बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

चार काँधे!

                                     मैंने अपने जीवन में आदमी के बहुत सारे रूप देखे हैं. हर स्तर पर रिश्तों में, मित्रता में, कार्यक्षेत्र में  और परिवार में भी. हर इंसान की अपनी अलग सोच और अलग ही व्यवहार होता है. कुछ सोचते हैं कि हमें किसी से कोई काम नहीं पड़ने वाला है. मेरे पास इतना पैसा है, इतनी इज्जत है मैं किसी का मुहताज नहीं. ये जीवन में उसकी सबसे बड़ी भूल होती है.
जीवन एक स्थिति वह आती है जब इंसान को सिर्फ इंसान के चार कंधों की जरूरत ही होती है. कोई पैसा कोई इज्जत उसके पार्थिव को उठा कर नहीं रख सकता है.
                                      मैंने बचपन में अपनी दादी से एक कहानी  सुनी थी. एक सरपंच अपने गाँव में बहुत ही पैसे वाला और रुतबे वाला था. उसको किसी से क्या जरूरत ? लेकिन गाँव का सरपंच था तो किसी के यहाँ भी कोई अच्छा या बुरा मौका होता सरपंच के घर सूचना जरूर आती और सरपंच अपने घमंड में उसके घर अपने नौकरों से अपने जूते  भेज देते. ये क्रम तब तक चलता रहा जब तक वह इस स्थति से न गुजरे . सरपंच के घर में उनकी माँ  का निधन हुआ तो पूरे गाँव में डुगडुगी  पिटवा दी गयी कि सरपंच जी कि माँ का स्वर्गवास हो गया है तो सबको उनके यहाँ पहुँचना है. गाँव वाले उनके व्यवहार से पहले से ही क्षुब्ध थे. उन लोगों ने एक आदमी को पूरा गाँव वालों के जूते  लेकर सरपंच के घर भेज दिया. अब सरपंच की माँ को कन्धा देने के लिए चार लोग भी नहीं थे. अपने ही नौकरों की सहायता से उन्होंने अपनी माँ के पार्थिव शरीर को श्मशान पहुँचाया और अपनी गलती के लिए सभी से क्षमा मांगी ताकि खुद उनकी अंतिम क्रिया में कुछ लोग तो हों.
                                     उस समय. हम लोग समझते थे कि ये दादी ऐसी ही कहानी बना कर सुना देती हैं कहीं ऐसा होता है
लेकिन हाँ ऐसा होता है -- आज भी लोग इस कदर मानवता और आत्मीयता से दूर हैं कि चार काँधे के मुहताज हैं.
                                      मेरे एक परिचित या कहूं कि वे मेरे बॉस है. बहुत ही सीमित रहने वाले. उनका अपने विभाग से भी अन्य लोगों से कम ही मिलना जुलना. किसी के यहाँ शादी ब्याह में आना जाना भी कम. हाँ वे अपने काम के प्रति पूर्णतया समर्पित बल्कि मैं कहूँगी कि ऐसा समर्पण अपने जीवन में मैंने नहीं देखा है. जो इंसान साठ साल से ऊपर होकर और किसी घातक बीमारी से ग्रसित हो  और आज भी १८ -२० घंटे कार्य करने कि क्षमता रखता हो तो हम उसके सामने ये नहीं कह सकते कि अब बस. जब भी बाहर मीटिंग होती है तो हमारी मीटिंग १२ घंटे से कम नहीं होती है. वही ब्रेकफास्ट , वही लंच और वही से डिनर  लेकर आप वापस आते हैं. मैं उनके इस समर्पण को सलाम करती हूँ. लेकिन एक इंसान के रूप में शायद वह विफल रहे. अपने परिवार को भी समय देने में वे नगण्य हैं.

                          पिछले दिनों ऑफिस से आने के बाद मुझे फ़ोन मिला कि सर के पिताजी का निधन हो गया. वे उस समय यहीं पर थे. शाम ७ बजे निधन हुआ था. उन्होंने अपने बहनों और भाइयों को खबर की रात में घर में वे , उनकी पत्नी, एक घरेलु नौकर और उसकी पत्नी थी. उनके आस पास वालों तक को खबर न दी. इतना जरूर की आई आई टी में विभाग से मेल भेज दी गयी कि ऐसा हुआ है और उनको १२ बजे भैरों घाट के लिए बस प्रस्थान करेगी. सुबह मैं अपने पतिदेव के साथ उनके घर पहुंचे तो तब तक उनके पास वाले भाई आ चुके थे और बाकी का इन्तजार कर रहे थे. पता चला कि अभी देर है. मेरे पतिदेव तो वापस हो लिए और मैं रुक गयी. वहाँ पर मेरे साथ  कम करने वाले लोग, विभाग के ऑफिस से कुछ लोग भर थे. भैरों घाट जाने के लिए एक गाड़ी शव को ले जाने के लिए और एक बड़ी बस लोगों के लिए भेजी गयी थी. 
                         शव को कन्धा देने के लिए चार मजबूत कंधे न थे क्योंकि ३ बेटे उनके ६० से ऊपर थे और एक पोता था. देने को उनके बेटों ने कन्धा तो दिया लेकिन उठाने में समर्थ न थे सो जो वहाँ लोग उपस्थित थे उन लोगों ने कन्धा देकर शव को गाड़ी में रखा. पूरे विभाग से एक भो प्रो. न था. उनके कोई पड़ोसी न थे. जब बस आकर खड़े हो गयी तो पड़ोसियों  के कान  खड़े हुए कि क्या बात है? सारी महिलाएं बाहर आ गयी . वे आपस में बातें करने लगी कि हम को तो पता ही नहीं लगा. अरे हम इतने पास हैं. उनकी बड़ी बस पूरी खाली थी उसमें सिर्फ उनके चार के घर वाले और ३-४ लोग कुल ऑफिस और प्रोजेक्ट के साथ गए थे. तब लगा कि आदमी का पैसे का या अपने ज्ञान का या अपनी पद का अहंकार उसे इस स्थान पर कितना नीचा दिखा देता है कि चार मजबूत कंधे न जुटा सके कि शव को कम से कम चौराहे तक तो कंधे तक ले जाया जा सकता. 
                          जीवन में एक यही स्थिति ऐसी होती है , जहाँ इंसान को इंसान की जरूरत होती है. इस जगह न अहंकार रहता है और न पद का रुतबा और न ही दौलत का घमंड. इस लिए अगर मानव बन कर आये हैं तो हमें मानव ही बने रहना चाहिए. उससे ऊपर उठ कर आप कुछ नहीं बन सकते हैं.

11 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

जीवन में एक यही स्थिति ऐसी होती है , जहाँ इंसान को इंसान की जरूरत होती है. इस जगह न अहंकार रहता है और न पद का रुतबा और न ही दौलत का घमंड. इस लिए अगर मानव बन कर आये हैं तो हमें मानव ही बने रहना चाहिए. उससे ऊपर उठ कर आप कुछ नहीं बन सकते हैं. -- जीवन की सच्चाई है इन शब्दों मेीआदमी को ये याद रखना चाहिये कि जब मुसीबत आती है तो हमे उसका भी मुंह देखना पडता है जिसके कभी पैर नही देखे इस लिये समाज मे सब से मिल जुल कर रहना ही हितकर है। अच्छा लगा आलेख। धन्यवाद।

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप की बात से सहमत हे , जब हम ने इस समाज मै रहना हे तो समाज के प्रति हमारा भी कुछ दातियव हे, ओर यही सच्चाई हे, जिसे भुलना नही चाहिये,
धन्यवाद इस सुंदर शिक्षा भरी कविता से

ajit gupta ने कहा…

ऐसे उदाहरण रोज ही जीवन में आते हैं लेकिन फिर भी इंसान समझने को तैयार नहीं है। दुनिया विचित्रताओं से भरी है, क्‍या कीजिएगा।

Udan Tashtari ने कहा…

बिल्कुल सही कहा. अंत में व्यवहार ही काम आता है. रुपया, पैसा, रुतबा सब क्षणभंगुर है.

राजेश उत्‍साही ने कहा…

जीवन का शाश्‍वत सत्‍य यही है।

P.N. Subramanian ने कहा…

बिलकुल सही कह रहे हैं.

वन्दना ने कहा…

यही जीवन का अन्तिम सत्य है मगर इंसान अपने अहम के चलते इसकी अनदेखी करता है तो उसका फ़ल भी फ़ुगतता है……………सत्य का दर्शन करा दिया।

Shekhar Suman ने कहा…

यही जीवन का अंतिम सत्य है, जो है वो यहीं छूट जाना है..जो हमारे साथ जायेगा वो दिखता ही नहीं...

मेरे ब्लॉग पर इस बार

उदास हैं हम ....

rashmi ravija ने कहा…

तब तक ये लोग नहीं समझते जब तक खुद पर ना गुजरे या कई बार...इसके बावजूद भी उनकी आँखें नहीं खुलती और दोष दूसरों को देते हैं.
समाज में रहना है..तो सामाजिकता का निर्वाह,अवश्य होना चाहि

सतीश सक्सेना ने कहा…

आदमी को अक्सर अपना यह समय याद नहीं रहता ..

BrijmohanShrivastava ने कहा…

इसी लिये तो कहते है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सब से हिल मिल चालिये नदी नाव संजोग