शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

मजदूर दिवस - !

                         आज मजदूर दिवस है - आज कोई मजदूर काम नहीं करेगा? 
  • लेकिन क्या और दिवसों की तरह से इन मजदूरों का भी कहीं सम्मान किया जाएगा? 
  • सरकार आज का वेतन इनको मुफ्त में बांटेगी? 
  • वे संस्थाएं जो मजदूर दिवस का ढिंढोरा पीटती रहती हैं, इनको एक दिन कहीं होटल में सही ढाबे में ही मुफ्त खाना खिलवायेंगी ? 
  • इनके इलाके में कोई ठेकेदार या पैसे वाला मुफ्त में मिठाई बांटेगा? 
  • आज इनके मनोरंजन के लिए कोई कार्यक्रम इनकी झुग्गी - झोपड़ियों के आस-पास किये जायेंगे? 
                         अरे ऐसा कुछ भी नहीं होगा. आज की बिचारों की दिहाड़ी ही मारी जायेगी. इससे तो अच्छा होता कि   आज के काम के बदले इनको दुगुनी मजदूरी दे दी जाती तो ये भी इस दिन की कुछ ख़ुशी मना लेते. हाँ बड़ी बड़ी सरकारी   फैक्टरी में भले ही इनके हितार्थ कुछ होता हो. लेकिन वे मजदूर जो बिहार , छत्तीसगढ़, झारखण्ड , असम से तक आ कर यहाँ भवन निर्माण में कम करते हैं, उनकी कोई यूनियन नहीं होती. यहाँ तक की औरत और आदमी के काम के घंटे तो बराबर होते हैं लेकिन उनकी मजदूरी में फर्क होता है. 
बड़ी बड़ी फैक्ट्री और मिलों  में तो उनको बोनस भी मिल जाता है लेकिन ये जो वाकई मजदूर है, इनके लिए न कोई भविष्य है और नहीं वर्तमान. जब तक इनके हाथ पैर चल रहे हैं, ये कमाते रहेंगे और फिर इसके बाद इनके बच्चों को भी यही करना होता है. 
                      हाँ इन मजदूरों के संदर्भ ये जरूर जिक्र करना चाहूंगी की आई आई टी में  निर्माण कार्य में काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के लिए यहाँ के छात्र शिक्षित करने में खुद अपना समय देते हैं और उनके लिए जरूरी सामग्री की व्यवस्था भी करते हैं. अगर वे स्वयं यहाँ तक पहुंचे हैं तो उनमें मानवता के ये गुण शेष हैं. उनका यही प्रयास इस मजदूर दिवस के लिए सबसे सार्थक है. क्योंकि इन मजदूरों से उनका सिर्फ मानवता का रिश्ता है. वे उनके नौकर नहीं है, उनके लिए काम नहीं करते हैं फिर भी ये छात्र चाहते हैं की उनके बच्चे इतना पढ़ लें की पिता की तरह ईंट गारा ढो कर जीवनयापन न करें.

6 टिप्‍पणियां:

SANJEEV RANA ने कहा…

majdoor divas sirf kaagajo me chalta h
aaj bhi bebas h ye

rashmi ravija ने कहा…

इन बेचारे मजदूरों को पता भी नहीं होगा, कि इनके नाम पर कितने कागज़ काले किए जा रहें हैं और एयर कंडीशंड रूम में बैठकर धूप में तपते उन मजदूरों के नाम पर भाषण दिए जा रहें हैं..और दावत उडाई जा रही है..
बहुत अच्छा लगा जान आई. आई. टी. के छात्र इनका इतना ख़याल रखते हैं और इनके अच्छे जीवन के लिए प्रयासरत हैं.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

और दिवसों की तरह भाषणबाजी करते हुए ये दिवस भी बीत जायेगा. मजदूर जहां था वहीं रह जायेगा.

Udan Tashtari ने कहा…

आई आई टी में काम कर रहें मजदूरों के बच्चों के लिए होता सार्थक प्रयास प्रेरणादायी है. कुछ आशा की किरण बाकी है अभी.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

समीर जी,

इस मामले में आई आई टी में अभी बहुत मानवता बाकी है , हमारे पूर्व राष्ट्रपति वेंकट रमण कि बेटी श्रीमती रामचंद्रन भी यहाँ पर गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाती थी. जब तक वह कानपुर में रही अपने काम को अच्छी तरह करती रही.

shikha varshney ने कहा…

रेखा जी ! बहुत अच्छा लगा पढ़ कर कि कम से कम नई पीडी के पड़े लिखे नौज़बानो में ये जज्बा तो है..