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बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (10)

                                सपना तो  सपना होता   है , किसका सपना किस चीज से जुडा हो नहीं कह सकते हैं।  सपने अपने भविष्य से जुड़े  होते हैं,  कुछ बनने का सपना या कुछ पाने का सपना लेकिन एक ऐसा सपना जो अंजू  जी ने देखा , उसके बारे में सुनकर आत्मा सिसक पड़ी . ऐसा सपना जिसे न कोई बयां कर सकता है और न वह कोई और दे सकता है। अनजाने में तो हो सकता है या फिर उसके प्रति किसी को उस ललक का अहसास   हो  और वह उस प्यार में अपनेपन और पितृत्व के भाव को दे सके . अभी जीवन बहुत है कब कौन सी आत्मा तुम्हारे उस अहसास को समझ ले और बेटी पर अपने आशीष भरा हाथ सर पर रख दे। आज अपने सपने को बता रही हैं  -- अंजू चौधरी।

 

अधूरे सपने ...क्या लिखूँ कुछ समझ नहीं आ रहा ...जिंदगी में बहुत कुछ ऐसा रहता है जो अधूरा होता है ...ख्याबों के पीछे पीछे भागते भागते उम्र निकल जाती है पर अधूरा सपना फिर भी कभी पूरा नहीं होता ...उसकी कसक मन की भीतर कहीं बहुत गहरे दब कर दम थोड़ देती है ये सोचते हुए कि अब वक्त गया ...और कुछ ऐसा ही सपना मेरा भी है था और रहेगा ....ये सपना शायद  मेरी जिंदगी का सबसे अजीब सपना है ( कम से कम मुझे ऐसा लगता है ) या लोग सच कहने को डरते हैं  इस लिए कह नहीं पाते ...पर आज जब मन की और अधूरे सपने की बात आई है तो मैं बस इतना ही कहूँगी पापा के गुज़र जाने के बाद एक अधूरी इच्छा मन में कहीं छिपी रही और वक्त के साथ मैं तो बड़ी हो गई और उसके साथ साथ मेरा सपना भी साल दर साल बड़ा होने लगा ...कि शायदा कोई होगा  जो कभी ना कभी उनकी जगह लेगा .....वो भाई हो ....पति हो या फिर कोई ऐसा दोस्त जो मुझे किसी भी रूप में अपना सके | इस अधूरी इच्छा की सबसे बड़ी वजह मुझे ये लगती है कि किसी भी लड़की के पापा को उसकी छोटी उम्र में नहीं जाना चाहिए . एक वक्त था जब पढाई अधूरी रह गई थी ...जो आगे चल कर मेरी लगन और पति  के साथ से पूरी हो पाई ...आगे पढ़ने की अब भी इच्छा है ...पर मैं जानती हूँ ये अब इस उम्र में बहुत मुश्किल है पर मैंने अभी हिम्मत नहीं हारी है . आज भी जब सोचती हूँ कि पता नहीं क्यों वो ऊपर वाला भी इस जिंदगी से ऐसे खेल क्यों खेलता है कि जो गोद एक बार खो गई ...वो फिर क्यों नसीब नहीं हो पाई ...मेरी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा  सिर्फ अपने सपने के पीछे भागते हुए ही बीत गया ..मेरे इस अधूरे सपने के लिए ,मेरे पास बहुत अधिक शब्द या सोच नहीं हैं ....फिर भी मन में ये जरुर है कि ''हां कोई ऐसा होता जो मुझे उसी रूप में स्वीकार करने की हिम्मत करे/ या करता , जिस रूप में मैं हूँ '' पर ऐसा हुआ नहीं है आज तक .....भाई अपना फर्ज़ बहुत अच्छे से निभा रहे हैं ...पति ,पति है वो दोस्त तो है पर वो गोद नहीं दे पाए इसके लिए जीवन में भटकाव की स्थिति बनती है...पर फिर भी मेरी जिंदगी में पति से ऊपर और कोई नहीं है और उनके साथ और प्यार के साथ मेरी ये जिंदगी सिर्फ उनसे ही बंधी है ,पूरे मान सम्मान के साथ ......और दोस्त ???????? कोई ऐसा है ही नहीं | एक अजीब से अपने अधूरे सपने के साथ ये पगली अंजु (अनु)....||