ये मेरा नितान्त निजी विचार है और इसी लिए ये मेरी सोच पर ही लिख रही हूँ। ब्लॉग का निर्माण , उस पर लिखना और साझा ब्लॉग में सम्मिलित हो जाना हमारे लिए एक आम बात है और शुरू में जब इसकी जिम्मेदारियों से भिज्ञ न थी और साझा ब्लॉग की उपयोगिता और उसके स्वरूप से प्रभावित हुई और मैंने भी कई ब्लॉग में साझीदारी स्वीकार कर ली।
मेरे द्वारा अपनाये गए सभी ब्लॉग कभी महत्वपूर्ण भूमिका रहे हैं ब्लॉग जगत में। लेकिन मैं एक अपराध बोध से ग्रस्त हूँ कि मेरे डैशबोर्ड में मेरी द्वारा अनुसरित किये गए ब्लोगों लम्बी फेहरिस्त है। मैंने हर एक पर जाना चाहती हूँ लेकिन चाह कर भी सब पर न तो पढ़ने ही पहुँच पाती हूँ और न ही लिखने के लिए। रोज न सही अगर मैं सप्ताह में एक बार भी वहाँ लिख पाऊं तो शायद ये अपराध बोध मुझे परेशान न करे। अपने ब्लॉग पर हफ्तों न लिख पाऊं मेरी आत्मा इतना नहीं कचोटती है जितना कि मैं अपने द्वारा अनुसरित ब्लॉग पर कुछ न कर पाने के लिए परेशान रहती हूँ।
मैं जितना पहले इस पर सक्रिय रह पाती थी अब नहीं रह पाती हूँ। सोचती हूँ कि कहीं इतने सारे ब्लोग्स को मैं धोखा तो नहीं दे रही हूँ कि सबको अपनाकर भी मैं उन्हें अपना अपनत्व नहीं दे पाती हूँ। जब कहीं जाकर अपनत्व देने कि कोशिश करती हूँ तो एक मेहमान की तरह से ।
मैं sajha blog ko ek परिवार कि tarah se hi samajhti हूँ, भले ही हम व्यक्तिगत रूप से एक दूसरे से परिचित न हों फिर भी जब परिवार के सदस्य कुछ अभिव्यक्त करें तो हमको उससे जुड़ना तो चाहिए ही भले ही हम उसको अपनत्व देने में देर करें लेकिन ये हमारा नैतिक दायित्व बनता है कि हम अपने परिवार के सदस्यों के प्रति अपने को जुडाव रखें। उनके लिखे हुए को पढ़ें और उसका मूल्याङ्कन करके उनको प्रोत्साहित भी करें। ऐसा न कर सकें तो कम से कम वहाँ तक जाकर उसकी अद्यतन गनअतिविधियों से तो अवगत होना ही चाहिए।
मेरा ये अपराध बोध मुझे दबाये जा रहा है। आप सबसे अनुरोध है कि मुझे इस विषय में अपनी राय दें कि क्या मेरा सोचना और ये अपराध बोध उचित है या नहीं।
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सोमवार, 28 फ़रवरी 2011
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