शुक्रवार, 19 मार्च 2010



इस विषय की  सार्थकता  क्या है? इस प्रश्न का सामना करने के लिए मैं पूरी तरह से तैयार हूँ.
अभिभावक  इस देश के भविष्य को दिशा निर्देश देने वाले हैं और कई ऐसे निर्णय होते हैं कि उसमें उनकी भूमिका बहुत ही जरूरी होती है. मेरी मुलाकात अपनी बेटी की सहेली से होती है, उसकी शादी एक दक्षिण भारतीय परिवार में हुई. वह दोनों तो अंग्रेजी में बात कर लेते हैं लेकिन उसके सास ससुर तो तमिल ही जानते हैं लेकिन चूँकि तमिल संस्कृत के बहुत ही करीब है इस लिए वह समझ लेती है. और तमिल भी धीरे धीरे सीख रही है.
उसकी एक बेटी है, एकदम छोटी मात्र ३ महीने की. अब उसके पति चाहते हैं कि वह पहला शब्द जो बोले वह तमिल में हो, शची अपनी बेटी से हिंदी में ही बतियाती है और पिता तमिल में. कोई विरोधाभास नहीं है, फिर भी दिल से वह भी चाहती है कि उसकी बेटी तमिल में ही पहला शब्द बोले. वह बाबा और दादी जैसे शब्द तमिल में उसके सामने बोलती है, जिससे कि वह जब भी बोले ऐसे ही बोले. लेकिन वह हिंदी तो उसको अच्छे से सिखाना चाहती है.
ये प्रश्न शची का नहीं है, ये प्रश्न अपनी राष्ट्र भाषा का भी है और अपनी पहचान का भी. आज कल बच्चों को पब्लिक स्कूल में पढ़ाने को प्राथमिकता प्रदान की जाती है. माता और पिता भी बड़े गर्व के साथ बताते हैं कि उस स्कूल में डाला है, फीस जरूर ज्यादा है लेकिन इंग्लिश बढ़िया बोल लेता है. हिंदी विषय में कुछ कमजोर है.
कई मांएं भी ये बात बड़े गर्व के साथ बताती हैं कि हिंदी में अच्छे से नहीं बोल पता क्योंकि अंग्रेजी स्कूल में पढ़ रहा है न. बच्चों के भविष्य के लिए उच्च शिक्षा और सही शिक्षा दिलाना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन उसको अपने राष्ट्र की पहचान देने वाली भाषा का ज्ञान तो होना ही चाहिए. कभी कभी तो ये ज्ञान होते हुए भी कुछ लोग हिंदी का स्वरूप विकृत बना कर बोलते हैं.
  • हमको हिंदी नहीं आता है.
  • हमने वहाँ जाना है.
  • वहाँ का सड़क बहुत टूटा है.
  • यहाँ सूरज बहुत देर से निकलती है.
भाषा का ज्ञान तो कम से कम हिंदी भाषी को होना ही चाहिए. व्याकरण का ज्ञाता न ही हो फिर भी प्राथमिक व्याकरण भी आना आवश्यक है.
इसमें माँ कि भूमिका सबसे अहम् होती है. अगर बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है तो आप घर में उससे हिंदी में बात कीजिये और उसकी गलतियों को सुधारिए. उसको अपनी जमीन से जुड़े रहने दीजिये. ये बहुत आम बात है कि हम टीवी पर अंग्रेजी सिखाने वाली बहुत किताबों ऑडियो विडियो के विज्ञापन देखा करते हैं और शहर में भी इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स के बड़े बड़े बैनर लगे देखते हैं. अपने बच्चों को भेजते भी हैं. लेकिन कभी हमने हिंदी स्पीकिंग कोर्स का कोई भी विज्ञापन देखा है? या फिर कभी सोचा है कि अगर हमारा बच्चा स्कूल के वातावरण में अच्छी हिंदी नहीं सीख रहा है तो उसको हम घर में नहीं तो किसी कोचिंग में ऐसा करवा सकते हैं. नहीं ऐसा तो सोचा ही नहीं जा सकता है क्योंकि हिंदी तो बोलने वाले बड़ी ही हेय दृष्टि से देखे जाते हैं. अंग्रेजी बोलने वालों का तो स्तर ही अलग होता है.
कितने हमारे ब्लॉग से जुड़े जन ऐसे ही हैं, हम हिंदी कि उन्नति और समृद्धि की बात करते हैं और अपने बच्चों से ये उम्मीद करते हैं कि वे इंग्लिश ही बोलें. ये दोहरे प्रतिमानों के क्या अर्थ हो सकते हैं? जिस भाषा पर हमारा अधिकार है, वह भाषा हमारे परिवार में फलनी फूलनी चाहिए. मैं ये नहीं कहती कि आप दूसरी भाषा पर अधिकार नहीं रख सकते हैं. पर अपनी भाषा को भूलिए नहीं. ऐसी भाषा तो आनी ही चाहिए कि हम गर्व से कह सकें कि हम हिन्दीभाषी है और हमारा उस पर पूरा अधिकार है. यही बात अपने परिवेश से जुड़ी होती है.
इस सिलसिले में एक पुरानी बात याद आ रही है, १९९४ के समय में एक इंजीनियर IIT में Ph D करने के लिए कर्नाटक से आया था . उसको हिंदी बिलकुल भी नहीं आती थी, हमारे सहयोग से ही उसका काम होना था. जब तक उसने अपना काम पूरा किया वह बहुत अच्छी हिंदी बोलने लगा था क्योंकि हम उससे इंग्लिश के माध्यम से बात करते और कहते कि हिंदी भी सीख लो. हमने तो कन्नड़ नहीं सीखी लेकिन उसको हिंदी जरूर सिखा दी. फिर हम ये काम अपने घर में तो आसानी से कर सकते हैं. ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती लेकिन आत्मज्ञान यानि कि अपनी भाषा और संस्कृति के बिना इनसान कि पहचान अधूरी होती है. जो एक माँ और बहन सिखा सकती है वह पिता और भाई नहीं सिखा सकते हैं. अपनी भाषा से सबका अच्छा परिचय हो इस कामना के साथ हिंदी को प्रणाम करती हूँ.

9 टिप्‍पणियां:

रचना ने कहा…

किसी को भी जबरदस्ती कुछ भी सिखाना गलत हैं । अपने घर मे हम जो नियम बनाना चाहे वो ठीक हैं पर सामाजिक रूप से अगर हम इसको किसी नहीं थोप सकते । कल राज ठाकरे ने कहा हैं कि बैंक के काम मराठी मे हो , अब इस प्रकार से हम एक उलझाव ही पैदा करेगे । राष्ट्र भाषा हैं हिंदी ये ठीक हैं पर उसको हम और भाषाओं से उप्पर नहीं रख सकते हैं हमे हर भाषा को समान अधिकार देना चाहिये और जो भी भाषा हमे रोजी रोटी दिलवाने मे सहायक हो उसका प्रचार प्रसार भी बहुत जरुरी हैं । आलेख बहुत साधा हुआ हैं हैं पढ़ कर अच्छा लगा मेरा कमेन्ट मेरी सोच मात्र हैं आप के आलेख पर टिप्पणी नहीं

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बहुत महत्त्वपूर्ण आलेख!
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संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ"
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संपादक : सरस पायस

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

रचना,
हम हिंदी भाषा को इसलिए बढ़ावा नहीं दे रहे हैं कि ये उत्तर भारत की भाषा है बल्कि इसलिए कि ये हमारी पहचान है. और इसकी अनिवार्यता से इनकार नहीं कर सकते हैं. हिंदी के साथ और भाषायों की अवमानना नहीं कर रहे हैं. लेकिन जो राष्ट्र के रूप में हमारी पहचान है वह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा. भारत में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या भी अधिक है. मैं उपभाषा (Dialect )की बात नहीं कर रही हूँ . फिर अपना अपना विचार है , सहमति या असहमति तो सभी का अधिकार है.

shikha varshney ने कहा…

रेखा जी बहुत सुन्दर आलेख है और में आपकी बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ ..यह माता -पिता कि ही जिम्मेदारी है कि वह बच्चे को कम से कम अपनी पहचान तो दें और बिन निज भाषा ज्ञान के सब व्यर्थ ..यह सही है कि आज के युग में अंग्रेजी ज्ञान एक जरुरत बन गया है परन्तु उसके आगे हिंदी को हीन समझना हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य है...आज शायद भारत से ज्यादा भारत के बाहर लोग हिंदी को मान देते हैं ..मेरे बच्चे जो पैदाइश से ही यहाँ है उन्हें मैने हिंदी सिखाई है और आज मैं गर्व से कहती हूँ कि वे हिंदी बोलते ही नई बल्कि लिख- पढ़ भी लेते हैं..और भारत जाने पर दादी नानी से आराम से बात कर पाते हैं..और यही नहीं यहाँ कुछ संस्थाए हिंदी की क्लासेस भी चलती हैं जहाँ लोग अपने बच्चों को हिंदी सीखने के लिए भेजते हैं...

संगीता पुरी ने कहा…

आपने बहुत ही संतुलित आलेख लिखा है .. हिंदी का मान बढना ही चाहिए .. पर इसे विदेशी जितना महत्‍व देते हैं .. उतना हम ही नहीं देते .. यह दुर्भाग्‍य नहीं तो और क्‍या है ??

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया आलेख. विचारणीय.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

शिखाजी,
अपने बिलकुल सही कहा, ये हमारी जिम्मेदारी है की हम बच्चों को क्या सिखाते है? वहाँ हिंदी क्लास्सेस चलती है , वो हम ही चलते हैं न, फिर अपने ही देश में क्यों नहीं? मैंने कहीं नहीं सुना की तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक , आन्ध्र प्रदेश में कहीं भी हिंदी की क्लास्सेस चल रही हों और फिर उनको इस काम के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा हो. हमारी पहचान अपने ही देश से है और इस पर हमें फख्र भी है. मेधा औरलगन में भारतीय लोगों की बराबरी कोई नहीं कर सकता है.

rashmi ravija ने कहा…

बहुत ही सधा हुआ आलेख है रेखा दी, हिंदी की उपयोगिता से कोई इनकार नहीं कर सकता. हमारे देश के ही नौनिहाल अंग्रेजी अगर गलत बोल जाएँ तो शर्म से सर झुका लेते हैं, पर हिंदी गलत बोलने पर गर्व करते हैं..'अरे ये हिंदी हमें नहीं आती'. सिर्फ दक्षिण के अंदरूनी शहरों को छोड़ दें तो भारत में कोई ऐसी जगह नहीं ,जहां की संपर्क भाषा हिंदी ना हो. और जब हिंदी बोलना ही है तो शुद्ध रूप में क्यूँ ना बोलें. और बोलने की कोशिश तो की ही जा सकती है.
हिंदी स्पीकिंग कोर्स की बात भी आपने अच्छी उठायी.मेरी एक क्रिश्चियन सहेली है. जो मूल रूप से चेन्नई की है.वह तमिल और अंग्रेजी तो अच्छी बोल लेती है. पर हिंदी बोलने में उसे उतना आत्मविश्वास नहीं है. वह किसी ऐसे कोर्स की तलाश में है. बाकी सहेलियां मेरी तरफ इशारा कर देती हैं.पर कहती है कोर्स के द्वारा अच्छी तरह सीख पाऊँगी.
हिंदी किसी पर थोपने की बात नहीं है, हमें झूठी शान छोड़ खुद आगे बढ़कर उसे गले लगाना चाहिए और बच्चों को भी शुद्ध हिंदी बोलने के लिए प्रेरित करना चाहिए.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

gambheer aalekh hai.....aur sabkuch spasht hai