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गुरुवार, 29 नवंबर 2012

अधूरे सपनों की कसक : एक विश्लेषण और उपलब्धि !

                              अधूरे सपनों की कसक को लेकर चली थी कि सबके आधे अधूरे सपनों से दो चार होंगे और फिर सोचेंगे कि  इन सपनों के सजने और टूटने में क्या था? किसने अधिक इस सफर में अपने सपनों के  साथ समझौता किया और कौन उसके लिए जिम्मेदार रहा? उसका नारी होना या फिर सामाजिक सीमाओं की परिधि। 

                            सबसे पहले तो अपने उन सभी साथियों को धन्यवाद कहूँगी जिन्होंने ने मेरे इस अनुरोध को मान दिया और सहयोग किया अपने सपनों की कसक को बांटने में। फिर इस बात को लेकर एक कसक मन में रह गयी कि सपनों की कसक को बांटने का आश्वासन देकर कुछ साथी मुझे लालीपॉप दिखाते रहे और फिर छुप कर खुद ही खा गए और हम रोज इन्तजार करते रहे कि  वो हमें आज मिलेगी , कल मिलेगी लेकिन वो तो आज तक मिली ही नहीं . दिवाली के बाद बहुत दिनों तक इन्तजार करते रहे कि शायद त्यौहार के बाद समय मिले तो मिल जाए लेकिन मेरा इन्तजार तो व्यर्थ ही गया।
                         मेरे इस सफर में  सबसे अधिक साथ दिया आधी आबादी ने - शायद हम सब की पीड़ा कहीं न कहीं एक जैसी ही रही थी लेकिन शेष आधी आबादी ने सहयोग तो दिया लेकिन बहुत कम फिर भी मैं अपने सभी साथियों का हार्दिक धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने ने मेरे अनुरोध का मान रखा और उन्हें भी जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में बता दिया कि ऐसा  कुछ उनके जीवन में हुआ ही नहीं।
                       इस सफर से कुछ तो उपलब्धि हुई ही है , हम कहते हैं कि  नारी आज सशक्त हो रही है और सक्षम भी लेकिन कितनी?  इसको इसी बात से देखा जा सकता है कि उच्च शिक्षित होने के बाद भी हमारी पीढी हो या फिर आज की युवा पीढी -- आधी आबादी ने अपने सपनों को एक परिवार से दूसरे परिवार में आने पर बलिदान कर दिया और अपनी जिम्मेदारियों को उठाते हुए अपने सपनों को दूसरी तरफ रुख कर के अपनी संतुष्टि के रास्ते  को खोज लिया। वही अपने पहले परिवार के साथ भी निश्चित सीमाओं के कारन अपने सपनों को वहीँ अधूरा छोड़ दिया और उसे आज भी अपने मन में पलते हुए अफसोस को अपने आने वाली पीढी में पूरा होने की आशा कर रही है।
                      सपनों के साकार होने में कल भी और आज भी आधी आबादी के साथ कभी न्याय नहीं हो सका है। हाँ इतना जरूर है कि  हम जो अपने अधूरे सपनों की कसक लिए कभी सोचते हैं तो फिर अपने बच्चों के सपनों को कभी न टूटने देने के लिए प्रयत्नशील होते हैं। लेकिन फिर भी अपनी बेटी की शादी के बाद नहीं जानते कि  उसके इस बार भी  देखे गए सपने और हमारे द्वारा दी गयी दिशा को वहां कितना समर्थन मिलेगा? वह अपनी पढाई और शिक्षा के उद्देश्य को कितने प्रतिशत पूरा कर पायेगी  ? ऐसे कितने केस मेरे सामने है कि  लड़कियाँ मात्र औपचारक शिक्षा नहीं नहीं बल्कि एम टेक , एम सी ए और एम बी ए  जैसी शिक्षा पाने के बाद भी दूसरे घर में जाने के बाद अपने माता पिता की खून और पसीने की कमाई  से पढाई करने के बाद भी वे सिर्फ गृहणी बन कर रह गयीं . उनके सपने वहीँ के वहीँ रह गए और उनके साथ सजे उनके माता पिता के सपने भी .
लेकिन इसको माता पिता भी अपने अधूरे सपने की कसक के साथ इस कसक को भी सह लेते हैं। ऐसा शेष आधी दुनियां के साथ नहीं होता है। वह अपने सपनों को भी हक से पूरा कर लेता है और अगर न भी हो सके तो फिर भी उसके लिए कोई बंधन नहीं होता है कि उसकी सीमायें इतने भी ही सीमित हैं . एक नहीं ऐसे कितने ही मामले हो सकते हैं। हम एक बुद्धिजीवी वर्ग के सामने थे और फिर उनके सपनों की रह को नापा था लेकिन शायद कुछ ही प्रतिशत ऐसे लोगों के उत्तर मिले कि  मेरा कोई भी सपना अधूरा नहीं रहा बल्कि मेरे हर सपने को अपना मक़ाम मिला . बस यही तो सोच रही थी और सोच रही हूँ की काश ऐसे गर्व से पूरे संसार में सभी कह सकें की मेरा कोई भी सपना अधूरा न रहा . वह अधूरापन जो की उसके लिए मजबूरी न बने 

शनिवार, 3 नवंबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (26) !

                 
सपने तो सपने हैं चाहे छोटे हों या बड़े , हर मन में बसते हैं . उम्र के साथ ये भी बढ़ाते जाते हैं। कभी हमने बच्चों से पूछा होता की क्या चाहते हैं ? तो वे अपने सपनों को आकार  देते हुए कुछ न कुछ जरूर बता देते - जैसे किसी को उड़ने वाला जहाज चाहिए , किसी को बार्बी की गुडिया चाहिए और अपने परिवार की स्थिति के अनुसार ही उनके सपने होते हैं। हम बड़े अपने हिसाब से सपने देखते हैं। अगर सपने नहीं देखेंगे तो फिर कुछ पाने के लिए प्रयास कैसे करेंगे ? बस यही तो एक रास्ता है मंजिल तक जाने का , ये जरूर नहीं की बुने हुए सपने के अनुसार ही मंजिल मिले और फिर वही कसक देने वाले बन जाते हैं। 

                           आज अपने सपनों को लेकर आये हैं  -- यशवंत माथुर 






जीवन के प्रारम्भ से जीवन के अंत तक एक काम जो हम निरंतर करते हैं वो है सपने देखना। कुछ पूरे हो जाते हैं और कुछ अधूरे रह जाते हैं। जो पूरे हो जाते हैं उनके पूरा होने की उपलब्धि और जो अधूरे रह जाते हैं उनके पूरा न होने की कसक रह रह कर जीवन के मोड़ों पर अपना एहसास कराती ही रहती है। सपने देखने की इस स्वाभाविक मानव प्रवृत्ति से मैं भी अछूता नहीं हूँ ;शायद कुछ अटपटा लगे सुनकर लेकिन सच कहूँ तो अक्सर दिन में खुली आँखों में भी सपने देखता हूँ।

जीवन का दूसरा दशक समाप्ति से कुछ ही दिन की दूरी पर है और ज़्यादा बड़े सपने कभी देखे नहीं। लोग इस उम्र मे आई. ए . एस ,पी सी एस बनने के सपने देखते हैं मैंने अभी तक ऐसी की कोई परीक्षा ही नहीं दी। आगरा में बड़ी रिटेल कंपनी मे काउंटर सेल्स की नौकरी से कैरियर शुरू करने के बाद कस्टमर सर्विस पर बैठे साथियों की कार्य शैली ने बहुत आकर्षित किया था । ग्राहकों से मिलना और पब्लिक एड्रेस सिस्टम से स्टोर मे चल रहे ओफर्स का प्रभावशाली बखान ऐसा लगता था जैसे रेडियो पर कोई बोल रहा हो।एक तरह से मैंने लक्ष्य बना लिया था कि एक दिन कस्टमर सर्विस डेस्क पर मैं भी बैठूँगा। आगरा से मेरठ ट्रांसफर हुआ शुरू मे कुछ दिन सेल्स मे रहने के बाद एक दिन आखिरकार किस्मत ने साथ  दिया और अचानक ही 'ओफिशियल पॉलिटिक्स'  के तहत कस्टमर सर्विस की कुर्सी  जो मिली  सो वहाँ से कानपुर आने तक और नौकरी छोडने तक मेरे साथ बनी रही । क्यों और कैसे माइक पर मेरा लाइव परफ़ोर्मेंस ,प्रेजेंटेशन और वॉयस मोड्यूलेशन बॉस लोगों के साथ ही आने वाले कस्टमर्स को भी अच्छा लगने  लगा,मैं कह नहीं सकता।  कानपुर में इसी कस्टमर सर्विस पर बैठे बैठे न जाने किस घड़ी में कुछ कस्टमर्स मुझे एफ एम रेडियो के लिये ट्राई करने को उकसाने लगे। लगभग हर दिन ही कोई न कोई मेरी आवाज़ के बारे में प्रशंसा के शब्द कस्टमर फीडबैक बुक में लिख कर या कह कर जाने लगा और इसके चलते मैं भी आर जे बनने के हसीन सपने मे खोने लगा। प्रशंसा के यह शब्द यहाँ क्लिक कर के फेस बुक पर आप भी देख सकते हैं। कुछ कारणों से कानपुर में ही रिज़ाइन करना पड़ा लेकिन यह सपना साथ रहा और तब तक रहा जब तक अपनी आवाज़ रिकॉर्ड कर के कई जगह भेज नहीं दी। 'बड़े लोगों' ने छोटे की ईमेल का रिप्लाई तक करने की ज़रूरत नहीं समझी और 2-4 मेल के बाद लगा कि शायद लोगों ने फर्जी ही उकसा दिया था।
बहरहाल कुछ सपने,सपने ही रह जाने के लिये होते हैं और आर जे या कहें कि रेडियो अनाउंसर बनने का सपना एक ऐसे मीठे सपने की तरह है जिसे अब मैं खुद भी सपना ही बने रहने देना चाहता हूँ।

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (25) !

                    सपने की बात करे  तो फिर सपने अपने अपने  और अलग अलग शब्दों में व्यक्त किये जाते हैं    क्योंकि ये वह चीज है जो निजी होते हैं वह बात और ही की यही सपना किसी और आँखों में पलता हुआ मिल जाय तो उससे कितना  महसूस होता है। कभी कई लोगों के सपनों में झाँका तो लगा की अरे ये ही तो मैंने भी देखा था और दूसरे में भी अपना ही अक्श दिखाई दे जाता है। 

                                  आज अपने सपनों के साथ है -- वाणी शर्मा जी 






कभी किसी नवजात शिशु को देखा है ...गहरी  नींद में भी अंगडाई लेते कितनी बार अधमुंदी पलकों   में ही मुस्कुराता   है , कभी  जोर से हँसता भी है , तो कभी मुंह बिसरा कर रोना भी ... कहते हैं नवजात के  सपने में बेमाता बात करती है बच्चे से , उसके साथ खेलती है , डरती है , गुदगुदाती है . हर आँख में सपना उस बचपन से ही पलने लगता है , जो बड़े होते खुली आँखों के सपने में बदलता है उस सपने को पूरे  करने में हर जीवन की जद्दोजहद होती है . 
जीवन सिर्फ एक सपने पर नहीं रखता , एक पूरा हुआ तो दूसरा , एक पूरा नहीं हुआ तो दूसरा सपना , समय के साथ सपने नए रुख लेते हैं ,नयी मंजिलों की राह पर बढ़ते हैं . उम्र के इस मोड़ पर अब याद भी नहीं की बहुत छुटपन से क्या सपने देखे थे नुशासनप्रिय नाना जी के सानिद्य में कल्याण पत्रिका पढने का शौक जगा , या मजबूरी समझे क्योंकि उनके पास और कोई पत्रिका होती नहीं थी . पत्रिका ने बचपन को आध्यात्मिकता के रंग में रंगा तो सोचा की  सन्यासियों जैसा ही जीवन बेहतर होता है . बचपन की ही सखी  ब्रह्मकुमारी बनने  की प्रक्रिया या प्रशिक्षण  से गुजर रही थी , तिसपर ब्रह्मकुमारियों की सफ़ेद झक पोशाक और मीठी वाणी प्रभावित करती रही . मुजफ्फरपुर प्रवास में एक दिन  ब्रह्मकुमारी आश्रम में रहना पड़ा ,  शांत वातावरण , दीदी और दादी का ममत्व और अपनापन बहुत भाया .सबको भाई बहन मानना और कहने तक तो ठीक था मगर जब जाना कि मनोरंजन के लिए  रेडियो पर फ़िल्मी गाने सुनना , फिल्मे देखना , धर्म से इतर अन्य साहित्य पढने की इज़ाज़त नहीं है , उन्हें सिर्फ धार्मिक पुस्तक पढने या प्रवचन  सुनने होते हैं , उनका ही प्रचार करना होता है , तो ऐसे किसी संन्यास का भूत एक झटके से सर से उतर गया .  
अगला सपना था इंजिनीअरिंग की पढ़ाई करने का , सपना ही रह गया , यही कहना ठीक होगा कि  शायद हमारी योग्यता ही नहीं थी . अविवाहित रहकर समाजसेवी बनना , अनाथ बच्चों , विशेषकर लड़कियों को घर जैसा स्नेह और माहौल उपलब्ध करने के साथ उनकी उचित शिक्षा का प्रबंध करना भी तरुणावस्था में देखा गया एक सपना था .  विवाह हुआ , अपने बच्चे हुए तो आर्थिक निर्भरता या  बच्चों की परवरिश दोनों में से एक को चुनते हुए  शिक्षा पूर्ण कर व्याख्याता बनने का  सपना अपने   घर और दो बच्चों से बढ़कर उनके सपने तक ही सीमित  हो गया . अब तक एकमात्र सपना जो पूर्ण हुआ,  वह था बच्चों की अच्छी परवरिश और उनमे सदगुणों का विकास . 
इस तरह समय के साथ सपने बदलते रहे . बच्चे थोड़े बड़े हुए , कुछ अपने बारे में सोचना शुरू किया, अपने नाम से  जाने जाने का सपना  जगा  तो ब्लॉग पर लिखना प्रारम्भ हुआ , पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ छपने से एक कवियत्री  या  ब्लॉग लेखिका के रूप में यह सपना भी पूरा हुआ . 
आज का  अपना अगला सपना यही है कि अपने  बच्चों की अच्छी शिक्षा , आत्मनिर्भरता और सुरक्षित भविष्य के लक्ष्य के बीच   भी अनाथ या अल्प आय वर्ग की लड़कियों की उच्च  शिक्षा में अपना योगदान , समाज में उपेक्षित वृद्ध /वृद्धों के लिए कुछ  किया जा सके . किस तरह पूरा होता है , समय कहेगा !

गुरुवार, 1 नवंबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (24)


                              कुछ लोग अपनी शख्सियत को सबसे अलग प्रस्तुत करने में माहिर होते हैं और वही अंदाज उनकी अपनी विशेषता होती है। सपने सभी ने देखे और अपने अपने सपनों के स्वरूप को शब्दों में ही ढाल कर भेजा लेकिन समीर जी ने उसे सबसे अलग कविता रूप देकर प्रस्तुत किया क्योंकि सपने तो सपने हैं और ये सबसे अलग हैं। 



                                    तो फिर अपने सपनों के साथ आये हैं -- समीर लाल 'समीर' 


अधूरे सपने- अधूरी चाहतें!!

मेरे कमरे की खिड़की से दिखता
वो ऊँचा पहाड़
बचपन गुजरा सोचते कि
पहाड़ के उस पार होगा
कैसा एक नया संसार...
होंगे जाने कैसे लोग...
क्या तुमसे होंगे?
क्या मुझसे होंगे?
आज इतने बरसों बाद
पहाड़ के इस पार बैठा
सोचता हूँ उस पार को
जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...
कुछ धुँधले चेहरों की स्मृति लिए
याद करने की कोशिश में कि
कैसे थे वो लोग...
क्या तुमसे थे?
क्या मुझसे थे?
तो फिर आज नया ख्याल उग आता है
जहन में मेरे
दूर
क्षितिज को छूते आसमान को देख...
कि आसमान के उस पार
जहाँ जाना है हमें एक रोज
कैसा होगा वो नया संसार...
होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...
क्या तुमसे होंगे?
क्या मुझसे होंगे?
पहुँच जाऊँगा जब वहाँ...
कौन जाने बता पाऊँगा तब यहाँ..
कुछ ऐसे ही या कि
चलती जायेगी वो तिल्समि
यूँ ही अनन्त तक
अनन्त को चाह लिए!!
बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के
जाने कब तक...जाने कहाँ तक...
तभी अपनी एक गज़ल में
एक शेर कहा था मैने

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (23)

             ये शास्त्री जी का सपना  जो पूरा हुआ उनके द्वारा देखा गया और हम कर रहे हैं अधूरे सपनों की बात , लेकिन शास्त्री जी के भेजे इस पूर्णसपने को हम उतना ही सम्मान  देना चाहते हैं जितना  अपने विषय से जुड़े  संस्मरण को दिया है। इस लिए आप सबसे विषय से इतर जाने के लिए  क्षमा चाहते हुए उनके अनुभव को प्रकाशित  कर रही हूँ . अपने से बड़ों से जो बात सुनकर पता चलता  है और उसके  अन्दर कुछ  बात  होती है। इसमें भी एक सन्देश है -  साहित्यकार  के साहित्य को पढ़कर ही उसके विषय में और उससे मिलने का हमारा मंतव्य पूर्ण  हो सकता हैं .

                             ये सपना बता रहे हैं - रूपचन्द्र  शास्त्री " मयंक " जी

सपने तो व्यक्ति जीवनभर देखता है, कभी खुली आँखों से तो कभी बन्द आँखों से। साहित्य का विद्यार्थी होने के नाते मुझे हमेशा यही सपने आते थे कि मुझे किसी साहित्यकार का सानिध्य मिले।
बात उन दिनों की है जब मैं विद्यार्थी था। आर्थिक अभाव तो था लेकिन फिर भी घूमने का बहुत शौक था। मैं मार्गव्यय बचा कर रखता था और बचे हुए पैसों से पुस्तकें जरूर खरीद लेता था।
मुझे शौक चर्राया कि काशीविश्वनाथ के दर्शन किये जायें और मैं बनारस की यात्रा पर निकल गया। बनारस जाकर मैंने काशी विश्वनाथ के दर्शन किये। उन दिनों मैंने नाटककार लक्ष्मीनारायण मिश्र जी के कई नाटक पढ़े थे। मन पर उनका बहुत प्रभाव था। इसलिए मौका था उनसे मिलने का। अतः मैं उनसे मिलने के लिए उनके घर पहुँच गया। साहित्यकार बहुत ही उदारमना होते हैं। वे मुझसे बहुत ही प्रेम से मिले। मिश्र जी के पास उस समय डॉ.सभापति मित्र भी बैठे थे। काफी देर तक बातें होतीं रही। फिर उन्होंने पूछा कि क्या सुनोगे? मैंने तपाक से कहा कि पंडित जी रसराज सुनाइए! बस फिर क्या था पंडित जी माथे पर हाथ रखा और एक से बढ़कर एक प्रकृति का श्रृंगार सुनाया।

पंडित जी से विदा लेते हुए मैंने उनसे कहा- “पंडित जी! मैं साहित्यकारों का सान्निध्य चाहता हूँ।“

पंढित जी ने बहुत ही विनम्रता से कहा-“आप उनका साहित्य पढ़िए और उनसे मिलने पर उन्हे यह बताइए कि उनके अमुक साहित्य से मुझे यह सीख मिली।“

मैंने पंडित जी की बात गाँठ बाँध ली और बहुत से साहित्यकारों से मिला लेकिन जो बात मैंने बाबा नागार्जुन के साहित्य में देखी वो आज तक किसी के वांगमय में नहीं दिखाई दी।

अब उनसे मिलने की इच्छा मन में थी या यह कहें कि मेरा खुली आँखों का सपना था यह।

मेरा यह सपना पूरा हुआ सन् 1989 में। जब साक्षात् बाबा नागार्जुन ने मुझे दर्शन ही नहीं दिये अपितु उनकी सेवा और सान्निध्य का मौका भी मुझे भरपूर मिला और इसके निमित्त बने वाचस्पति जी, जो उस समय राजकीय महाविद्यालय, खटीमा में हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे।

मैं बाबा का एक संस्मरण इस आलेख में साझा कर रहा हूँ!
(गोष्ठी में बाबा को सम्मानित करते हुए
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री व जसराम रजनीश)
हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठित कवि बाबा नागार्जुन की अनेकों स्मृतियाँ आज भी मेरे मन में के कोने में दबी हुई हैं। मैं उन खुशकिस्मत लोगों में से हूँ, जिसे बाबा का भरपूर सानिध्य और प्यार मिला। बाबा के ही कारण मेरा परिचय सुप्रसिद्ध कवर-डिजाइनर और चित्रकार श्री हरिपाल त्यागी और साहित्यकार रामकुमार कृषक से हुआ। दरअसल ये दोनों लोग सादतपुर, दिल्ली मे ही रहते हैं। बाबा भी अपने पुत्र के साथ इसी मुहल्ले में रहते थे।
बाबा के खटीमा प्रवास के दौरान खटीमा और सपीपवर्ती क्षेत्र मझोला, टनकपुर आदि स्थानों पर उनके सम्मान में 1989-90 में कई गोष्ठियाँ आयोजित की गयी थी। बाबा के बड़े ही क्रान्तिकारी विचारों के थे और यही उनके स्वभाव में भी सदैव परिलक्षित होता था। किसी भी अवसर पर सही बात को कहने से वे चूकते नही थे।
एक बार की बात है। वाचस्पति शर्मा के निवास पर बाबा से मिलने कई स्थानीय साहित्यकार आये हुए थे। जब 5-7 लोग इकट्ठे हो गये तो कवि गोष्ठी जैसा माहौल बन गया। बाबा के कहने पर सबने अपनी एक-एक रचना सुनाई। बाबा ने बड़ी तन्मयता के साथ सबको सुना।

उन दिनों लोक निर्माण विभाग, खटीमा में तिवारी जी करके एक जे।ई. साहब थे। जो बनारस के रहने वाले थे। सौभाग्य से उनके पिता जी उनके पास आये हुए थे, जो किसी इण्टर कालेज से प्रधानाचार्य के पद से अवकाश-प्राप्त थे। उनका स्वर बहुत अच्छा था। अतः उन्होंने ने भी बाबा को सस्वर अपनी एक कविता सुनाई।

जब बाबा नागार्जुन ने बड़े ध्यान से उनकी कविता सुनी तो तिवारी जी ने पूछ ही लिया- ‘‘बाबा आपको मेरी कविता कैसी लगी।

’’ बाबा ने कहा-‘‘तिवारी जी अब इस रचना को बिना गाये फिर पढ़कर सुनाओ।’’

तिवारी जी ने अपनी रचना पढ़ी। अब बाबा कहाँ चूकने वाले थे। बस डाँटना शुरू कर दिया और कहा- ‘‘तिवारी जी आपकी रचना को स्वर्ग में बैठे आपके अम्माँ-बाबू ठीक करने के लिए आयेंगे क्या? खड़ी बोली की कविता में पूर्वांचल-भोजपुरी के शब्दों की क्या जरूरत है।’’

इसके आद बाबा ने विस्तार से व्याख्या करके अपनी सुप्रसिद्ध रचना-‘‘अमल-धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है।’’ को सुनाया। उस दिन के बाद तिवारी जी इतने शर्मिन्दा हुए कि बाबा को मिलने के लिए ही नही आये।
यह था मेरी खुली आँखों का सपना!
....शेष कभी फिर!

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (22) !

                          हमारे सपनों के आकर और स्वरूप अलग अलग होता है , संगीता जी उन सब में सबसे अलग दिशा में जाकर अपने सपने देख रही हैं क्योंकि अब तक के सरे लोगों से अलग एक दिशा में उनके कदम बढ़ रहे हैं। उनके सपनों के साथ जुड़ कर हम सभी उनके इसा सपने को साकार होने की कामना करती हूँ  .
                            आज अपने सपने के साथ है -- संगीता पुरी जी।








भाग्यशाली   होते हैं वे लोग जिनके सपने पूरे हो जाते हैं , कुछ तो इतने भाग्‍यशाली होते हैं कि सपनों से अधिक मिल जाता है उन्‍हें। पर यथार्थ में देखा जाए तो 99 प्रतिशत लोगों के सपने लाख कोशिशों के बावजूद दम तोड लेते हैं। जीवन में समझौता करना उनकी मजबूरी होती है, एक रास्‍ते के बंद होते ही दूसरे रास्‍ते की तलाश में जुट जाते हैं। दुनिया की भीड में भले ही वो हंसते खिलखिलाते नजर आ जाएं पर अंदर एक कसक सी बनी रहती है , जीवन के किसी भी मोड पर किसी और के द्वारा भी वो सपनों को पूरा होते देखना चाहते हैं। मैने ब्‍लॉगर परिचय में लिखा है आसमान को छूने के सपने है मेरे , हो भी क्‍यों नहीं , मेरे पास एक ऐसा ज्ञान है जो दुनियाभर में किसी के पास नहीं, वो है किसी के जन्‍म समय के आधार पर उसके संपूर्ण जीवन में समय समय पर आने वाली परिस्थितयों को सटीक ढंग से जान पाना। इससे लाखों परेशान लोगों को उचित सलाह दी जा सकती है। पर अपने देश में प्रतिभा की इतनी कद्र भी नहीं कि बिना सपने देखे ही हमें सबकुछ मिल जाए, इसलिए सपने ही तो देखने होंगे।
होश संभालते ही मैने अपने पापाजी को ज्‍योतिष के ग्रंथों में डूबा पाया , बी एस सी के एस्‍ट्रोनोमी पेपर के ग्रह नक्षत्रों के बाद ज्‍योतिष जैसे विषय को विज्ञान से जोडते हुए , अपने लेखों से भारत भर के विद्वानों के मध्‍य अलग पहचान बनाने में दूसरों का सटीक भविष्‍य बतला देना हमें रोचक लगता। थोडी बडी होने पर ही ज्‍योतिष को सीखने की मेरी भी इच्‍छा हो गयी , पर चूंकि ज्‍योतिष को समाज मे मान्‍यता प्राप्‍त नहीं थी , पापाजी नहीं चाहते थे कि उनकी अगली पीढी भी ज्‍योतिष में आए। पर उनके नौकरी छोडकर गांव में वापस आ जाने के कारण हमें पढाई लिखाई के लिए उचित वातावरण नहीं मिल पा रहा था। गणित और विज्ञान मेरे लिए रोचक विषय थे , पर गांव में पढाई की सुविधा न होने से मजबूरी में अर्थशास्‍त्र की पढाई करनी पडी। मन में प्राध्‍यापिका बनने का सपना देखती रही , पर विवाह के बाद का वातावरण उसके अनुकूल भी नहीं था। मन मारकर घर गृहस्‍थी में ही रमना पडा।

पर तबतक पापाजी ज्‍योतिष के क्षेत्र में काफी आगे निकल चुके थे , उनका रिसर्च इस हद तक पूरा हो गया था कि किसी की जन्‍म तिथि और जन्‍म समय मात्र की जानकारी से उसके पूरे जीवन के उतार चढाव का ग्राफ खींच लेते थे , उसके विभिन्‍न संदर्भों का सुख दुख प्रतिशत में निकाल लेते थे और समय समय पर अन्‍य प्रकार की समययुक्‍त भविष्‍यवाणी भी सटीक तौर पर करने में समर्थ थे। उनके द्वारा अध्‍ययन मनन के साथ ही साथ लेखन का काम भी जारी था , जिससे समाज को एक दिशा दी जा सकती थी। ज्‍योतिष के नाम पर अंधविश्‍वास और भ्रांतियों का खात्‍मा कर इसके वैज्ञानिक स्वरूप को स्‍थापित किया जा सकता था पर न तो पत्र पत्रिकाएं , न प्रकाशक , न अखबार या चैनल उनके लेखों या पुस्‍तकों को छापने या उन्‍हें स्‍थापित करने के लिए तैयार थे। समाज में अंधविश्‍वास फैलाने पर उनको करोडों मिलते हैं , मेरे ज्ञान का प्रचार प्रसार करने पर उन्‍हें क्‍या मिलता ?
पर इस मजबूत आधार को लेकर ज्‍योतिष का पूर्ण विकास किया जा सकता था , इसलिए  मैने अपना जीवन भी इसी को समर्पित करने का निश्‍चय किया। इस तरह अपने जीवन का 25 वर्ष से अधिक मैं भी इसपर समर्पित कर चुकी , जिसके बाद महसूस हो रहा है कि ग्रहों का प्रभाव हमपर पडता है और इस ज्ञान के बिना समाज अंधेरे में ही जी रहा है। जिस तरह सूर्य की चाल के हिसाब से बने घडी और कैलेण्‍डर से हम अपने समय को व्‍यवस्थित कर पाते हैं , उसी प्रकार सभी ग्रहों की चाल को समझकर जीवनभर के समय को विभिन्‍न कार्यक्रमों के मध्‍य समायोजित किया जा सकता है। मेरा सपना एक एक व्‍यक्ति को इस रहस्‍य से परिचित कराने का है कि हमारे जीवन में समय समय पर आने वाले उतार चढाव का रहस्‍य आसमान में विचरण कर रहे ग्रह हैं और उनकी चाल हैं और उन्‍हें देखकर हम अपने भविष्‍य का पूर्वानुमान लगा सकते हैं। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ और पापाजी को विश्‍वभर में पहचान दिलाने और जनसामान्‍य में फैले ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करने के उद्देश्‍य से मैं पुस्‍तकों के लेखन और सॉफ्टवेयर निर्माण से संबंधित कार्यों में जुटी हुई हूं , कभी मंजिल बिल्‍कुल निकट दिखाई देती है तन मन में आशा का संचार होता है लेकिन कभी कई प्रकार की बाधाएं भी उपस्थित हो जाती है , मन भयभीत हो जाता है , सोंचकर कि ऐसा न हो कि मेरा सपना साकार न हो।

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (21)

             सपने कुछ अपने कुछ औरों के लिए भी होते हैं कभी हम खुद के लिए कुछ देखते हैं लेकिन कभी हमारे सपने देखते तो हम हैं लेकिन वो होते औरों के लिए हैं। एक परमार्थ का सपना - एक सुन्दर सोच का प्रतीक , हो सकता है कि ये आज न पूरा हुआ हो कल पूरा हो जाए . ये कसक ही तो है जिस सपने को पूरा करने का समय अभी ख़त्म नहीं हुआ है उसको अभी देखते रहना है क्योंकि देखने से ही आगे बढ़ने की प्रेरणा शेष रहती है और क्या पता कि उसकी चाहत में इतनी शिद्दत हो कि वह पूरा होकर किसी और के सपनों को साकार करने में सफल हो जाए। ऐसे ही परमार्थ के लिए सपने देखती हुई अपने सपने साझा कर रही हैं स्वप्न मंजूषा  शैल  "अदा " जी .







यूँ तो मेरे सपने, कामो-बेसी पूरे हो चुके हैं, गाने का बहुत शौक था, पूरा हो गया, टी .वी . में काम करने का शौक तो नहीं था लेकिन वो भी पूरा हुआ, हाँ,  रेडियो अनाउन्सर बनने का शौक था, धूम-धाम से वो भी पूरा हुआ, विदेश आने का मन था, पूरा हुआ, यहाँ कुछ बन जाने का सपना था, पूरा हुआ। दिल था बच्चे ढंग से पढाई कर लें, वो भी हो रहा है।

लेकिन अभी भी कुछ सपने ऐसे हैं जिन्हें पूरा नहीं कर पाने की कसक, महसूस कर जाती हूँ । वो शायद इसलिए कि कुछ सपने अपने इख्तियार से बहार होते हैं। पिछले ढाई महीने भारत में रह कर वापिस आई हूँ कनाडा, तब इन सपनों ने कई बार सिर उठाया है।

कहते हैं, बुढ़ापा अपने आप में एक बिमारी है, लेकिन कुछ वर्षों से इसे देख भी रही हूँ और महसूस भी कर रही हूँ। मेरी माँ की उम्र 78 वर्ष है, उसके हाथ-पाँव धीरे-धीरे साथ देना छोड़ रहे हैं लेकिन, उसके मन में सपनों का ताजमहल अभी भी, उतना ही धवल है जितना शायद उसके यौवन में रहा होगा।

मेरा पहला सपना है कि मैं अपने ईलाके के, अधिक से अधिक बुजुर्गों के सपनों को, पूरा करूँ, बल्कि यहाँ कनाडा, ओटावा में भी मैंने गवर्नमेंट को एक प्रोपोजल दिया है, जितने भी ओल्ड ऐज होम हैं, वहां जितने भी बुजुर्ग हैं, उनके जो भी सपने हैं, और जो उनको पूरा करने की इच्छा रखते हैं और अगर वो हमारे इख्तियार में हैं, तो हम उनको ज़रूर पूरा करने की कोशिश करें। जैसे किसी को गाने का शौक था और नहीं गा पाए तो हम उनकी रेकोर्डिंग करें, किन्हीं बुजुर्ग को अगर मौंटीनियरिंग का सपना था और वो नहीं कर पाए तो हम उसे पूरा करें। किसी को फिल्म में अभिनय करने की इच्छा थी, हम उसे भी पूरा करें। मतलब जो भी हम कर सकते हैं अपने बुजुर्गों के लिए हम ज़रूर करें। पिछले न जाने कितने वर्षों से इसमें लगी हुई हूँ, लेकिन अभी तक कुछ कर नहीं पायी हूँ, कभी अपने काम में उलझ जाती हूँ और कभी विदेशों के दौरे पर, लेकिन अब इस सपने को पूरा करने के लिए कुछ ठोस कदम उठा रही हूँ, शायद बहुत जल्द आप लोगों से कुछ साझा भी कर पाऊं।

एक आम आदमी की ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सपना होता है अपना घर। मेरा दूसरा सपना है, कम आय वाले परिवारों को, कम लागत के मकान बना कर दिलवाना ...सपना छोटा नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है, इसके लिए भी काम कर रही हूँ, शायद यह भी पूरा हो जाए।

और तीसरा सपना है राजनीति में जाना।
हो सकता है राजनीति का नाम सुनकर आप लोगों को लगे कि, लो एक और आ गयी देश को बेच खाने के लिए, लेकिन मेरा मकसद सिर्फ और सिर्फ स्वस्थ राजनीति से है, कहने वाले ये भी कहते हैं, राजनीति में अच्छे लोग ठहर ही नहीं सकते, शायद यह सच भी हो, लेकिन अपना काम है कोशिश करना, बिना कोशिश किये हुए किसी भी चीज़ को असंभव कह देना मुझे नहीं पसंद। हो सकता है बदलाव लाने में सफल न भी होऊं मैं, लेकिन बिना कोशिश किये हुए हार मानना मुझे नहीं मंज़ूर। तो मेरे कदम अब बढ़ेंगे राजनीति की ओर ।

बाकी तो जो होगा वो देखा ही जाएगा। तो ये थी मेरे सपनों की फेहरिस्त। जिनके पूरे नहीं होने की कसक ज़रूर उठती है, लेकिन उम्मीद और विश्वास क मरहम इस कसक से कहीं ज्यादा कारगर है। अभी मैंने अपनी जान नहीं लगाई है इन सपनों को पूरा करने में इसलिए, इनके पूरे होने की सम्भावना भी उस नन्ही सी कसक से बहुत बड़ी है। 
मुझे आपलोगों की शुभकामनायें चाहिए। क्यूंकि अगर वो मिल जाए तो फिर इस कसक की कसक तो हम निकाल ही देंगे।
हाँ नहीं तो ...!
धन्यवाद।