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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

संबोधन, रिश्ते और अपनत्व !

                              परिवार और रिश्तों का जो सम्बन्ध  है वह प्रेम , स्नेह और सामीप्य से जुड़ा  है। हम आधुनिक बनने की लालसा में और उससे अधिक खुद को माडर्न देखने की झूठी शान में डूबते हुए वह खोते चले जा रहे हैं , जो हमारी शान रही है और जिसे पाने के लिए सब तरसते हैं।  
                              भारत में परिवार और विवाह जैसी संस्था विदेशों में एक सुखद आश्चर्य के रूप में देखी  जाती है और उसमें बसने वाला प्रेम और एकसूत्र में बंधे रहने की भावना तो और भी अधिक अनुकरणीय समझी जाती है। वह बात और है कि  अब हम उनके पीछे दौड़ कर अपने को आधुनिक कहलाने में ज्यादा गर्व महसूस करने लगे हैं। वह यहाँ आकर हमारी संस्कृति के अनुसार शादी करना चाहते हैं और हमारे परिवार में आकर उसकी परम्पराओं को अपनाने के लिए लालायित रहते हैं।
                                आज सुबह ही ऐसा कुछ सामने आया कि  मन किया कि  हम अपने आपको ही सुधारें और उनको सुधारने का प्रयास करें जो अपने संस्कृति और संस्कारों से भटक रहे हैं। समझाना हमारा काम है और मानना उनका। सुबह मेरी पारिवारिक मित्र परिवार की पोती मेरे पास आई और बोली दादू आपको "पुंटी " ने बुलाया है। पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया फिर मैंने पूछा ये 'पुंटी ' कौन है?  अरे दादू पूनम आंटी को हम ही पुंटी  कहते हैं।एक तो एक साथ रहते हुए चाची को आंटी कहना और फिर वह भी नाम लेकर।  घर के बड़े लोगों ने भी रोकने या टोकने की जरूरत नहीं समझी , जबकि वे लोग बहुत अधिक आधुनिक नहीं है।  हाँ आधुनिकता ओढ़ने का काम जरूर करते हैं। 
                               वह तो कह कर चली गयी लेकिन मेरे लिए एक सवाल छोड़ गयी कि उस परिवार में अभी सिर्फ दो बेटों की शादी हुई है . मेरे लिए अपने ही परिवार की तरह से है। बड़े बेटे के बच्चे हैं छोटे की पत्नी को आंटी कहने के लिए नाम जोड़ कर उन लोगों ने उसे 'पुंटी ' बना दिया और घर वाले उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिए कभी टोका नहीं . आंटी शब्द हमने अंग्रेजी भाषा से ही लिया है और अंकल भी क्योंकि उनके यहाँ चाहे जो रिश्ता हो वह अंकल और आंटी में ही निहित होता है और हमारे यहाँ के संबोधन रिश्तों की अलग परिभाषा ही नहीं देता है बल्कि उसकी गरिमा भी बताता है साथ ही पैत्रिक परिवार या मातृ परिवार किस से सम्बंधित रिश्ता है इसको भी स्पष्ट करता है। और ये शब्द बच्चे घर से बाहर  जाकर नहीं सीखते हैं बल्कि इन्हें तो घर में बाबा, दादी, नाना , नानी , माता पिता ही उनको वाणी ज्ञान होते ही सिखाते हैं कि  ये आपके ये हैं। अगर हम बच्चों को चाहे चाचा हो, मामा हो या फिर मौसा या फूफा जो सबको अंकल ही कहने की शिक्षा देते हैं तो ये हमारी कमी है। जो अपनत्व अपने भारतीय संबोधन में है वह विदेशी या अंग्रेजी से आये संबोधन में नहीं है। 
      हम आधुनिक बनें लेकिन किस दृष्टि से -- अपनी कुरीतियों के बहिष्कार के लिए, अपने बच्चों में लिंग भेद को छोड़ कर सबको समान प्यार और हक देने के लिए , उनकी समान शिक्षा और अधिकार देने के लिए और उनकी तरह से ही  स्वयं अपने कामों के लिए आत्मनिभर होने के लिए बने। ये नहीं कि  आप छोटे छोटे कामों के लिए पत्नी या बहू पर निर्भर रहें  , उसे भी इंसान समझ कर उसके काम में हाथ बंटा लें तो आपकी भारतीयता कम नहीं होती। हम दोहरी मानसिकता पाल कर आधुनिक और विदेशी संस्कृति के अनुयायी बन रहे हैं तो यह तो वह हुआ  'दोऊ  दीन  से गए पांडे , हलुआ मिला न मांडे  '
                      शायद मैं विषय से भटक रही हूँ , इन संबोधन में भी एक प्यार और अपनत्व झलकता है जो सिर्फ भारतीय संस्कृति में ही मिलता है और कहीं भी ये देखने को नहीं मिलेगा। अगर बड़े छोटों को बेटा और बेटी कहकर बुलाते हैं तो  ही वह हमारा रक्त सम्बन्धी न हो लेकिन एक अपनत्व से जोड़ने का अहसास जरूर दे जाता है। हमारी ग्रामीण संस्कृति में आज भी चाहे वह जाति  का कोई भी हो, छोटा और बड़ा सब एक रिश्ते से बंधे और संबोधन से बंधे होते हैं। हमारे बुंदेलखंड में तो ये आज भी है। नाम लेकर बुलाना तो बहुत कम होता है। बड़े हैं तो चाचा और दादा और महिला हुई हुई तो चाची  या दादी कह कर संबोधन करते हैं चाहे वह परिचित हो या न हो। हमारे मुंह से उतने ही शब्द निकलते हैं चाहे हम ए बुढ़िया कहें या चाची  या अम्मा कहें . लेकिन इन शब्दों में हमारी तहजीब  और तमीज छिपी रहती है जो मुंह से निकलते ही  जाहिर  हो जाती है।आज की पीढ़ी यह भी कह कर बड़ों को झिड़क देती है।  एक घटना मुझे याद है - मैं बैंक में खड़ी थी और मुझसे आगे एक वृद्ध जिन्हें शायद खड़े होने में तकलीफ भी हो रही थी क्योंकि वह बार बार आकर खड़े हो जाते और फिर बेंच पर बैठ जाते।  कई पीछे के लोग काम करवा कर चले गए तो वह काउंटर पर आकर उस लड़की से बोले बेटा मैं बहुत देर से खड़ा हूँ मेरा काम कब होगा ? ये बुढऊ यहाँ रिश्तेदारी बनाने का काम मत करो , जो काउंटर पर आगे खड़ा होगा उसका ही काम होगा। मैं सुनकर अवाक रह गयी।  मानवता के आगे कोई रिश्ता या धर्म नहीं होता है।  एक बुजुर्ग को इस तरह से बोलना शायद हमारे संस्कारों की छवि दिखा रहा था।  ये तो हमारी भारतीयता का प्रतीक नहीं है।  इन रिश्तों में कोई खून का संबंध जरूरी नहीं है बल्कि अपनेपन की जरूरत होती है और यही अपनापन समाज की डहरी नींव का प्रतीक है ।
                      अगर हम कम शिक्षित लोगों की बात करें तो वो आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए मिल जायेंगे। लेकिन हम चाहे आधुनिक न भी हों, उच्च शिक्षित  न भी हों लेकिन खुद को आधुनिकता के लिबास में लपेटे हुए बच्चों को अंकल आंटी, ग्रांड माँ , ग्रांड पा बोलना जरूर सिखा देते हैं। फिर बच्चे अगर भावनात्मक रूप से न जुड़ पायें तो इसमें हम उनको दोष क्यों दें? हम ही उनके मन में दूर रहने वाले संबोधनों के बीज बो रहे हैं फिर कल को वे हमें भी उस नजर से देखना शुरू कर देते हैं तो हमें कष्ट क्यों होता है? आज जिस जगह पर हमारे बुजुर्ग या बराबर के लोग खड़े हैं कल वहीँ हम भी खड़े होंगे और तब शायद ये अनुभव करें कि हमने ही गलत सिखाया।  
                     अगर हम अपने सदियों से चले आ रहे रिश्तों की गहन बंधन और उसमें बसे प्यार को देखे तो वह बंधन सदैव अटूट रहता है। भले ही हम दो घरों में रहे लेकिन वो संबोधन हमें बांधे रहने में पूरी तरह से सक्षम हैं। चलो हम ही कुछ बच्चों में कैसे ही ये संस्कार डालें कि  कम से कम हम संबोधन  तो अपने रख ही सकते हैं। मैं तो परिवार की बात कर रही हूँ लेकिन हमारे मित्रों के बीच भी अंकल और आंटी कहने का रिवाज नहीं है।  बच्चे चाचा चाची या फिर मामा और मामी और मौसा मौसा ही कहते हैं और फिर हम आपस में जितना जुड़े हैं वो कहने की बात नहीं है। इसमें कोई  पैसा या स्तर कभी भी आड़े नहीं आया क्योंकि बचपन के मित्र एक स्तर के नहीं होते हैं लेकिन परिवारों के बीच वही अपनत्व है।  यही भारतीयता है और इसको कायम रखना हमारे हाथ में है।  

बुधवार, 8 अगस्त 2012

निर्माण का आधार !

                        
                      औरों  की बात तो मैं नहीं जानती लेकिन अपने बारे में निश्चित तौर पर कह सकती हूँ कि किसी भी रचना की नींव  कभी एक दिन में नहीं रखी जाती है. हाँ कविता के विषय में जरूर कहा जा सकता है कि किसी घटना या एक वाकया ने अंतर को छुआ और रच गयी लेकिन कोई भी गद्य लेख कई घटनाओं और अनुभवों का संयोजन होती है. जिसमें सिर्फ और सिर्फ सत्य का आधार मान कर किसी सन्देश  का संचार होता है. अपने स्वभाव और अपने कार्य के अनुरुप तमाम लोगों के अनुभव और उन सबके साम्य को मिलते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुँच कर ही किसी नई रचना का सृजन होता है.                               
                             पिछले दिनों मेरे एक लेख पर हमारे कुछ शुभचिंतक ब्लोगर साथियों ने कुछ और ही सोच लिया और फिर किसी और बन्धु को फोन करके बताया कि मैंने उनको इंगित करते हुए लेख लिखा है. वे मेरे अन्तरंग थे और उन्होंने सीधे मुझसे संपर्क कर ये बात पूछी और वह काफी समझदार और निकट सम्बन्ध रखने वाले थे , जिनसे कोई बात कहनी होती है तो मैं उन्हें भला बुरा भी कह देने का हक रखती हूँ. ये बात उन्हें पता थी तभी मुझसे पूछ डाला. मैंने उन्हें विस्तार से समझ दिया और उसे उस आधार को भी बता दिया जिससे प्रेरित होकर मैंने उसे लिखा था.
                             सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक विषयों पर लिखना मेरी रूचि में शामिल है और ये सभी विषय मेरी रूचि के साथ साथ मेरे अध्ययन में भी शामिल रहने वाले विषय हें. इन विषयों पर मैं सिर्फ ब्लोगर बनने के बाद ही नहीं लिख रही हूँ बल्कि इन पर मैं पत्र - पत्रिकाओं में भी लिखती रही हूँ. इसलिए किसी के लेखन को व्यक्ति विशेष से जोड़ कर देखना गलत है. कितने संयोग होते हें जो आपस में मिल जाते हें और कितने लोगों की जीवन चर्या भी मिल जाती है लेकिन इसका आशय यह बिल्कुल भी नहीं है कि वह किसी विशेष से ही सम्बंधित हो. इस लिए एक रचना को सिर्फ रचना की दृष्टि से ही पढ़ा जाय न कि उसके तार जहाँ आपको सही लगे वहाँ जोड़ कर देख लें. ये बात सिर्फ मेरे लेखन की ही बात नहीं है बल्कि औरों के साथ भी होती है. अरे हम सब बुद्धिजीवी है तो उसकी गरिमा का तो ख्याल रखना चाहिए.

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

विकृति को समझें !

                         चर्चा में रहने के लिए कुछ तो ऐसी चर्चा कर लेंगे कि लोग वाह वाह न करें गालियाँ ही दें। बदनाम हुआ तो क्या नाम होगा? ये तो एक अलग बात है लेकिन ये सबके पीछे इंसान की दिमागी हालत और उसकी स्थिति भी देखने के जरूरत पड़ती है। इस रास्ते पर चलने वाले कुछ तो मानसिक विकृति का शिकार ही कहे जायेंगे, लेकिन ऐसे लोगों को शह देने वाले वाह वाह जरूर करते हैं लेकिन पीछे आलोचना भी करते हैं। 
                        चर्चा में रहने के लिए अगर हम ऐसी हरकतें करें कि लोग खीज़ कर गालियाँ देने लगें तो उस विकृति के शिकार इंसान को एक सुकून मिलता है, भले ही उसकी बातों से किसी को कितना ही दुख हो? वास्तव में वह होता है जिसकी दूसरी प्रशंसा होती है लेकिन जो श्रेष्ठता ग्रंथि का शिकार होते हैं उनकी कोशिश होती है कि अपनी ही बातों से दूसरों को हीन साबित करने की कोशिश करें बगैर ये जाने कि इन बेसिर पैर की बातों का क्या असर होगा? लेकिन स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भावना उनमें इतनी बलवती होती है कि वे उचित और अनुचित के अंतर को भूल जाते हैं। ये एक प्रकार के मानसिक विकार का असर होता है और इसको दूसरे शब्दों में मानसिक विकृति भी कह सकते हैं। 
                    ये आवश्यक नहीं है कि इसका रोगी इस बात को समझने वाला हो, कभी कभी वह बिलकुल अनभिज्ञ होता है। तब तो विदेश में जाकर बसने वाले कुछ भारतीय उसी देश के गुणगान करने लगते हैं और अपने देश की बेदखली। वहाँ सुविधाओं अलग है और वह देश बहुत पूरा है लेकिन वे भूल जाते हैं कि कैसे ही क्यों न हो? उस मिट्टी की महक और रगों में बहते हुए खून में मिट्टी, हवा और पानी का अंश है। यहाँ की भाषा तो जाहिलों की भाषा लगने लगती है, उनकी माँ और बाप इतने बड़े अंग्रेज थे कि बेटे को संबोधन अंग्रेजी में ही मॉम और डैड ही सिखाया गया होगा। ये भूल जाते हैं कि इस धरती पर जो धर्म ग्रन्थ रचे गए उन पर अंग्रेजी वाले भी शोध कर रहे हैं। यहाँ की भाषा सीखने रहे हैं और हिंदी में ग्रन्थ लिख रहे हैं। इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि अपने ही देश के जन्मे लोग अपनी ही भाषा का अपमान कर रहे हों और उसी भाषा में और जमीन पर जहाँ वे रहते हैं। 
                   ये भी एक मानसिक विकृति का ही परिणाम ये है कि हर ऐसे विकार वाले लोग अपने को समाज में भी अकेले ही पाते हैं और अपनी जाति को को यह कह कर दबाते हैं कि मेरे बराबर का इस समाज में कोई है ही नहीं, केवल तो मैं किसी लिफ्ट ही नहीं देता है। लेकिन वह ये भूल जाते हैं कि उनकी मनोविज्ञान को समझने वाले भी लोग इस समाज में हैं। ऐसे कोडिंग की कोई जरूरत नहीं है, न ही उन्हें इलाज की जरूरत होती है, हालांकि केवल वह काउंसलिंग ही क्यों न हो।
इसलिए अस्थिरता वालों से सावधान रहना और अपनी ऊर्जा उनकी बातों में हरगिज जाना न करें।

गुरुवार, 7 जून 2012

उठ जाग मुसाफिर !

               
                      क्या पढ़े लिखे और इस विकासशील भारत में जनता  अपने अधिकारों और कर्तव्यों से इतना अधिक विमुख है कि सरकार के किसी भी कदम का न तो  विरोध  कर सकते हैं और न ही उनसे कोई सवाल करने का अधिकार रखते हैं। वे  सरकार चुनते समय अपने विवेक को ताक  में रख कर बटन दबा कर चले आते हैं। लेकिन मैं यह क्यों भूल रही हूँ कि बटन दबाने के बाद जो चुने जाते हैं उनके ही रास्ते  और इरादे बदल जाते हैं। वे पांच साल के बादशाह बन जाते हैं और वह भी निरंकुश बादशाह फिर ठगा सा जनमत कुछ कर ही नहीं सकता है। 
                   पिछले दिनों आई रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में 15 वीं विधान सभा के पूरे 5 वर्ष के  89 दिवस सत्र  चले .  जब कि  एक वर्ष में 365 दिन में  अगर 30 दिन भी कार्य होता तो 5 साल में 150 कार्य दिवस होते लेकिन वह भी नहीं हो सका। जो 89 दिवस सदन में कार्य  हुआ  और 403 विधायकों में से सिर्फ 5 ऐसे थे जो की पूरे 89 दिन उपस्थित थे और इनके समेंत 20 विधायक ऐसे थे जो 88 दिन उपस्थित थे। इसमें से 1 को को छोड़ कर  शेष  सभी सत्तापक्ष  के विधायक थे। शेष कहाँ रहते हैं और क्या करते रहे इसके बारे में न सदन ने कभी जानने की कोशिश की और नहीं उन लोगों ने इस बारे में सूचित करने की कोई जरूरत समझी। उनके  वेतन भत्ते में कभी कोई  नहीं की जाती है क्योंकि प्रदेश का अस्तित्व  उनसे ही   है, नहीं तो प्रदेश अनाथ हो जाएगा। ये सिर्फ एक प्रदेश की स्थिति  है  इस बारे में हमें संसद और शेष सभी राज्यों के विधान सभाओं  की स्थिति के बारे में जानकारी उपलब्ध करायी जाए . लोक में जागरूकता जब तक नहीं आएगी तब तक अपना अर्थ सार्थक नहीं कर  पायेंगे .
                    प्रजातंत्र में सरकार में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ही हम अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं लेकिन वही प्रतिनिधि अपने दल के कठपुतली बन जाएँ तो ठगे तो हम जाते हैं। चुने हुए प्रतिनिधि तो अपनी जुगाड़ में कहीं और घूमते फिरते हैं सदन की कार्यवाही या उसमें अपनी उपस्थिति से उनको कोई भी मतलब नहीं होता है और नहीं सदन के अध्यक्ष इस विषय में कोई कदम उठता है . सरकारी कार्यालयों और बच्चों के स्कूल में उपस्थिति की तरह से हमारे विधायकों और सांसदों की उपस्थिति का भीएक रिकार्ड होना चाहिए और उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उन्हें चुनने वालों को पूरा अधिकार है कि  वे अपने प्रतिनिधि की कार्य प्रणाली से पूरी तरह से वाकिफ रहें। ताकि भविष्य में उनसे इस बारे में दुबारा आने पर सवाल तो किया ही जा सके। अन्धानुकरण अधिक दिन नहीं चल सकता है। वर्षों से विधायक और सांसदों के पद पर काबिज लोगो को अब जनमत क्यों नकार रहा है? सिर्फ इस लिए कि  उन्होंने अपने क्षेत्र के लिए कुछ किया ही नहीं . कुछ माननीय अपनी नीयत सिर्फ इस इरादे से स्पष्ट कर देते हैं कि वे सिर्फ अपने और अपने क्षेत्र के विकास में में रूचि रखते हैं। 
                  अब हमें जागरूक होने की जरूरत है , पांच साल सिर्फ इसलिए हम चुप नहीं बैठ सकते हैं कि  हम उन्हें झेलने के लिए मजबूर है नहीं हमें उनकी गतिविधियों पर निगाह रहने का पूरा पूरा अधिकार होता है। अपनी बात उनके द्वारा संसद में उठाये जाने की बात को लेकर बात करने तक। वे ही हमारा माध्यम हैं और उन्हें अपने  क्षेत्र से जुड़े मामले को उठाना ही होगा। बस एक दूसरे का हाथ थाम  का शक्ति को बढ़ाना होगा और आवाज को बुलंद करना होगा फिर कल हम सुधार  की आशा कर सकते हैं. हम कोई राजनैतिक दल के सदस्य नहीं है लेकिन हम उस विधा से जुड़े हैं कि हम एक दूसरे तक अपनी बात को  पहुँचा तो सकते हैं और सोचने के लिए मजबूर भी कर सकते हैं। 
  

शुक्रवार, 1 जून 2012

विचार करें !

   अगर घर में बेटियाँ हें तो उनके विवाह के लिए आज नहीं कल सोचना है और ये कोई एक या दो दिन का सम्बन्ध नहीं है . इस जीवन भर के रिश्ते की बुनियाद भी मजबूत होनी चाहिए. आज कल लगभग सभी लड़कियाँ आत्मनिर्भर होकर जीने को अधिक महत्ता प्रदान करती हें और होना भी चाहिए क्योंकि आज की बदलती सोच ने अब पति और पत्नी दोनों को समान रूप से काम और जिम्मेदारियों  को उठाने की राह दिखाई है. इस परिवार और विवाह संस्था को स्थायित्व देने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार है - हमारी प्रगतिशील और परिपक्व सोच. इसके लिए हम पूरी तरह से जिम्मेदार हें क्योंकि आज भी ८० प्रतिशत विवाह माता पिता द्वारा ही किये जाते हैं . आज भी हर माँ बाप का ये सपना होता है कि जिस लड़के के साथ हम अपनी बेटी का रिश्ता करने जा रहे हैं उसका घर और परिवार हमसे अच्छे स्तर का हो. वह सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोण से ही तुलना करता है और आज भी मध्यम वर्ग का पिता कुछ न कुछ कर्जदार होकर बेटी के हाथ पीले कर रहा है.
                  उस घर में जाकर बेटी को कितना सामंजस्य स्थापित करके रहना पड़ता है इसके विषय में कम ही पता चल पाता है. क्योंकि दूर के ढोल सुहाने होते हैं और कुछ लोगों के तो दोहरे चेहरे होते हैं. इन चेहरे पर चढ़े नकाब के लिए शिक्षा दीक्षा भी कोई भूमिका अदा नहीं करती है क्योंकि संस्कार भी कुछ होते हैं और मैं नहीं समझ पाती हूँ कि ये मनुष्य किस मिट्टी के बने होते हैं? जो शादी के पहले कुछ और बोलते हैं और शादी होने के बाद कुछ और बोलने लगते हैं. 
                     मैं बहुत लम्बे चौड़े दायरे की बात नहीं कर रही हूँ . बस अपने इर्द गिर्द बसने वाले कुछ परिवारों की बात कर रही हूँ. कुछ उन बेटियों की बात कर रही हूँ जो मुझसे बहुत करीब से जुड़ी हें. सभी उच्च शिक्षित और सभ्य सुसंस्कृत परिवारों में विवाह के बाद पहुंची हैं. पिछले दिनों मैंने अपनी बेटी से बात करनी चाही तो उसका फ़ोन व्यस्त आ रहा था. जब वह फ्री हुई तो उसने मुझे मिलाया. मैंने उससे पूछा कि कहाँ व्यस्त थी? इस समय तो हमारे बात करने का समय होता है तो बोली - 'मम्मी हमारा "आओ सखी चुगली करें" क्लब बना है उसमें हम सब यानि जिनकी अभी या कुछ दिन पहले शादी हुई है अपनी अपनी ससुराल में बैठ कर अपनी समस्याएं शेयर करके हैं और मैं उन सबको कंसोल करती हूँ और रास्ते बताती हूँ कि कैसे इन हालातों से निबटा जाय? (वैसे बताती चलूँ कि मेरी दोनों ही बेटियों में काउंसिलिंग करने का गुण मेरी ही तरह से आया है.) वैसे वह अपनी और सहेलियों की बातें मुझसे बराबर शेयर करती हैं और तभी निष्कर्ष के तौर पर ये लेख लिखने की बात दिमाग में आई.
                              उसकी एक सहेली सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है और उसकी शादी फरवरी में हुई है. वैसे तो वह दिल्ली में ही रहती है लेकिन एक डॉक्टर से हम शादी करने से पहले ये सोच कर चलते हैं कि उसका क्या दायरा है? उससे हम कितनी पुरातन पंथी परम्पराओं को निभाने के लिए मजबूर कर सकते हैं. लेकिन हमारी सोच अपने बेटे या बेटी के उच्च शिक्षित होने से बदल नहीं जाते हैं लेकिन फिर भी समय और हालात के साथ हमें सामंजस्य स्थापित करना चाहिए. हम बाहर से दिखाने के लिए बहू को बेटी की तरह रखने की हामी तो भर लेते हैं लेकिन बाद में जो माँ का चोला उतार कर सास का रूप धारण करते हैं तो बहू भी आसमान से उतर कर जमीन पर खड़ी होती है और विस्फारित नेत्रों से देखती रह जाती है. उस बच्ची की डॉक्टर ननद है और घर में जब वह चाय लेकर जाती है तो वह कहती है -' जरा सिर ढक कर जाना पापा जी को चाय देने जा रही हो.'  जब कि हकीकत ये है तो उसको साड़ी पहनना शादी के चार दिन पहले सिखाया गया था. सच ये है कि वह अभी ठीक से दोनों हाथ से काम करते हुए सिर पर पल्ला संभाल नहीं पाती है. ये बात मुझे भी कुछ खली कि एक डॉक्टर और दूसरी डॉक्टर से इस तरह की बात कर रही है. क्या हम अपने को सिर्फ उदारवादी दिखाने का नाटक करते हैं? कल वह मेरे पास आई थी और बोली कि गाँव में कोई पूजा है तो वहाँ जा रहे हैं और वहाँ पर तो सास जी ने कहा है कि मुँह ढक कर रहना होगा. अगर कहा है तो रहना ही होगा. इतनी  गर्मी  और फिर भरी  साड़ी भी पहननी  होगी क्योंकि  नई  बहू पहली  बार  गाँव जा रही है उस पर मुँह ढक कर रहना. सोच कर ही डर  लगा  रहा है.
                          सास के दो चेहरे ओ अक्सर ही देखने को मिल जाते हैं. मेरे साथ एक लड़की वनस्थली से एम टेक करते समय आई आई टी में प्रोजेक्ट करने आई थी. वह कानपुर की रहने वाली थी इसलिए प्रोजेक्ट में उसको जॉब मिल गयी और वह एम टेक पूरा करने के बाद मेरे ही प्रोजेक्ट में जॉब भी करने लगी. वह पापा के ट्रान्सफर वाले जॉब के कारण शुरू से ही हॉस्टल में पढ़ी थी. इत्तेफाक से वह मंगली थी और उसके लिए उसके पापा मंगली वर ही खोज रहे थे. उनको एक ठीक ठाक एम बी ए लड़का मिल गया. जब शादी तय हुई तो वह बाहर जॉब कर रहा था. उनकी सास का शुरू में जो व्यवहार था उससे यही लगता था कि उनके घर में बेटी नहीं है इसलिए वह बहू के रूप में बेटी मिल रही है .बेटी बहुत खुश रहेगी. बाकी कुछ जानने और समझने की जरूरत ही नहीं समझी गयी. लोकल शादी हुई थी इसलिए नौकरी छोड़ने की बात उसने सोची भी नहीं थी . शुरू शुरू में सास लंच बना कर देती और फिर कुछ दिन बाद उसके लिए खाना बना कर जाना. उसका घर इतना दूर था कि उसकी अगर ऑफिस की बस छूट  गई तो उसको ३ घंटे आने में लगते थे और इसलिए ऑफिस में देर तो वहाँ उसको उत्तर देना होता था. रोज रोज वह घर का रोना नहीं रो सकती थी. घर में उसको सास मुँह ढक कर रहने के लिए मजबूर करती. अगर उसको सबके साथ टीवी भी देखना हो तो मुँह ढका होना चाहिए. फिर सोने से पहले सास के पैर भी दबाने पड़ते . वह रात १२ बजे सोने जाती और सुबह ४ बजे उठ जाती. ऑफिस में सारे दिन कंप्यूटर पर काम करना होता . उसके मम्मी पापा अगर छुट्टी के समय बस स्टॉप पर आकर मिल लेते . इसी समय वह गर्भवती हुई , तब तो उसके लिए काम और घर मुश्किल होने लगा. शुरू के दिन की परेशानियाँ और घर के माहौल  से वह टूटने लगी थी. आखिर उसके मम्मी पापा अपने घर ले आये लेकिन उसके पति को माँ उससे मिलने केलिए नहीं आने देती.  उसका पति भी ऑफिस में लंच टाइम में आकर मिलता. उसको बेटा हुआ तो दादी का मन डोला और उसको घर ले गयी. फिर शुरू हुआ बच्चे को रखने के लिए समस्या. आया वह रख नहीं सकती थी, खुद वह देखेंगी नहीं. फिर दबाब बढ़ा कि नौकरी छोड़ दो. उसने नौकरी छोड़ दी और एक वह लड़की जिसके माँ बाप ने एम टेक तक शिक्षा दिलवाई उसके ससुराल वालों की सोच के लिए वह सिर्फ एक गृहणी बना दी गयी. रोज रोज की किच किच परेशान होकर उसके पति ने बाहर दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली और पत्नी और बेटे को लेकर चला गया. तब जाकर उस लड़की को सुकून मिला.
                              ये दो किस्से सिर्फ इसलिए कि लड़कियों  के माँ बाप अपनी ओर से सुयोग्य वर और अच्छा घर देखते हैं लेकिन इसके साथ ही उस घर के लोगों की सोच और विचारों को जानने का भी प्रयास करें तो बेटी के सुखद भविष्य के लिए अधिक उचित होगा. घर का स्तर , ऊपर दिखने वाला व्यवहार और उनके आतंरिक स्वरूप के विषय में जल्दी पता नहीं चल पता है. इसलिए शादी तय करने के बाद इतना समय अवश्य लें कि उनके बारे में अच्छी तरह से पता लगा लें. वह आपके अपने स्रोत होंगे जिन्हें प्रयोग करके आप पता लगायें. बेटी की शादी एक या दो दिन की बात नहीं होती है और हमारे दिए संस्कारों के कारण वह ऐसे लोगों के बीच कितना तनाव झेलती है इसको मैंने उस लड़की से जाना है. .
                              अपनी बेटी के भावी जीवन के बारे में हमें सोचना है तो हमेशा ये देखना चाहिए कि उस परिवार में वैचारिक परिपक्वता होनी चाहिए. आर्थिक स्तर भी समान होना चाहिए बल्कि यह एक महत्वपूर्ण आधार है क्योंकि बहुत बड़े घर में बेटी देना चाहे वह कामकाजी हो या फिर घरेलु उसके सुख और आत्मसम्मान के लिए ये जरूरी है कि समकक्ष आर्थिक स्तर का परिवार हो. अगर आपने बड़े घर की बेटी ले ली तो वह आपके घर में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पायेगी . फिर या तो वह आपको बात बात पर अपने घर का बखान करके नीचा दिखाएगी या फिर वह अपने घर जैसे माहौल की अपेक्षा करेगी. ये आवश्यक नहीं है कि जिसे आप उचित समझें उसे आपकी  बेटी भी समझे इस लिए उसके सामने हर बात स्पष्ट रूप से बता देनी चाहिए. जीवन उसको गुजारना है इसलिए वह आगे आने वाले स्थितियों से निपटने केलिए मानसिक रूप से तैयार रहेगी.
                              ये सारी बाएँ सिर्फ बेटी की शादी के लिए ही लागू नहीं होती बल्कि बेटे की शादी के लिए भी लागू होती है. लड़की भी हमेशा अपने बराबरी के परिवार और सभ्य सुसंस्कृत परिवार की लेनी चाहिए. हम आजकल नेट के माध्यम से रिश्ते अधिक खोजते हैं और फिर उसमें दी हुई जानकारियाँ कितनी सच और कितनी गलत होती हैं , ये बात तो तभी पता चलती है जब कि हकीकत से दो चार होना पड़ता है. इसलिए रिश्ते से पहले अपनी सारी इन्द्रियां सजग रख कर ही निर्णय लेने चाहिए. परिवार की सुख और शांति के लिए सिर्फ एक पक्ष नहीं बल्कि दोनों पक्षों की भलाई होती है.

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

संस्कार कैसे देते हें?

जीवन मूल्यों में हो रहे परिवर्तन  ने हमारी संस्कृति को विकृत  रूप  में प्रस्तुत  करना  शुरू  कर  दिया है. एक  मिसाल बनकर विश्व में अपना  परचम फैलाने वाली भारतीय संस्कृति के आधार परिवार, पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की गरिमा को अब लज्जित होने के लिए हम ही उसको इस हद तक पहुंचा रहे  है. आज हम खुद  ही अपने  पारिवारिक  मूल्यों की दुहाई  देने  में कतराने  लगे  हैं क्यों ? क्योंकि  हम अपने नैतिक  और पारिवारिक मूल्यों को खोते  चले  जा  रहे हैं ( संचित भी है, इस बात  से  इनकार  नहीं है लेकिन  अब खोने  का  पलड़ा  भारी है. ) 
                       ऐसा नहीं है पहले भी ऐसा होता था लेकिन उसका प्रतिशत इतना कम  था कि संयुक्त परिवार में वह नगण्य के बराबर होता था और ऐसे उदाहरण सामने आ नहीं पाते थे. . वैसे इसके लिए उत्तरदायी हम ही हुआ करते हें.
                             संस्कार कोई गिफ्ट आइटम नहीं है कि जिसे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को गिफ्ट पैक बना कर देते हें - उन्हें बहुत कुछ समझाने की जरूरत नहीं होती है , वे आज बहुत समझदार है और उसके अनुसार ही आचरण करते हें. आज की नई पीढ़ी और वह पीढ़ी जो अभी अपने पैरों पर चलने के लिए तैयार हो रही है वह वही ग्रहण कर रही है जो हम उसको दिखा रहे हें.
                             हमारी अपनी सोच, व्यवहार और आचरण ही  उनके लिए संस्कार बन जाते हें . इस विषय में वह लघुकथा सबसे अच्छा उदाहरण है कि 'दादा के निधन के बाद पिता ने उनके खाने वाले बर्तन उठा कर फ़ेंक दिए और उनका बेटा जाकर उन्हें वापस उठा लाया. पिता के ये पूछने पर  कि इन फेंके हुए बर्तनों को वह क्यों उठा लाया? तो बेटे ने उत्तर दिया कि कल जब आप बूढ़े हो जायेंगे तो ये ही बर्तन आपके काम आयेंगे. '
                             आज संयुक्त परिवार टूटते टूटते बिखर गए  हैं.  कहीं अगर माता पिता को साथ रखा तो तिरस्कृत करके रखा या फिर उन्हें वृद्धाश्रम भेज दिया. बच्चों ने वही देखा और वही ग्रहण किया. जो हमने उनको दिखाया  वही उन्होंने  संस्कार समझ  कर अपना  लिया . 
  बाद में हम सिर धुन कर रोते हैं  कि पता नहीं आज कल के बच्चों को क्या हो गया है? माँ - बाप की बात सुनते ही नहीं है, आप जब बड़े हो गए तब अपने सुनना बंद किया था और आप के बच्चों ने बचपन से ही क्यों? क्योंकि अब वे प्रगति पर हें और उनकी बुद्धि पिछली पीढ़ी से कहीं अधिक तेज है. ज्यादातर लोगों की ये सोच होती है कि हम जो कर रहे हें वह सही है लेकिन अगर वही बच्चों के द्वारा किया जाता है तो हमें कितना बुरा लगता . इसी लिए आचार्य श्री राम शर्मा की एक उक्ति है - जो व्यवहार आपको अपने लिए पसंद नहीं है तो वह आप दूसरों के साथ   भी न करें. लेकिन ऐसा होता कहाँ है? हम खुद सम्मान और सर आँखों पर बिठाये जाने की अपेक्षा रखते हें और माँ - बाप को अपने मित्रों से मिलाने में भी शर्म महसूस करते हें . क्यों? इसलिए कि हमारे पिता कभी क्लर्क होते थे और माँ एक गृहणी थी. उनको   बाहर के  आचार व्यवहार से परिचय ही नहीं होता है. वह तो अपना पूरा जीवन आपको पढ़ाने और लिखाने   में लगी रही. पिता ने अपनी आय को आपकी पढ़ाई में लगा दिया और खुद अपने लिए नई साइकिल भी नहीं खरीद सके, कभी मिल गया तो ऑफिस के बाद पार्ट टाइम जॉब भी कर लिया ताकि पढ़ाई के साथ साथ आपकी अच्छी खिलाई पिलाई भी कर सकें. इसे हमने उनके फर्ज मान हाशिये में रख दिया और खुद के अच्छी पढ़ाई के बाद जब नौकरी मिली तो उनको अपने बराबर बिठाने में शर्म महसूस करने लगे. हमारे जीवनसाथी ने भी यही समझा कि पति की कमाई पर तो उसका ही हक है , माँ बाप को कोई आशा भी नहीं करनी चाहिए ।
 
                               यही जो कुछ हम दिखा रहे हें वह हमारे बच्चे ग्रहण कर रहे हें . यही संस्कार बन रहे हें उन्हें कुछ भी सीखना नहीं पड़ता है . पहले नानी दादी उन्हें अपने साथ लिटा कर श्रवण कुमार और लक्ष्मण जैसे पुत्र और भाई की कहानी सुनाया करती थी. और बाल मन पर वह गहराई से बैठ जाया करती थी. आज क्या आपके पास टीवी देखने या फिर अपने मित्र मंडली के साथ गपशप करने अलावा भी कुछ है . बच्चे भी साथ साथ टीवी से चिपके  रहना  चाहते  हें. उन्हें कब सिखाया  जाए  और क्या सिखाया  जाए ?अब इसके लिए तो हमें ही सोचना होगा की बच्चों को गलत संस्कार न मिल पायें और वे मानवता और नैतिक मूल्यों के मूल्य को समझें लेकिन ये होगा तभी जब हम उन्हें समझा पायें. चलिए कोशिश करते हैं.

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

विपरीत प्रभाव !

कन्या के जन्म से लेकर उसके जीवन के निर्धारण तक का अधिकार पुरुष वर्ग अपने हाथ में लिए रहा हैतब अधिक अच्छा था जब वह अधिक उन्नत जीवन नहीं जी रहा थावह कृषि और व्यापार में लगा था लेकिन आम घरों में अगर लड़कियाँ अधिक हें तो लड़के की आशा में प्रयास बंद नहीं करते थे लेकिन लड़कियों की हत्या नहीं करते थेमन मलिन भले कर लें लेकिन उनका जीवन नहीं हरते थे
हम जैसे जैसे सुशिक्षित और सम्पन्न होते जा रहे हें हमारी मानसिकता क्या क्रूरता की ओर नहीं जा रही है? या फिर ये कहें कि पहले इस तरह की घटनाएँ प्रकाश में नहीं आती थीं और आज मीडिया के सशक्त होने के साथ ही घटनाएँ सामने आने लगी हेंकल पलक एक अत्याचार का शिकार होकर जीवन लीला समाप्त कर चल दी और आज आफरीन सिर्फ तीन माह की बच्ची अपने पिता के अमानुषिक व्यवहार का शिकार हो कर दुनियाँ से कूच कर गयी किस लिए क्योंकि उसके पिता को बेटी नहीं बेटा चाहिए था और बेटी होने पर उसने उस नन्ही सी जान को सिगरेट से जलाया , उसके सिर को दीवार से पटक कर उसके मष्तिष्क को क्षत विशत कर दिया और वह कोमा में चली गयीएक हफ्ते के अन्दर वह जिन्दगी की जंग हार कर और अपनी माँ की गोद सूनी करके चली गयी
पुरुष जाति में बच्चियों के प्रति पाशविकता की भावना क्यों घर करने लगी है ? अगर वह पिता है तो उसको बच्ची चाहिए ही नहीं तो या तो उसको जन्म से पहले ही मार दो और अगर नहीं मारी तो पैदा होने पर मार देंइन सबसे ऊपर उठ कर वे लोग हें जो बच्चियों को अबोध बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बना रहे हें और फिर उनकी हत्या कर भाग जाते हेंये काम तो आदिम युग में भी नहीं किया जाता थाआज हम अपनी प्रगति और सक्षमता का ढिंढोरा पीट रहे हें और अपने को २१वी सदी का प्रगतिशील व्यक्ति मानते हें लेकिन हमारी सोच तो जितने हम ऊँचे पहुँचने का दावा करते हें उससे कई गुना नीचे जा रही हैइसके कारणों की ओर कभी मनोवैज्ञानिक तौर पर अगर विश्लेषण किया गया है तो यही पाते हें कि व्यक्ति सारी प्रगति और उपलब्धियों के बाद भी उसकी आकांक्षाएं इतनी बढ़ चुकी हें कि वह उनको पूरा कर पाने के कारण कुंठित हो रहा है और वह कुंठाएं कहाँ और कैसे निकलती हें ? इसके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है
अपने से अधिक बलशाली या फिर बराबरी के व्यक्ति से अगर वह उलझने की कोशिश करेगा तो शायद वह अपनी कुंठा निकल पाए इसलिए वह अपना शिकार अबोध और किशोर वय की ओर जाति हुई बच्चियों पर मौका पाकर निकालने की कोशिश करता हैजब एक तरह की घटना सामने आती है तो फिर उस तरह की छिपी हुई कई घटनाएँ सामने आना शुरू हो जाती हेंये जरूरी ही नहीं है कि वे कुंठित ही हों , वे दकियानूसी भी हो सकते हेंकितने स्थानों पर बेटे की चाह में बेटियों की बलि दे दी जाती है बगैर ये जाने कि क्या इसका कोई औचित्य है?
हम बेटी बचाओ अभियान चला रहे हें क्योंकि अगर बेटी होंगी तो ये सृष्टि आगे कैसे चलेगी? क्या हम बेटियाँ इसी लिए बचाने की गुहार लगा रहे हें कि कल कोई वहशी उन बच्चियों से दुराचार कर उनकी हत्या कर दे? हम बेटियों का जीवन सुरक्षित कैसे करें? वे कोई कागज की गुडिया तो नहीं हें कि हम उन्हें डिबिया में बंद कर छिपा लेंउनके जीवन के लिए उनकी शिक्षा और प्रगति भी जरूरी है तो फिर कौन सा ऐसा कदम हो कि वे सुरक्षित रहेंक्या पैदा होते ही उनको पुरुषों के साए से दूर रखा जाय? क्या उनके साथ माँ को साए की तरह से हमेशा साथ रहना होगा ? क्या फिर से हम अतीत में जाकर पर्दा प्रथा को अपना लें? लड़कियों को शिक्षा के नाम पर सिर्फ गीता और रामायण पढ़ने भर की शिक्षा लेकर उन्हें परिवार को बढ़ाने भर के लिए जीवित रखें?
इतने सारे सवाल है और इनके उत्तर आज भी हमारे पास नहीं है क्योंकि अब हम नेट युग में जी रहे हें , आभासी दुनियाँ में जी रहे हें और बगैर मिले और देखे भी अपनी दुनियाँ को विस्तृत कर रहे हें फिर अतीत में जाने की बात बेमानी है लेकिन ये भी सत्य है कि हमें अब लड़कियों के जीवन और अस्मिता की रक्षा के लिए भी कुछ सोचना होगाउनके प्रति हो रहे दुराव और दुराचार के खिलाफ उठाये जा रहे कदमों के विपरीत प्रभाव पर अंकुश लगा होगा