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"मैं बी ए कर रहा हूँ, आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग से सम्बन्ध रखता हूँ. सब लोग कह रहे हैं की 'यहाँ (भारत में) कुछ नहीं रखा है, बाहर निकल जाओ बहुत बहुत पैसा है.' आप बतलाइये मैं क्या करूँ?"
ये पत्र था एक लड़के का, जो करियर काउंसलर को लिखा गया था. ऐसे ही कितने युवा है, जो गुमराह किये जाते हैं. जिनकी शिक्षा का अभी आधार भी नहीं बना होता है. जिन्हें व्यावसायिक शिक्षा का ज्ञान तक नहीं होता है और उन्हें सिर्फ ढेर से पैसे की चाह होती है या फिर उनको ऐसे ही लोग सब्ज बाग़ दिखा कर दिग्भ्रमित कर देते हैं. इसमें इस युवा का भी दोष नहीं है क्योंकि सीमित साधन वाले माता पिता अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत क़तर ब्यौत करके खर्च पूरा करते हैं और बच्चे इस बात से अनभिज्ञ नहीं होते हैं. इस बात से उनको बहुत कष्ट होता है (सब को नहीं ) और वे जल्दी से जल्दी पैरों पर खड़े होकर बहुत सा पैसा कामना चाहते हैं. इसमें बुरा कुछ भी नहीं है किन्तु उसके लिए सही शिक्षा और सही मार्गदर्शन भी जरूरी है.
'यहाँ कुछ नहीं रखा है." कहने वाले वे लोग होते हैं जो ऐसे युवाओं को विदेश का लालच देकर वहाँ बंधुआ मजदूर बनवा कर खुद कमीशन हड़प जाते हैं. उनके दिमाग में इस तरह की बात डालना उनके भविष्य को गर्त में डालना है. पैसा कमाने का शार्ट कट या तो अपराध की दुनियाँ में कदम रखवा सकता है या फिर ऐसे ही लोगों के जाल में फँस कर अपने को बेच देने के बराबर होता है. अब तो हर क्षेत्र में आप चाहे कला, वाणिज्य या फिर विज्ञान स्नातक हों - करियर की इतनी शाखाये खुल रही हैं कि उसमें से चुनाव आपकी रूचि पर निर्भर करता है. इस दिशा की ओर ले जाने वाले संस्थान अपने देश में भी हैं, जो आपको नौकरी के साथ तकनीकी या विशिष्ट शिक्षा के अवसर प्रदान कर रहे हैं. आप काम करते हुए भी अपने करियर को अपने रूचि के अनुसार संवार सकते हैं.. इग्नू जैसे संस्थान है जो विश्व स्तर पर अपनी शिक्षा के लिए मान्य है.
वह तो अच्छा हुआ की उसने करियर काउंसलर से सलाह ले ली और उसे सही दिशा निर्देश प्राप्त हो गया अन्यथा ये युवा आसमां में उड़ने का सपना लिए अपने पर तक कटवा बैठते हैं कि एक बार उड़ने के बाद फिर पैरों पर चलने के काबिल भी नहीं रहते . इस विषय में मेरे अन्य ब्लॉग पर दी गयी पोस्ट इसका सत्य एवं ज्वलंत प्रमाण है.
मैंने अपने जीवन में आदमी के बहुत सारे रूप देखे हैं. हर स्तर पर रिश्तों में, मित्रता में, कार्यक्षेत्र में और परिवार में भी. हर इंसान की अपनी अलग सोच और अलग ही व्यवहार होता है. कुछ सोचते हैं कि हमें किसी से कोई काम नहीं पड़ने वाला है. मेरे पास इतना पैसा है, इतनी इज्जत है मैं किसी का मुहताज नहीं. ये जीवन में उसकी सबसे बड़ी भूल होती है.
जीवन एक स्थिति वह आती है जब इंसान को सिर्फ इंसान के चार कंधों की जरूरत ही होती है. कोई पैसा कोई इज्जत उसके पार्थिव को उठा कर नहीं रख सकता है.
मैंने बचपन में अपनी दादी से एक कहानी सुनी थी. एक सरपंच अपने गाँव में बहुत ही पैसे वाला और रुतबे वाला था. उसको किसी से क्या जरूरत ? लेकिन गाँव का सरपंच था तो किसी के यहाँ भी कोई अच्छा या बुरा मौका होता सरपंच के घर सूचना जरूर आती और सरपंच अपने घमंड में उसके घर अपने नौकरों से अपने जूते भेज देते. ये क्रम तब तक चलता रहा जब तक वह इस स्थति से न गुजरे . सरपंच के घर में उनकी माँ का निधन हुआ तो पूरे गाँव में डुगडुगी पिटवा दी गयी कि सरपंच जी कि माँ का स्वर्गवास हो गया है तो सबको उनके यहाँ पहुँचना है. गाँव वाले उनके व्यवहार से पहले से ही क्षुब्ध थे. उन लोगों ने एक आदमी को पूरा गाँव वालों के जूते लेकर सरपंच के घर भेज दिया. अब सरपंच की माँ को कन्धा देने के लिए चार लोग भी नहीं थे. अपने ही नौकरों की सहायता से उन्होंने अपनी माँ के पार्थिव शरीर को श्मशान पहुँचाया और अपनी गलती के लिए सभी से क्षमा मांगी ताकि खुद उनकी अंतिम क्रिया में कुछ लोग तो हों.
उस समय. हम लोग समझते थे कि ये दादी ऐसी ही कहानी बना कर सुना देती हैं कहीं ऐसा होता है
लेकिन हाँ ऐसा होता है -- आज भी लोग इस कदर मानवता और आत्मीयता से दूर हैं कि चार काँधे के मुहताज हैं.
मेरे एक परिचित या कहूं कि वे मेरे बॉस है. बहुत ही सीमित रहने वाले. उनका अपने विभाग से भी अन्य लोगों से कम ही मिलना जुलना. किसी के यहाँ शादी ब्याह में आना जाना भी कम. हाँ वे अपने काम के प्रति पूर्णतया समर्पित बल्कि मैं कहूँगी कि ऐसा समर्पण अपने जीवन में मैंने नहीं देखा है. जो इंसान साठ साल से ऊपर होकर और किसी घातक बीमारी से ग्रसित हो और आज भी १८ -२० घंटे कार्य करने कि क्षमता रखता हो तो हम उसके सामने ये नहीं कह सकते कि अब बस. जब भी बाहर मीटिंग होती है तो हमारी मीटिंग १२ घंटे से कम नहीं होती है. वही ब्रेकफास्ट , वही लंच और वही से डिनर लेकर आप वापस आते हैं. मैं उनके इस समर्पण को सलाम करती हूँ. लेकिन एक इंसान के रूप में शायद वह विफल रहे. अपने परिवार को भी समय देने में वे नगण्य हैं.
पिछले दिनों ऑफिस से आने के बाद मुझे फ़ोन मिला कि सर के पिताजी का निधन हो गया. वे उस समय यहीं पर थे. शाम ७ बजे निधन हुआ था. उन्होंने अपने बहनों और भाइयों को खबर की रात में घर में वे , उनकी पत्नी, एक घरेलु नौकर और उसकी पत्नी थी. उनके आस पास वालों तक को खबर न दी. इतना जरूर की आई आई टी में विभाग से मेल भेज दी गयी कि ऐसा हुआ है और उनको १२ बजे भैरों घाट के लिए बस प्रस्थान करेगी. सुबह मैं अपने पतिदेव के साथ उनके घर पहुंचे तो तब तक उनके पास वाले भाई आ चुके थे और बाकी का इन्तजार कर रहे थे. पता चला कि अभी देर है. मेरे पतिदेव तो वापस हो लिए और मैं रुक गयी. वहाँ पर मेरे साथ कम करने वाले लोग, विभाग के ऑफिस से कुछ लोग भर थे. भैरों घाट जाने के लिए एक गाड़ी शव को ले जाने के लिए और एक बड़ी बस लोगों के लिए भेजी गयी थी.
शव को कन्धा देने के लिए चार मजबूत कंधे न थे क्योंकि ३ बेटे उनके ६० से ऊपर थे और एक पोता था. देने को उनके बेटों ने कन्धा तो दिया लेकिन उठाने में समर्थ न थे सो जो वहाँ लोग उपस्थित थे उन लोगों ने कन्धा देकर शव को गाड़ी में रखा. पूरे विभाग से एक भो प्रो. न था. उनके कोई पड़ोसी न थे. जब बस आकर खड़े हो गयी तो पड़ोसियों के कान खड़े हुए कि क्या बात है? सारी महिलाएं बाहर आ गयी . वे आपस में बातें करने लगी कि हम को तो पता ही नहीं लगा. अरे हम इतने पास हैं. उनकी बड़ी बस पूरी खाली थी उसमें सिर्फ उनके चार के घर वाले और ३-४ लोग कुल ऑफिस और प्रोजेक्ट के साथ गए थे. तब लगा कि आदमी का पैसे का या अपने ज्ञान का या अपनी पद का अहंकार उसे इस स्थान पर कितना नीचा दिखा देता है कि चार मजबूत कंधे न जुटा सके कि शव को कम से कम चौराहे तक तो कंधे तक ले जाया जा सकता.
जीवन में एक यही स्थिति ऐसी होती है , जहाँ इंसान को इंसान की जरूरत होती है. इस जगह न अहंकार रहता है और न पद का रुतबा और न ही दौलत का घमंड. इस लिए अगर मानव बन कर आये हैं तो हमें मानव ही बने रहना चाहिए. उससे ऊपर उठ कर आप कुछ नहीं बन सकते हैं.
करवा चौथ का सम्बन्ध हमेशा पति और पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनने वाला होता है. इसमें एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण के भाव को देखा जा सकता है. ये तो सदियों से चली आने वाली परंपरा है और कालांतर में इसमें सुधार भी होने लगा है और आज की पीढ़ी के तार्किक विचारों से कहीं सहमत भी होना पड़ता है क्योंकि उनके तर्क हमेशा निरर्थक तो नहीं होते हैं.
हमारी पड़ोसन उम्र के साथ साथ डायबिटीज और अन्य रोगों से ग्रस्त हैं , जिसके चलते उनको लम्बे समय तक खाली पेट रहना घातक हो सकता है. वह तो सदैव से बगैर पानी पिए ही इस व्रत को करती रहीं हैं. इस बार उनकी बहू ने बिना पानी डाले सिर्फ दूध की चाय उनको दी कि अब आपका पानी का संकल्प तो ख़त्म नहीं होता इसको आप पी लीजिये. फल भी ले सकती हैं. उनके इस तर्क को कि पति की दीर्घायु के लिए होता है और मैं नहीं चाहती कि ये खंडित हो. उनकी बहू का तर्क था कि आप देखिये मेरे माँ ने जीवन भर बिना पानी के व्रत रखा और मेरे पापा नहीं रहे बतलाइए इसमें कहाँ से ये बात सिद्ध होती है. अपनी निष्ठां को मत तोडिये लेकिन उसके लिए पूर्वाग्रह भी मत पालिए. सब कुछ वैसा ही चलता है कुछ नहीं बदलता है. कोई पति तो अपनी पत्नी के लिए व्रत नहीं रखता है तब भी पतिनियाँ उनसे अधिक जीती हुई मिलती हैं.

इस दिशा में नई पीढ़ी के विचार बहुत सार्थक परिवर्तन वाले मिलने लगे हैं. दोनों कामकाजी हैं तो फिर दोनों ही आपस में मिलकर तैयारी कर लेते हैं और पत्नी का पूरा पूरा ख्याल भी रखते हैं. पहले तो पत्नी दिन भर व्रत रखी और फिर ढेरों पकवान बनने में लगी रहती थी और चाँद निकलने तक तैयार ही नहीं हो पाती थी और फिर बस किसी तरह से तैयार होकर पूजा कर ली. फिर व्रत तोड़ कर सबको खाना भी खिलाना होता था. अब अगर अकेले होते हैं तो पति पत्नी कहीं भी बाहर जाकर खाना खा लेते हैं और अगर घर में भी हैं तो पति पूरा सहयोग खाने में भी करता है और तैयारी में भी. बल्कि अब तो ये कहिये की पत्नी के साथ पति ने भी व्रत रखना शुरू कर दिया है और उनकी दलील भी अच्छी है की अगर ये मेरे लिए भूखा रहकर व्रत कर सकती है तो क्या हम एक दिन भूखे नहीं रह सकते हैं. इससे पत्नी को भी मनोबल मिलता है और उनमें एक दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव भी बढ़ता है. आज की युवा पीढ़ी में ५० प्रतिशत युवा इसके समर्थक मिलते हैं.
पहले तो ये होता था की शादी के बाद ही करवा चौथ का व्रत किया जाता था किन्तु मुझे एक घटना याद है कि मेरे साथ एक इंजीनियर काम करता था और उसका अफेयर मेरे घर के पास रहने वाली लड़की से था. शादी के लिए संघर्ष चल रहा था क्योंकि वे दोनों ही अलग अलग जाति के थे. लड़की ने करवा चौथ का व्रत रखा लेकिन अपने घर में तो नहीं बताया , उसने लड़की को शाम को मेरे घर आने के लिए बोल दिया और खुद भी आ गया. मेरे साथ उसने करवा चौथ की पूजा की और फिर व्रत तोड़ कर अपने घर चली गयी. ईश्वर की कृपा हुई और उनकी शादी हो गयी और अब दोनों बहुत ही सुखपूर्वक रह रहे हैं. ये तो भाव है, जिससे जुड़ चुका है उसके लिए ही मंगल कामना के लिए व्रत किया जा सकता है.

अगर हम पुरुषों को नारी उत्पीड़न के लिए दोषी ठहराते हैं तो वे इतने निर्मल ह्रदय भी हैं कि वे अपनी पत्नी के लिए खुद भी त्याग करने में पीछे नहीं रहते हैं. मैं इस आज की पीढ़ी को सलाम करती हूँ जो कि एक दूसरे के लिए इतना सोचती है और इस दिशा में यह बहुत अच्छी सोच है. उनको पुरुष के अहंकार से दूर भी कर रही है. वह अब पत्नी को बराबरी का दर्जा देकर उसके हर कष्ट में खुद भी कष्ट उठाने के लिए तैयार रहता है. उम्मीद की जा सकती है कि आने वाली ये युवा पीढ़ी सदियों पुराने पूर्वाग्रह से मुक्त होकर एक खुशहाल जीवन व्यतीत करेगी. मेरी यही कामना है कि पाती पत्नी इसी तरह से एक दूसरे के प्रति भाव रखते हुए एक दूसरे का सम्मान करें. करवाचौथ का ये बदलता हुआ स्वरूप एक अच्छा सन्देश देता है.
हाँ यही दिन तो था जब कि मेरे धर्मपिता (ससुर ) ने मेरा साथ छोड़ दिया था. मेरी शादी के सख्त विरोधी होने के बाद भी शायद मेरे व्यवहार कहूं या उनके और लोगों में इंसान पहचानने का हुनर कहूं वे मेरे हर जगह पर साथ खड़े थे. मेरे संघर्ष के दिनों में उस धैर्य और सांत्वना का हाथ मेरे सिर पर रखे रहे कि जंग तो हमने ही लड़ी थी लेकिन सिर पर छत होने का अहसास सदैव देते रहे.
वह हमारे संघर्ष के वर्ष था जब कि मेरे पति ने अपनी कंपनी से अपने उसूलों के चलते इस्तीफा दे दिया था और मैं उस समय एम एड करके निकली ही थी. पति के एक मित्र को अपने स्कूल के लिए प्रिंसिपल की जरूरत थी और वे मुझे अपने स्कूल में ले गए लेकिन हमारे रहने की जगह ऐसी थी कि स्कूल की बस सुबह तो आकर ले जाती लेकिन दोपहर में बच्चों को देर न हो इसलिए वह मुझे करीब दो किलोमीटर दूर छोड़ देती थी. जहाँ से मुझे अपनी बड़ी बेटी जो ४ साल की थी को लेकर पैदल ही आना पड़ता था. उस समय मैं दूसरी बेटी को भी जन्म देने की प्रक्रिया में चल रही थी.
संयुक्त परिवार में मेरी स्थिति या संघर्ष को कोई स्थान नहीं दिया जाता था . स्कूल से लौटकर घर की जिम्मेदारियों में कमी नहीं इजाफा ही था क्योंकि घर की छोटी बहू तो अधिक काम करने के लिए होती है. मैंने जिन्दगी में कभी हार नहीं मनी चाहे जितना भी संघर्ष क्यों न किया हो?
मेरे ससुर को मेरी स्थिति से पूरी सहानुभूति थी और वे जब मेरे स्कूल से लौटने का समय होता था तो छाता लेकर जहाँ मैं बस से उतरती थी वहाँ खड़े मिलते थे और फिर मेरी बेटी को गोद में उठा कर पैदल मेरे साथ चलकर घर लाते थे. ये क्रम उन्होंने मेरे सातवें महीने से लेकर पूरे समय तक जारी रखा. अप्रैल और मई के गर्मी में भी वो कभी आलस नहीं करते थे. रास्ते भर मुझे समझाते हुए आते थे कि बेटा तुमने इतनी पढ़ाई की है तो जल्दी ही कोई अच्छी नौकरी मिल जाएगी और फिर ये भी जल्दी ही कोई दूसरी कंपनी में लग जाएगा. उनकी उतनी सांत्वना मुझे एक संबल बनाकर सहारा देती रही.
मैं लड़ती रही . उस समय उनकी आयु ७१ वर्ष की थी जब वे मुझे लेने जाया करते थे और एक बच्ची को गोद में उठा कर चलते थे.
शायद उनके आशीर्वाद से ही मुझे ६ महीने बाद आई आई टी में नौकरी मिल गयी थी और पति भी फिर से नई कंपनी में जॉब करने लगे. लेकिन वे ५ महीने इंसां को परखने के लिए बहुत होते हैं. मेरा रोम रोम उनका ऋणी है और फिर हम दोनों ने उनके अंतिम समय में जो कुछ कर सकते थे किया . उसका बखान करके मैं अपनी बड़ाई नहीं करना चाहती हूँ. लेकिन उनके जो आखिरी शब्द थे वो थे - "बेटा मुझे या नहीं पता था कि तुम मेरी इतनी सेवा करोगी. मेरी आत्मा तुमसे बहुत खुश है."
मैं उनकी इस सेवा कर पाने के लिए अपने आई आई टी के सहयोगियों और बॉस दोनों की ही तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ क्योंकि मैं घर में रात में उनके दर्द के कारण उनके पास रहती थी और सो नहीं पाती थी. ऑफिस में मेज पर सिर रख कर सो जाया करती थी. कभी बॉस भी आ गए तो उन्होंने ने ये नहीं कहा कि काम कब करोगी? वैसे उस समय का जो वातावरण था वो एक परिवार की तरह था. कोई बॉस नहीं था सब एक दूसरे के सुख दुःख में शामिल होते थे. मेरे उस बड़े दुःख में सब शामिल रहे. अब सब मेरे साथ नहीं है लेकिन जो जहाँ भी है अब भी हम संपर्क में हैं .
इस लेख को लिखने के बारे में हमारे ब्लॉग से प्रेरणा मिली. इससे सम्बंधित कई बातें पढ़ी और फिर बार बार सिर उठाने लगीं. यूँ ही ब्लॉग पर पढ़ने के लिए खोज रही थी कि नजर पढ़ी ऐसे पोस्ट पर कि जिसमें टिप्पणियों की संख्या बहुत ज्यादा थी. सोचा जरूर कोई अच्छा विषय होगा और पढ़ा तो कुछ ख़ास नहीं लेकिन जब टिप्पणियां पढ़ी तो पता चला कि ये एक विवाद है और उस विवाद में धत तेरे की मची हुई थी. आरोप प्रत्यारोपों की श्रंखला चली थी . कुछ शब्दों में कहूं तो तू ऐसा, तू ऐसी ....... मेरी विचारधारा तो यही है कि अगर कोई ब्लॉग लिखने वाला है तो जरूर ही प्रबुद्ध तो होगा. भाषा संयम, संस्कारित और शिक्षित भी होगा . लेकिन उसमें मिले विचारों ने मेरी सोच को ध्वस्त कर दिया और मैं सिर थाम कर सोचने लगी कि हमारी सोच कहाँ से अधिक प्रभावित होती है?
हमारी सोच का आधार क्या है --संस्कार, शिक्षा या संगति?
संस्कार जो हमें आँखें खोलते ही देखकर, सुनकर या माता पिता प्रदत्त होते हैं. इनमें से कुछ व्यक्ति ग्रहण कर लेता है और कुछ छोड़ भी देता है क्योंकि कभी कभी बहुत सज्जन माँ बाप के बच्चे बहुत ही निकृष्ट सोच के निकल जाते हैं. माता पिता का हमेशा यही प्रयास रहता है की वह अपने बच्चे को अच्छे संस्कार दे. इसके बाद वह पाठशाला की दहलीज चढ़ता है और वह भी उसके लिए उसकी सोच और आचरण के लिए मंदिर के समान होता है. इस पर पैर रखने के पहले वह बहुत कुछ सीख चुका होता है. अपने बड़ों से संवाद में प्रयुक्त शब्दों का चयन, सम्मान और अपमान जनक भाषा का प्रयोग या फिर अपशब्दों का प्रयोग. इसमें बच्चों की बचपन की संगति भी बहुत काम आती है.
अगर माँ बाप व्यस्त हैं और बच्चा आया या नौकरानी के साथ रहता है, उसके बच्चों के साथ खेलता है तो संस्कार वही पाता है और कभी नहीं भी पाता है. लेकिन अबोध मष्तिष्क पर ये छाप अंकित जरूर हो जाती है. अच्छे उच्च पदस्थ अधिकारियों, नेताओं और महिलाओं तक को गालियाँ बकते हुए सुना है. वे गालियाँ उनकी शिक्षा में समाहित नहीं होती हैं. पुस्तकों में भी नहीं लिखी होती हैं. यदि शिक्षक से सुनी हैं तो वे उसके जीवन में स्थान ले सकती हैं. तब उच्च शिक्षा और पद शर्मिंदा है. अक्सर डॉक्टरों तक को मरीजों से बहुत ही बुरी तरह से बात करते हुए सुना है.
--अगर पैसे नहीं थे तो यहाँ क्यों आये? क्या धर्मशाला समझ रखी है?
--पहले पैसे जमा करो तब मरीज को हाथ लगायेंगे.
--इतने ही पैसे हैं तो किसी और डॉक्टर के पास जाओ.
जब कि डॉक्टर को मरीजों के प्रति सहानुभूति पूर्ण रवैया और मानव सेवा की शपथ दिलाई जाती है. हमारी सोच हमारे संस्कारों से अधिक प्रभावित होती है. मैंने कई अच्छे संस्थानों में छात्रों को गन्दी गन्दी गालियाँ बकते हुए सुना है. भले ही वे आपस में दे रहे हों या मजाक में बात कर रहे हों लेकिन उनकी मेधा और शिक्षा इसमें कहीं भी शामिल नहीं होती है.
हम अपने संभाषण में , आरोपों और प्रत्यारोपों में जो अपशब्द प्रयोग करते हैं, वे हमें ही लज्जित करते हैं - हम दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं. जिसने भी पढ़ा और सुना वो आपके प्रति अच्छी धारणा तो नहीं ही बनाएगा. वह बात और है कि हम अपने को बहुत दबंग या मुंहफट साबित कर रहे हों लेकिन ये सम्मानीय व्यक्तित्व को धूमिल कर देता है. हमारे पास इनके प्रयोग की सफाई भी होती है लेकिन कहीं हम अपना सम्मान खो चुके होते हैं. हमारी प्रबुद्धता कलंकित हो चुकी होती है. इसमें स्त्री या पुरुष का भेद नहीं है. जो बात गलत है वह सब पर लागू होती है. ऐसा नहीं है कि हम पुरुष है तो वह क्षम्य है और स्त्री हैं तो जघन्य अपराध. अपनी सोच और अभिव्यक्ति पर संयम ही आपको सम्मानित स्थान देता है और सम्मान किसी बाजार से खरीदा नहीं जाता बल्कि हमारे विचार और अभिव्यक्ति ही इसके लिए जिम्मेदार होते हैं. इस लिए भाषा का संयम सबसे पहल कदम है जो आपको प्रबुद्ध ही नहीं बल्कि एक जिम्मेदार और संस्कारित मानव की श्रेणी में रखता है.
मानव मनोभावों और इच्छाओं के बूते ही अपना सुखी जीवन और सुखी संसार बनाता है. हर कोई चाहता है कि अपनी इच्छाओं कि पूर्ति के लिए कठिन परिश्रम करे और उनका सुख उठाये. किन्तु ये इच्छाएं भी उसके जीवन में अलग अलग प्रयोजनार्थ होती हैं, यदि ये सिर्फ स्वहित से जुड़ी हैं तो उनका मंतव्य कुछ और ही होगा और अगर ये परहित से जुड़ी हैं तो उनकी प्राप्ति के साधन का स्वरूप कुछ और ही होगा. जूनून दोनों में ही होता है लेकिन उसके लिए प्रयास विभिन्न प्रकार के होते हैं.
आज के इस आधुनिकता और स्पर्धा के दौर में जीवन सिर्फ भौतिकताओं में सिमट कर रह गया है और उन्हीं के कारण ये अपने साधनों को चुनने लगे हैं. इससे जुड़ी अदम्य इच्छाएं ही व्यक्ति को ले जाती हैं अपराध की ओर. अगर वह परहित से जुड़ा है तो अपने सीमित साधनों से उसको हासिल करने की चेष्टा करता है किन्तु यदि ये स्वहित से जुड़ी हैं तो निश्चय ही वह उसके लिए कुछ भी करने को तैयार होता है और फिर ये अदम्य इच्छाएं उनके लिए अपराध की सीढ़ी बन जाती हैं और अपराध के दलदल में फंसा इंसां और गहरे में चला जाता है.
अपने क्षेत्र में सर्वोपरि बने रहने की अदम्य इच्छा ने व्यक्ति को इतना नीचे गिरा दिया कि वह हत्या करवाने जैसा जघन्य अपराध तक कर बैठता है. एक कोचिंग संचालक ने अपने प्रतिद्वद्वी को पहले अपहरण कर और उसके बाद हत्या कर ऐसे स्थान पर फिंकवाया की उसके मिलने की कोई गुंजाईश ही न थी और फिर मिल भी जाये तो शिनाख्त का कोई प्रश्न नहीं उठता किन्तु शायद उन बूढ़े माँ बाप के कुछ पुण्य शेष रहे होंगे तो उन्हें अपने बेटे की लाश मिल गयी किन्तु उनका तो जीवन ही समाप्त हो गया. जिस दिन अपहरण की सूचना मिली तो वे महोदय अपने क्लास में कह रहे थे कि आज तो मिठाई बांटने का दिन है. हो सकता है कि वे इसमें लिप्त न हों लेकिन अपरोक्ष रूप से वे ही माने गए. साक्ष्य न मिले और मामला खत्म हो गया किन्तु????????????
भौतिक सुखों की अदम्य इच्छाएं तो उससे कुछ भी करवा सकती हैं क्योंकि ये ही उसके जीवन का साध्य बन जाती हैं. इसके लिए वह प्रत्यक्ष रूप से नहीं परोक्ष रूप से चोरी करेगा. दूसरों को धोखा देगा और अपने घर वालों से भी झूठ बोलेगा. उनकी आपाधापी में न घर को समय है और न परिवार को. अनैतिक काम भी करेगा . यह वह किसके लिए करता है? करोड़ों का बैंक बैलेंस होगा लेकिन क्या वह रख पायेगा बैंक में. नहीं. बाहर रखेगा और घर की तिजोरी में रखेगा. असीमित धन होने पर भी क्या वह सोने के सिक्के चबायेगा. खाना वह वही खायेगा क्योंकि इस कार्य में उसका स्वास्थ्य उसको बहुत कुछ खा पाने की पाबन्दी लगा चुका होगा. सोयेगा वह बिस्तर पर ही वह बात और है कि मखमली बिस्तर पर सोये और ज़री के चादर बिछा ले लेकिन क्या नीद उसको चैन की आएगी? गाड़ियाँ वह १० रख सकता है लेकिन चल सिर्फ एक में ही पायेगा. करोड़ों रुपये का मालिक क्या आसमान में पैर रख कर चलेगा, चलना उसे जमीं पर ही पड़ेगा और जब फिर जब जाएगा तो खाली हाथ. उसके साथ कुछ भी नहीं जायेगा. बस उसकी अदम्य इच्छाओं ने उसको गुनाहगार बना दिया.
प्रभाव और स्वामित्व की अदम्य इच्छाएं भी व्यक्ति को किसी और अपराध की ओर ले जाती हैं. राजनीति इसका सबसे पहला पाठ पढ़ती है. अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए वह कितने अपराध करता और करवाता है. चुनाव शुरू नहीं हुए और हत्याओं का दौर शुरू हो गया. अपने प्रभाव को मनवाने का सबसे सफल तरीका है. अपने प्रभाव को कायम रखने के लिए वह अपराधी भी पालता है जो उसके स्थान पर हत्या और अपहरण जैसे छोटे मोटे काम कर सकें. माफिया क्या होते हैं? इन्हीं अदम्य इच्छाओं के स्वामी होते हैं. बस्तियां जलवा दी और बन गया काम्प्लेक्स उसकी कमाई पाप की है लेकिन उनके नाम से लोग थर्राते हैं. किसी को उठवा लेना, किसी को टपका देना और किसी से खोके की मांग ही उनको अपराध जगत में स्थापित करती है. ये भी उनकी अदम्य इच्छा है लेकिन बस सिर्फ यही इच्छा पूरी होती है . शेष घर और परिवार के लिए वे दुर्लभ होते हैं. एक आम इंसां की जिन्दगी क्या होती है? इससे वे अनभिज्ञ होते हैं.
इसका सबसे घिनौना रूप होता है - जब इंसां सेक्स की अदम्य इच्छा का शिकार होता है. इसका कोई अंत नहीं होता है और वह इसके लिए उम्र , जाति और नैतिक और अनैतिक तरीके से भी नहीं डरता है. ये छोटी छोटी लड़कियों के साथ होने वाले कृत्य , गरीब या सुन्दर लड़कियाँ जिन पर ऐसे लोगों की नजर पड़ी फिर वे इसके लिए कुछ भी करेंगे. उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो चुकी होती है कि उनको कुछ भी नहीं दिखाई देता है. ये अपराध तो उन्हें सबसे नीचे गिरा देता है. हो सकता है कि वे प्रभाव से बच जाते हों और इसका शिकार किसी और को बना देते हो लेकिन न्याय तो कभी न कभी होता ही है और फिर ऐसे लोग न घर के होते हैं और न घाट के. ऐसे कार्य के लिए बड़े बड़े अफसर , डॉक्टर , इंजीनियर से लेकर छोटे तबके लोगों तक के चेहरे काले हुए हैं.
ऐसा नहीं है, ये अदम्य इच्छाएं यदि परहित के लिए होती हैं तो वे उसको बहुत बड़ा स्टेटस नहीं दे जाती लेकिन उस इंसां के चेहरे के ख़ुशी और मन के सुकून को कोई पा नहीं सकता है. ऐसे ही एक सज्जन हैं जिनको जूनून है कि वे लावारिश लाशों का अंतिम संस्कार ले जाकर करते हैं और वर्षों से इस काम में जुटे हैं. उनसे मिलकर लगता है कि क्या ये भी कोई कर सकता है लेकिन उनका जूनून है.
मदर टेरेसा जैसी महान आत्मा को क्या दीन- दुखियों की सेवा कि अदम्य इच्छा ने ही यहाँ भारत में लाकर नहीं रखा और उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर सबकी माँ नहीं बना दिया. बस इसके रूप और उद्देश्य अलग अलग होते हैं.
अवसाद (Depression ) , कुण्ठा (Frustration ), और तनाव (Tension ) : जीवन के खतरनाक मोड़ होते है , इन मोड़ों पर कभी कभी ये भी देखने को मिलता है --
*सैनिक ने आत्मा हत्या कर ली
*साथियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाईं और खुद को गोली मार ली.
*अफसरों के व्यवहार से क्षुब्ध होकर आत्महत्या.
*पत्नी के झगड़कर मायके जाने या वापास न आने पर फाँसी लगा ली.
*परीक्षा में फेल होने के डर से परिणाम से पहले आत्महत्या.
जीवन एक सुगम, सरल रास्ता नहीं है , इस पर चलने वाले कितने मानसिक व्याधियों से गुजरते हैं - कभी काबू पा लेते हैं और कभी हार जाते हैं . इन मानसिक स्थितियों का धन - दौलत और ऐश्वर्य से कुछ भी लेना देना नहीं है.
बहिर्मुखी व्यक्तित्व के लोग अपने इस हाल में घर वाले , मित्र आदि को अपना हमराज बना लेते हैं और ये सामने वाले की समझदारी होती है कि वे उसको इससे उबारने में कैसे सहायता करते हैं? अक्सर उबर भी जाते हैं.
इसके विपरीत एक पक्ष अंतर्मुखी लोगों का होता है , ये इन स्थितियों में अधिक खतरनाक निर्णय ले बैठते हैं. ये सिर्फ अपने में जीते हैं, उनकी मानसिक स्थिति सिर्फ उनकी संपत्ति है और इससे वे ही निपट सकते हैं ऐसी सोच उनको और सीमित कर देती है. ऐसे लोगों का व्यवहार , बातचीत और दायरा एकदम अलग होता है.
जीवन के खतरनाक मोड़ कुछ लोगों को मौत के द्वार तक ले जाते हैं . इसका स्वरूप आत्महत्या, दूसरों की हत्या कर आत्महत्या या अंधाधुंध शराब पीकर वाहन चलाना दूसरों को क्षति पहुँचाना या खुद को ही पहुँचाना. इस स्थिति में सड़क पर चलते हुए या कहीं भी जाते हुए आगे पीछे के होर्न या अन्य संकेतक कुछ भी नहीं समझ आते हैं और फिर दुर्घटना.
इन स्थितियों से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए लेकिन मनोवेगों पर भी व्यक्ति का पूर्ण नियंत्रण नहीं होता है. यदि स्वविवेक से कार्य किया जा सके तो अच्छा है अन्यथा मनोचिकित्सक के पास जाकर इसके लिए रास्ते मिल सकते हैं. कोई भी अनियंत्रित स्थिति पागलपन की हद तक जा सकती है. इससे पूर्व कि स्थिति पागलपन या जीवन की समाप्ति के निर्णय तक पहुँच जाये , घर वालों को सतर्क होना चाहिए. अंतर्मुखी व्यक्ति को हमेशा इस बात के लिए उत्साहित करना चाहिए कि वह डायरी लिखने की आदत डाल ले और भी तरीके से वह अपनी आतंरिक मनोभावों को अभिव्यक्त कर सकता है. कविता कहानी के रूप में या फिर चाहे वह उसको लिख कर फाड़ ही दे लेकिन ये निश्चित है कि वह कुछ हद तक अपनी मानसिक स्थिति से मुक्ति नहीं तो उससे उत्पन्न गलत विचारों से निज़ात अवश्य ही पा सकता है. दिमाग में उमड़ते घुमड़ते तनाव, कुंठा या अवसाद जब शब्दों में लिख कर निकल जाते हैं तो इंसां बहुत हल्का हो जाता है और वे रास्ते जो उसको सिर्फ और सिर्फ स्वयं को क्षति पहुँचने के लिए खुले मिलते हैं , वे बंद हो जाते हैं.
एक जागरुक मानव होने के नाते इस पर एक बार विचार कीजिये और कोशिश कीजिये कि ऐसे कुछ लोग अगर आपके संपर्क में हों तो उन्हें एक नई दिशा दीजिये. सिर्फ और सिर्फ लेखन कितने को बचा सकता है. चलिए इस दिशा में प्रयास करें.