भारतीय समाज की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार बेटी विदा होकर पति के घर ही जाती है. उसके माँ बाप उसके लालन पालन शिक्षा दीक्षा में उतना ही खर्च करते हैं जितने की लड़के की शिक्षा में , चाहे वह उनका अपना बेटा हो या फिर उनका दामाद . शादी के बाद बेटी परायी हो जाती हैं - ये हमारी मानसिक अवधारणा है और बहू हमारी हो जाती है. हमारी आर्थिक सोच भी यही रहती है कि कमाने वाली बहू आएगी तो घर में दोहरी कमाई आएगी और उनका जीवन स्तर अच्छा रहेगा. होना भी ऐसा ही चाहिए और शायद माँ बाप आज कल बेटी को इसी लिए उनके आत्मनिर्भर होने वाली शिक्षा दिलाने का प्रयास करते हैं. वे अपनी बेटी से कोई आशा भी नहीं करते हैं. लेकिन कभी कभी किसी का कोई व्यंग्य सोचने पर मजबूर कर देता है.
"तुम्हारे बेटा तो कोई है नहीं तो क्या बेटी के घर कि रोटियां तोडोगी? "
"तुमने जीवन में कुछ सोचा ही नहीं, सारा कुछ घर के लिए लुटा दिया , अब बुढ़ापे में कौन से तुमको पेंशन मिलनी है कि गुजारा कर लोगे."
"मैं तो सोचता हूँ कि ऐसे लोगों का क्या होगा, जीवन भर भाग भाग कर कमाया और बेटी को पढ़ा तो दिया अब कहाँ से शादी करेगा और कैसे कटेगा इनका बुढ़ापा. "
बहुत सारे प्रश्न उठा करते हैं, जब चार लोग बैठ कर सामाजिकता पर बात करते हैं. ऐसे ही मेरी एक पुरानी कहानी कि पात्र मेहनतकश माँ बाप की बेटी थी और माँ बाप का ये व्यंग्य कि कौन सा मेरे बेटा बैठा है जो मुझे कमाई खिलायेगा.
उसने अपनी शादी के प्रस्ताव लाने वालों से पहला सवाल यह किया कि मेरी शादी के बाद मैं अपनी कमाई से इतना पैसा कि मेरे माँ बाप आराम से रह सकें इनको दूँगी.
लड़के वालों के लिए ये एक अजीब सा प्रश्न होता और वे उसके निर्णय से सहमत नहीं होते क्योंकि शादी के बाद उसकी पूरी कमाई के हक़दार वे ही होते हैं न.
एक सवाल सभी लोगों से यह पूछती हूँ कि अगर माँ बाप ने अपनी बेटी को इस काबिल बना दिया है कि वह कमा कर अपने पैरों पर खड़ी हो सके तो फिर शादी के बाद वह अपने माँ बाप का भरण पोषण का अधिकार क्यों नहीं रखती है? ऐसे मामले में ससुराल वालों को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए. जिस शिक्षा के बल पर वह आत्मनिर्भर है वह उसके माता पिता ने ही दिलाई है न. फिर उनके आर्थिक रूप से कमजोर होने पर वह अपनी कमाई का हिस्सा माता पिता को क्यों नहीं दे सकती है? बेटे को आपने पढ़ाया तो उसकी कमाई पर आपका पूरा पूरा हक़ है और उन्होंने बेटी को पढ़ाया तो उसकी कमाई पर भी आपका ही पूरा पूरा हक़ है. आखिर क्यों? हम अपनी इस मानसिकता से कब मुक्त हो सकेंगे कि बेटी विवाह तक ही माता पिता की देखभाल कर सकती है और उसके बाद वह पराई हो जाती है.
