है।

सतर्क रहें : ये वह समय है जब कि माता - पिता को बहुत ही सतर्क रहने की जरूरत है।  अधिकांशतः मार्च से लेकर जुलाई तक का समय होता है जबकि स्कूली परीक्षा , कॉलेज की परीक्षा या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं का समय होता है।  पहले परीक्षाएं और फिर परिणाम।  बच्चे जी तोड़ परिश्रम करते हैं लेकिन अगर पेपर ख़राब होने पर या परिणाम के आने से पूर्व असफलता की आशंका उनके कोमल मष्तिष्क पर छायी रहती है और ऐसे समय में उन्हें भावात्मक सम्बल की जरूरत होती है और साथ ही माता पिता के सतर्क रहने की भी जरूरत होती है।  बच्चा यदि स्वभाव के विपरीत कुछ भी करता नजर आता है तो आप भी कोशिश करें कि उस पर विशेष ध्यान दें. उन्हें अकेले रहने का अवसर न दें                                                           
बाल  मनोविज्ञान :  बाल और किशोर मनोविज्ञान से आप अवगत होंगे और कभी अगर इस और ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी है तो अब समझें।  अगर आपका बच्चा अंतर्मुखी स्वभाव का है तो ऐसे बच्चे अपने मन की बात कोई प्रकट नहीं करते हैं और अप्रत्याशित कदम भी उठा लेते हैं।  उन्हें खुद को अभिव्यक्त करने की आदत नहीं होती है और ऐसी आदत के चलते अगर आपको भी ये लगे कि आपका बच्चा अंतर्मुखी है तो उसको किशोर वय में प्रवेश करने से पहले उन्हें अभिव्यक्ति का माध्यम सुझा दें. उन्हें संगीत , लेखन या फिर डायरी लिखने की आदत डाल देनी चाहिए।  इससे उन्हें अपने तनाव या अवसाद को व्यक्त करने का माध्यम मिल जाता है और इससे वह कुछ हद तक अपने उसे तनाव से मुक्त हो जाते हैं।
बच्चों पर अपना निर्णय न थोपें : यह अधिकांशतः देखा जाता है कि माता पिता जो खुद बनना चाहते हैं और नहीं  बन पाते हैं  तो वे अपनी दमित इच्छा को बच्चों में साकार देखना चाहते हैं और इस बात को वे बच्चों से इस तरह कहते हैं कि बच्चों के ऊपर एक मानसिक दबाव आ जाता है और वे भी उसकी पूर्ति के लिए जी जान से जुट जाते हैं लेकिन इसमें अगर कहीं उनको लगता है कि वे सफल नहीं हो पाएंगे और कभी पेपर सहीं न होने पर तो कभी परिणाम आने के पहले ही वह कभी कभी आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।  इस स्थिति से  बचने के लिए बच्चे की रूचि और क्षमताओं का आकलन करते हुए ही अपेक्षा रखे और उनको आश्वासन देते रहें कि  जो भी परिणाम हो उनको ख़ुशी होगी क्योकि तुमने पूरी शक्ति से तयारी की है।
तुलना न करें :  बच्चे की प्रगति और परिणाम में अक्सर माता पिता बच्चों की तुलना उनके मित्रों या अपने मित्रों के बच्चों के साथ करने लगते हैं।  जीवन में हर बच्चे की अपनी अलग क्षमता होती है और उसकी मेधा भी अलग होती है तो तुलना तो बिलकुल ही व्यर्थ है बल्कि इससे आप अपने बच्चे को अवसाद  और तनाव का शिकार बना देंगे और कभी कभी तो तुलना की भावना बच्चे में हिंसा का भाव तक ला देता है।  उन्हें स्वाभाविक तरीके से पालें और बड़ा होने दें। 

सोमवार, 28 मई 2018

वक्त : सावधान रहने का !


                         संतान माता पिता या अभिभावकों के लिए सबसे प्रिय होती है और उसके लिए ही वो कठिन परिश्रम करते है और अपने सुख को भूल जाते हैं।  उनके सुन्दर भविष्य की कल्पना करना उनका सबसे बड़ा सपना होता है।  भविष्य के लिए सपनों वो बच्चे भी देखते हैं लेकिन वह उनके जीवन की वह उम्र होती है , जिसे किशोर वय  कहते हैं और इसमें वे इतने अनिश्चय के दौर से गुजर रहे होते हैं कि कभी वे ऐसा निर्णय ले बैठते हैं जो न उनके लिए उचित  होता है और न अभिभावकों के लिए है।
                       जब बच्चे जीवन के इस मोड़ पर होते हैं , तब उनके लिए परीक्षा का वह समय आ जाता है जिसमें अपनी अपेक्षा के अनुसार परिणाम की आशा करते हैं और कुछ बच्चे तो अपने माता पिता के सपनों को पूरा करने के लिए सब कुछ लगा लेते हैं।   उनकी उम्र के हिसाब से भी बहुत नाजुक होता है और माता पिता के लिए भी ये बहुत कठिन घडी होती है।  इस उम्र में वे कोई ऐसी परीक्षा दे रहे होते हैं , जो उनके आगे के भविष्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होता है या फिर शिक्षा की नींव बनती है।  पहली हो या दूसरी या फिर भविष्य के सपनों से जुडी कोई भी परीक्षा , उनके लिए जीवन मरण का प्रश्न बन जाती है।

माता पिता की सतर्कता :
 
                                    ये वह समय है जब कि माता - पिता को बहुत ही सतर्क रहने की जरूरत है।  अधिकांशतः मार्च से लेकर जुलाई तक का समय होता है जबकि स्कूली परीक्षा , कॉलेज की परीक्षा या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं का समय होता है।  पहले परीक्षाएं और फिर परिणाम।  बच्चे जी तोड़ परिश्रम करते हैं लेकिन अगर पेपर ख़राब होने पर या परिणाम के आने से पूर्व असफलता की आशंका उनके कोमल मष्तिष्क पर छायी रहती है और ऐसे समय में उन्हें भावात्मक सम्बल की जरूरत होती है और साथ ही माता पिता के सतर्क रहने की भी जरूरत होती है।  बच्चा यदि स्वभाव के विपरीत कुछ भी करता नजर आता है तो आप भी कोशिश करें कि उस पर विशेष ध्यान दें. उन्हें अकेले रहने का अवसर न दें                                
 किशोर मनोविज्ञान :  
              बाल और किशोर मनोविज्ञान से आप अवगत होंगे और कभी अगर इस और ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी है तो अब समझें।  अगर आपका बच्चा अंतर्मुखी स्वभाव का है तो ऐसे बच्चे अपने मन की बात कोई प्रकट नहीं करते हैं और अप्रत्याशित कदम भी उठा लेते हैं।  उन्हें खुद को अभिव्यक्त करने की आदत नहीं होती है और ऐसी आदत के चलते अगर आपको भी ये लगे कि आपका बच्चा अंतर्मुखी है तो उसको किशोर वय में प्रवेश करने से पहले उन्हें अभिव्यक्ति का माध्यम सुझा दें. उन्हें संगीत , लेखन या फिर डायरी लिखने की आदत डाल देनी चाहिए।  इससे उन्हें अपने तनाव या अवसाद को व्यक्त करने का माध्यम मिल जाता है और इससे वह कुछ हद तक अपने उसे तनाव से मुक्त हो जाते हैं।
बच्चों के प्रिय बनें: माता पिता में से कोई ऐसा होना चाहिए , जिस पर उन्हें पूर्ण विश्वास हो कि वह उसको अच्छे से समझता है और  जिससे वे अपनी बातें शेयर कर सकें और उनको समुचित सांत्वना मिल सके।अगर पिता घर पर नहीं रहते हैं , वे बाहर नौकरी करते हैं , कार्य के घंटे अधिक हैं या फिर वह समय नहीं निकल सकते हैं तो माँ को उन्हें पूर्ण विश्वास में लेना चाहिए ताकि वे अपने को उपेक्षित न समझें।  उनसे उनके स्कूल की गतिविधियों के बारे में पूछते रहें।  शिक्षकों के विषय में जानकारी लेते रहें।  उनके मित्रों के बारे में भी खबर उनसे लें।  इससे यह होता है कि बच्चा अपनी हर बात शेयर करता है और वह समझता है कि माँ उसकी सबसे शुभचिंतक है और वे अपने  तनाव और समस्यांओं को सहज ही हल प्राप्त कर सकते हैं।
तुलना न करें : 
                   ये इंसान की आम आदत है कि वह अपने बच्चे से ये अपेक्षा रखता है कि वह सबसे आगे रहे और खास तौर पर साथ काम करने वालों या फिर रिश्तेदारों के बराबरी के बच्चों से। यह एक बहुत बड़ी भूल होती है अभिभावकों की।  हर बच्चे की अपनी क्षमताएं और बुद्धिमत्ता होती है और तुलना चाहे वह सगे भाई बहनों के साथ हो या फिर मित्रों के साथ , बच्चे के मष्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती है और वे जहाँ भी ये देखते हैं कि  उन्हें अपनी परीक्षा से पापा या मम्मी के अनुकूल अंक नहीं मिल पाएंगे तो कभी कभी वे आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम भी उठा लेते हैं।
मित्रता का रिश्ता रखें : बच्चों के साथ सदैव मित्रता का सम्बन्ध रखें।  अपने माता या पिता  होने के अधिकार के चलते उनको हीनता महसूस न होने दें।  मित्रवत व्यवहार आज की पीढ़ी की सबसे अच्छी पसंद है।  समय के साथ रिश्तों के बीच की दूरियां ख़त्म हो रही हैं और यही कारन है कि बच्चे माता पिता के साथ अपनी हर बात शेयर करना चाहते हैं।  यह एक अच्छी पहल होगी।

शनिवार, 12 मार्च 2016

लकीरें !

                                    ये तो विश्वास की बात है कि हमारे जीवन में लकीरों का कितना महत्व है और हमारे हाथ की लकीरें को पढने वाले बहुत मिल जाते हैं।  माथे की लकीरें भी पढ़ना प्रबुद्ध जन जानते हैं और उनका आकलन  कितना सही है? इस बात को वही बता सकता है जो इसका भुक्तभोगी हो। कहते हैं कि हाथ की लकीरे बनती बिगड़ती रहती हैं और बच्चों के हाथ की लकीरें तो १२ वर्ष की उम्र तक बनती हैं। 
                                    आज अपना अनुभव बता रही हूँ कि रेखाओं की भाषा जिसे आती है उसे खूब आती है।  ये बात तब फिर से याद आई जब इस बार मेरी बेटी ने कहा - 'माँ हम लोग चाहते हैं कि आप और पापा एक बार पुर्तगाल आने का प्रोग्राम बना लें और हमें बता दें।  हम उसी के अनुसार टिकट करवा देंगे। '  उसके इस कथन ने मुझे ३४ साल पहले लाकर खड़ा कर दिया।  जब मेरी इस बेटी का जन्म हुआ था और मैं उसे अस्पताल से लेकर घर आई थी तो हमारे एक परिचित की बेटी घर आई थी।  सुना था कि उसको ज्योतिष का बड़ा अच्छा ज्ञान है लेकिन लकीरों का इतना गहन ज्ञान और वह भी उतनी कम उम्र में मुझे विश्वास नहीं था। 
         बेटी लेटी थी तो उसके पैर की लकीरों को उसने बहुत दूर से देखा और बोली - 'भाई साहब आपकी ये बेटी आपको विदेश घुमाएगी। ' 
                   तब हम लोग हँस दिए थे क़ि अभी  वक्त है। पता नहीं तब कौन कहाँ होगा ? बात मेरे दिमाग में घर कर गयी थी लेकिन जीवन के संघर्षों और उतार -चढ़ाव  के बीच ये  ये कथन भी धुंधला गया बल्कि कहें हम भूल ही गए।  हमारी ऐसी स्थिति न थी कि हम अपनी बेटी को बाहर पढने भेज पाते लेकिन लकीरें उसे विदेश ले गयीं और अब गीता की कही लकीरों की गणना भी पूर्ण होने वाली है।