हाँ यही दिन तो था जब कि मेरे धर्मपिता (ससुर ) ने मेरा साथ छोड़ दिया था. मेरी शादी के सख्त विरोधी होने के बाद भी शायद मेरे व्यवहार कहूं या उनके और लोगों में इंसान पहचानने का हुनर कहूं वे मेरे हर जगह पर साथ खड़े थे. मेरे संघर्ष के दिनों में उस धैर्य और सांत्वना का हाथ मेरे सिर पर रखे रहे कि जंग तो हमने ही लड़ी थी लेकिन सिर पर छत होने का अहसास सदैव देते रहे.
वह हमारे संघर्ष के वर्ष था जब कि मेरे पति ने अपनी कंपनी से अपने उसूलों के चलते इस्तीफा दे दिया था और मैं उस समय एम एड करके निकली ही थी. पति के एक मित्र को अपने स्कूल के लिए प्रिंसिपल की जरूरत थी और वे मुझे अपने स्कूल में ले गए लेकिन हमारे रहने की जगह ऐसी थी कि स्कूल की बस सुबह तो आकर ले जाती लेकिन दोपहर में बच्चों को देर न हो इसलिए वह मुझे करीब दो किलोमीटर दूर छोड़ देती थी. जहाँ से मुझे अपनी बड़ी बेटी जो ४ साल की थी को लेकर पैदल ही आना पड़ता था. उस समय मैं दूसरी बेटी को भी जन्म देने की प्रक्रिया में चल रही थी.
संयुक्त परिवार में मेरी स्थिति या संघर्ष को कोई स्थान नहीं दिया जाता था . स्कूल से लौटकर घर की जिम्मेदारियों में कमी नहीं इजाफा ही था क्योंकि घर की छोटी बहू तो अधिक काम करने के लिए होती है. मैंने जिन्दगी में कभी हार नहीं मनी चाहे जितना भी संघर्ष क्यों न किया हो?
मेरे ससुर को मेरी स्थिति से पूरी सहानुभूति थी और वे जब मेरे स्कूल से लौटने का समय होता था तो छाता लेकर जहाँ मैं बस से उतरती थी वहाँ खड़े मिलते थे और फिर मेरी बेटी को गोद में उठा कर पैदल मेरे साथ चलकर घर लाते थे. ये क्रम उन्होंने मेरे सातवें महीने से लेकर पूरे समय तक जारी रखा. अप्रैल और मई के गर्मी में भी वो कभी आलस नहीं करते थे. रास्ते भर मुझे समझाते हुए आते थे कि बेटा तुमने इतनी पढ़ाई की है तो जल्दी ही कोई अच्छी नौकरी मिल जाएगी और फिर ये भी जल्दी ही कोई दूसरी कंपनी में लग जाएगा. उनकी उतनी सांत्वना मुझे एक संबल बनाकर सहारा देती रही.
मैं लड़ती रही . उस समय उनकी आयु ७१ वर्ष की थी जब वे मुझे लेने जाया करते थे और एक बच्ची को गोद में उठा कर चलते थे.
शायद उनके आशीर्वाद से ही मुझे ६ महीने बाद आई आई टी में नौकरी मिल गयी थी और पति भी फिर से नई कंपनी में जॉब करने लगे. लेकिन वे ५ महीने इंसां को परखने के लिए बहुत होते हैं. मेरा रोम रोम उनका ऋणी है और फिर हम दोनों ने उनके अंतिम समय में जो कुछ कर सकते थे किया . उसका बखान करके मैं अपनी बड़ाई नहीं करना चाहती हूँ. लेकिन उनके जो आखिरी शब्द थे वो थे - "बेटा मुझे या नहीं पता था कि तुम मेरी इतनी सेवा करोगी. मेरी आत्मा तुमसे बहुत खुश है."
मैं उनकी इस सेवा कर पाने के लिए अपने आई आई टी के सहयोगियों और बॉस दोनों की ही तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ क्योंकि मैं घर में रात में उनके दर्द के कारण उनके पास रहती थी और सो नहीं पाती थी. ऑफिस में मेज पर सिर रख कर सो जाया करती थी. कभी बॉस भी आ गए तो उन्होंने ने ये नहीं कहा कि काम कब करोगी? वैसे उस समय का जो वातावरण था वो एक परिवार की तरह था. कोई बॉस नहीं था सब एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल होते थे. मेरे उस बड़े दुःख में सब शामिल रहे. अब सब मेरे साथ नहीं है लेकिन जो जहाँ भी है अब भी हम संपर्क में हैं .
मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
सोच का आधार : शिक्षा या संस्कार !
इस लेख को लिखने के बारे में हमारे ब्लॉग से प्रेरणा मिली. इससे सम्बंधित कई बातें पढ़ी और फिर बार बार सिर उठाने लगीं. यूँ ही ब्लॉग पर पढ़ने के लिए खोज रही थी कि नजर पढ़ी ऐसे पोस्ट पर कि जिसमें टिप्पणियों की संख्या बहुत ज्यादा थी. सोचा जरूर कोई अच्छा विषय होगा और पढ़ा तो कुछ ख़ास नहीं लेकिन जब टिप्पणियां पढ़ी तो पता चला कि ये एक विवाद है और उस विवाद में धत तेरे की मची हुई थी. आरोप प्रत्यारोपों की श्रंखला चली थी . कुछ शब्दों में कहूं तो तू ऐसा, तू ऐसी ....... मेरी विचारधारा तो यही है कि अगर कोई ब्लॉग लिखने वाला है तो जरूर ही प्रबुद्ध तो होगा. भाषा संयम, संस्कारित और शिक्षित भी होगा . लेकिन उसमें मिले विचारों ने मेरी सोच को ध्वस्त कर दिया और मैं सिर थाम कर सोचने लगी कि हमारी सोच कहाँ से अधिक प्रभावित होती है?
हमारी सोच का आधार क्या है --संस्कार, शिक्षा या संगति?
संस्कार जो हमें आँखें खोलते ही देखकर, सुनकर या माता पिता प्रदत्त होते हैं. इनमें से कुछ व्यक्ति ग्रहण कर लेता है और कुछ छोड़ भी देता है क्योंकि कभी कभी बहुत सज्जन माँ बाप के बच्चे बहुत ही निकृष्ट सोच के निकल जाते हैं. माता पिता का हमेशा यही प्रयास रहता है की वह अपने बच्चे को अच्छे संस्कार दे. इसके बाद वह पाठशाला की दहलीज चढ़ता है और वह भी उसके लिए उसकी सोच और आचरण के लिए मंदिर के समान होता है. इस पर पैर रखने के पहले वह बहुत कुछ सीख चुका होता है. अपने बड़ों से संवाद में प्रयुक्त शब्दों का चयन, सम्मान और अपमान जनक भाषा का प्रयोग या फिर अपशब्दों का प्रयोग. इसमें बच्चों की बचपन की संगति भी बहुत काम आती है.
अगर माँ बाप व्यस्त हैं और बच्चा आया या नौकरानी के साथ रहता है, उसके बच्चों के साथ खेलता है तो संस्कार वही पाता है और कभी नहीं भी पाता है. लेकिन अबोध मष्तिष्क पर ये छाप अंकित जरूर हो जाती है. अच्छे उच्च पदस्थ अधिकारियों, नेताओं और महिलाओं तक को गालियाँ बकते हुए सुना है. वे गालियाँ उनकी शिक्षा में समाहित नहीं होती हैं. पुस्तकों में भी नहीं लिखी होती हैं. यदि शिक्षक से सुनी हैं तो वे उसके जीवन में स्थान ले सकती हैं. तब उच्च शिक्षा और पद शर्मिंदा है. अक्सर डॉक्टरों तक को मरीजों से बहुत ही बुरी तरह से बात करते हुए सुना है.
--अगर पैसे नहीं थे तो यहाँ क्यों आये? क्या धर्मशाला समझ रखी है?
--पहले पैसे जमा करो तब मरीज को हाथ लगायेंगे.
--इतने ही पैसे हैं तो किसी और डॉक्टर के पास जाओ.
जब कि डॉक्टर को मरीजों के प्रति सहानुभूति पूर्ण रवैया और मानव सेवा की शपथ दिलाई जाती है. हमारी सोच हमारे संस्कारों से अधिक प्रभावित होती है. मैंने कई अच्छे संस्थानों में छात्रों को गन्दी गन्दी गालियाँ बकते हुए सुना है. भले ही वे आपस में दे रहे हों या मजाक में बात कर रहे हों लेकिन उनकी मेधा और शिक्षा इसमें कहीं भी शामिल नहीं होती है.
हम अपने संभाषण में , आरोपों और प्रत्यारोपों में जो अपशब्द प्रयोग करते हैं, वे हमें ही लज्जित करते हैं - हम दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं. जिसने भी पढ़ा और सुना वो आपके प्रति अच्छी धारणा तो नहीं ही बनाएगा. वह बात और है कि हम अपने को बहुत दबंग या मुंहफट साबित कर रहे हों लेकिन ये सम्मानीय व्यक्तित्व को धूमिल कर देता है. हमारे पास इनके प्रयोग की सफाई भी होती है लेकिन कहीं हम अपना सम्मान खो चुके होते हैं. हमारी प्रबुद्धता कलंकित हो चुकी होती है. इसमें स्त्री या पुरुष का भेद नहीं है. जो बात गलत है वह सब पर लागू होती है. ऐसा नहीं है कि हम पुरुष है तो वह क्षम्य है और स्त्री हैं तो जघन्य अपराध. अपनी सोच और अभिव्यक्ति पर संयम ही आपको सम्मानित स्थान देता है और सम्मान किसी बाजार से खरीदा नहीं जाता बल्कि हमारे विचार और अभिव्यक्ति ही इसके लिए जिम्मेदार होते हैं. इस लिए भाषा का संयम सबसे पहल कदम है जो आपको प्रबुद्ध ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदार और संस्कारित मानव की श्रेणी में रखता है.
हमारी सोच का आधार क्या है --संस्कार, शिक्षा या संगति?
संस्कार जो हमें आँखें खोलते ही देखकर, सुनकर या माता पिता प्रदत्त होते हैं. इनमें से कुछ व्यक्ति ग्रहण कर लेता है और कुछ छोड़ भी देता है क्योंकि कभी कभी बहुत सज्जन माँ बाप के बच्चे बहुत ही निकृष्ट सोच के निकल जाते हैं. माता पिता का हमेशा यही प्रयास रहता है की वह अपने बच्चे को अच्छे संस्कार दे. इसके बाद वह पाठशाला की दहलीज चढ़ता है और वह भी उसके लिए उसकी सोच और आचरण के लिए मंदिर के समान होता है. इस पर पैर रखने के पहले वह बहुत कुछ सीख चुका होता है. अपने बड़ों से संवाद में प्रयुक्त शब्दों का चयन, सम्मान और अपमान जनक भाषा का प्रयोग या फिर अपशब्दों का प्रयोग. इसमें बच्चों की बचपन की संगति भी बहुत काम आती है.
अगर माँ बाप व्यस्त हैं और बच्चा आया या नौकरानी के साथ रहता है, उसके बच्चों के साथ खेलता है तो संस्कार वही पाता है और कभी नहीं भी पाता है. लेकिन अबोध मष्तिष्क पर ये छाप अंकित जरूर हो जाती है. अच्छे उच्च पदस्थ अधिकारियों, नेताओं और महिलाओं तक को गालियाँ बकते हुए सुना है. वे गालियाँ उनकी शिक्षा में समाहित नहीं होती हैं. पुस्तकों में भी नहीं लिखी होती हैं. यदि शिक्षक से सुनी हैं तो वे उसके जीवन में स्थान ले सकती हैं. तब उच्च शिक्षा और पद शर्मिंदा है. अक्सर डॉक्टरों तक को मरीजों से बहुत ही बुरी तरह से बात करते हुए सुना है.
--अगर पैसे नहीं थे तो यहाँ क्यों आये? क्या धर्मशाला समझ रखी है?
--पहले पैसे जमा करो तब मरीज को हाथ लगायेंगे.
--इतने ही पैसे हैं तो किसी और डॉक्टर के पास जाओ.
जब कि डॉक्टर को मरीजों के प्रति सहानुभूति पूर्ण रवैया और मानव सेवा की शपथ दिलाई जाती है. हमारी सोच हमारे संस्कारों से अधिक प्रभावित होती है. मैंने कई अच्छे संस्थानों में छात्रों को गन्दी गन्दी गालियाँ बकते हुए सुना है. भले ही वे आपस में दे रहे हों या मजाक में बात कर रहे हों लेकिन उनकी मेधा और शिक्षा इसमें कहीं भी शामिल नहीं होती है.
हम अपने संभाषण में , आरोपों और प्रत्यारोपों में जो अपशब्द प्रयोग करते हैं, वे हमें ही लज्जित करते हैं - हम दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं. जिसने भी पढ़ा और सुना वो आपके प्रति अच्छी धारणा तो नहीं ही बनाएगा. वह बात और है कि हम अपने को बहुत दबंग या मुंहफट साबित कर रहे हों लेकिन ये सम्मानीय व्यक्तित्व को धूमिल कर देता है. हमारे पास इनके प्रयोग की सफाई भी होती है लेकिन कहीं हम अपना सम्मान खो चुके होते हैं. हमारी प्रबुद्धता कलंकित हो चुकी होती है. इसमें स्त्री या पुरुष का भेद नहीं है. जो बात गलत है वह सब पर लागू होती है. ऐसा नहीं है कि हम पुरुष है तो वह क्षम्य है और स्त्री हैं तो जघन्य अपराध. अपनी सोच और अभिव्यक्ति पर संयम ही आपको सम्मानित स्थान देता है और सम्मान किसी बाजार से खरीदा नहीं जाता बल्कि हमारे विचार और अभिव्यक्ति ही इसके लिए जिम्मेदार होते हैं. इस लिए भाषा का संयम सबसे पहल कदम है जो आपको प्रबुद्ध ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदार और संस्कारित मानव की श्रेणी में रखता है.
गुरुवार, 30 सितंबर 2010
अदम्य इच्छाएं सीढ़ी है अपराध की !
मानव मनोभावों और इच्छाओं के बूते ही अपना सुखी जीवन और सुखी संसार बनाता है. हर कोई चाहता है कि अपनी इच्छाओं कि पूर्ति के लिए कठिन परिश्रम करे और उनका सुख उठाये. किन्तु ये इच्छाएं भी उसके जीवन में अलग अलग प्रयोजनार्थ होती हैं, यदि ये सिर्फ स्वहित से जुड़ी हैं तो उनका मंतव्य कुछ और ही होगा और अगर ये परहित से जुड़ी हैं तो उनकी प्राप्ति के साधन का स्वरूप कुछ और ही होगा. जूनून दोनों में ही होता है लेकिन उसके लिए प्रयास विभिन्न प्रकार के होते हैं.
आज के इस आधुनिकता और स्पर्धा के दौर में जीवन सिर्फ भौतिकताओं में सिमट कर रह गया है और उन्हीं के कारण ये अपने साधनों को चुनने लगे हैं. इससे जुड़ी अदम्य इच्छाएं ही व्यक्ति को ले जाती हैं अपराध की ओर. अगर वह परहित से जुड़ा है तो अपने सीमित साधनों से उसको हासिल करने की चेष्टा करता है किन्तु यदि ये स्वहित से जुड़ी हैं तो निश्चय ही वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है और फिर ये अदम्य इच्छाएं उनके लिए अपराध की सीढ़ी बन जाती हैं और अपराध के दलदल में फंसा इंसां और गहरे में चला जाता है.
अपने क्षेत्र में सर्वोपरि बने रहने की अदम्य इच्छा ने व्यक्ति को इतना नीचे गिरा दिया कि वह हत्या करवाने जैसा जघन्य अपराध तक कर बैठता है. एक कोचिंग संचालक ने अपने प्रतिद्वद्वी को पहले अपहरण कर और उसके बाद हत्या कर ऐसे स्थान पर फिंकवाया की उसके मिलने की कोई गुंजाईश ही न थी और फिर मिल भी जाये तो शिनाख्त का कोई प्रश्न नहीं उठता किन्तु शायद उन बूढ़े माँ बाप के कुछ पुण्य शेष रहे होंगे तो उन्हें अपने बेटे की लाश मिल गयी किन्तु उनका तो जीवन ही समाप्त हो गया. जिस दिन अपहरण की सूचना मिली तो वे महोदय अपने क्लास में कह रहे थे कि आज तो मिठाई बांटने का दिन है. हो सकता है कि वे इसमें लिप्त न हों लेकिन अपरोक्ष रूप से वे ही माने गए. साक्ष्य न मिले और मामला खत्म हो गया किन्तु????????????
भौतिक सुखों की अदम्य इच्छाएं तो उससे कुछ भी करवा सकती हैं क्योंकि ये ही उसके जीवन का साध्य बन जाती हैं. इसके लिए वह प्रत्यक्ष रूप से नहीं परोक्ष रूप से चोरी करेगा. दूसरों को धोखा देगा और अपने घर वालों से भी झूठ बोलेगा. उनकी आपाधापी में न घर को समय है और न परिवार को. अनैतिक काम भी करेगा . यह वह किसके लिए करता है? करोड़ों का बैंक बैलेंस होगा लेकिन क्या वह रख पायेगा बैंक में. नहीं. बाहर रखेगा और घर की तिजोरी में रखेगा. असीमित धन होने पर भी क्या वह सोने के सिक्के चबायेगा. खाना वह वही खायेगा क्योंकि इस कार्य में उसका स्वास्थ्य उसको बहुत कुछ खा पाने की पाबन्दी लगा चुका होगा. सोयेगा वह बिस्तर पर ही वह बात और है कि मखमली बिस्तर पर सोये और ज़री के चादर बिछा ले लेकिन क्या नीद उसको चैन की आएगी? गाड़ियाँ वह १० रख सकता है लेकिन चल सिर्फ एक में ही पायेगा. करोड़ों रुपये का मालिक क्या आसमान में पैर रख कर चलेगा, चलना उसे जमीं पर ही पड़ेगा और जब फिर जब जाएगा तो खाली हाथ. उसके साथ कुछ भी नहीं जायेगा. बस उसकी अदम्य इच्छाओं ने उसको गुनाहगार बना दिया.
प्रभाव और स्वामित्व की अदम्य इच्छाएं भी व्यक्ति को किसी और अपराध की ओर ले जाती हैं. राजनीति इसका सबसे पहला पाठ पढ़ती है. अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए वह कितने अपराध करता और करवाता है. चुनाव शुरू नहीं हुए और हत्याओं का दौर शुरू हो गया. अपने प्रभाव को मनवाने का सबसे सफल तरीका है. अपने प्रभाव को कायम रखने के लिए वह अपराधी भी पालता है जो उसके स्थान पर हत्या और अपहरण जैसे छोटे मोटे काम कर सकें. माफिया क्या होते हैं? इन्हीं अदम्य इच्छाओं के स्वामी होते हैं. बस्तियां जलवा दी और बन गया काम्प्लेक्स उसकी कमाई पाप की है लेकिन उनके नाम से लोग थर्राते हैं. किसी को उठवा लेना, किसी को टपका देना और किसी से खोके की मांग ही उनको अपराध जगत में स्थापित करती है. ये भी उनकी अदम्य इच्छा है लेकिन बस सिर्फ यही इच्छा पूरी होती है . शेष घर और परिवार के लिए वे दुर्लभ होते हैं. एक आम इंसां की जिन्दगी क्या होती है? इससे वे अनभिज्ञ होते हैं.
इसका सबसे घिनौना रूप होता है - जब इंसां सेक्स की अदम्य इच्छा का शिकार होता है. इसका कोई अंत नहीं होता है और वह इसके लिए उम्र , जाति और नैतिक और अनैतिक तरीके से भी नहीं डरता है. ये छोटी छोटी लड़कियों के साथ होने वाले कृत्य , गरीब या सुन्दर लड़कियाँ जिन पर ऐसे लोगों की नजर पड़ी फिर वे इसके लिए कुछ भी करेंगे. उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो चुकी होती है कि उनको कुछ भी नहीं दिखाई देता है. ये अपराध तो उन्हें सबसे नीचे गिरा देता है. हो सकता है कि वे प्रभाव से बच जाते हों और इसका शिकार किसी और को बना देते हो लेकिन न्याय तो कभी न कभी होता ही है और फिर ऐसे लोग न घर के होते हैं और न घाट के. ऐसे कार्य के लिए बड़े बड़े अफसर , डॉक्टर , इंजीनियर से लेकर छोटे तबके लोगों तक के चेहरे काले हुए हैं.
ऐसा नहीं है, ये अदम्य इच्छाएं यदि परहित के लिए होती हैं तो वे उसको बहुत बड़ा स्टेटस नहीं दे जाती लेकिन उस इंसां के चेहरे के ख़ुशी और मन के सुकून को कोई पा नहीं सकता है. ऐसे ही एक सज्जन हैं जिनको जूनून है कि वे लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार ले जाकर करते हैं और वर्षों से इस काम में जुटे हैं. उनसे मिलकर लगता है कि क्या ये भी कोई कर सकता है लेकिन उनका जूनून है.
मदर टेरेसा जैसी महान आत्मा को क्या दीन- दुखियों की सेवा कि अदम्य इच्छा ने ही यहाँ भारत में लाकर नहीं रखा और उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर सबकी माँ नहीं बना दिया. बस इसके रूप और उद्देश्य अलग अलग होते हैं.
आज के इस आधुनिकता और स्पर्धा के दौर में जीवन सिर्फ भौतिकताओं में सिमट कर रह गया है और उन्हीं के कारण ये अपने साधनों को चुनने लगे हैं. इससे जुड़ी अदम्य इच्छाएं ही व्यक्ति को ले जाती हैं अपराध की ओर. अगर वह परहित से जुड़ा है तो अपने सीमित साधनों से उसको हासिल करने की चेष्टा करता है किन्तु यदि ये स्वहित से जुड़ी हैं तो निश्चय ही वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है और फिर ये अदम्य इच्छाएं उनके लिए अपराध की सीढ़ी बन जाती हैं और अपराध के दलदल में फंसा इंसां और गहरे में चला जाता है.
अपने क्षेत्र में सर्वोपरि बने रहने की अदम्य इच्छा ने व्यक्ति को इतना नीचे गिरा दिया कि वह हत्या करवाने जैसा जघन्य अपराध तक कर बैठता है. एक कोचिंग संचालक ने अपने प्रतिद्वद्वी को पहले अपहरण कर और उसके बाद हत्या कर ऐसे स्थान पर फिंकवाया की उसके मिलने की कोई गुंजाईश ही न थी और फिर मिल भी जाये तो शिनाख्त का कोई प्रश्न नहीं उठता किन्तु शायद उन बूढ़े माँ बाप के कुछ पुण्य शेष रहे होंगे तो उन्हें अपने बेटे की लाश मिल गयी किन्तु उनका तो जीवन ही समाप्त हो गया. जिस दिन अपहरण की सूचना मिली तो वे महोदय अपने क्लास में कह रहे थे कि आज तो मिठाई बांटने का दिन है. हो सकता है कि वे इसमें लिप्त न हों लेकिन अपरोक्ष रूप से वे ही माने गए. साक्ष्य न मिले और मामला खत्म हो गया किन्तु????????????
भौतिक सुखों की अदम्य इच्छाएं तो उससे कुछ भी करवा सकती हैं क्योंकि ये ही उसके जीवन का साध्य बन जाती हैं. इसके लिए वह प्रत्यक्ष रूप से नहीं परोक्ष रूप से चोरी करेगा. दूसरों को धोखा देगा और अपने घर वालों से भी झूठ बोलेगा. उनकी आपाधापी में न घर को समय है और न परिवार को. अनैतिक काम भी करेगा . यह वह किसके लिए करता है? करोड़ों का बैंक बैलेंस होगा लेकिन क्या वह रख पायेगा बैंक में. नहीं. बाहर रखेगा और घर की तिजोरी में रखेगा. असीमित धन होने पर भी क्या वह सोने के सिक्के चबायेगा. खाना वह वही खायेगा क्योंकि इस कार्य में उसका स्वास्थ्य उसको बहुत कुछ खा पाने की पाबन्दी लगा चुका होगा. सोयेगा वह बिस्तर पर ही वह बात और है कि मखमली बिस्तर पर सोये और ज़री के चादर बिछा ले लेकिन क्या नीद उसको चैन की आएगी? गाड़ियाँ वह १० रख सकता है लेकिन चल सिर्फ एक में ही पायेगा. करोड़ों रुपये का मालिक क्या आसमान में पैर रख कर चलेगा, चलना उसे जमीं पर ही पड़ेगा और जब फिर जब जाएगा तो खाली हाथ. उसके साथ कुछ भी नहीं जायेगा. बस उसकी अदम्य इच्छाओं ने उसको गुनाहगार बना दिया.
प्रभाव और स्वामित्व की अदम्य इच्छाएं भी व्यक्ति को किसी और अपराध की ओर ले जाती हैं. राजनीति इसका सबसे पहला पाठ पढ़ती है. अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए वह कितने अपराध करता और करवाता है. चुनाव शुरू नहीं हुए और हत्याओं का दौर शुरू हो गया. अपने प्रभाव को मनवाने का सबसे सफल तरीका है. अपने प्रभाव को कायम रखने के लिए वह अपराधी भी पालता है जो उसके स्थान पर हत्या और अपहरण जैसे छोटे मोटे काम कर सकें. माफिया क्या होते हैं? इन्हीं अदम्य इच्छाओं के स्वामी होते हैं. बस्तियां जलवा दी और बन गया काम्प्लेक्स उसकी कमाई पाप की है लेकिन उनके नाम से लोग थर्राते हैं. किसी को उठवा लेना, किसी को टपका देना और किसी से खोके की मांग ही उनको अपराध जगत में स्थापित करती है. ये भी उनकी अदम्य इच्छा है लेकिन बस सिर्फ यही इच्छा पूरी होती है . शेष घर और परिवार के लिए वे दुर्लभ होते हैं. एक आम इंसां की जिन्दगी क्या होती है? इससे वे अनभिज्ञ होते हैं.
इसका सबसे घिनौना रूप होता है - जब इंसां सेक्स की अदम्य इच्छा का शिकार होता है. इसका कोई अंत नहीं होता है और वह इसके लिए उम्र , जाति और नैतिक और अनैतिक तरीके से भी नहीं डरता है. ये छोटी छोटी लड़कियों के साथ होने वाले कृत्य , गरीब या सुन्दर लड़कियाँ जिन पर ऐसे लोगों की नजर पड़ी फिर वे इसके लिए कुछ भी करेंगे. उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो चुकी होती है कि उनको कुछ भी नहीं दिखाई देता है. ये अपराध तो उन्हें सबसे नीचे गिरा देता है. हो सकता है कि वे प्रभाव से बच जाते हों और इसका शिकार किसी और को बना देते हो लेकिन न्याय तो कभी न कभी होता ही है और फिर ऐसे लोग न घर के होते हैं और न घाट के. ऐसे कार्य के लिए बड़े बड़े अफसर , डॉक्टर , इंजीनियर से लेकर छोटे तबके लोगों तक के चेहरे काले हुए हैं.
ऐसा नहीं है, ये अदम्य इच्छाएं यदि परहित के लिए होती हैं तो वे उसको बहुत बड़ा स्टेटस नहीं दे जाती लेकिन उस इंसां के चेहरे के ख़ुशी और मन के सुकून को कोई पा नहीं सकता है. ऐसे ही एक सज्जन हैं जिनको जूनून है कि वे लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार ले जाकर करते हैं और वर्षों से इस काम में जुटे हैं. उनसे मिलकर लगता है कि क्या ये भी कोई कर सकता है लेकिन उनका जूनून है.
मदर टेरेसा जैसी महान आत्मा को क्या दीन- दुखियों की सेवा कि अदम्य इच्छा ने ही यहाँ भारत में लाकर नहीं रखा और उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर सबकी माँ नहीं बना दिया. बस इसके रूप और उद्देश्य अलग अलग होते हैं.
शनिवार, 11 सितंबर 2010
अवसाद, कुण्ठा और तनाव : जीवन के खतरनाक मोड़ !
अवसाद (Depression ) , कुण्ठा (Frustration ), और तनाव (Tension ) : जीवन के खतरनाक मोड़ होते है , इन मोड़ों पर कभी कभी ये भी देखने को मिलता है --
*सैनिक ने आत्मा हत्या कर ली
*साथियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और खुद को गोली मार ली.
*अफसरों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर आत्महत्या.
*पत्नी के झगड़कर मायके जाने या वापास न आने पर फाँसी लगा ली.
*परीक्षा में फेल होने के डर से परिणाम से पहले आत्महत्या.
जीवन एक सुगम, सरल रास्ता नहीं है , इस पर चलने वाले कितने मानसिक व्याधियों से गुजरते हैं - कभी काबू पा लेते हैं और कभी हार जाते हैं . इन मानसिक स्थितियों का धन - दौलत और ऐश्वर्य से कुछ भी लेना देना नहीं है.
बहिर्मुखी व्यक्तित्व के लोग अपने इस हाल में घर वाले , मित्र आदि को अपना हमराज बना लेते हैं और ये सामने वाले की समझदारी होती है कि वे उसको इससे उबारने में कैसे सहायता करते हैं? अक्सर उबर भी जाते हैं.
इसके विपरीत एक पक्ष अंतर्मुखी लोगों का होता है , ये इन स्थितियों में अधिक खतरनाक निर्णय ले बैठते हैं. ये सिर्फ अपने में जीते हैं, उनकी मानसिक स्थिति सिर्फ उनकी संपत्ति है और इससे वे ही निपट सकते हैं ऐसी सोच उनको और सीमित कर देती है. ऐसे लोगों का व्यवहार , बातचीत और दायरा एकदम अलग होता है.
जीवन के खतरनाक मोड़ कुछ लोगों को मौत के द्वार तक ले जाते हैं . इसका स्वरूप आत्महत्या, दूसरों की हत्या कर आत्महत्या या अंधाधुंध शराब पीकर वाहन चलाना दूसरों को क्षति पहुँचाना या खुद को ही पहुँचाना. इस स्थिति में सड़क पर चलते हुए या कहीं भी जाते हुए आगे पीछे के होर्न या अन्य संकेतक कुछ भी नहीं समझ आते हैं और फिर दुर्घटना.
इन स्थितियों से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए लेकिन मनोवेगों पर भी व्यक्ति का पूर्ण नियंत्रण नहीं होता है. यदि स्वविवेक से कार्य किया जा सके तो अच्छा है अन्यथा मनोचिकित्सक के पास जाकर इसके लिए रास्ते मिल सकते हैं. कोई भी अनियंत्रित स्थिति पागलपन की हद तक जा सकती है. इससे पूर्व कि स्थिति पागलपन या जीवन की समाप्ति के निर्णय तक पहुँच जाये , घर वालों को सतर्क होना चाहिए. अंतर्मुखी व्यक्ति को हमेशा इस बात के लिए उत्साहित करना चाहिए कि वह डायरी लिखने की आदत डाल ले और भी तरीके से वह अपनी आतंरिक मनोभावों को अभिव्यक्त कर सकता है. कविता कहानी के रूप में या फिर चाहे वह उसको लिख कर फाड़ ही दे लेकिन ये निश्चित है कि वह कुछ हद तक अपनी मानसिक स्थिति से मुक्ति नहीं तो उससे उत्पन्न गलत विचारों से निज़ात अवश्य ही पा सकता है. दिमाग में उमड़ते घुमड़ते तनाव, कुंठा या अवसाद जब शब्दों में लिख कर निकल जाते हैं तो इंसां बहुत हल्का हो जाता है और वे रास्ते जो उसको सिर्फ और सिर्फ स्वयं को क्षति पहुँचने के लिए खुले मिलते हैं , वे बंद हो जाते हैं.
एक जागरुक मानव होने के नाते इस पर एक बार विचार कीजिये और कोशिश कीजिये कि ऐसे कुछ लोग अगर आपके संपर्क में हों तो उन्हें एक नई दिशा दीजिये. सिर्फ और सिर्फ लेखन कितने को बचा सकता है. चलिए इस दिशा में प्रयास करें.
*सैनिक ने आत्मा हत्या कर ली
*साथियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और खुद को गोली मार ली.
*अफसरों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर आत्महत्या.
*पत्नी के झगड़कर मायके जाने या वापास न आने पर फाँसी लगा ली.
*परीक्षा में फेल होने के डर से परिणाम से पहले आत्महत्या.
जीवन एक सुगम, सरल रास्ता नहीं है , इस पर चलने वाले कितने मानसिक व्याधियों से गुजरते हैं - कभी काबू पा लेते हैं और कभी हार जाते हैं . इन मानसिक स्थितियों का धन - दौलत और ऐश्वर्य से कुछ भी लेना देना नहीं है.
बहिर्मुखी व्यक्तित्व के लोग अपने इस हाल में घर वाले , मित्र आदि को अपना हमराज बना लेते हैं और ये सामने वाले की समझदारी होती है कि वे उसको इससे उबारने में कैसे सहायता करते हैं? अक्सर उबर भी जाते हैं.
इसके विपरीत एक पक्ष अंतर्मुखी लोगों का होता है , ये इन स्थितियों में अधिक खतरनाक निर्णय ले बैठते हैं. ये सिर्फ अपने में जीते हैं, उनकी मानसिक स्थिति सिर्फ उनकी संपत्ति है और इससे वे ही निपट सकते हैं ऐसी सोच उनको और सीमित कर देती है. ऐसे लोगों का व्यवहार , बातचीत और दायरा एकदम अलग होता है.
जीवन के खतरनाक मोड़ कुछ लोगों को मौत के द्वार तक ले जाते हैं . इसका स्वरूप आत्महत्या, दूसरों की हत्या कर आत्महत्या या अंधाधुंध शराब पीकर वाहन चलाना दूसरों को क्षति पहुँचाना या खुद को ही पहुँचाना. इस स्थिति में सड़क पर चलते हुए या कहीं भी जाते हुए आगे पीछे के होर्न या अन्य संकेतक कुछ भी नहीं समझ आते हैं और फिर दुर्घटना.
इन स्थितियों से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए लेकिन मनोवेगों पर भी व्यक्ति का पूर्ण नियंत्रण नहीं होता है. यदि स्वविवेक से कार्य किया जा सके तो अच्छा है अन्यथा मनोचिकित्सक के पास जाकर इसके लिए रास्ते मिल सकते हैं. कोई भी अनियंत्रित स्थिति पागलपन की हद तक जा सकती है. इससे पूर्व कि स्थिति पागलपन या जीवन की समाप्ति के निर्णय तक पहुँच जाये , घर वालों को सतर्क होना चाहिए. अंतर्मुखी व्यक्ति को हमेशा इस बात के लिए उत्साहित करना चाहिए कि वह डायरी लिखने की आदत डाल ले और भी तरीके से वह अपनी आतंरिक मनोभावों को अभिव्यक्त कर सकता है. कविता कहानी के रूप में या फिर चाहे वह उसको लिख कर फाड़ ही दे लेकिन ये निश्चित है कि वह कुछ हद तक अपनी मानसिक स्थिति से मुक्ति नहीं तो उससे उत्पन्न गलत विचारों से निज़ात अवश्य ही पा सकता है. दिमाग में उमड़ते घुमड़ते तनाव, कुंठा या अवसाद जब शब्दों में लिख कर निकल जाते हैं तो इंसां बहुत हल्का हो जाता है और वे रास्ते जो उसको सिर्फ और सिर्फ स्वयं को क्षति पहुँचने के लिए खुले मिलते हैं , वे बंद हो जाते हैं.
एक जागरुक मानव होने के नाते इस पर एक बार विचार कीजिये और कोशिश कीजिये कि ऐसे कुछ लोग अगर आपके संपर्क में हों तो उन्हें एक नई दिशा दीजिये. सिर्फ और सिर्फ लेखन कितने को बचा सकता है. चलिए इस दिशा में प्रयास करें.
मंगलवार, 13 जुलाई 2010
रिटायमेंट एक अहसास!
जीवन में आरम्भ से ही व्यक्ति किसी न किसी गतिविधि से जुड़ा रहता है. उसका जीवन सक्रिय रहता है उनसे जुड़े कार्यों में. बचपन से शिक्षा, युवा होने पर करियर फिर नौकरी, परिवार और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को पूरा करते करते वह रिटायर्मेंट की उम्र तक आ जाता है.
अगर हम सोचें तो ये रिटायर्मेंट क्या है? जीवन में आने वाला एक अहसास और इस अहसास को हर व्यक्ति पाने ढंग से स्वीकार करता है और करना भी चाहिए लेकिन ये जीवन या जीवन की सक्रियता का अंत तो बिल्कुल नहीं है. हाँ वर्षों से चली आ रही एक जीवन शैली में परिवर्तन का समय होता है और जीवन के इस पड़ाव पर इसका आना भी जरूरी है.
मेरे पड़ोसी रिटायर्मेंट के एक साल पहले से ही - रोज उलटी गिनती दुहराने लगे
अब इतने दिन रह गए है.
बस अब इतने महीने रह हैं.
अब इसके बाद मैं क्या करूंगा?
अब दिन कैसे काटेंगे?
मैं तो फिर खाना और सोने के अलावा कुछ भी नहीं करने वाला आदि आदि .
और आखिर वह दिन भी आ गया. सुबह से ही बड़े मायूस दिख रहे थे. शाम को उनकी ऑफिस से विदाई हुई और घर आये. घर में भी अच्छा माहौल बनाया गया था. वह दिन तो गुजार गया लेकिन दूसरे दिन दिन चढ़े तक सोते रहे और फिर धीरे धीरे अपने सुबह के काम निपटाए 'अब कौन कहीं जाना है?' , 'अब कौन सी जल्दी है?' बस इसी तरह के जुमले सुनने को मिलते रहे.
रिटायर्मेंट थक कर बिस्तर पड़े रहने का नाम नहीं है. न ही व्यक्ति की क्रियाशीलता की इतिश्री है. यह एक ऐसा अवसर है जब कि आप पर थोपे गए बंधनों से मुक्ति का समय है. जिसमें बांध कर आप जीवन के ३५- ४० वर्ष गुजारे हैं. अब आपका अपनी इच्छा से समय गुजरने का समय आ गया है - ये सोच कर शेष जीवन एन्जॉय कीजिये. वक्त काटना नहीं पड़ता है अपितु पता नहीं चलता है कि कहाँ गुजार गया?
नौकरी करने वाले हर व्यक्ति को एक निश्चित उम्र पर रिटायर्मेंट तो मिलेगा ही, उसको आप किस दृष्टि से देखते हैं, यह आपके ऊपर निर्भर करता है. यदि आप इस उम्र तक सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं तब तो बहुत ही अच्छा है आप भाग्यशाली हैं. यदि नहीं मुक्त हुए हैं तब भी ये अच्छा समय है जब कि आप अपना सम्पूर्ण समय बिना किसी तनाव के इस कार्य में लगा सकते हैं. वक्त को काटने और न काटने के लिए परेशान नहीं होना चाहिए. यदि आप नौकरी के चलते कहीं आने और जाने के लिए सायं नहीं निकल पाए हैं तो अब उस समय का सदुपयोग कीजिये. अपने रिश्तेदारों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ बनाइये. अपने हमउम्र लोगों के साथ समय गुजरिये, दूसरे लोगों के सुख दुःख में शरीक होइए. इस नियमबद्ध जीवन को जो आप अब त़क जीते आ रहे हैं दूसरे नियमों और कार्यों में समाहित कीजिये.
आप को अब वक्त मिला है कि आप अपनी पत्नी के साथ वक्त गुजरिये. विवाह से अब तक जीवन की भागदौड़ में जो साथ बिताने वाले पलों की कमी थी उसे अब पूरा कीजिये. उनके साथ शहर से बाहर दर्शनीय स्थलो तीर्थस्थलों और पहाड़ी स्थलों पर जाकर अपना समय बिताकर यादगार क्षणों को संजो सकते हैं. यह मत सोचिये कि अब आप थक चुके हैं या किसी काबिल नहीं रहे. इसका रिटायर्मेंट से कोई सम्बन्ध नहीं है. ये तो अपनी सोच होती है. साठ साल की उम्र में भी अपने को युवा महसूस करते हुए लोगों को देखा जा सकता है. ये भी तो सोचिये कि नौकरी के अतिरिक्त कार्य करने वाले लोग कभी रिटायर्मेंट की बात सोच ही नहीं पाते हैं और होते भी नहीं है व्यापारी, वकील, डॉक्टर जब तक ये सक्रिय रहते हैं कभी आराम या थकने की बात सोचते ही नहीं है. क्या ये ६० वर्ष के नहीं होते हैं होते हैं लेकिन उन्हें रिटायर्मेंट जैसा अहसास नहीं होता क्योंकि उनका कार्य सतत चलने वाला होता है और उम्र बढ़ने के साथ साथ ही उसमें परिपक्वता आती है और वे दूसरों का मार्गदर्शन करने में लग जाते हैं. उनके पास वक्त नहीं होता.
मेरे पड़ोसी की तरह नहीं कि बहुत नौकरी कर ली अब तो आराम और सिर्फ आराम ही करना है. इस सिद्धान्त पर चलने वाले खाना और सोना ही शेष जीवन का लक्ष्य बना कर रहने लगते हैं. एक अच्छे खासे सक्रिय शरीर को निष्क्रिय बनाने के लिए पर्याप्त है. इस अहसास को अपनी सोच से सकारात्मक स्वरूप प्रदान कीजिये यही जीवन कि अनिवार्यता है.
अगर हम सोचें तो ये रिटायर्मेंट क्या है? जीवन में आने वाला एक अहसास और इस अहसास को हर व्यक्ति पाने ढंग से स्वीकार करता है और करना भी चाहिए लेकिन ये जीवन या जीवन की सक्रियता का अंत तो बिल्कुल नहीं है. हाँ वर्षों से चली आ रही एक जीवन शैली में परिवर्तन का समय होता है और जीवन के इस पड़ाव पर इसका आना भी जरूरी है.
मेरे पड़ोसी रिटायर्मेंट के एक साल पहले से ही - रोज उलटी गिनती दुहराने लगे
अब इतने दिन रह गए है.
बस अब इतने महीने रह हैं.
अब इसके बाद मैं क्या करूंगा?
अब दिन कैसे काटेंगे?
मैं तो फिर खाना और सोने के अलावा कुछ भी नहीं करने वाला आदि आदि .
और आखिर वह दिन भी आ गया. सुबह से ही बड़े मायूस दिख रहे थे. शाम को उनकी ऑफिस से विदाई हुई और घर आये. घर में भी अच्छा माहौल बनाया गया था. वह दिन तो गुजार गया लेकिन दूसरे दिन दिन चढ़े तक सोते रहे और फिर धीरे धीरे अपने सुबह के काम निपटाए 'अब कौन कहीं जाना है?' , 'अब कौन सी जल्दी है?' बस इसी तरह के जुमले सुनने को मिलते रहे.
रिटायर्मेंट थक कर बिस्तर पड़े रहने का नाम नहीं है. न ही व्यक्ति की क्रियाशीलता की इतिश्री है. यह एक ऐसा अवसर है जब कि आप पर थोपे गए बंधनों से मुक्ति का समय है. जिसमें बांध कर आप जीवन के ३५- ४० वर्ष गुजारे हैं. अब आपका अपनी इच्छा से समय गुजरने का समय आ गया है - ये सोच कर शेष जीवन एन्जॉय कीजिये. वक्त काटना नहीं पड़ता है अपितु पता नहीं चलता है कि कहाँ गुजार गया?
नौकरी करने वाले हर व्यक्ति को एक निश्चित उम्र पर रिटायर्मेंट तो मिलेगा ही, उसको आप किस दृष्टि से देखते हैं, यह आपके ऊपर निर्भर करता है. यदि आप इस उम्र तक सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं तब तो बहुत ही अच्छा है आप भाग्यशाली हैं. यदि नहीं मुक्त हुए हैं तब भी ये अच्छा समय है जब कि आप अपना सम्पूर्ण समय बिना किसी तनाव के इस कार्य में लगा सकते हैं. वक्त को काटने और न काटने के लिए परेशान नहीं होना चाहिए. यदि आप नौकरी के चलते कहीं आने और जाने के लिए सायं नहीं निकल पाए हैं तो अब उस समय का सदुपयोग कीजिये. अपने रिश्तेदारों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ बनाइये. अपने हमउम्र लोगों के साथ समय गुजरिये, दूसरे लोगों के सुख दुःख में शरीक होइए. इस नियमबद्ध जीवन को जो आप अब त़क जीते आ रहे हैं दूसरे नियमों और कार्यों में समाहित कीजिये.
आप को अब वक्त मिला है कि आप अपनी पत्नी के साथ वक्त गुजरिये. विवाह से अब तक जीवन की भागदौड़ में जो साथ बिताने वाले पलों की कमी थी उसे अब पूरा कीजिये. उनके साथ शहर से बाहर दर्शनीय स्थलो तीर्थस्थलों और पहाड़ी स्थलों पर जाकर अपना समय बिताकर यादगार क्षणों को संजो सकते हैं. यह मत सोचिये कि अब आप थक चुके हैं या किसी काबिल नहीं रहे. इसका रिटायर्मेंट से कोई सम्बन्ध नहीं है. ये तो अपनी सोच होती है. साठ साल की उम्र में भी अपने को युवा महसूस करते हुए लोगों को देखा जा सकता है. ये भी तो सोचिये कि नौकरी के अतिरिक्त कार्य करने वाले लोग कभी रिटायर्मेंट की बात सोच ही नहीं पाते हैं और होते भी नहीं है व्यापारी, वकील, डॉक्टर जब तक ये सक्रिय रहते हैं कभी आराम या थकने की बात सोचते ही नहीं है. क्या ये ६० वर्ष के नहीं होते हैं होते हैं लेकिन उन्हें रिटायर्मेंट जैसा अहसास नहीं होता क्योंकि उनका कार्य सतत चलने वाला होता है और उम्र बढ़ने के साथ साथ ही उसमें परिपक्वता आती है और वे दूसरों का मार्गदर्शन करने में लग जाते हैं. उनके पास वक्त नहीं होता.
मेरे पड़ोसी की तरह नहीं कि बहुत नौकरी कर ली अब तो आराम और सिर्फ आराम ही करना है. इस सिद्धान्त पर चलने वाले खाना और सोना ही शेष जीवन का लक्ष्य बना कर रहने लगते हैं. एक अच्छे खासे सक्रिय शरीर को निष्क्रिय बनाने के लिए पर्याप्त है. इस अहसास को अपनी सोच से सकारात्मक स्वरूप प्रदान कीजिये यही जीवन कि अनिवार्यता है.
मंगलवार, 15 जून 2010
मंत्र शक्ति का यथार्थ!
विषय एकदम अलग - मेरे लेखन का सबसे अलग विषय किन्तु ये मेरी सोच ही नहीं बल्कि यथार्थ के साथ जुड़ी मेरी वह सोच है जिसको मैंने भोगा है और इस भोग से ये महसूस किया कि इससे औरों को कुछ दिया जा सकता है या बाँटा जा सकता है तो क्यों न अपने इस वृहद् परिवार में बाँट कर चलें.
मैं आध्यात्म से जुड़ना और उससे जुड़े हुए अनुभवों को सांझा करने की बात कर रही हूँ. हिन्दू धर्म में दुर्गा सप्तशती सभी ने देखी या पढ़ी होगी . उसमें कुछ श्लोक हैं जो कि कवच कहे जाते हैं. उन मन्त्रों से हम अपने शरीर को सुरक्षित करते हैं. ऐसे ही अगर हम सहज रूप से देखे तो रामचरित मानस है - जिसकी चौपाइयां अपने आप में एक मंत्र हैं और उन मन्त्रों को हम अनुभूत करें तो वे आज भी ये सिद्ध कर देती हैं कि ये विश्वास की शक्ति कभी भी हमें निराश नहीं करती है. ये ज्ञान या विवरण देने से पहले मैं बता दूं कि ये मुझे अपने आध्यात्मिक गुरु जो मेरे फूफा जी भी थे - श्री जगदम्बा प्रसाद श्रीवास्तव से प्राप्त हुआ था. बचपन से ही जब भी वे उरई जाते मुझे अपने पास बिठा कर छोटी छोटी बातें सिखाया करते थे. कुछ मंत्र , कुछ ऐसी बातें जो हमें किताबों में नहीं मिल सकती थी. यही चीजें हम दृढ बनाती हैं - संघर्ष करने की शक्ति देती हैं.
रामचरित मानस सिर्फ एक काव्य ही नहीं है बल्कि एक शक्तिशाली धार्मिक ग्रन्थ है . इसकी चौपाइयां कितनी अर्थपूर्ण और शक्तिपूर्ण है ये मैं बता रही हूँ.
मामभि रक्षय रघुकुल नायक, धृत वर चाप रुचिर कर सायक .
ये वह चौपाई है - जिससे हम किसी आकस्मिक दुर्घटना से अपने को सुरक्षित कर सकते हैं. मात्र एक पंक्ति है लेकिन कितनी सशक्त है ये मैंने अपने जीवन में एक बार नहीं बल्कि बार बार अनुभव किया और जिन्हें समझा उनको दिया भी है.
सिर्फ एक घटना का उल्लेख कर रही हूँ, अगर मैं इसके घेरे में न होती तो शायद ये लिखने के लिए सबके सामने भी नहीं होती.
आज से करीब ५ साल पहले की घटना है , मेरी माँ को यहाँ ऑपरेशन के लिए लाया गया था और हम दोनों ( मैं और मेरे पति) रात १२ बजे सारी तैयारी करवाने के बाद घर आ रहे थे. स्कूटर ४०-५० की गति से चला रहे थे. स्कूटर चलाने में कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. अचानक इन्होने मुझसे कुछ कहा और मुझे सुनाई दिया - 'रेखा मामभि रक्षय का जप करो' और मैं इस का मन ही मन जप करने लगी. बस ५ मिनट ही बीते थे की हमारा स्कूटर एक मिट्टी के ढेर पर चढ़ गया और इन्होने जो ब्रेक लगाया तो हमारा स्कूटर उछल गया. बस आगे जो देखा तो हमारी साँसें थाम गयी. नीचे करीब दस फुट गहरे गड्ढे में काम हो रहा था और उसके बाहर कोई अवरोध या रोशनी नहीं थी. वे गड्ढे के अन्दर रोशनी रख कर काम कर रहे थे. हमें सामान्य होने में करीब दस मिनट लग गए. लेकिन मैंने ये अहसास किया की इस मंत्र की शक्ति को हम नमन कर सकते. इसको हम घर से बाहर निकलते समय पढ़ कर ही निकलते हैं.
मैं आध्यात्म से जुड़ना और उससे जुड़े हुए अनुभवों को सांझा करने की बात कर रही हूँ. हिन्दू धर्म में दुर्गा सप्तशती सभी ने देखी या पढ़ी होगी . उसमें कुछ श्लोक हैं जो कि कवच कहे जाते हैं. उन मन्त्रों से हम अपने शरीर को सुरक्षित करते हैं. ऐसे ही अगर हम सहज रूप से देखे तो रामचरित मानस है - जिसकी चौपाइयां अपने आप में एक मंत्र हैं और उन मन्त्रों को हम अनुभूत करें तो वे आज भी ये सिद्ध कर देती हैं कि ये विश्वास की शक्ति कभी भी हमें निराश नहीं करती है. ये ज्ञान या विवरण देने से पहले मैं बता दूं कि ये मुझे अपने आध्यात्मिक गुरु जो मेरे फूफा जी भी थे - श्री जगदम्बा प्रसाद श्रीवास्तव से प्राप्त हुआ था. बचपन से ही जब भी वे उरई जाते मुझे अपने पास बिठा कर छोटी छोटी बातें सिखाया करते थे. कुछ मंत्र , कुछ ऐसी बातें जो हमें किताबों में नहीं मिल सकती थी. यही चीजें हम दृढ बनाती हैं - संघर्ष करने की शक्ति देती हैं.
रामचरित मानस सिर्फ एक काव्य ही नहीं है बल्कि एक शक्तिशाली धार्मिक ग्रन्थ है . इसकी चौपाइयां कितनी अर्थपूर्ण और शक्तिपूर्ण है ये मैं बता रही हूँ.
मामभि रक्षय रघुकुल नायक, धृत वर चाप रुचिर कर सायक .
ये वह चौपाई है - जिससे हम किसी आकस्मिक दुर्घटना से अपने को सुरक्षित कर सकते हैं. मात्र एक पंक्ति है लेकिन कितनी सशक्त है ये मैंने अपने जीवन में एक बार नहीं बल्कि बार बार अनुभव किया और जिन्हें समझा उनको दिया भी है.
सिर्फ एक घटना का उल्लेख कर रही हूँ, अगर मैं इसके घेरे में न होती तो शायद ये लिखने के लिए सबके सामने भी नहीं होती.
आज से करीब ५ साल पहले की घटना है , मेरी माँ को यहाँ ऑपरेशन के लिए लाया गया था और हम दोनों ( मैं और मेरे पति) रात १२ बजे सारी तैयारी करवाने के बाद घर आ रहे थे. स्कूटर ४०-५० की गति से चला रहे थे. स्कूटर चलाने में कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. अचानक इन्होने मुझसे कुछ कहा और मुझे सुनाई दिया - 'रेखा मामभि रक्षय का जप करो' और मैं इस का मन ही मन जप करने लगी. बस ५ मिनट ही बीते थे की हमारा स्कूटर एक मिट्टी के ढेर पर चढ़ गया और इन्होने जो ब्रेक लगाया तो हमारा स्कूटर उछल गया. बस आगे जो देखा तो हमारी साँसें थाम गयी. नीचे करीब दस फुट गहरे गड्ढे में काम हो रहा था और उसके बाहर कोई अवरोध या रोशनी नहीं थी. वे गड्ढे के अन्दर रोशनी रख कर काम कर रहे थे. हमें सामान्य होने में करीब दस मिनट लग गए. लेकिन मैंने ये अहसास किया की इस मंत्र की शक्ति को हम नमन कर सकते. इसको हम घर से बाहर निकलते समय पढ़ कर ही निकलते हैं.
मंगलवार, 8 जून 2010
भटकती युवा पीढ़ी : निदान क्या हो?
अभी दो दिन पहले कि बात है, एक बारात आई और किसी का घर बसा लेकिन किसी कि दुनियाँ उजाड़ गयी. बारात में आये हुए लड़कों ने पास के घर में छत पर सोयी अकेली दो लड़कियों में से एक के साथ बलात्कार किया और उसको मार दिया. उसकी गूंगी बहरी बहन ही उसके साथ थी. शादी के शोर में उसने बहुत चीखने की कोशिश की लेकिन विवश थी. अपने सामने सब देखा और फिर बयान नहीं कर सकी. जब घर वाले वापस आये तो देखा और पुलिस को सूचना दी. शादी के विडियो से उस गूंगी लड़की ने इस अपराध में लिप्त लड़कों को पहचाना.
ये कोई खास घटना नहीं है, ऐसी घटनाएँ अखबार के पेज पर रोज दो चार होती ही हैं लेकिन अगर इसको देखा जाय तो ये हमारी भटकती हुई युवा पीढ़ी कि एक बानगी है.
उस लड़की से कोई लेना देना नहीं था. गेस्ट हाउस के बगल में उसका घर था. न वे लड़की को जानते थे और न कोई दुश्मनी ही थी. फिर ऐसा क्यों हुआ? क्या सिर्फ क्षणिक आवेग था? अगर हाँ तो इसके लिए दोषी कौन है? अगर आवेग इतना तीव्र हो कि हत्या तक करवा देता है तो वह आवेग एक मानसिक बीमारी बन चुका है. हम कहते हैं कि युवा पीढ़ी भटक रही है, लेकिन क्यों भटक रही है और इसके लिए समाज की क्या सहभागिता होनी चाहिए इस पर हम कम ही विचार कर पाते हैं. हम ये कह कर छुट्टी पा लेते हैं पता नहीं माँ बाप ने कैसे संस्कार दिए हैं? अगर माँ बाप स्वयं इस प्रवृत्ति के नहीं हैं तो कोई भी माँ बाप अपने बेटे या बेटी को इस तरह के कार्यों में लिप्त नहीं देखना चाहता है. फिर ये इस दिशा में कैसे भटक जाते हैं? छेड़छाड़ तो आम बात है.
अगर हम इसके कारणों पर विचार करें तो क्या हमें को यहाँ नहीं लगता है कि इन अपराधी प्रवृत्तियों का बीज कहीं घर के किसी कोने में ही प्रस्फुटित होता है, हम जान नहीं पाते कि हमारा ही व्यवहार बच्चे को कहाँ ले जा रहा है? इन बीजों की प्रजातियाँ और पर्यावरण अलग अलग होते हैं और उसी तरह के अपराध पलते हैं. बच्चों कि सबसे नाजुक उम्र होती है १२ से १७ साल के बीच की. इस दौरान उनके मन में बहुत सारे प्रश्न उठते हैं और उन्हें इनके उत्तरों की खोज होती है . वे सबसे पहले उनका उत्तर आने घर में खोजते हैं और अगर समझदार माँ बाप हुए तो उनके प्रश्नों का उत्तर बहुत धैर्य से देते हैं और नहीं तो आम माँ बाप -
-तुमको इन सबसे क्या मतलब,
-अपने काम से काम रखो,
-आइन्दा ऐसी बातों को जानने कि कोशिश मत करना,
-इन बातों के लिए तुम बहुत छोटे हो,
इसके बाद कर्तव्यों कि इतिश्री समझ कर वे अपने अपने कार्यों में लिप्त हो जाते हैं लेकिन बच्चे का किशोर मन इन बातों के उत्तर खोजता है. नहीं मिलता है तो अपने साथियों से जानने कि कोशिश करता है और कभी कभी उनके अनुसार ही आचरण भी करने लगता है.
इस बात की माँ बाप को खबर भी नहीं होती कि वो कहाँ रहता है? उसके साथी कौन है? उसकी गतिविधियाँ क्या हैं? जब किशोर उम्र के बच्चे इस तरह के काण्ड अंजाम देने लगते हैं तो कटघरे में कड़े माँ बाप और परिवार वाले खुद से ही प्रश्न करते हैं कि गलती कहाँ हुई? वे खुद का आकलन नहीं कर पाते हैं. अपनी ओर से बहुत अच्छी परवरिश की. अच्छी से अच्छी सुविधाएँ दी फिर भी?
इस जगह मैं कुछ अपने विचारों के अनुसार आपको कुछ बताना चाहूंगी कि माँ बाप कितने भी व्यस्त हो, अगर उन्हें अपने बच्चे के लिए एक अच्छा भविष्य का सपना देखना है तो उसको उपेक्षित मत कीजिये. जैसे और काम होते हैं वैसे ही कुछ समय बच्चों के लिए भी दीजिये. उनपर अपनी इच्छाएं लादिये मत , उनके मन की भी सुनिए और फिर उस पर विचार करके ही निर्णय लीजिये. अगर उसकी सोच गलत है तो उस कोमल मन को बड़े धैर्य से अपनी सही बात के लिए तैयार कीजिये.
बच्चे की टीचर से बराबर मिलते रहिये.
उसके मित्र वर्ग कि भी खबर रखिये - ये सबसे अहम् मुद्दा होता है कि कई जगह पर चालाक लड़के सीधे बच्चे को बरगला कर गलत रास्ते पर ले जाते हैं और उसके पैसे से अपने शौक भी पूरे करते हैं और अगर बहुत अमीर घर के बच्चे हुए तो आपका बच्चा उनके सामने खुद को हीन न दिखने के लिए गलत रास्ते अपना सकता है. इस लिए मित्र वर्ग की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. उसके दायरे को हमेशा अपने नजर के सामने रखिये.
बच्चे के किशोर होने पर कभी उनको बाइक उपहार में मत दीजिये. युवा मन की दौड़ बहुत तेज होती है और बाइक उसको और गति देती है. ये उनके पढ़ने लिखने कि उम्र होती है और इसके लिए अन्य साधनों को उपलब्ध करिए. सुविधाएँ दीजिये लेकिन उसकी सीमाओं को भी निश्चित कीजिये. कंप्यूटर लाइए लेकिन उसके लिए अन्य सुविधाएँ अपने सामने प्रयोग करने दीजिये. बस उनकी गतिविधियों पर एक नजर रखी जानी चाहिए. उनकी रुचियों के अनुरुप उनको साहित्य और अन्य साधन उपलब्ध करिए.
ये बातें लड़कियों और लड़कों दोनों पर ही लागू होती हैं. उनके भविष्य के प्रति आप ९० प्रति शत जिम्मेदार होते हैं, इनसे बचा नहीं जा सकता है. पैसे कमाइए लेकिन बच्चों कि कीमत पर कमाया हुआ आपका पैसा आपको खुद आपकी नजर में अपराधी बना कर कटघरे में खड़ा कर सकता है. इस विषय पर मनोविश्लेषकों के बहुत महत्वपूर्ण साबित होती है . इससे अतिरिक्त आप सभी के सुझाव भी आमंत्रित है कि क्या और किया जाय जो इन गतिविधियों में लिप्त होने वाली युवा पीढ़ी की गति को विराम दिया जा सके.
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