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मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

संस्कार कैसे देते हें?

जीवन मूल्यों में हो रहे परिवर्तन  ने हमारी संस्कृति को विकृत  रूप  में प्रस्तुत  करना  शुरू  कर  दिया है. एक  मिसाल बनकर विश्व में अपना  परचम फैलाने वाली भारतीय संस्कृति के आधार परिवार, पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की गरिमा को अब लज्जित होने के लिए हम ही उसको इस हद तक पहुंचा रहे  है. आज हम खुद  ही अपने  पारिवारिक  मूल्यों की दुहाई  देने  में कतराने  लगे  हैं क्यों ? क्योंकि  हम अपने नैतिक  और पारिवारिक मूल्यों को खोते  चले  जा  रहे हैं ( संचित भी है, इस बात  से  इनकार  नहीं है लेकिन  अब खोने  का  पलड़ा  भारी है. ) 
                       ऐसा नहीं है पहले भी ऐसा होता था लेकिन उसका प्रतिशत इतना कम  था कि संयुक्त परिवार में वह नगण्य के बराबर होता था और ऐसे उदाहरण सामने आ नहीं पाते थे. . वैसे इसके लिए उत्तरदायी हम ही हुआ करते हें.
                             संस्कार कोई गिफ्ट आइटम नहीं है कि जिसे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को गिफ्ट पैक बना कर देते हें - उन्हें बहुत कुछ समझाने की जरूरत नहीं होती है , वे आज बहुत समझदार है और उसके अनुसार ही आचरण करते हें. आज की नई पीढ़ी और वह पीढ़ी जो अभी अपने पैरों पर चलने के लिए तैयार हो रही है वह वही ग्रहण कर रही है जो हम उसको दिखा रहे हें.
                             हमारी अपनी सोच, व्यवहार और आचरण ही  उनके लिए संस्कार बन जाते हें . इस विषय में वह लघुकथा सबसे अच्छा उदाहरण है कि 'दादा के निधन के बाद पिता ने उनके खाने वाले बर्तन उठा कर फ़ेंक दिए और उनका बेटा जाकर उन्हें वापस उठा लाया. पिता के ये पूछने पर  कि इन फेंके हुए बर्तनों को वह क्यों उठा लाया? तो बेटे ने उत्तर दिया कि कल जब आप बूढ़े हो जायेंगे तो ये ही बर्तन आपके काम आयेंगे. '
                             आज संयुक्त परिवार टूटते टूटते बिखर गए  हैं.  कहीं अगर माता पिता को साथ रखा तो तिरस्कृत करके रखा या फिर उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया. बच्चों ने वही देखा और वही ग्रहण किया. जो हमने उनको दिखाया  वही उन्होंने  संस्कार समझ  कर अपना  लिया . 
  बाद में हम सिर धुन कर रोते हैं  कि पता नहीं आज कल के बच्चों को क्या हो गया है? माँ - बाप की बात सुनते ही नहीं है, आप जब बड़े हो गए तब अपने सुनना बंद किया था और आप के बच्चों ने बचपन से ही क्यों? क्योंकि अब वे प्रगति पर हें और उनकी बुद्धि पिछली पीढ़ी से कहीं अधिक तेज है. ज्यादातर लोगों की ये सोच होती है कि हम जो कर रहे हें वह सही है लेकिन अगर वही बच्चों के द्वारा किया जाता है तो हमें कितना बुरा लगता . इसी लिए आचार्य श्री राम शर्मा की एक उक्ति है - जो व्यवहार आपको अपने लिए पसंद नहीं है तो वह आप दूसरों के साथ   भी न करें. लेकिन ऐसा होता कहाँ है? हम खुद सम्मान और सर आँखों पर बिठाये जाने की अपेक्षा रखते हें और माँ - बाप को अपने मित्रों से मिलाने में भी शर्म महसूस करते हें . क्यों? इसलिए कि हमारे पिता कभी क्लर्क होते थे और माँ एक गृहणी थी. उनको   बाहर के  आचार व्यवहार से परिचय ही नहीं होता है. वह तो अपना पूरा जीवन आपको पढ़ाने और लिखाने   में लगी रही. पिता ने अपनी आय को आपकी पढ़ाई में लगा दिया और खुद अपने लिए नई साइकिल भी नहीं खरीद सके, कभी मिल गया तो ऑफिस के बाद पार्ट टाइम जॉब भी कर लिया ताकि पढ़ाई के साथ साथ आपकी अच्छी खिलाई पिलाई भी कर सकें. इसे हमने उनके फर्ज मान हाशिये में रख दिया और खुद के अच्छी पढ़ाई के बाद जब नौकरी मिली तो उनको अपने बराबर बिठाने में शर्म महसूस करने लगे. हमारे जीवनसाथी ने भी यही समझा कि पति की कमाई पर तो उसका ही हक है , माँ बाप को कोई आशा भी नहीं करनी चाहिए ।
 
                               यही जो कुछ हम दिखा रहे हें वह हमारे बच्चे ग्रहण कर रहे हें . यही संस्कार बन रहे हें उन्हें कुछ भी सीखना नहीं पड़ता है . पहले नानी दादी उन्हें अपने साथ लिटा कर श्रवण कुमार और लक्ष्मण जैसे पुत्र और भाई की कहानी सुनाया करती थी. और बाल मन पर वह गहराई से बैठ जाया करती थी. आज क्या आपके पास टीवी देखने या फिर अपने मित्र मंडली के साथ गपशप करने अलावा भी कुछ है . बच्चे भी साथ साथ टीवी से चिपके  रहना  चाहते  हें. उन्हें कब सिखाया  जाए  और क्या सिखाया  जाए ?अब इसके लिए तो हमें ही सोचना होगा की बच्चों को गलत संस्कार न मिल पायें और वे मानवता और नैतिक मूल्यों के मूल्य को समझें लेकिन ये होगा तभी जब हम उन्हें समझा पायें. चलिए कोशिश करते हैं.

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

विपरीत प्रभाव !

कन्या के जन्म से लेकर उसके जीवन के निर्धारण तक का अधिकार पुरुष वर्ग अपने हाथ में लिए रहा है । तब अधिक अच्छा था जब वह अधिक उन्नत जीवन नहीं जी रहा था। वह कृषि और व्यापार में लगा था लेकिन आम घरों में अगर लड़कियाँ अधिक हें तो लड़के की आशा में प्रयास बंद नहीं करते थे लेकिन लड़कियों की हत्या नहीं करते थे। मन मलिन भले कर लें लेकिन उनका जीवन नहीं हरते थे।
हम जैसे जैसे सुशिक्षित और सम्पन्न होते जा रहे हें हमारी मानसिकता क्या क्रूरता की ओर नहीं जा रही है? या फिर ये कहें कि पहले इस तरह की घटनाएँ प्रकाश में नहीं आती थीं और आज मीडिया के सशक्त होने के साथ ही घटनाएँ सामने आने लगी हें। कल पलक एक अत्याचार का शिकार होकर जीवन लीला समाप्त कर चल दी और आज आफरीन सिर्फ तीन माह की बच्ची अपने पिता के अमानुषिक व्यवहार का शिकार हो कर दुनियाँ से कूच कर गयी किस लिए क्योंकि उसके पिता को बेटी नहीं बेटा चाहिए था और बेटी होने पर उसने उस नन्ही सी जान को सिगरेट से जलाया , उसके सिर को दीवार से पटक कर उसके मष्तिष्क को क्षत विशत कर दिया और वह कोमा में चली गयी। एक हफ्ते के अन्दर वह जिन्दगी की जंग हार कर और अपनी माँ की गोद सूनी करके चली गयी।
पुरुष जाति में बच्चियों के प्रति पाशविकता की भावना क्यों घर करने लगी है ? अगर वह पिता है तो उसको बच्ची चाहिए ही नहीं तो या तो उसको जन्म से पहले ही मार दो और अगर नहीं मारी तो पैदा होने पर मार दें। इन सबसे ऊपर उठ कर वे लोग हें जो बच्चियों को अबोध बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बना रहे हें और फिर उनकी हत्या कर भाग जाते हें। ये काम तो आदिम युग में भी नहीं किया जाता था। आज हम अपनी प्रगति और सक्षमता का ढिंढोरा पीट रहे हें और अपने को २१वी सदी का प्रगतिशील व्यक्ति मानते हें लेकिन हमारी सोच तो जितने हम ऊँचे पहुँचने का दावा करते हें उससे कई गुना नीचे जा रही है। इसके कारणों की ओर कभी मनोवैज्ञानिक तौर पर अगर विश्लेषण किया गया है तो यही पाते हें कि व्यक्ति सारी प्रगति और उपलब्धियों के बाद भी उसकी आकांक्षाएं इतनी बढ़ चुकी हें कि वह उनको पूरा न कर पाने के कारण कुंठित हो रहा है और वह कुंठाएं कहाँ और कैसे निकलती हें ? इसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
अपने से अधिक बलशाली या फिर बराबरी के व्यक्ति से अगर वह उलझने की कोशिश करेगा तो शायद वह अपनी कुंठा निकल न पाए इसलिए वह अपना शिकार अबोध और किशोर वय की ओर जाति हुई बच्चियों पर मौका पाकर निकालने की कोशिश करता है। जब एक तरह की घटना सामने आती है तो फिर उस तरह की छिपी हुई कई घटनाएँ सामने आना शुरू हो जाती हें। ये जरूरी ही नहीं है कि वे कुंठित ही हों , वे दकियानूसी भी हो सकते हें। कितने स्थानों पर बेटे की चाह में बेटियों की बलि दे दी जाती है बगैर ये जाने कि क्या इसका कोई औचित्य है?
हम बेटी बचाओ अभियान चला रहे हें क्योंकि अगर बेटी न होंगी तो ये सृष्टि आगे कैसे चलेगी? क्या हम बेटियाँ इसी लिए बचाने की गुहार लगा रहे हें कि कल कोई वहशी उन बच्चियों से दुराचार कर उनकी हत्या कर दे? हम बेटियों का जीवन सुरक्षित कैसे करें? वे कोई कागज की गुडिया तो नहीं हें कि हम उन्हें डिबिया में बंद कर छिपा लें। उनके जीवन के लिए उनकी शिक्षा और प्रगति भी जरूरी है तो फिर कौन सा ऐसा कदम हो कि वे सुरक्षित रहें। क्या पैदा होते ही उनको पुरुषों के साए से दूर रखा जाय? क्या उनके साथ माँ को साए की तरह से हमेशा साथ रहना होगा ? क्या फिर से हम अतीत में जाकर पर्दा प्रथा को अपना लें? लड़कियों को शिक्षा के नाम पर सिर्फ गीता और रामायण पढ़ने भर की शिक्षा लेकर उन्हें परिवार को बढ़ाने भर के लिए जीवित रखें?
इतने सारे सवाल है और इनके उत्तर आज भी हमारे पास नहीं है क्योंकि अब हम नेट युग में जी रहे हें , आभासी दुनियाँ में जी रहे हें और बगैर मिले और देखे भी अपनी दुनियाँ को विस्तृत कर रहे हें फिर अतीत में जाने की बात बेमानी है लेकिन ये भी सत्य है कि हमें अब लड़कियों के जीवन और अस्मिता की रक्षा के लिए भी कुछ सोचना होगा। उनके प्रति हो रहे दुराव और दुराचार के खिलाफ उठाये जा रहे कदमों के विपरीत प्रभाव पर अंकुश लगा होगा।

मंगलवार, 20 मार्च 2012

हम खुद कितने भ्रष्ट है?

अन्ना के आंदोंलन को अभी ख़त्म नहीं होना है और अभी वह लौ बुझी भी नहीं है लेकिन हम जो कल उनके अनशन के साथ थे और पूरा देश एक आवाज पर खड़ा था । वह लोग राजनीति से दूर थे और अपने अपने निवास स्थल से ही उनका समर्थन कर रहे थे। किसलिए क्योंकि हम भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हें।
आज नए वातावरण में जब उत्तर प्रदेश में चुनाव हो चुके हैं और नई सरकार अपने घोषणा पात्र के अनुसार बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ते को देने के लिए प्रतिबद्धता को दुहरा रहा है। चुनाव परिणाम के आने के पहले ही सेवायोजन कार्यालय में पंजीकरण के लिए आधी रात से भीड़ लगनी शुरू हो गयी फिर अचानक एक नया मोड आया कि ये भत्ता ३५ साल से ऊपर के बेरोजगारों को मिलेगा लेकिन इससे भीड़ काम नहीं हुई बल्कि पंजीकरण के लिए आने वालों की उम्र बढ़ गयी। और इससे एक बात और बढ़ गयी कि भ्रष्टाचार के दरवाजे सामने से खुलने लगे। वह जो कल भ्रष्टाचार के विरोध में सिर पर अन्ना टोपी लगाये घूम रहे थे वही पंजीकरण करा रहे थे।
पंजीकरण कराने वाले कौन लोग हें ? जो इसकी पात्रता को पूरा नहीं कर रहे हें लेकिन सरकारी मुफ्त का धन लेने में कोई हर्ज नहीं है।
१। प्राइवेट नौकरी करने वाले ।
२। गृहणी जो न कभी पंजीकृत थी और न कभी उन्होंने नौकरी के लिए सोचा था।
३। अपने धंधा करने वाले लोग जिनकी आय उस मिलने वाले भत्ते से कई गुण ज्यादा है।
४। वह लोग जो पैतृक संपत्ति से होने वाली आय से अपना गुजारा वर्षों से कर रहे हें।
क्या वास्तव में कोई भी व्यक्ति जो परिवार की जिम्मेदारी वाला है ३५ वर्ष की आयु तक घर में बैठा होगा। वह कुछ भी करे करता जरूर है। मेहमत की कमाई में विश्वास रखने वाले तो ग्रेजुएट होकर भी रिक्शा चला रहे हैं। सेल्स मैन का काम कर रहे हैं या फिर कुछ और। (अपवाद इसके भी हो सकते हैं लेकिन जो लाखों की संख में लोग पंजीकरण करवा रहे हें सभी बेरोजगार तो बिल्कुल भी नहीं हैं।
आज मेरा एक परिवार में जाना हुआ। वे मेरे अन्तरंग हैं, उनकी आर्थिक स्थिति से मैं भलीभांति परिचित भी हूँ। मेरी उपस्थिति में ही उनके घर के नीचे के तल में रहने वाले किरायेदार की पत्नी ने आक़र पूछा कि ऑफिस से अंकल का फ़ोन आया है कि इतने सारे फार्म जमा नहीं हो पाएंगे किसी लेडीज को आना पड़ेगा तो कुछ जल्दी हो सकती है क्योंकि वहाँ पर लाइन नहीं लम्बी है और अगर किसी को दे कर जमा करवाता हूँ तो १०० प्रति फार्म लग रहा है। क्या करना है जल्दी से पूछ कर बतलाइये।
जब वे चली गयी तो मैंने उस परिवार की बहू से पूछा कि कौन कौन फार्म भर रहा है तो उसने बताया कि वह उसकी विवाहित ननद उसके पति और खुद उस बहू के पति। उनके तीन मंजिले मकान में ३ किरायेदार और एक पोर्शन में वह खुद रहती हें। वह एक पौश इलाके में रहने वाला परिवार है।
मैंने पूछा कि क्या तुम लोग भी इसके लिए पंजीकरण करवा रहे हो?
-हाँ नीचे वाले अंकल हें तो उन्होंने कहा कि फार्म आसानी से जमा हो जाएगा और फिर जो बन पड़ेगा पूरा कर दूँगा। फिर अगर सबको मिल गया तो कम से कम मोबाइल का खर्च तो निकल ही आएगा। मुफ्त का मिलेगा कुछ करना तो है नहीं ।
मुझे उनकी बात कहीं से भी सही नहीं लगी वे महिलायें जिन्होंने कोई भी ऐसी शिक्षा नहीं पायी है जिससे कि नौकरी कर पातीं। छोटी मोटी नौकरी करना तो उस बड़ी बिल्डिंग के मालिक के बच्चों की इज्जत के अनुरुप भी नहीं थी लेकिन अगर मुफ्त में मिल जाए तो कुछ बुरा भी नहीं है।
ये सिर्फ एक लोग की सोच है और कितने ही लोग ऐसे होंगे जो कि इस मुफ्त सरकारी धन के लिए लालायित हो रहे होंगे और लेंगे भी।
इसके लिए लाखों लोगों ने पंजीकरण करवाया है कितने लोग वाकई इसके लिए पात्रता पूरी करने वाले होंगे और कितने तो फर्जी ही इसको लेते रहेंगे। जब हम खुद इतने भ्रष्ट सिर्फ एक हजार रुपये के लिए हो सकते हें तो फिर बड़े बड़े घोटाले करने वाले क्या बुरा कर रहे हें? हम उनसे अलग कहीं भी नहीं है। सरकारी धन को इस तरह से हासिल करके हम खुद को भ्रष्ट घोषित कर रहे हें।

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

२ अक्टूबर !

आज दो अक्टूबर है और देश में छुट्टी भी है वैसे तो कई लोग इस कलेंडर को गालियाँ दे रहे हें कि एक छुट्टी चली गयी अगर सोमवार को पड़ता तो किसी को दो और किसी को तीन छुट्टियाँ मिल जाती खूब मस्ती करते या फिर घूमने निकल जाते । ठीक भी है बेचारे सरकारी कर्मचारी रात दिन मेहनत करते हें तो छुट्टियों का इन्तजार क्यों न करें?
आज देश में इस छुट्टी का लाभ उठाने वाले लोगों में से कितनों ने गाँधी जी और शास्त्री जी को याद किया होगा , उनके जन्मदिन के उपलक्ष में ही तो छुट्टी ले रहे हें। उन्हें याद कर लें यही बहुत है और अगर उनके चरित्र औरउनके मार्ग पर चलना तो दूर शायद इतिहास में उनके सद्कार्यों के वर्णन का 'क ख ग' भी याद करके अपने बच्चों कोबता दें तो इस दिन की छुट्टी मेरी दृष्टि में सार्थक हो जाएगी लेकिन ऐसा भी नहीं होता है। वे गुजरे ज़माने के लोग थे औरआज के ज़माने में अगर गाँधी या शास्त्री की तरह चलने लगें तो हम भी उनकी तरह से बिना कपड़ों के और शास्त्री जी कीतरह से अच्छे खासे रेल मंत्री थे और रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे डाला.ये आदर्शों का जमाना जा चुकाहै और ये आदर्श सिर्फ किताबों और उपदेशों में अच्छे लगते हें । वास्तव में ये कालातीत हो चुके हें। अरे यहाँ तो अबजमाना है कि करो खुद और डंके की चोट पर करो और बलि का बकरा किसी और को बना कर हलाल करवा दो।
मानवता , नैतिकता और आत्मा की आवाज की परिभाषा भी बदल चुकी है। अब कोई आत्मा दूसरे के हित के बारेमें नहीं सोचती है सब अपने बारे में सोचते हें। गाँधी की तरह एक लंगोटी में जीना नहीं चाहते बल्कि इतना इकठ्ठा करलेना चाहते हें कि आने वाली सात पीढियां खा सकें। उसी संसद में जहाँ गाँधी और शास्त्री की तस्वीरे मुस्करा रही हें , उनके साए में ही बैठ कर ये नेता साजिशें रचा करते हें। देश को बेचने की साजिश, उसको खोखला बनाने की साजिश औरदेश में जितने भी लोग हों सबके बीच में एक दीवार खड़ी करने की साजिश। जिसे जहाँ मौका मिला अपने भविष्य कोसुरक्षित करने की जुगाड़ में लगा रहता है और आज के दिन की गरिमा को कहीं भी किसी को भी बनाये रखने की जरूरतनहीं है।

आज उन दो महान आत्माओं को याद करते हुए सोच रही हूँ कि वे जरूर जहाँ भी होंगी अपने त्यागऔर संघर्ष पर आंसूं बहा रही होंगी कि उन्होंने क्या सोचा था और आज देश क्या हो गया है? पूरा देश ऐसा है ये तो नहीं हैलेकिन कितने प्रतिशत है जो गाँधी और शास्त्री के प्रति कृतज्ञ हें या फिर उनके त्याग के मूल्य को समझ रहे हें। खैर ये तोदुनियाँ है - हम सभी लिखने वाले तो कलम से उनके प्रति आदर और श्रद्धा प्रकट कर ही सकते हें।

रविवार, 18 सितंबर 2011

गाड़ी के दो पहिये !

हम ये तो सदियों से सुनते चले आ रहे हें कि पति और पत्नी गाड़ी के दो पहिये होते हें और जब दोनों मेंसामंजस्य होगा तो जीवन रुपी सफर में ये गाड़ी सुखपूर्वक दौड़ती रहेगी। हमारी सामाजिक व्यवस्था के अनुसार पति काकाम कमाना और पत्नी का काम घर और बच्चों कि देखभाल करना होता है। इसे एक सामान्य पारिवारिक स्वरूप के रूपमें स्वीकार किया जाता है, लेकिन अगर इससे इतर कुछ भी होता है तो फिर स्थिति गड़बड़ाने लगती है। पत्नी कमाती हैऔर दोनों काम देखती है, वह बहुत अच्छा है लेकिन अगर पत्नी कमाती है और पति घर के कामों को देखने लगता है तोये स्वरूप न हमारे पुरुष समाज को स्वीकार होता है और न ही स्त्री समाज को, आखिर क्यों? जब दोनों पहिये हें तो इसमेंभी तो आर्थिक स्रोत कहीं से भी चल रहा हो चलना चाहिए किसी घर्म ग्रन्थ या आचार संहिता में ये नहीं लिखा है कि पत्नीकमा कर घर का खर्च नहीं चल सकती है। मैं अपने एक बहुत करीबी रिश्तेदार के बारे में ऐसा ही कुछ सुनती आ रही थीऔर इत्तेफाक से मुझे वहाँ जाने का और दो दिन रुकने का मौका मिल गया। तब मैंने विश्लेषण किया और पाया कि येसामंजस्य कितनी अच्छा और समझदारी भरा है कि घर भी चल रहा है और काम भी।
जब मैं सुबह उठी तो मिनी किचेन में चाय बना रही थी और निखिल सो कर उठा था और चाय का इंतजारकर रहा था । निखिल बैंक में काम कारता था जब उसकी शादी हुई थी और मिनी गृहणी थी। लेकिन कुछ वक़्त ने पलटाखाया और निखिल बैंक में किसी केस में फँस गया , उसकी नौकरी चली गयी और उसका केस आज भी हाई कोर्ट में चलरहा है। नौकरी जाने के बाद सिर्फ पिता को छोड़ कर सबने किनारा कर लिया। सोचा जा सकता है कि घर की स्थिति कैसी चल रही होगी। घर से बाहर निकलने पर लोगों के कटाक्ष सहने पड़ते थे और उसका जो सामाजिक दायरा था वह भीधीरे धीरे ख़त्म होने लगा था। क्योंकि उसके बराबर खड़े होने के लायक अब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था।
घर पिता के नाम था सो रहने कि कोई समस्या नहीं थी लेकिन रिटार्यड पिता की पेंशन के बल पर कब तकखर्च चलाया जा सकता था? बुजुर्ग भी कभी कभी कुछ न कुछ कह ही देते हें और जब हम समर्थ होते हें तो वह बुरा नहींलगता लेकिन जब हम उनके आश्रित हों तो हमें आत्मग्लानि लगने लगती है। यही हुआ मिनी के साथ और उसने कुछनिर्णय ले डाला। उसने ससुर के विरोध के बावजूद भी ब्यूटीशियन का कोर्स किया और घर के एक कमरे में अपनाब्यूटीपार्लर खोल लिया। कुछ उधार लिया और कुछ मायके से सहायता लेकर शुरू कर दिया काम। इज्जत की दो रोटी कासवाल था। उसके मधुर व्यवहार और काम से उसका काम अच्छा चल निकला।
निखिल ने चाय पीने के बाद अपने काम शुरू किया , पहले पौधों में पानी देना, फिर एक रात पहले भीगे हुएपार्लर के कुछ नेपकिन को धो कर डालना उसने वाशिंग मशीन कपड़े धोने के लिए लगा दी, उसने सारे कपड़े धो कर डालदिए । पार्लर खुलने के समय तक मिनी ने नाश्ता निपटा दिया और वह पार्लर में चली गयी। बाकी काम नौकरानी नेआकर कर दिए । बीच बीच में आकर वह खाने के लिए तैयारी कर जाती। दोपहर के खाने तक वह आती और गरमगरम रोटियां सेंक कर ससुर जी को खिलाती और बच्चों और निखिल के साथ खुद खा लेती। इस बीच निखिल सलादवगैरह काट कर तैयार कर देता है या फिर उसके अपने किसी काम से निकलना हुआ तो निकल जाता है।
घर में सब कुछ इतनी शांत पूर्ण ढंग से हो रहा था कि मुझे लगा कि गाड़ी के दो पहिये ऐसे ही होते हें। क्याफर्क पड़ता है कि आर्थिक स्रोत कहाँ से निकल रहे हें? अगर जीवन में कुछ असामान्य परिस्थितियां भी आ जाती हें तोइन दोनों पहियों को डगमगाना नहीं चाहिए। उनमें संतुलन कायम रहना चाहिए। ये एक समझदारी भरा कदम है किकोई भी काम कोई भी करे परिवार रुपी गाड़ी की गति नहीं रुकनी चाहिए। दोनों में से किसी में भी हीन ग्रंथि का प्रादुर्भावनहीं होना चाहिए। इतना अच्छा सामंजस्य मैंने अपने जीवन में इन परिस्थितियों में किसी में भी नहीं देखी।
ये तो आज की पीढ़ी की बात है मैंने ऐसा सामंजस्य अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में भी देखा था। मेरी शादीहुई थी और वहीं सामने वाले घरों में विश्वविद्यालय की एक लिपिक रहती थीं। उनके पति डॉक्टर थे लेकिन कुछ वक्त कीमार कहें या फिर भाग्य उनकी प्रैक्टिस कहीं भी नहीं चली जबकि वे लखनऊ मेडिकल कॉलेज से बी डी एस थे। बीना जीसुबह नौकरी पर चली जाती और वे घर में रहते बच्चों के स्कूल से आने के बाद उनको खाना देना और खुद बीना जी जबलंच में आती तो उनके साथ ही खाते थे। उनके आने तक वह घर के कपड़े धोना और बाकी काम करते थे. जब वे बालकनीमें कपड़े फैलाते तो और घरों की महिलाओं को मैंने सुना था कि डॉक्टर साहब तो बीना जी के चाकरी में ही लगे रहते हें.तब की सोच कुछ और ही थी लेकिन उनको किसी के कहने या कटाक्ष से कोई फर्क नहीं पड़ता था. शाम को उनके आनेतक चाय पर इन्तजार करते और फिर दोनों साथ ही चाय पीते। कहीं कोई लड़ाई या मन मुटाव मुझे सुनाई नहीं दिया। एक शांत पूर्ण जीवन उन दोनों का रहा।
ये समझदारी और आपसी सामंजस्य हमारी अपनी बनायीं हुई होती थी। ये घर की सुख और शांति का आधारहोती है। कमाने के लिए चाहे दोनों कमायें या फिर एक उसे सकारात्मक तरीके से अगर देखें तो ये जीवन एक समर नहींहै बल्कि एक सफर है जो एक दूसरे का हाथ थाम कर गुजर जाता है। ऐसे नहीं कहा जाता है कि दाम्पत्य जीवन में पतिऔर पत्नी दोनों ही दो पहिये होते हें।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

रक्षा बंधन त्यौहार या अहसास !




rakshaa बंधन हम एक पर्व की तरह से मनाते हैं एक निश्चित दिन लेकिन ये एक अहसास भी है - बहन के द्वारा भाई की कलाई पर बंधा हुआ रेशमी धागा इस बात का प्रतीक है कि बहन ने भाई को अपने रक्षा दायित्व में बाँध लिया है लेकिन उस दायित्व को निभाना भी एक बहूत बड़ा काम होता है। कभी कोई अपना कुछ न होते हुए भी बहूत कुछ बन जाता है। ये एक अहसास है क्योंकि कभी कभी ऐसा भी देखने को मिल जाता है जो हम अपने खून के रिश्तों में नहीं देख पाते हैं। कभी जायदाद को लेकर , कभी माता - पिता की परवरिश को लेकर या फिर कभi छोटे या बड़े मनमुटाव को लेकर खून के रिश्तों में तो दरार आ जाती है लेकिन इन धागों के रिश्तों में शायद ये दरार कभी नहीं आती है। क्योंकि ये रिश्ते किसी स्वार्थ से नहीं जुड़े होते हैं।


मेरे अपने भाई हैं हर समय नहीं जा पाती हूँ , लेकिन मेरे पास में ही मेरा एक माना हुआ भाई रहता है। वह नहीं है लेकिन काफी समय मेरे घर आता रहा और फिर एक दिन बातों बातों में पता चला कि वह कहीं से मेरे रिश्ते में भाई होता है। उसने रक्षा बंधन के दिन खबर भिजवा दी कि आज दीदी मेरे घर आकर रखी बांधेंगी नहीं तो फिर मैं कभी नहीं आऊंगा। इत्तेफाक से उसके कोई बहन भी नहीं है। मुझे वर्ष तो नहीं याद है लेकिन इतना कि मैंने कभी ये महसूस नहीं किया कि ये मेरा खून के रिश्ते वाले भाई से कभी कम है। खून के रिश्ते तो सब निभाते हैं , अगर ये रिश्ते जीवन भर निभाए जाएँ तो प्यार को सन्देश मिलता है जिसकी कोई सीमा नहीं है।ये एक अहसास है जिसे हम प्यार से जी लें तो उससे अच्छा कुछ भी नहीं।


इस पावन पर्व पर मैं अपने सभी भाइयों को हार्दिक शुभकामनाएं भेज रही हूँ। सभी के जीवन में ख़ुशी और समृद्धि बनी रहे। ईश्वर एक स्वस्थ और सुखमय जीवन प्रदान करे ।






शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

लोकतंत्र में सुधार चाहिए!

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने अपने पोर्टल पर और फेसबुक के सहारे इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा प्रणाली के विषय में मत संग्रह किया - जान सामान्य के विचार जानने के लिए यह एक बहुत ही अच्छा तरीका रहा। इस तरीके के पढ़ते पढ़ते ऐसा ही ख्याल आया कि पुरानी परिभाषाओं को परिमार्जित करके नया कलेवर दिया जा सकता है। लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप की जो दुर्दशा हो रही है, उससे हर कोई वाकिफ है। वंशानुगत दलों की बागडोर सभांलने वाले राजनेता और भावनाओं में बहने वाला मतदाता को जो अपने छाले जाने का अहसास होता तब तक वह पांच साल के लिए मजबूर हो चुका होता है। फिर भले ही वे अपने प्रतिनिधि को उनके ही पेट में लात मारकर अपनी तिजोरियां भरते हुए देखें या फिर निरंकुश शासक बन आने ही घर को कांचन महल बनाकर अंगूठा दिखाते रहें।
उनके चुने हुए प्रतिनिधि दलों के निर्जीव मुहरे होते हैं। जिन्हें पार्टी हाई कमान अपनी इच्छानुसार नाचता रहता है और सत्ता पर काबिज पटरी अपनी इच्छानुसार विधेयक बनाकर पेश करती रहती है। जिसमें लाभान्वित चाहे कोई भी न हो लेकिन अपनी सत्ता के भविष्य में काबिज रहने की संभावनाओं को पुख्ता करने के साधन जुटाए जाते हैं।
अब लोकतंत्र को वास्तव में जनता के लिए जनता के द्वारा शासन की परिभाषा को सत्य तो होने दीजिये। उसके अब सुधार की जरूरत हो रही है। जब समय के साथ हर क्षेत्र में क्रांति हो रही है फिर ये क्षेत्र अछूता क्यों रहे? अब इसको भी परिमार्जित किया जाना चाहिए। अब विधेयक का प्रारूप तैयार करने के बाद सदन में रखने से पूर्व ठीक इसी तरह से सरकारी पोर्टल और अन्य सोशल नेट वर्क पर डाल कर जनमत संग्रह होना चाहिए। ये सारे विधेयक सिर्फ सदन या संसद में लागू नहीं होने है। ये बनाये तो उनके प्रतिनिधियों के द्वारा ही हैं लेकिन उसके ही गले को काटने की तैयारी भी की जा रही है। ये सत्य है की ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग इन सब चीजों से वाकिफ नहीं है, वे कैसे भाग ले सकते हैं तो इसके लिए ग्राम पंचायतों में कंप्यूटर की व्यवस्था होनी चाहिए । ऐसे विधेयक या नए विधेयक की सम्पूर्ण रूपरेखा सार्वजनिक तौर पर प्रकाशित या प्रदर्शित की जानी चाहिए । टी वी तो आजकल हर घर में है चाहे वे झुग्गी झोपड़ी में ही क्यों न रहते हों? उसकी जानकारी दी जानी चाहिए। सिर्फ जानकारी नहीं बल्कि उसमें मतदान के लिए भी रूचि जाग्रत किया जाना चाहिए। आरम्भ में इस प्रक्रिया को जटिल कह कर रद्द किया जा सकता है लेकिन इसको सहज भी बनाया जा सकता है। अपनी राय देने के साथ राय देने वाले का नाम और मतदाता संख्या का उल्लेख भी हो तो उसकी उपयोगिता और उसकी सत्यता को आँका जा सकता है। नहीं तो ये टी वी सीरियल की तरह फर्जी या फिर कई कई बार वोटिंग करके जनमत का मखौल उठाया जा सकता है। अगर इस प्रक्रिया को अपना लिया जाय तो फिर किसी अन्ना हजारे या रामदेव को अनशन या प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। किसी विधेयक को न्यायालय में चुनौती देकर न्यायिक सक्रियता के दायरे में नहीं लाया जाएगा। सदन के बहुमत पर ये मतदान भरी पड़ेगा। विधेयक की सार्थकता को समझाने वाला बुद्धिजीवी वर्ग ही अगर इसमें शामिल हो जाता है तो फिर इसके सार्थक होने में संदेह नहीं किया जा सकता है। विधेयक राजनेताओं के स्वार्थ पूर्ति के लिए नहीं बल्कि प्रजा के कल्याण के लिए बनाये जाते हैं। यहाँ संसद में सत्तारूढ़ दल अपनी मनमानी और अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अपने अधिकारों का दुरूपयोग नहीं कर पायेंगे। सार्वजनिक तौर पर रखे गए विधेयक में सुधार भी प्रस्तावित किये जा सकते हैं। इस प्रक्रिया से गुजर कर जो विधेयक बनेगा वह लोकहित में होगा।
यहाँ कुछ विषयों को तुरुप का पत्ता बना कर बाजी हमेशा अपने पक्ष में ही नहीं रखी जायेगी।
सत्तारूढ़ दल के निरंकुश होते रवैये पर अंकुश लगाया जाना जरूरी है। लोक विरोध करता हुआ छटपटाता रहता है और हासिल उसको कुछ भी नहीं होता है। लोकपाल बिल, सांप्रदायिक हिंसा निषेध बिल के लिए किसी अन्ना हजारे या कालेधन के लिए किसी रामदेव बाबा को इस तरह से अनशन न करने पड़ते और न ही सरकार के कुकृत्यों के द्वारा लोक को लज्जित होना पड़ा।
अब लोक को ही जागरूक होना पड़ेगा, तभी तो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को ये जागरूकता हस्तांतरित होगीऔर फिर आज नहीं तो कल आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ समाज और सरकार मिल सकेगी । एक काले कारनामों से रहित और लोकहित के लिए सोचने वाली सरकार। क्या ऐसा संभव है? असंभव तो कुछ भी नहीं है और मुझे लगता है किआने वाली पीढ़ी पिछली पीढ़ी से अधिक विस्तृत सोच रखती है। फिर इसके लिए ये प्रस्ताव कैसा है?