(chitra googal ke sabhar )
आज बाल दिवस है, देश के बच्चों के लिए जो भी किया जाय कम है क्योंकि असली बाल वह है , जो अपने अनिश्चित भविष्य से जूझ रहा है. अगर वह स्कूल भी जा रहा है तो उसको चिंता इस बात की हर अभी घर में जाकर इतना कम कर लूँगा तो इतने पैसे मिलेंगे. उनकी शिक्षा भविष्य का दर्पण नहीं है बल्कि बस स्कूल में बैठ दिया गया है तो बैठे हैं .
अगर माँ बाप भीख मांग रहे हैं तो बच्चे भी मांग रहे हैं. क्या ये बाल दिवस का अर्थ जानते हैं या कभी ये कोशिश की गयी कि in भीख माँगने वाले बच्चों के लिए सरकार कुछ करेगी. जो कूड़ा बीन रहे हैं तो इसलिए क्योंकि उनके घर को चलने के लिए उनके पैसे की जरूरत है. कहीं बाप का साया नहीं है, कहीं बाप है तो शराबी जुआरी है, माँ बीमार है, छोटे. छोटे भाई बहन भूख से बिलख रहे हैं. कभी उनकी मजबूरी को जाने बिना हम कैसे कह सकते हैं कि माँ बाप बच्चों को पढ़ने नहीं भेजते हैं. अगर सरकार उनके पेट भरने की व्यवस्था करे तो वे पढ़ें लेकिन ये तो कभी हो नहीं सकता है. फिर इन बाल दिवस से अनभिज्ञ बच्चों का बचपन क्या इसी तरह चलता रहेगा?
आज अखबार में पढ़ा कि ऐसे ही कुछ बच्चे कहीं स्कूल में पढ़ रहे हैं क्योंकि सरकार ने मुफ्त शिक्षा की सुविधा जो दी है लेकिन शिक्षक बैठे गप्प मार रहे हैं.पढ़ाने में और इस लक्ष्य से जुड़े लोगों को रूचि तो सिर्फ सरकारी नौकरी और उससे मिलने वाली सुविधाओं में है. इन बच्चों का भविष्य तो कुछ होने वाला ही नहीं है तभी तो उनको नहीं मालूम है कि बाल दिवस किसका जन्म दिन है और क्यों मनाया जाता है. जहाँ सरकार जागरूक करने का प्रयत्न भी कर रही है वहाँ घर वाले खामोश है और किसी तरह से बच्चे स्कूल तक आ गए तो उनके पढ़ाने वाले उनको बैठा कर समय गुजार रहे हैं.
पिछले दिनों की बात है. केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद को किसी भिखारी की बच्चियां रास्ते में मिली थी और फिर उन्होंने उन बच्चियों को शिक्षा के लिए गोद लेने की सोची और उनका घर पता लगाते हुए वे भिखारी बस्ती में भी गए . उन्होंने उसकी माँ से कहा कि अपनी बेटियों को मेरे साथ भेज दो मैं उनकी पढ़ाई लिखाई का पूरा खर्चा उठाऊँगा और वे पढ़ लिख जायेंगी तुम्हारी तरह से भीख नहीं मांगेंगी . उन्होंने बहुत प्रयास किया लेकिन उसकी माँ तैयार ही नहीं हुई क्योंकि उसका एक ही जवाब था कि मैं इसी में गुजरा कर लूंगी लेकिन अपनी बेटियों को कहीं नहीं भेजूंगी . इस जगह मंत्री जी चूक गए उन्हें लड़कियों को दिल्ली ले जाकर पढ़ाने के स्थान पर उनको वहीं पढ़ाने का प्रस्ताव रखना चाहिए था . शायद वह भिखारिन मान जाती तो दो बच्चियां अपनी माँ की तरह से जिन्दगी गुजारने से बच जाती.
(chitra googal ke sabhar )
ऐसे बचपन को इस विभीषिका से बचाने के लिए या फिर ऐसे माँ बाप के बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए सबसे पहले उनके माँ बाप को इस बात को समझाना चाहिए कि उनके बच्चे पढ़ लिख कर क्या बन सकते हैं? कैसे वे उनकी इस दरिद्र जिन्दगी से बाहर निकल कर कल उनका सहारा बन सकते हैं. सर्वशिक्षा तभी सार्थक हो सकती है जब कि इसके लिए उनके अभिभावक भी तैयार हों . नहीं तो कागजों में चल रहे स्कूल और योजनायें - सिर्फ दस्तावेजों की शोभा बनती rahengin और इन घोषणाओं से कुछ भी होने वाला नहीं है. अगर इसे सार्थक बनाना है और बाल दिवस को ही इस काम की पहल के लिए चुन लीजिये . सबसे पहले बच्चों के माँ बाप को इस बात के प्रोत्साहित कीजिये कि वे अपने बच्चे को पढ़े लिखे और इज्जत और मेहनत से कमाते हुए देखें . अगर इस दिशा में सफल हो गए तो फिर ये सड़कों पर घूमता हुआ बचपन कुछ प्रतिशत तक तो सँभल ही जाएगा और इस देश का बाल दिवस तभी सार्थक समझना चाहिए .
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रविवार, 14 नवंबर 2010
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