समाज के बढ़ते हुए प्रगतिशील कदमों ने हमारे नैतिक मूल्यों पर सबसे अधिक प्रहार किया है। उन मूल्यों के रक्षा के लिए ही, हम कानून पर क़ानून बनाते जा रहे हैं। लेकिन यह एक विचारणीय विषय है कि क्या नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी कानून की जरूरत होगी और कानून सिर्फ बनाये जा सकते हैं, क्या उनको लागू कराने के लिए भी कोई आचार संहिता है कि उनको कैसे पालन करवाया जाय। नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है , क़ानून और संविधान की धज्जियाँ उड़ते हुए हम ही देख रहे हैं। नैतिक मूल्यों की अवमानना भी हम ही देख रहे है और हममें में से कितने कर रहे हैं।
नारी उत्पीड़न के विरुद्ध कानून बना दिए गए और क्या इससे नारी उत्पीडन रुक गया , नहीं रुका तो नहीं है बल्कि इन कानूनों की आड़ में कहीं नारी ही उत्पीड़क बनती जा रही है। दहेज़ के झूठे मुक़दमे और फिर ग़लत आरोपों के चलते टूटते हुए परिवारों ने हमें क्या सिखाया है? क़ानून बनने से मानसिकता नहीं बदल जाती है। न दहेज़ हत्याएं रुकीं , न भ्रूण हत्या रुकी और न ही नारी उत्पीडन रुका। सब वैसे के वैसे ही है, बस उससे बचने के नए नए तरीके निकाल लिए हैं।
सहयोग भी हमारा समाज और परिवार ही दे रहा है.
परिवार में वरिष्ठ लोगों के संरक्षण के लिए क़ानून बना दिए गए हैं की कोई भी पुत्र या पुत्री उनके दायित्वों से नहीं बच सकते हैं, इसके लिए सजा का भी प्राविधान कर दिया गया है। क्या इससे निदान हमको मिल सकता है? नहीं कभी भी नहीं। माँ-बाप घर में रहते हैं लेकिन उसके साथ कैसा व्यवहार होता है, कौन सा क़ानून है जो इसके लिए पहरे बिठा सकता है? बेटे या बहू को बाध्य कर सकते है कि वे उनको उचित सम्मान और परवरिश दें। उनको वृद्धाश्रम में भेज देना वे अधिक बेहतर समझते हैं। ख़ुद और उनकी पत्नी इस दायित्व से मुक्त रहेंगे। उनके पास समय नहीं होता है कि अपने जनक और जननी का हाल-चाल भी पूछ लें।
इस विषय को उठा कर मैं किसी पर आक्षेप नहीं लगा रही हूँ, बल्कि इसका सुगम उपाय जो मैंने अपने विचार से सोचा है, उसको सबके साथ बाँट कर एक अलग दिशा खोजना चाहती हूँ। आखिर हम भी बुद्धिजीवी होने का जो दम भरते हैं ,उनका समाज और नैतिकता के प्रति कुछ तो धर्म बनता है तो क्यों न अपनी अपनी सोच से रास्ता खोजें पता नहीं कब कौन सा रास्ता सफल सिद्ध हो।
मेरे विचार से काउंसिलिंग सबसे बेहतर रास्ता हो सकता है। यह काम छोटे से बड़े सभी स्तर के लोगों के साथ करना होगा। कभी बड़े ग़लत होते हैं और अपने अहम् के मारे उसको स्वीकार नहीं कर पाते हैं या फिर बच्चों को छोटा जानकर उनकी बात सुनने के लिए तैयार ही नहीं होते हैं। क़ानून बनाने के रास्ते के अलावा भी एक यह रास्ता है और बहुत ही कारगर है। मैंने इसको अपनाया है और बहुत बड़ी बात नहीं , कम से कम दस बीस लोगों को तो सही दिशा दिखाई और वे आज अपने पथ पर सफल हैं।
आवश्यकता है इस मार्ग को सहज बनाने की , इस तरह के केन्द्र खोले जाने चाहिए , जहाँ पर काउंसिलिंग की सुविधा प्राप्त हो, इसके लिए स्वयमसेवी संस्थाएं, मनोवैज्ञानिक और कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को पहल करनी होगी। पीड़ित व्यक्ति के साथ साथ दूसरे की भी बात सुनकर उनको सही दिशा दिखाई जा सकती है। क़ानून और सजा अपराधी को और अधिक उद्दंड बना देता है किंतु काउंसिलिंग उनको सही और ग़लत सभी दिशाओं के बारे में बताते हुए, सही दिशा चुनने का विकल्प सामने रखता है। परिवार में कहें तो हर समय बेटे या बेटियाँ ही गलत नहीं होते हैं, कहीं कहीं बुजुर्ग भी अपने हठधर्मी और अधिकार का दुरूपयोग करते हुए बच्चों को परेशान कर देते हैं। वहां उन बुजुर्गों को जरूरत है समझाने की। जहाँ बच्चों के उपेक्षा और तिरस्कार का शिकार बुजुर्ग होते हैं तो वहां समझाने की जरूरत है उन बेटे और बेटियों को।
यह सही है कि यह रास्ता आसान नहीं है, किंतु प्रयास किया जा सकता है और क़ानून जिसे नहीं रोक सकता है ,वहां पर काउंसिलिंग रोक सकती है और उन्हें दिशा दिखा सकती है। बच्चे उद्दंड हो रहे हैं, लेकिन हमारे पास यह समझाने का समय ही कहाँ है कि वे ऐसे क्यों हो रहे है? उन्हें जो बचपन से घर में दिखाई दे रहा है , उसको ही ग्रहण कर रहे हैं। हमारे पास समय कहाँ है उनकी बात सुनाने का ? उनको सही दिशा कौन दे? जो उन्होंने अपने साथियों में देखा , घर में देखा उसी पर चलना शुरू कर दिया। हमने ग़लत देखा तो बस फटकार और मार को हल समझ लिया लेकिन अपनी गलती तब भी नहीं देख पाये। जब तक अपनी गलती समझते हैं तब तक पानी सर से गुजर चुका होता है। यह काम पुरूष से अधिक नारी कर सकती है। बच्चों को संस्कार पिता से कम और माँ से अधिक मिलते हैं, क्योंकि वह सबसे करीब माँ के होता है। पहले घर से शुरू करें और फिर अपने आस-पास चले। सही होने पर कितने आपको ग़लत समझेंगे। मर्म समझाने पर सभी इसको स्वीकार कर लेंगे.
फिर क्यों न एक बार मेरे इस विचार को मूर्त रूप देने में आप सभी सहयोग दें और फिर देखें की हम कितने सफल हैं अपने प्रयास में। जिस स्थिति में आज देश और समाज खड़ा है उसके लिए कुछ तो करने का संकल्प लेना पड़ेगा।
शायद हम कुछ कर सकें.
मंगलवार, 6 जनवरी 2009
रविवार, 21 दिसंबर 2008
धर्म की आड़ में!
क्या इतने ऊपर जाकर भी नारी किसी की नजर में आज भी उपभोग की वस्तु बन कर रह रही है कि जब तक उसका मन चाहा उपभोग किया और जब ऊब गए तो जब चाहा छोड़ दिया। दूसरी औरत जो उसकी जिन्दगी में आ जाती है। उस पत्नी को कानूनी पत्नी का हक़ दिलाने के लिए सबसे आसन और त्वरित अस्त्र है ' इस्लाम धर्म' कबूल करके अपने सम्बन्ध पर वैधता की मुहर लगवा ली। न "तलाक़" जैसी प्रक्रिया में फंसने की जरूरत और न ही इन्तजार में सालों गुजारने की जहमत।
आप लोग समझ गए होंगे कि यह कोई नया किस्सा नहीं है लेकिन किसका कौन सा वाक्य जेहन में घुस कर बवंडर मचा दे यह कहा नहीं जा सकता है - यह किस्सा है हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्र मोहन उर्फ चाँद मोहम्मद के वाकये को लेकर यह सवाल उठा है।
वैवाहिक जीवन और विवाह संस्था हर धर्म में उतनी ही महत्वपूर्ण है, चाहे हिंदू धर्म हो या फिर इस्लाम। मौकापरस्ती में फायदा उठाने के लिए इस्लाम कुबूल कर लिया और नाम बदल कर निकाह कर लिया।
कभी उस धर्म में बहु विवाह कि अनुमति दिए जाने के साथ जुड़े दायित्वों को पढने कि कोशिश की शायद नहीं, न वे अपने ईमान से हिंदू रहे और न ही मुस्लिम बन पाये।
क्या वे नमाज अदा करेंगे?
क्या वे इदुल्फितर और मुहर्रम को मानेगे?
क्या उन्होंने इससे पहले शरीयत का अध्ययन किया है?
शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि वे इस धर्म को इसलिए अपनाएंगे। इस्लाम भी दूसरे विवाह कि अनुमति देने के साथ साथ पहली पत्नी के सारे 'हक' अदा करने कि बात करता हैं , न कि अपनी सुख और सुविधा के अनुसार पहली पत्नी और बच्चों को त्यागने की।
चंद्र मोहन उर्फ चाँद मोहम्मद का यह बयान कि पहली पत्नी और बच्चे अगर आए भी तो उनको भगा दूँगा। उनके मानसिक दिवालियेपन को दिखाता है। इस्लाम धर्म के जुड़े नैतिक मूल्यों के प्रति अनभिज्ञता को प्रदर्शित करता है। चाहे जो भी धर्म हो उसके नैतिक और सामजिक मूल्य एक ही होते है , उनमें फर्क नहीं होता। अन्याय का सभी में विरोध किया जाता है।
कोई धर्म और धर्माचार्य इसको धर्म सांगत नहीं कहेगा तो धर्म की आड़ में होने वाले इस खेल पर अंकुश लगना चाहिए। सिर्फ स्वार्थ के लिए धर्म परिवर्तन करके विवाह करना चाहें उन्हें धर्म अनुमति न दे। विवाह से पहले उन्हें कम से कम एक साल पहले धर्म को बदलकर उसके धार्मिक नियमों को पालन करते हुए आचरण करना चाहिए तभी उन्हें इस धर्म के नियमानुसार विवाह की अनुमति प्रदान की जाए। धर्म के नियमों का उल्लंघन करने पर उन्हें दण्डित किया जाए।
सामाजिक, धार्मिक और नैतिक मूल्य तथाकथित 'माननीयों' पर लागू नहीं होते । इनको भी क़ानून की हद में लाना होगा। स्वार्थ या फिर धन के लालच में उनका साथ देने वालों पर लानत है, जो एक धर्म की आड़ में अनैतिकता के इस व्यापार को हवा देते हैं.
आप लोग समझ गए होंगे कि यह कोई नया किस्सा नहीं है लेकिन किसका कौन सा वाक्य जेहन में घुस कर बवंडर मचा दे यह कहा नहीं जा सकता है - यह किस्सा है हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्र मोहन उर्फ चाँद मोहम्मद के वाकये को लेकर यह सवाल उठा है।
वैवाहिक जीवन और विवाह संस्था हर धर्म में उतनी ही महत्वपूर्ण है, चाहे हिंदू धर्म हो या फिर इस्लाम। मौकापरस्ती में फायदा उठाने के लिए इस्लाम कुबूल कर लिया और नाम बदल कर निकाह कर लिया।
कभी उस धर्म में बहु विवाह कि अनुमति दिए जाने के साथ जुड़े दायित्वों को पढने कि कोशिश की शायद नहीं, न वे अपने ईमान से हिंदू रहे और न ही मुस्लिम बन पाये।
क्या वे नमाज अदा करेंगे?
क्या वे इदुल्फितर और मुहर्रम को मानेगे?
क्या उन्होंने इससे पहले शरीयत का अध्ययन किया है?
शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि वे इस धर्म को इसलिए अपनाएंगे। इस्लाम भी दूसरे विवाह कि अनुमति देने के साथ साथ पहली पत्नी के सारे 'हक' अदा करने कि बात करता हैं , न कि अपनी सुख और सुविधा के अनुसार पहली पत्नी और बच्चों को त्यागने की।
चंद्र मोहन उर्फ चाँद मोहम्मद का यह बयान कि पहली पत्नी और बच्चे अगर आए भी तो उनको भगा दूँगा। उनके मानसिक दिवालियेपन को दिखाता है। इस्लाम धर्म के जुड़े नैतिक मूल्यों के प्रति अनभिज्ञता को प्रदर्शित करता है। चाहे जो भी धर्म हो उसके नैतिक और सामजिक मूल्य एक ही होते है , उनमें फर्क नहीं होता। अन्याय का सभी में विरोध किया जाता है।
कोई धर्म और धर्माचार्य इसको धर्म सांगत नहीं कहेगा तो धर्म की आड़ में होने वाले इस खेल पर अंकुश लगना चाहिए। सिर्फ स्वार्थ के लिए धर्म परिवर्तन करके विवाह करना चाहें उन्हें धर्म अनुमति न दे। विवाह से पहले उन्हें कम से कम एक साल पहले धर्म को बदलकर उसके धार्मिक नियमों को पालन करते हुए आचरण करना चाहिए तभी उन्हें इस धर्म के नियमानुसार विवाह की अनुमति प्रदान की जाए। धर्म के नियमों का उल्लंघन करने पर उन्हें दण्डित किया जाए।
सामाजिक, धार्मिक और नैतिक मूल्य तथाकथित 'माननीयों' पर लागू नहीं होते । इनको भी क़ानून की हद में लाना होगा। स्वार्थ या फिर धन के लालच में उनका साथ देने वालों पर लानत है, जो एक धर्म की आड़ में अनैतिकता के इस व्यापार को हवा देते हैं.
गुरुवार, 4 दिसंबर 2008
फिर से शुरू करें!
आज तो यह आम हो चुका है कि बच्चे माँ - बाप को छोड़ कर पढने चले गए या फिर नौकरी के लिए चले गए। सभी बच्चों को उनकी रूचि के अनुसार जाना ही है। यह भी आम बात में शुमार हो चुका है कि बच्चे विदेश पढने या नौकरी के लिए जा रहे हैं और माँ-बाप अकेले घर में रहा जाते हैं। यह तो प्रकृति का नियम है - पशु और पक्षी भी पर निकलने तक माँ-बाप से दाने लेते और फिर अपने पर फैला कर उड़ जाते हैं। नया घौसला बनाने के लिए।
शर्मा दंपत्ति , गुप्ता दंपत्ति, सिंह दंपत्ति सभी ऐसे ही है और न जाने कितने लोग जो कि अब अकेले रह रहे हैं. मैं भी इसी श्रेणी में आती हूँ। फिर ऐसे लोग क्या करते हैं ?
अरे क्या बच्चे हैं नहीं हम दोनों हैं कुछ भी बना लिया और खा लिया।
घर में ही पड़े रहते हैं ,न कहीं जाने का मन करता है और न घूमने फिरने का।
दिन में कुछ भी नहीं बनती हूँ , बस एक बार शाम को बना लेती हूँ।
दिन भर घर में पड़े पड़े बोरे हो जाती हूँ।
दिन काटे नहीं कटता है, शाम होने के इन्तजार में बैठी रहती हूँ।
टीवी भी कहाँ तक देखें, सभी सीरियलों में एक ही कहानी होती है।
खाली घर काटने को दौड़ता है।
यह नहीं सोचा था कि बिल्कुल अकेले रह जायेंगे।
यह सोच है , अधेड़ उम्र के लोगों कि, जहाँ पर वे अकेले रह गए हैं, उन लोगों ने इस एकाकीपन को अपना प्रारब्ध मान लिया है या फिर इस ढर्रे पर जीवन को ढाल लिया है। जीवन के इस पड़ाव का भी अपना एक अलग उद्देश्य बनाइये। हम स्वार्थी तो नहीं हो सकते हैं कि बच्चों को बाहर न जाने दें या फिर उनको कहें कि यही कोई नौकरी खोज लो। कम मिलेगा घर में तो रहोगे घर का कम ही ठीक है। बाहर का हजार घर में सौ अच्छे होते हैं। यह भी धारणा होती है लोगों में.
लेकिन उक्त दंपत्तियों की श्रेणी में इस लिहाज से मैं नहीं आती हूँ कि हम दोनों उनकी तरह से घर में कैद नहीं हैं या फिर अगर नौकरी में न होते तो क्या घर में कैद होना ठीक है। जीवन को अब अपने नजरिये से देखिये, बच्चों का अपना भविष्य बनाने का समय है और उन्हें कुछ बनने के लिए ही तो हम ने इतनी मेहनत कि है, उन्हें समय से नाश्ता देना , स्कूल और कोचिंग भेजना तब जाकर उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया है। यह लक्ष्य सिर्फ उनका ही नहीं था हमारा भी एक सपना था कि हमारे बच्चे भविष्य में यह बनें ।
अपने जीवन में प्रवेश करने से लेकर आज तक क्या आपको समय मिला अपने बारे में सोचने का। आते ही बहू के दायित्वों को उठा लिया फिर धीरे धीरे बच्चे और उनका बचपन देखने में निकल गया जीवन। बच्चों के बड़े होने तक अपने सारे शौक भूल कर उनको आगे ले जाने कि फिक्र में ही तो जीते रहते हैं माँ-बाप। अब इस पड़ाव पर जब अपने माँ-बाप के साए से भी आप वंचित हो गए है और बच्चों के साथ से भी , तब क्या जीवन कि इतिश्री यही हो जाती है। नहीं अब शुरू होता है अपने जीवन का असली सफर , कोई चिंता नहीं। इसको पूरी तरह से एन्जॉय कीजिये। जिस साथ के लिए अब तक समय नहीं मिला , वह अवसर अब ही तो मिला है। कहीं भी घूमने निकल जाइये। शहर के अन्दर या शहर के बाहर। समय कम लगने लगेगा इन सब चीजों के लिए। अगर आप समर्थ तो फिर उसको दूसरे तरीके से एन्जॉय कीजिये। एक निश्चित ध्येय बनाइये कि हफ्ते में एक दिन हमें गरीबों कि बस्ती में जाना है और उनके लिए भी कुछ करना है। कभी उनके लिए बच्चों के पुराने कपडे निकाल लीजिये और जाकर उनको बाँट दीजिये। मौसम के अनुसार उनके लिए फल लेकर जा सकती हैं। आपको यह पता ही होगा कि यह सब चीजें इन बच्चों के लिए सपना होती हैं। रोटी के लिए वे माँ बाप सुबह से शाम तक बच्चों को छोड़ कर चले जाते हैं तब उन्हें शाम को खाना मिल पता है। कभी अनाथालयों में चले जाइए और देखिये कितने बच्चे दो प्यार भरे बोलों को तरस रहे हैं । उन्हें अपना दोस्त बना लीजिये, बाँट लीजिये उनके मन के भरे गुबार को। वे नहीं जानते कि प्यार क्या होता है? अपनों से तो वे महरूम होते ही हैं, दो मीठे बोल से भी महरूम होते हैं।
पति ऑफिस चले गए आप यदि कामकाजी नहीं हैं तो दिन भर क्या करेंगी? टीवी देखेंगी या फिर पड़ोस में चली जायेंगी, वह भी हर जगह उपलब्ध नहीं होता है। तब आप अपने आपको इस तरह से व्यस्त रख सकती हैं। मेरी शुरू से ही आदत है कि मेरे कार्य स्थल पर बाहर से बच्चे आते हैं , जितने दिन उनको काम करना हुआ किया और फिर चले गए।
अगर मुझे उनकी पसंद पता है तो मैं कभी कभी उनको घर से वाही चीज बनाकर लाती हूँ और खिलाती हूँ। अपने घर से दूर होस्टल में रहते हुए उन्हें घर कि याद आती है। जिसने अपनत्व रखा अच्छा है और नहीं तो और बच्चों कि तरह से ही वे भी चले गए कोई बात नहीं। पर आज मेरा इतना बड़ा परिवार है कि वे बच्चे कहीं भी रहें। विदेश में हैं तो और यहाँ हैं तो नेट से हमेशा जुड़े रहते हैं। आंटी मेरी शादी है आना जरूर है, आप नानी बन गई , दादी बन गई। क्या है यह सब है प्यार देने का पारितोषक। जिसने कभी मुझे अकेले रहने ही नहीं दिया है। इसके लिए उम्र आडे नहीं आती है आप बड़ों के साथ बड़े बन कर उनके हमराज बन जाइए और छोटों के साथ छोटे बनकर । आप अकेले कब हैं? दुनिया बहुत बड़ी है बस उसको अपनी नजर से देखना होगा।
देखिये जीवन कितना सुखमय बन जायेगा। लगेगा ही नहीं कि हम अकेले हैं।
शर्मा दंपत्ति , गुप्ता दंपत्ति, सिंह दंपत्ति सभी ऐसे ही है और न जाने कितने लोग जो कि अब अकेले रह रहे हैं. मैं भी इसी श्रेणी में आती हूँ। फिर ऐसे लोग क्या करते हैं ?
अरे क्या बच्चे हैं नहीं हम दोनों हैं कुछ भी बना लिया और खा लिया।
घर में ही पड़े रहते हैं ,न कहीं जाने का मन करता है और न घूमने फिरने का।
दिन में कुछ भी नहीं बनती हूँ , बस एक बार शाम को बना लेती हूँ।
दिन भर घर में पड़े पड़े बोरे हो जाती हूँ।
दिन काटे नहीं कटता है, शाम होने के इन्तजार में बैठी रहती हूँ।
टीवी भी कहाँ तक देखें, सभी सीरियलों में एक ही कहानी होती है।
खाली घर काटने को दौड़ता है।
यह नहीं सोचा था कि बिल्कुल अकेले रह जायेंगे।
यह सोच है , अधेड़ उम्र के लोगों कि, जहाँ पर वे अकेले रह गए हैं, उन लोगों ने इस एकाकीपन को अपना प्रारब्ध मान लिया है या फिर इस ढर्रे पर जीवन को ढाल लिया है। जीवन के इस पड़ाव का भी अपना एक अलग उद्देश्य बनाइये। हम स्वार्थी तो नहीं हो सकते हैं कि बच्चों को बाहर न जाने दें या फिर उनको कहें कि यही कोई नौकरी खोज लो। कम मिलेगा घर में तो रहोगे घर का कम ही ठीक है। बाहर का हजार घर में सौ अच्छे होते हैं। यह भी धारणा होती है लोगों में.
लेकिन उक्त दंपत्तियों की श्रेणी में इस लिहाज से मैं नहीं आती हूँ कि हम दोनों उनकी तरह से घर में कैद नहीं हैं या फिर अगर नौकरी में न होते तो क्या घर में कैद होना ठीक है। जीवन को अब अपने नजरिये से देखिये, बच्चों का अपना भविष्य बनाने का समय है और उन्हें कुछ बनने के लिए ही तो हम ने इतनी मेहनत कि है, उन्हें समय से नाश्ता देना , स्कूल और कोचिंग भेजना तब जाकर उन्हें इस मुकाम तक पहुँचाया है। यह लक्ष्य सिर्फ उनका ही नहीं था हमारा भी एक सपना था कि हमारे बच्चे भविष्य में यह बनें ।
अपने जीवन में प्रवेश करने से लेकर आज तक क्या आपको समय मिला अपने बारे में सोचने का। आते ही बहू के दायित्वों को उठा लिया फिर धीरे धीरे बच्चे और उनका बचपन देखने में निकल गया जीवन। बच्चों के बड़े होने तक अपने सारे शौक भूल कर उनको आगे ले जाने कि फिक्र में ही तो जीते रहते हैं माँ-बाप। अब इस पड़ाव पर जब अपने माँ-बाप के साए से भी आप वंचित हो गए है और बच्चों के साथ से भी , तब क्या जीवन कि इतिश्री यही हो जाती है। नहीं अब शुरू होता है अपने जीवन का असली सफर , कोई चिंता नहीं। इसको पूरी तरह से एन्जॉय कीजिये। जिस साथ के लिए अब तक समय नहीं मिला , वह अवसर अब ही तो मिला है। कहीं भी घूमने निकल जाइये। शहर के अन्दर या शहर के बाहर। समय कम लगने लगेगा इन सब चीजों के लिए। अगर आप समर्थ तो फिर उसको दूसरे तरीके से एन्जॉय कीजिये। एक निश्चित ध्येय बनाइये कि हफ्ते में एक दिन हमें गरीबों कि बस्ती में जाना है और उनके लिए भी कुछ करना है। कभी उनके लिए बच्चों के पुराने कपडे निकाल लीजिये और जाकर उनको बाँट दीजिये। मौसम के अनुसार उनके लिए फल लेकर जा सकती हैं। आपको यह पता ही होगा कि यह सब चीजें इन बच्चों के लिए सपना होती हैं। रोटी के लिए वे माँ बाप सुबह से शाम तक बच्चों को छोड़ कर चले जाते हैं तब उन्हें शाम को खाना मिल पता है। कभी अनाथालयों में चले जाइए और देखिये कितने बच्चे दो प्यार भरे बोलों को तरस रहे हैं । उन्हें अपना दोस्त बना लीजिये, बाँट लीजिये उनके मन के भरे गुबार को। वे नहीं जानते कि प्यार क्या होता है? अपनों से तो वे महरूम होते ही हैं, दो मीठे बोल से भी महरूम होते हैं।
पति ऑफिस चले गए आप यदि कामकाजी नहीं हैं तो दिन भर क्या करेंगी? टीवी देखेंगी या फिर पड़ोस में चली जायेंगी, वह भी हर जगह उपलब्ध नहीं होता है। तब आप अपने आपको इस तरह से व्यस्त रख सकती हैं। मेरी शुरू से ही आदत है कि मेरे कार्य स्थल पर बाहर से बच्चे आते हैं , जितने दिन उनको काम करना हुआ किया और फिर चले गए।
अगर मुझे उनकी पसंद पता है तो मैं कभी कभी उनको घर से वाही चीज बनाकर लाती हूँ और खिलाती हूँ। अपने घर से दूर होस्टल में रहते हुए उन्हें घर कि याद आती है। जिसने अपनत्व रखा अच्छा है और नहीं तो और बच्चों कि तरह से ही वे भी चले गए कोई बात नहीं। पर आज मेरा इतना बड़ा परिवार है कि वे बच्चे कहीं भी रहें। विदेश में हैं तो और यहाँ हैं तो नेट से हमेशा जुड़े रहते हैं। आंटी मेरी शादी है आना जरूर है, आप नानी बन गई , दादी बन गई। क्या है यह सब है प्यार देने का पारितोषक। जिसने कभी मुझे अकेले रहने ही नहीं दिया है। इसके लिए उम्र आडे नहीं आती है आप बड़ों के साथ बड़े बन कर उनके हमराज बन जाइए और छोटों के साथ छोटे बनकर । आप अकेले कब हैं? दुनिया बहुत बड़ी है बस उसको अपनी नजर से देखना होगा।
देखिये जीवन कितना सुखमय बन जायेगा। लगेगा ही नहीं कि हम अकेले हैं।
सोमवार, 1 दिसंबर 2008
कहाँ गई नैतिकता!
देश अभी उबर नहीं है उन ६० घंटों के भयावह धमाकों और बरबादियों से और हमारे जन प्रतिनिधि कहे जाने वाले सांसद और विधायक बड़ी बड़ी फूल मालाएं पहने कहीं स्टेशन का उद्घाटन कर रहे हैं। वह भी उस स्थिति में जब की राज्य में पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री वि पि सिंह जी के निधन पर हम राष्ट्रीय शोक मना रहे हैं।
अरे नैतिकता तो एक बिना पढ़े लिखे लोगों में भी होती है फिर देश जिस विपदा से अभी गुजरा है लोगों ने तो शादी जैसे कार्यक्रम टाल दिए है या फिर बिना दिखावे के सम्पन्न किए हैं फिर यह जन प्रतिनिधि क्या अपनी सत्ता के डंका पीट रहे हैं।
धिक्कार रहा है वही जन तुमको जिसने तुमको चुना था लेकिन वह भी विवश है और अफसोस कर रहा है अपने चुनाव पर। पति-पत्नी सांसद और विधायक हैं फिर किसी और की जरूरत क्या है? दोनों में से शायद किसी को भी यह शर्म नहीं आई की हम क्या कराने जा रहे और किस माहौल में।
हाय रे! हमारे नेता और राजनीति के चतुर चितेरे - अरे कुछ पैसा उनलोगों में भी बाँट देते जो अपने लोगों से वंचित हो गए हैं, वे तुम्हारे अपने हैं जी हाँ उन्होंने ने ही आपको चुनकर सांसद और विधायक बनाया है। पर आपको तो अपने पद का रुतबा और शान दिखाने से फुरसत कब है। कभी झाँका है उन गलियों में दुबारा जहाँ आप पैदल चल कर वोट माँगने गए थे। उन्हें सरोकार नहीं है देश और राज्य की घटनाओं से , वे तो यह सोचते है की कैसे अखबार में सुर्खियों में नजर आ सकते हैं।
अरे एक शोक सभा ही कर डालते तब भी सुर्खियों में आ सकते थे और भविष्य के लिए एक अच्छे नेता भी बन सकते थे अरे अच्छे नेता नहीं बन सकते तो एक अच्छे इंसान ही बनकर मानवता और नैतिकता के मूल्यों का आदर करना सीखिए और सोचिये आप क्या है? आपको क्या और कैसा आचरण शोभा देता है? आपसे अच्छा एक आम आदमी है जो इस संकट के समय में राष्ट्र के साथ साथ ख़ुद को भी इस भयावह त्रासदी को सहने में सहयोग दे रहा है.
अरे नैतिकता तो एक बिना पढ़े लिखे लोगों में भी होती है फिर देश जिस विपदा से अभी गुजरा है लोगों ने तो शादी जैसे कार्यक्रम टाल दिए है या फिर बिना दिखावे के सम्पन्न किए हैं फिर यह जन प्रतिनिधि क्या अपनी सत्ता के डंका पीट रहे हैं।
धिक्कार रहा है वही जन तुमको जिसने तुमको चुना था लेकिन वह भी विवश है और अफसोस कर रहा है अपने चुनाव पर। पति-पत्नी सांसद और विधायक हैं फिर किसी और की जरूरत क्या है? दोनों में से शायद किसी को भी यह शर्म नहीं आई की हम क्या कराने जा रहे और किस माहौल में।
हाय रे! हमारे नेता और राजनीति के चतुर चितेरे - अरे कुछ पैसा उनलोगों में भी बाँट देते जो अपने लोगों से वंचित हो गए हैं, वे तुम्हारे अपने हैं जी हाँ उन्होंने ने ही आपको चुनकर सांसद और विधायक बनाया है। पर आपको तो अपने पद का रुतबा और शान दिखाने से फुरसत कब है। कभी झाँका है उन गलियों में दुबारा जहाँ आप पैदल चल कर वोट माँगने गए थे। उन्हें सरोकार नहीं है देश और राज्य की घटनाओं से , वे तो यह सोचते है की कैसे अखबार में सुर्खियों में नजर आ सकते हैं।
अरे एक शोक सभा ही कर डालते तब भी सुर्खियों में आ सकते थे और भविष्य के लिए एक अच्छे नेता भी बन सकते थे अरे अच्छे नेता नहीं बन सकते तो एक अच्छे इंसान ही बनकर मानवता और नैतिकता के मूल्यों का आदर करना सीखिए और सोचिये आप क्या है? आपको क्या और कैसा आचरण शोभा देता है? आपसे अच्छा एक आम आदमी है जो इस संकट के समय में राष्ट्र के साथ साथ ख़ुद को भी इस भयावह त्रासदी को सहने में सहयोग दे रहा है.
गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008
देश के दुश्मन!
कभी पाकिस्तान बना था तो वहां पर जो हैवानियत का तांडव हुआ था , कमोबेश उसी से गुजर रहा है देश। किस लिए?
वे भाषा और राज्य के आधार पर देश के टुकड़े करना चाहते हैं। दूसरे हमारी युवा पीढी किस तरह से उसकी प्रतिक्रिया दे रही है। क्या एक पागल हो तो सारा युवा वर्ग ही पागल हो जायेगा। हमें अपनी सोच को बदलना होगा - हमारी सोच होनी चाहिए एकता के लिए। हम भारतीय है और सम्पूर्ण देश में हमारा अधिकार है, कौन कहाँ रहता है, इसका कोई भी अर्थ नहीं है।
कितना तरस आता है उनकी सोच पर कि वे इसी भारत भूमि के पुत्र हैं जिसमें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि अवधारणा को जन्म दिया है। अपने ही घर में हम विराने होने लगे हैं। यह देश के सपूत नहीं हैं कपूत हैं जो कि उसके टुकड़े करके अपना स्वामित्व जमाना चाहते हैं। न यह धरती और न ही आकाश किसी कि जागीर नहीं है। इसको क्या कहा जाय आम आदमी कि सोच या फिर राजनीति के तवे पर स्वार्थ कि सिकती हुई रोटियां, जो बहुत तकलीफ दे रही हैं। कितने तनाव से गुजर रहे हैं वे लोग, जो दीपावली पर अपने घर आने का रास्ता देख रहे थे। ट्रेन जला रहे हैं, रद्द कर दी गयीं हैं। वे माँ-बाप जो अपने बच्चों कि राह देख रहे हैं । किसी के ऊपर इसका फर्क नहीं पड़ रहा है। कभी सोचा है कि जिनके बच्चे नहीं आ पाए उनकी दीवाली कैसी होगी? पटाखों कि गूँज क्या उनके दिल को चीर कर नहीं रख देंगे। दिए वे भी जलाएंगे लेकिन उनकी रौशनी क्या उनके दिल को रोशन कर पाएगी या उन्हें वो खुशी दे पाएगी जो उन्हें बच्चों के साथ मिलती।
सवाल इस बात का है कि ऐसे देश को तोड़ने की साजिश रचने वालों को देशद्रोही करार देना चाहिए। उनकी सजा क़ानून तय करे, वे सिर्फ देश के ही नहीं मानवता के भी अपराधी हैं। जन और धन कि जो हानि हो रही है उसकी भरपाई कौन करेगा। क्या और ऐसे तत्व इसका फायदा नहीं उठाएंगे । कौन सा ऐसा राज्य है जिसके निवासी पूरे भारत में न रह रहे हो, अपना नौकरी के लिए, पढ़ाई के लिए या फिर व्यवसाय के लिए। फिर ऐसी क्षुद्र मानसिकता क्यों? क्या हल हो सकता है इसका? क्या परिणाम हो सकते हैं इसके? यह सोच कर कि कर कोई रहा है और इसका खामियाजा कोई और भुगत रहा है, वे निर्दोष है जिन्हें उस राज्य के नाम पर प्रताडित किया जा रहा है. यहाँ नैतिकता भी शर्मसार हो रही है. उनके उन्माद से क्या महिलायें और क्या लड़कियाँ कोई भी नहीं बच रहीं है. यह सिर्फ आज कि समस्या नहीं है - बार बार उठी है और इसी तरह से उठती रहेगी. इसके लिए सोचना होगा और एक स्वस्थ मानसिकता को विक्सित करना होगा. उसके लिए नेताओं कि जरूरत नहीं है सिर्फ मानव कि आवश्यकता है और कम से कम इसको कम करने के लिए मानवतावादियों को तो आगे आना चाहिए.
वे भाषा और राज्य के आधार पर देश के टुकड़े करना चाहते हैं। दूसरे हमारी युवा पीढी किस तरह से उसकी प्रतिक्रिया दे रही है। क्या एक पागल हो तो सारा युवा वर्ग ही पागल हो जायेगा। हमें अपनी सोच को बदलना होगा - हमारी सोच होनी चाहिए एकता के लिए। हम भारतीय है और सम्पूर्ण देश में हमारा अधिकार है, कौन कहाँ रहता है, इसका कोई भी अर्थ नहीं है।
कितना तरस आता है उनकी सोच पर कि वे इसी भारत भूमि के पुत्र हैं जिसमें 'वसुधैव कुटुम्बकम' कि अवधारणा को जन्म दिया है। अपने ही घर में हम विराने होने लगे हैं। यह देश के सपूत नहीं हैं कपूत हैं जो कि उसके टुकड़े करके अपना स्वामित्व जमाना चाहते हैं। न यह धरती और न ही आकाश किसी कि जागीर नहीं है। इसको क्या कहा जाय आम आदमी कि सोच या फिर राजनीति के तवे पर स्वार्थ कि सिकती हुई रोटियां, जो बहुत तकलीफ दे रही हैं। कितने तनाव से गुजर रहे हैं वे लोग, जो दीपावली पर अपने घर आने का रास्ता देख रहे थे। ट्रेन जला रहे हैं, रद्द कर दी गयीं हैं। वे माँ-बाप जो अपने बच्चों कि राह देख रहे हैं । किसी के ऊपर इसका फर्क नहीं पड़ रहा है। कभी सोचा है कि जिनके बच्चे नहीं आ पाए उनकी दीवाली कैसी होगी? पटाखों कि गूँज क्या उनके दिल को चीर कर नहीं रख देंगे। दिए वे भी जलाएंगे लेकिन उनकी रौशनी क्या उनके दिल को रोशन कर पाएगी या उन्हें वो खुशी दे पाएगी जो उन्हें बच्चों के साथ मिलती।
सवाल इस बात का है कि ऐसे देश को तोड़ने की साजिश रचने वालों को देशद्रोही करार देना चाहिए। उनकी सजा क़ानून तय करे, वे सिर्फ देश के ही नहीं मानवता के भी अपराधी हैं। जन और धन कि जो हानि हो रही है उसकी भरपाई कौन करेगा। क्या और ऐसे तत्व इसका फायदा नहीं उठाएंगे । कौन सा ऐसा राज्य है जिसके निवासी पूरे भारत में न रह रहे हो, अपना नौकरी के लिए, पढ़ाई के लिए या फिर व्यवसाय के लिए। फिर ऐसी क्षुद्र मानसिकता क्यों? क्या हल हो सकता है इसका? क्या परिणाम हो सकते हैं इसके? यह सोच कर कि कर कोई रहा है और इसका खामियाजा कोई और भुगत रहा है, वे निर्दोष है जिन्हें उस राज्य के नाम पर प्रताडित किया जा रहा है. यहाँ नैतिकता भी शर्मसार हो रही है. उनके उन्माद से क्या महिलायें और क्या लड़कियाँ कोई भी नहीं बच रहीं है. यह सिर्फ आज कि समस्या नहीं है - बार बार उठी है और इसी तरह से उठती रहेगी. इसके लिए सोचना होगा और एक स्वस्थ मानसिकता को विक्सित करना होगा. उसके लिए नेताओं कि जरूरत नहीं है सिर्फ मानव कि आवश्यकता है और कम से कम इसको कम करने के लिए मानवतावादियों को तो आगे आना चाहिए.
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