मंगलवार, 8 जून 2010

भटकती युवा पीढ़ी : निदान क्या हो?

                                            
  अभी दो दिन पहले कि बात है, एक बारात आई  और किसी का घर बसा लेकिन किसी कि दुनियाँ उजाड़ गयी. बारात में आये हुए लड़कों ने पास के घर में छत  पर  सोयी अकेली दो लड़कियों में से एक के साथ बलात्कार किया और उसको मार दिया. उसकी गूंगी बहरी  बहन ही उसके साथ थी. शादी के शोर में उसने बहुत चीखने की  कोशिश की लेकिन विवश थी. अपने सामने सब देखा और फिर बयान नहीं कर सकी. जब घर वाले वापस आये तो देखा और पुलिस को सूचना दी. शादी के विडियो से उस गूंगी लड़की ने इस अपराध में लिप्त लड़कों को पहचाना.


                               ये कोई खास घटना नहीं है, ऐसी घटनाएँ अखबार के पेज पर रोज दो चार होती ही हैं लेकिन अगर इसको देखा जाय तो ये हमारी भटकती हुई युवा पीढ़ी कि एक बानगी है.
                                उस लड़की से कोई लेना देना नहीं था. गेस्ट हाउस के बगल में उसका घर था. न वे लड़की को जानते थे और न कोई दुश्मनी ही थी. फिर ऐसा क्यों हुआ? क्या सिर्फ क्षणिक आवेग था? अगर हाँ तो इसके लिए दोषी कौन है? अगर आवेग इतना तीव्र हो कि हत्या तक करवा देता है तो वह आवेग एक मानसिक बीमारी बन चुका है. हम कहते हैं कि युवा पीढ़ी भटक रही है, लेकिन क्यों भटक रही है और इसके लिए समाज की क्या सहभागिता होनी चाहिए इस पर हम कम ही विचार कर पाते हैं. हम ये कह कर छुट्टी पा लेते हैं पता नहीं माँ बाप ने कैसे संस्कार दिए हैं? अगर माँ बाप स्वयं इस प्रवृत्ति के नहीं हैं तो कोई भी माँ बाप अपने बेटे या बेटी को इस तरह के कार्यों में लिप्त नहीं देखना चाहता है. फिर ये इस दिशा में कैसे भटक जाते हैं? छेड़छाड़ तो आम बात है.
                              अगर हम इसके कारणों पर विचार करें तो क्या हमें को यहाँ नहीं लगता है कि इन अपराधी प्रवृत्तियों का बीज कहीं घर के किसी कोने में ही प्रस्फुटित होता है, हम जान नहीं पाते कि हमारा ही व्यवहार बच्चे को कहाँ ले जा रहा है? इन  बीजों की  प्रजातियाँ और पर्यावरण अलग अलग होते हैं और उसी तरह के अपराध पलते हैं. बच्चों कि सबसे नाजुक उम्र होती है १२ से १७ साल के बीच की. इस दौरान उनके मन में बहुत सारे प्रश्न उठते हैं और उन्हें इनके उत्तरों की खोज होती है . वे सबसे पहले उनका उत्तर आने घर में खोजते हैं और अगर समझदार माँ बाप हुए तो उनके प्रश्नों का उत्तर बहुत धैर्य से देते हैं और नहीं तो आम माँ बाप  -
-तुमको इन सबसे क्या मतलब,
-अपने काम से काम रखो,
-आइन्दा ऐसी बातों को जानने कि कोशिश मत करना,
-इन बातों के लिए तुम बहुत छोटे हो,
                  इसके बाद कर्तव्यों कि इतिश्री समझ कर वे अपने अपने कार्यों में लिप्त हो जाते हैं लेकिन बच्चे का  किशोर मन इन बातों के उत्तर खोजता है. नहीं मिलता है तो अपने साथियों से जानने कि कोशिश करता है और कभी कभी उनके अनुसार ही आचरण भी करने लगता है.
                    इस बात की माँ बाप को खबर भी नहीं होती कि वो कहाँ रहता है? उसके साथी कौन है? उसकी गतिविधियाँ क्या हैं?  जब किशोर उम्र के बच्चे इस तरह के काण्ड अंजाम देने लगते हैं तो कटघरे में कड़े माँ बाप और परिवार वाले खुद से ही प्रश्न करते हैं कि गलती कहाँ हुई? वे खुद का आकलन नहीं कर पाते हैं. अपनी ओर से बहुत अच्छी परवरिश की. अच्छी से अच्छी सुविधाएँ दी फिर भी?
                   इस जगह मैं कुछ अपने विचारों के अनुसार आपको कुछ बताना चाहूंगी कि माँ बाप कितने भी व्यस्त हो, अगर उन्हें अपने बच्चे के लिए एक अच्छा भविष्य का सपना देखना है तो  उसको उपेक्षित मत कीजिये. जैसे और काम होते हैं वैसे ही कुछ समय बच्चों के लिए भी दीजिये. उनपर अपनी इच्छाएं  लादिये  मत , उनके मन की भी सुनिए और फिर उस पर विचार करके ही निर्णय लीजिये.  अगर उसकी सोच गलत है तो उस कोमल मन को बड़े धैर्य से अपनी सही बात के लिए तैयार कीजिये.
बच्चे की  टीचर से बराबर मिलते रहिये.
उसके मित्र वर्ग कि भी खबर रखिये - ये सबसे अहम् मुद्दा होता है कि कई जगह पर चालाक लड़के सीधे बच्चे को बरगला कर गलत रास्ते पर ले जाते हैं और उसके पैसे से अपने शौक भी पूरे करते हैं और अगर बहुत अमीर घर के बच्चे हुए तो आपका बच्चा उनके सामने खुद को हीन न दिखने के लिए गलत रास्ते अपना सकता है. इस लिए मित्र वर्ग की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है. उसके दायरे को हमेशा अपने नजर के सामने रखिये.
बच्चे के किशोर होने पर कभी उनको बाइक उपहार में मत दीजिये. युवा मन की दौड़ बहुत तेज होती है और बाइक उसको और गति देती है. ये उनके पढ़ने लिखने कि उम्र होती है और इसके लिए अन्य साधनों को उपलब्ध करिए. सुविधाएँ दीजिये लेकिन उसकी सीमाओं को भी निश्चित कीजिये. कंप्यूटर लाइए लेकिन उसके लिए अन्य सुविधाएँ अपने सामने प्रयोग करने दीजिये. बस उनकी गतिविधियों पर एक नजर रखी जानी चाहिए. उनकी रुचियों के अनुरुप उनको साहित्य और अन्य साधन उपलब्ध करिए.
                            ये बातें लड़कियों और लड़कों दोनों पर ही लागू होती हैं. उनके भविष्य के प्रति आप ९० प्रति शत जिम्मेदार होते हैं, इनसे बचा नहीं जा सकता है. पैसे कमाइए लेकिन बच्चों कि कीमत पर कमाया हुआ आपका पैसा आपको खुद आपकी  नजर में अपराधी बना कर कटघरे में खड़ा कर सकता है. इस विषय पर मनोविश्लेषकों के बहुत महत्वपूर्ण साबित होती है . इससे अतिरिक्त आप सभी के सुझाव भी आमंत्रित है कि  क्या और किया जाय जो इन गतिविधियों में लिप्त होने वाली युवा पीढ़ी की गति को विराम दिया जा सके.

3 टिप्‍पणियां:

shikha varshney ने कहा…

एक एक शब्द ठीक कहा है आपने ..कोई माता पिता नहीं चाहते कि उनका बच्चा अपराधी बने ..परन्तु अनजाने ही कहीं किसी कोने का कोई वाकया या माहोल कच्चे मन पर क्या असर डालेगा ये सोचना बहुत जरुरी है.

rashmi ravija ने कहा…

यह तो एक लोमहर्षक घटना थी...रोंगटे खड़े हो गए और मन वितृष्णा से भर उठा....आपने सभी कारणों पर बहुत अच्छी तरह प्रकाश डाला है कि क्यूँ युवा पीढ़ी,दिग्भ्रमित हो रही है...सबको गंभीरता से इस पर विचार करना चाहिए...और सही निदान करने चाहियें..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत अच्छे से लिखी है सारी बात...प्रेरणा दायक...पर जिस घटना का ज़िक्र किया...वो दिल दहला देने वाली थी