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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

कल का सच - जो आज देखा !

मैंने एक कहानी पढ़ी - लिखने वाला एक युवा लेखक लेकिन उसने जो भी लिखा इतना यथार्थथा कि खुद मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब कल यही उत्तर मिलने वाला है। कहानी में एक युवा पुत्र नेअपने माता - पिता को एक पत्र लिखा था, उनके इस बात की दुहाई देने के लिए कि मुझे तुम्हारी अब जरूरत है , मेरे पास पैसा बहुत है और विदेश से नौकरी छोड़ कर यहाँ आ जाओ।
लिखने वाले की कलम की धार देखने काबिल थी, जो जो तथ्य उसने प्रस्तुत किये उससे उसनेअपने ही माता पिता को कटघरे में खड़ा कर दिया जिसके लिए कोई सफाई न मैं पेश कर सकती हूँ और न वह माँबाप कर पाए होंगे। वह भावी पीढ़ी के लिए एक कटु सत्य है और उसको झेलना ही होगा। आज की पीढ़ी जो जीवनस्तर, आधुनिक सुख सुविधाओं और सोसायटी में अपनी जगह बनाने के लिए जिस तरह से भाग रही है औरजीवन को एन्जॉय करना चाह रही है , उसके लिए बहुत कुछ खो भी रही है।
अगर हम अपनी पीढ़ी की बात करें तो हमारी कामकाजी होने के बाद भी अपने मध्यमवर्गीयपारिवारिक मूल्यों का वहन करती रही। काम के बाद बच्चों को अपने सीने से लगाकर सुलाया है। घर पर नहीं रहीतब भी आया के आँचल में नहीं दिया। संयुक्त परिवार के परिवेश में जिया । इसके लिए हमने अपने तन, मन औरधन तीनों से कीमत भी चुकाई लेकिन बच्चों के लिए 'घर' का अर्थ 'घर ' ही रहने दिया। माँ नहीं है तो बाबा दादी हैं , ताई या चाची हैं। उनको खाना निकाल कर तो दिया। स्कूल से आने पर अपने पास सुला तो लिया। नहीं तो अपनेभाई बहनों के संग सुरक्षित घर के माहौल में बच्चे रहे।
आज के बच्चे भी वही दिल लेकर पैदा होते हैं और उनके दिल भी हमारे बच्चों के तरह से ही धड़कतेहैं। वे भी चाहते हैं कि कुछ पल माँ के साए में गुजरें। ममता के अर्थ नहीं बदल जाते - हमारी सोच ने उसे बदलदिया है। आज की युवा पीढ़ी अर्थ के पीछे दौड़ रही है। अधिक से अधिक कामना और सुख सुविधाओं को जुटानायद्यपि वह ये सब सिर्फ अपने लिए नहीं कर रही है बल्कि बच्चों के लिए भी कर रही है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर मेंअच्छे स्कूल में पढ़ाना , आधुनिक जीवन मूल्यों के अनुसार बच्चों के अलग बेडरूम को अच्छे से सजाना औरउनके जरा सा बड़ा होते ही अलग कमरे में डाल देना। चाहे बच्चा रात में डर के मारे सो न पाए लेकिन उसे पाश्चात्यसंस्कृति के अनुसार जीना है। फिर हम भारतीयता कि दुहाई क्यों देने लगते हैं?
नौकरी के चलते छुट्टी के ख़त्म होते ही बच्चे को डे केयर सेंटर में छोड़ना होता है क्योंकि घर मेंकिसी को रहना नहीं होता है और आया के सहारे छोड़ने से अच्छा है कि बच्चा कई बच्चों के साथ रहे। सुबह जबबच्चा सोना चाहता है तब ऑफिस जाने की जल्दी में जल्दी से बच्चे को कभी कभी तो फ्रेश कराये बिना ही सेंटर मेंछोड़ दिया जाता है और बच्चा कई बार रोता रह जाता है। बच्चे को आया को पकड़ा कर माँ चल देती है. ये माँ केलिए मजबूरी ही सही लेकिन बच्चे के दिल में माँ के प्रति पलने वाला प्यार कहीं खोने लगता है। वह उसके पासरहता ही कितना है? माँ बाप को लगता है कि बच्चे को अच्छे से अच्छा मुहैया करवा रहे हैं तो उसको कोई भीशिकायत नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर माँ का आँचल और बाप का साया ही न मिला तो बच्चा निर्जीव चीजों केसाथ दोस्ती कर अपने संवेदनाओं को उनके साथ ही जोड़ लेता है और फिर अगर माँ उसके खिलौने कहीं उठा कररख भी दे तो वह रो रो कर उनकी मांग करता है तब उसको माँ नहीं अपने लिए वही जरूरी लगने लगते हैं।
रात में कभी कभी माँ पापा को पार्टी में जाना होता है और वे बच्चे को घर में बंद करके चल देते हैंक्योंकि पार्टी की औपचारिकता के अनुसार बच्चे वहाँ नहीं ले जा पाते हैं । एक वह अवसर भी बच्चों के सानिंध्य का छिन जाता है। उस नन्हे से मन की आत्मा कितनी आहत हुई ये हम नहीं समझ पाते हैं।
-हम बढ़िया से बढ़िया सामान मुहैया कराते हैं , हम कमाते किसके लिए हैं? इन्हीं बच्चों के लिए न।
-तुम्हारे किसी और दोस्त के पास हैं इतनी सारे खिलौने या फिर ऐसे समान - शायद नहीं लेकिन उनके पास कुछऔर होता है जो उसके पास नहीं होता है।
अगर कहें कि ये उनकी मजबूरी होती है , दोनों न कमायें तो खर्च कैसे उठायें? जीवन स्तर अच्छाकैसे बनायें? अपने फ्रेंड सर्किल में अपनी प्रतिष्ठा कैसे बना पायेंगे? पर इसकी कीमत बाल मन चुका रहा होता है। जब उसको माता पिता का प्यार नहीं मिला तो उसके मन में उनके प्रति प्यार कहाँ से आएगा? लगाव कैसे होगा?
बच्चे थोड़े से बड़े होते हैं , टी वी, कंप्यूटर, आई पोड से सुसज्जित कर दिए जाते हैं और फिर उन्हें किसी की जरूरतभी नहीं रहती है। अपने नेट से बनाये फ्रेंड सर्किल और अपनी बातें शेयर करने के लिए उनके पास बहुत से विकल्पआ जाते हैं फिर उन्हें किसी की जरूरत भी नहीं होती है। होस्टल, अपनी पढ़ाई और फिर कैरियर के लिए कोशिशकरना उनको और अधिक दूर कर लेता है।
अब कहीं उनके लिए अपनी मित्र मंडली ही सबसे बड़ी सहारा और दिशा देने वाली होती है। जॉबलगने पर छुट्टियों में वे घर आने कि बजाय घूमने के लिए निकल जाना अधिक पसंद करते हैं। क्योंकि उनकोलगता है घर जाने पर कोई दोस्त तो मिलेगा नहीं घर में रहकर करेंगे क्या? इसलिए बेहतर है कि टूरिस्ट प्लेस परजाकर छुट्टियाँ बिता आते हैं।
जब उन्हें हमारे साथ की जरूरत थी हम पैसे के पीछे भागते रहे और साथ ही अपनी सोसायटी मेंजगह बनाने के लिए हमारी गतिविधियाँ भी जारी रहनी चाहिए थी उसमें बच्चों के लिए कोई जगह नहीं थी। अबबच्चों के दिल में हमारे लिए कोई जगह नहीं है। उस बच्चे का एक उत्तर बहुत अच्छा लगा था। 'पापा पैसा आजमेरे पास भी बहुत है लेकिन इस पैसे से प्यार नहीं मिलता । जैसे आपने मेरे लिए सारी आधुनिक सुविधाएँ खरीदकर घर में कैद कर दिया था । मैं आप लोगों को और पैसे भेज देता हूँ। जो आपको चाहिए हो लेटेस्ट फैशन का लेलीजिये। लेकिन हमारे पास वह प्यार है ही नहीं हो हमें आपसे जोड़ सके। मार्था ने नौकरी छोड़ दी है क्योंकि वहअपने बच्चे को अधिक महत्वपूर्ण समझती है। पापा वह तो विदेशी है लेकिन उसके अन्दर ममता और प्यार दोनोंही है। ये प्यार हम बच्चे को किसी भी कीमत पर खरीद कर नहीं दे सकते हैं। हम तो आपको वही दे सकते हैं जोआपने हमें दिया। हम कहाँ से लायें जो हमें आपसे मिला ही नहीं। आशा करता हूँ कि आप मुझे क्षमा कर देंगे। '
आने वाली पीढ़ी को दोष किस बिला पर दें। अगर बच्चा माँ के आँचल की गर्मी महसूस नहीं कर सकातो फिर आज वह कशिश कहाँ से लाएगा? अभी समय है हमें इसके विकल्प खोज लेने चाहिए और सोचना चाहिएकि अगर हमें आज ये उत्तर मिल रहा है तो फिर हमने अपने माता पिता को तो आँचल की छाँव में पालने के बाद भीकुछ नहीं दिया।

सोमवार, 18 जुलाई 2011

खुद भी सुसंस्कृत बनें !

वैसे तो माँ - बाप के लिए जैसे ही किसी नए मेहमान के आने की बात सामने आती है , वे उसके भविष्य के लिए उसके नामकारण, शिक्षा और संस्कारों के लिए सपने बुनने लगते हैं (अपवाद इसके भी हो सकते हैं.) . जब वह दुनियाँ में आ जाता है तो फिर वह उसके इर्द गिर्द अपने जीवन को समेट लेते हैं. फिर मुँह से पहले शब्द के निकलने के साथ ही उसको अपने अनुसार ही शब्दों को सुनने के लिए लालायित रहते हैं. लेकिन ये पेरेंटिंग की जरूरत बच्चों को जितनी जरूरी है उतनी ही अपने आपको भी एक आदर्श ढांचे में ढाल कर रखने की जरूरत भी होती है. बच्चे सिर्फ वह नहीं देखते हैं जो आप उन्हें समझाते हैं बल्कि वे वह भी देखते हैं जो आप उनको अपने कार्यों के द्वारा दिखाते हैं. अपने व्यवहार को भी संयत रखने की बराबर जरूरत होती है.
मेरी एक परिचित के घर में उनके मायके वाले अक्सर ही आते रहते हैं और कभी बीमार होने पर यहाँ पर रुके भी रहते हैं. लेकिन उनकी सास-ससुर अगर आ जाते हैं तो उनका प्रयास रहता है कि वह कुछ दिन बाद देवर या जेठ के घर चले जाएँ. बच्चे इस बात को बहुत ही बारीकी से नोटिस में लेते रहे. एक बार उनके पिता जी आये उनको दमे की बीमारी थी.
वह कई महीने तक रहे और एक दिन उनकी बेटी ने कह दिया - मम्मी जब दादी यहाँ रहती थी और उनको खांसी आती थी तो आप कहती थीं कि इससे इन्फेक्शन लग सकता है और अब नाना जी के रहने से कोई इन्फेक्शन नहीं हो रहा है.
उन लोगों ने सोचा भी नहीं होगा कि उनकी अपनी बेटी जिसे वे संस्कार दे रहे हैं और अपनी बातों पर कभी ध्यान नहीं देते हैं कि हम क्या कर रहे हैं? उस बच्ची के कथन ने उन्हें आइना दिखा दिखा दिया. मेरे विचार से अगर हम अच्छे संस्कारित बच्चों की उम्मीद करते हैं तो हमें अपनी ओर भी ध्यान देना उतना ही जरूरी होता है.
ऐसी कहानी तो बहुत सुनी हैं और देखा भी है कि अगर घर में बच्चे अपने माता पिता को जैसा करते हुए देखते हैं वैसे ही करने कि उनकी सोच बनती है. नहीं मालूम ये कथा है लेकिन एक लघु कथा में पढ़ा था --
एक बच्चे के दादा जी का निधन हो गया तो उनके सारे समान को पिता ने घर से बाहर फ़ेंक दिया , बच्छा ये सब देखता रहा और बाहर जाकर उस कटोरे को उठा लाया जिसमें उसकी माँ दादा जी को खाना देती थी. जब उसके पिता ने देखा तो उससे पूछा - ये क्यों उठा कर लाये हो? इसको फ़ेंक दो न.'
'नहीं पापा जब आप बूढ़े हो जायेंगे न तब हम भी तो आपको इसी में खाना देंगे. इसी लिए उठा लाया.'
ये भी हमें कुछ सबक दे जाती है. देखने में बहुत छोटी सी बात है लेकिन कितनी गहराई से इसको सोचा जा सकता है और इसके परिणाम को सोच कर देंखें तो हमें यह बता जाता है कि हमारा व्यवहार ही बच्चों को कुछ सिखा जाता है.
मेरे एक मित्र बड़े परमार्थी हैं , उन्होंने कभी किसी भी जरूरतमंद को निराश नहीं किया. एक बार वे कुछ आर्थिक परेशानी में थे और उनकी बहन बीमार पड़ी , गंभीरता की स्थिति में बहन को उनके साथ की जरूरत महसूस हुई , उसने कहा कुछ भी नहीं लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें सहायता करनी चाहिए. उन्होंने अपने घर में बात की. उनकी बच्ची अपनी गोलक उठा कर लायी उसमें जामा किये हुए २००० रुपये पिता को दिए और कहा कि आप बुआ को ये दे दीजिये मेरे पास तो बेकार ही पड़े हैं न, उनके काम आ जायेंगे. '
ये सब चीजें सिखाने से नहीं आती हैं बल्कि बच्चों के द्वारा ग्रहण करने की होती हैं. जो हम उन्हें अपरोक्ष रूप से दिखाते हैं. कुछ प्रतिशत की बात छोड़ दें तो बच्चे घर से ही ग्रहण करते हैं और वही अपने जीवन में उतार लेते हैं. हमें तो बच्चों को सुसंस्कृत बनाने के लिए खुद को भी संयमित और सुसंस्कारित होने की जरूरत होती है. इसी लिए कहा जाता है कि बच्चे कोटि स्लेट की तरह से होते हैं और कुछ हम खुद लिख देते हैं और कुछ वे खुद ग्रहण कर लेते हैं . बच्चों के बिगड़ने पर हम उन्हें दोष नहीं दे सकते हैं. अपने गिरेबान में अगर खुद ही झांक कर आकलन कर लें तो बहुत अच्छा होगा न किसी को दोष देंगे और न कोई दोषी होगा.

गुरुवार, 26 मई 2011

एक पहल ऐसी भी !

अक्सर अख़बार में देखने को मिलता है कि किसी गरीब या फिर बीमारी से तबाह हो चुके व्यक्ति कोआर्थिक सहायता की जरूरत है। मीडिया ने उसको सुर्ख़ियों में ला दिया तो फिर कुछ न कुछ उसको सहायता मिलही जाती है और नहीं तो कितने दम तोड़ देते हैं , कितने घरों के चिराग बुझ जाते हैं और कितने घरों के चूल्हे मेंपानी पड़ जाता है। डॉक्टर जरूरत बता कर हट जाते हैं क्योंकि उनकी भी अपनी सीमायें होती हैं। वे अपने प्रयाससे जितना कर सकते हैं कर देते हैं लेकिन जरूरी धन तो वे नहीं जुटा सकते हैं। उस परिवार की हालात क्या होतीहै? ये तो कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है किन्तु सिर्फ पैसे के अभाव में हम किसी अपने को मरते हुए देखते रहें - इस विवशता का भान मनुष्य को खुद ही जीते जी मार देता है।
अभी पिछले दिनों एक घटना हुई कि एक महिला खिलाडी रेल से गिर कर अपना पाँव गवां बैठी । उसको पहले लखनऊ और फिर एम्स दिल्ली ले जाया गया। उसकी सहायता के लिए क्रिकेट खिलाडी युवराज वहरभजन सिंह ने एक एक लाख रुपये दिए। ये उसके खिलाडी होने के नाते या फिर उसकी सहायता मानवता केनाते करने का भाव उपजा ये तो वही बता सकते हैं लेकिन मेरे मन में जरूर ये विचार उपजा और जो एक लेख केरूप में आप लोगों के विचारार्थ प्रस्तुत है।
एक आम आदमी इससे अधिक भयावह स्थितियों से गुजरता है और किसी से सहायता नहींमिलती है। वह असहाय से अपने बेटे , बेटी , माता -पिता या पति को अपनी आँखों के समक्ष तिल तिल मरते हुएदेखता रहता है और कुछ भी नहीं कर पाता है। इतना सब लिखने का मेरा उद्देश्य मात्र एक विचार है जो कौंधा तोसोचा कि इसके बारे में सब से विचार करवाया जाय। क्या एक पहल ऐसी नहीं हो सकती है कि एक आपातकालीनकोष की स्थापना की जाय, जो इस तरह के लोगों के जीवन को बचाने में प्रयोग की जा सके । प्रश्न यह है कि वे लोगजो करोड़ों और लाखों रुपये कमा रहे हैं, उनके लिए कुछ हजार रुपये की राशि कुछ भी नहीं है और वे दे भी सकतेहैं। मंदिरों में करोड़ों का दान देने वाले इसमें भी कुछ दान दे सकते हैं । अगर हम यथार्थ की बात करें तो हर आस्थामें विश्वास रखने वाला ये जानता है कि ईश्वर या वह सर्वशक्तिमान यही कहता है कि मैं जीव में ही बसता हूँ औरजीव के प्रति दया मेरी सबसे अच्छी पूजा है। उसकी सेवा ही मेरी सेवा है। फिर मंदिरों में हम किस लिए इतना दानदेते हैं? अगर हम सिर्फ कुछ अंश ऐसे कोष में दान दे दें तो उससे कितने लोगों का जीवन बचाया जा सकता है। वेजो करोड़ों रुपये आयकर में दे सकते हैं वे इसमें भी दे सकते हैं। एक विशाल कोष तैयार होगा जिससे कितने गरीबोंके घर के रोटी कमाने वाले और कितने असहायों के सहाय बच सकते हैं।
प्रश्न यह है कि ऐसे कोष की पहल किस के अंतर्गत हो? ऐसे एक कोष कि स्थापना मानवाधिकारआयोग के अंतर्गत होनी चाहिए । जिसमें धन जमा करने वालों को आयकर से मुक्त धन देने का प्राविधान हो, इससे लाभ प्राप्त करने के लिए एक डॉक्टर की टीम सिफारिश करेगी वह टीम कहीं की भी हो सकती है। अब प्रश्न येहै कि इसके लिए पात्रता कैसे निर्धारित कि जा सकती हैं क्योंकि यहाँ भी रसूख वाले येन केन प्रकारेण इससे धनराशि प्राप्त करने के लिए जीभ लपलपाने लगेंगे। फर्जी प्रमाणपत्र और निर्धनता दिखाने वाले पैसे वालों की कमीनहीं है। इसके लिए मरीज कि स्थिति और उसके तीमारदारों कि स्थिति डॉक्टर से छिपी नहीं होती है और अगरडॉक्टर का पैनल इस पर विचार करते हुए अनुशंसा करे तो इसकी कार्यवाही आगे बढाई जाए , वही टीम मरीज केबारे में पूरा पूरा विवरण प्रस्तुत करके उसके लिए अनुमानित सहायता राशि के लिए लिख सकती है और फिरआयोग का डॉक्टर का पैनल इसकी आवश्यकता पर विचार करते हुए जारी करने कि सिफारिश करे।
कितने जीवन इससे बच सकते हैं, जो करोड़ों कमा रहे हैं उनके लिए छोटी सी राशि देना कोई बड़ीबात नहीं है और इसके साथ ही खुद को जनसेवक कहलाने वाले हमारे विधायक और सांसद जो साल में सिर्फ कुछदिन अपनी ड्यूटी के लिए संसद या विधानसभा में आते हैं और शेष पूरे वर्ष का वेतन लेते हैं उनके वेतन सेअनिवार्यतः वर्ष में कुछ दिनों का वेतन इस कोष में जमा करवाने की सिफारिश भी की जानी चाहिए। सच्चीजनसेवा इसी में है। तभी उनका जनसेवक कहलाने का कुछ अंश तक अर्थ जाना जा सकता है। मेरे विचार से येप्रस्ताव विचारणीय होना चाहिए।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

परिवार संस्था पर संकट !

परिवार संस्था आदिकाल से चली आ रही है और उसके अतीत को देखें तो दो और चार पीढ़ियों का एक साथ रहना कोई बड़ी बात नहीं थी। पारिवारिक व्यवसाय या फिर खेती बाड़ी के सहारे पूरा परिवार सहयोगात्मक तरीके से चलता रहता था। उनमें प्रेम भी था और एकता की भावना भी। धीरे धीरे पीढ़ियों की बात कम होने लगी और फिर दो - तीन पीढ़ियों का ही साथ रहना शुरू हो गया। जब परिवार के बच्चों ने घर से निकल कर शहर में आकर शिक्षा लेना शुरू किया तो फिर उनकी सोच में भी परिवर्तन हुआ और वे अपने ढंग से जीने की इच्छा प्रकट करने लगे।

आज छोटे परिवार और सुखी परिवार की परिकल्पना ने संयुक्त परिवार की संकल्पना को तोड़ दिया है। समय के साथ के बढती महत्वाकांक्षाएं, सामाजिक स्तर , शैक्षिक मापदंड और एक सुरक्षित भविष्य की कामना ने परिवार को मात्र तीन या चार तक सीमित कर दिया है।
इस एकाकी परिवार ने समाज को क्या दिया है? परिवार संस्था का अस्तित्व भी अब डगमगाने लगा है। पहले पति-पत्नी के विवाद घर से बाहर कम ही जाते थे, उन्हें बड़े लोग घर में ही सुलझा देते थे और अब विवाद सीधे कोर्ट में जाते हैं और विघटन की ओर बढ़ जाते हैं या फिर किसी एक को मानसिक रोग का शिकार बना देते हैं।
एक दिन एक लड़की अपनी माँ के साथ आई थी और माँ का कहना था कि ये शादी के लिए तैयार नहीं हो रही है। उस लड़की का जो उत्तर उसने मेरे सामने दिया वह था - 'माँ अगर शादी आपकी तरह से जिन्दगी जीने का नाम है तो मैं नहीं चाहती कि मेरे बाद मेरे बच्चे भी मेरी तरह से आप और पापा की लड़ाई के समय रात में कान में अंगुली डाल कर चुपचाप लेटे रहें। इससे बेहतर है की मैं सुकून से अकेले जिन्दगी जी लूं। '
आज लड़कों से अधिक लड़कियाँ अकेले जीवन जीने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे अपना जीवन शांतिपूर्वक जीना चाहती हैं। आत्मनिभर होकर भी दूसरों की इच्छा से जीने का नाम अगर जिन्दगी है तो फिर किसी अनाथ बच्चे को सहारा देकर अपने जीवन में दूसरा ले आइये ज्यादा सुखी रहेंगे।
एकाकी परिवार में रहने वाले लोग सामंजस्य करने की भावना से दूर हो जाते हैं क्योंकि परिवार में एक बच्चा अपने माता पिता के लिए सब कुछ होता है और उसकी हर मांग को पूरा करना वे अपना पूर्ण दायित्व समझते हैं । बच्चा भी सब कुछ मेरा है और किसी के साथ शेयर न करने की भावना से ग्रस्त हो जाता है। दूसरों के साथ कैसे रहा जाय? इस बात से वह वाकिफ होते ही नहीं है। जब वह किसी के साथ रहा ही नहीं है तो फिर रहना कैसे सीखेगा?
परिवार संस्था पहले तो संयुक्त से एकाकी बन गयी और अब एकाकी से इसका विघटन होने लगा तो क्या होगा? क्या सृष्टि के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न न लगने लगेगा। ऐसा नहीं है कि घर में माँ बाप की आज की पीढ़ी को जरूरत महसूस नहीं होती है लेकिन वे उनको तभी तक साथ रखने के लिए तैयार होते हैं जब तक की उनके छोटे बच्चों को घर में किसी के देखभाल की जरूरत होती है या फिर नौकरी कर रहे दंपत्ति को घर में एक काम करने वाले की तरह से किसी को रखने की जरूरत होती है। अगर अपनी सोच को विकसित करें और परिष्कृत करें तो माता पिता की उपस्थिति घर में बच्चों में संस्कार और सुरक्षा की भावना पैदा करती है और उनके माता पिता के लिए एक निश्चिन्त वातावरण की बच्चा घर में सुरक्षित होगा किसी आया या नौकर के साथ उसकी आदतों को नहीं सीख रहा होगा।
इसके लिए हमें अपनी सोच को मैं से निकल कर हम पर लाना होगा। ये बात सिर्फ आज की पीढ़ी पर ही निर्भर नहीं करती है इससे पहले वाली पीढ़ी में भी पायी जाती थी।
'
मैं कोई नौकरानी नहीं, अगर नौकरी करनी है तो बच्चे के लिए दूसरा इंतजाम करके जाओ।'
'
कमाओगी तो अपने लिए बच्चे को हम क्यों रखें? '

तब परिवार टूटे तो उचित लेकिन अगर हम अपनी स्वतंत्रता के लिए परिवार के टुकड़े कर रहे हैं तो हमारे लिए ही घातक है। इसके लिए प्रौढ़ और युबा दोनों को ही अपनी सोच को परिष्कृत करना होगा। घर में रहकर सिर्फ अपने लिए जीना भी परिवार को चला नहीं सकता है और ऐसा परिवार में रहने से अच्छा है कि इंसान अकेले रहे। वैसे आप कुछ भी करें लेकिन घर में रह रहे माँ बाप के सामने से आप छोटी छोटी चीजें अपने कमरे तक सीमित रखें और उन्हें बाहर वाले की तरह से व्यवहार करें तो उनको अपने सीमित साधनों के साथ जीने दीजिये। यही बात माता पिता पर भी लागू होती है ऐसा नहीं है कि हर जगह बच्चे ही गुनाहगार हैं। दो बच्चों में आर्थिक स्थिति के अनुसार भेदभाव करना एक आम समस्या है फिर चाहे कोई कमजोर हो या फिर सम्पन्न ऐसे वातावरण में रहने से वह अकेले नामक रोटी खाकर रहना पसंद करेगा।
कल जब परिवार टूट रहे थे तो ऐसी सुविधाएँ नहीं थीं। आज तो ऐसे सेंटर खुल चुके हैं कि जो आप को आपकी समस्याओं के बारे में सही दिशा निर्देश देने के लिए तैयार हैं और आपको उनमें समाधान भी मिल रहा है। फिर क्यों भटक कर इस संस्था को खंडित कर रहे हैं। इसको बचाने में ही सबका हित है और हमेशा रहेगा। इसके लिए सिर्फ एक पीढ़ी ही प्रयास करे ऐसा नहीं है दोनों को पहल करनी होगी और अपनी सोच को बदलना होगा क्योंकि परिवार से वे हैं और उनसे ही परिवार है।