बुधवार, 17 नवंबर 2010

आदर्शवाद का ढोंग !

                              मैंने अपने जीवन में ऐसा कोई काम शायद जानबूझ कर नहीं किया कि लोग मुझ पर अंगुली उठा सकें लेकिन 
                           लाभ हानि जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ    

     तुलसीदास जी की इन पंक्तियों को तो मैं भूल ही गयी थी. मेरी एक टिप्पणी पर हमारे ब्लोगर भाई परम आर्य जी ने ऐसी टिप्पणी की कि मैंने मानव जाति की बात कैसे कर सकती हूँ जब कि मैंने स्वयं अपने नाम के आगे अपनी जाति लगा रखी है. ये आदर्शवाद  का ढोंग है.' 
               उनकी टिप्पणी ने मुझे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया और फिर इसके लिए उठे प्रश्न से दो चार तो होना ही पड़ेगा. 
         क्या नाम के साथ लगी हुई जाति का प्रतीक इंसान की मानवता पर प्रश्न चिह्न लगा देता है? उसको मानवोचित गुणों से वंचित कर देता है या फिर उसकी सोच को जाति के दायरे से बाहर नहीं निकलने देता है. ऐसा कुछ भी नहीं है, ये जाति मेरे नाम के साथ मेरे पापा ने लगाई थी क्योंकि जब बच्चा स्कूल जाता है तो उसके माता पिता नाम देते हैं. मेरे पिता भी अपने नाम के साथ भी यही लगाते थे. किन्तु वे एक ऐसे इंसान थे जो इस दायरे से बाहर थे. हर जाति , धर्म और वर्ग में उनकी अपनी पैठ थी. उनके मित्र और अन्तरंग और सहयोगी थे. नाम कुछ भी हो मानवीय मूल्यों कि परिभाषा नहीं बदलती है या इसमें जाति या धर्म कहीं भी आड़े नहीं आता है.
                 फिर भी आर्य जी का ये आरोप कि जाति लगाकर इंसान मानव जाति और मानव धर्म कि बात नहीं कर सकता एकदम निराधार है. महात्मा गाँधी के साथ उनकी जाति का नाम जुड़ा था और वे क्या थे? उनका व्यक्तित्व क्या था? क्या गाँधी लगने से उनके आदर्शों और मूल्यों की कीमत कम हो गयी. सम्पूर्ण विश्व जिसके दिखाए मार्ग पर चलने की वकालत कर रहा है. अहिंसा का मार्ग ढोंग है, अगर नहीं तो इस आक्षेप का कोई अर्थ नहीं है. इतिहास उठाकर देखें तो यही ज्ञात होगा कि इंसान की सोच और कार्य के आगे नाम और उपनाम नगण्य है. इसका कुछ भी लेना या देना नहीं है. 
              रहा नाम के साथ जाति नाम लगाने का तो इसके लिए हमारी सोच ही इसको ख़त्म कर सकती है लेकिन ऐसी सोच और विचार तो हों. इस प्रसंग में मुझे अजय ब्रह्मात्मज का एक निबंध याद आ रहा है जो कि इसी विषय पर लिखा गया था और वह ५० हजार रुपये से पुरस्कृत भी किया गया था. उसमें उन्होंने लिखा था कि उनके पिता ने अपने बच्चों के नाम के आगे जाति लगने के स्थान पर अपने बेटों के नाम के आगे माँ का नाम और उसके साथ आत्मज जोड़ कर लगाया. इस तरह से ब्रह्मा + आत्मज = ब्रह्मात्मज लगाया और अपनी बेटी के नाम के साथ अपना नाम देव + आत्मजा = देवात्मजा लगाया. इस दृष्टिकोण के रखने वाले पिता को मेरा नमन है. इस सोच को रखने वाले पिता इस समय कम से कम ८० वर्ष के होंगे और इस सोच को उन्होंने आज से करीब ५५-६० वर्ष पहले मूर्त रूप दिया था.

22 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

विचारणीय आलेख्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

विचार पुख्ता होने चाहिए ...नाम के आगे जाति लगाने से यह साबित नहीं होता कि हमारी सोच जातीयता के सीमित दायरे में कैद है ...

वैसे मैं तो शादी के बाद से जातीय दायरे से ( नाम के आगे जाति सूचक शब्द लगाने से ) बाहर हूँ :):)...

मनोज कुमार ने कहा…

अपनी-अपनी सोच है। क्या कहें? आपके आलेख के विचारों से सहमत। सोच सही होनी चाहिए। बाक़ी नाम के आगे क्या लगाना हे (उपनाम) वह मायने नहीं रखता। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-श्री गुरुवे नमः

कविता रावत ने कहा…

Munde-munde matir bhina... sabkee apni soch hoti hai.. koi kisi kee soch nahi badal sakta jab tak wah khud iske liye taiyar na ho..
vicharniya aalekh achha laga...

PARAM ARYA ने कहा…

@ देवी जी , 'मेरी सोच' के हिसाब से मैंने आपका ध्यान आकृष्ट किया था ।
आपने यथोचित ध्यान दिया आभार
इससे आपकी संवेदनशीलता और गंभीरता परिलक्षित होती है ।
अपनी सोच और अपने कर्म को मनुष्य स्वयं ही ठीक से तौल सकता है ।

तिलक राज कपूर ने कहा…

नाम में क्‍या रक्‍खा है, जरूरी है मन वचन कर्म से एक होना। जो हम अंदर हैं वही बाहर दिखें, किसी प्रकार का भ्रम न रहे, यह काफी है।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अजय जी द्वारा वर्षों पूर्व लिया गया निर्णय प्रेरक है...समय आ गया है जब हम अपने पहले नाम से जाने जाएँ और जाती गत नाम का प्रयोग निषेध कर दें...उस दिन इंसान का इंसान से भेदभाव समाप्त हो जायेगा...आइडिया वाला विज्ञापन इसी बात की तस्कीद करता है जिसमें लोगों के नाम मोबाइल नम्बर जैसे रखे गए हैं ताकि गतिगत दंगा ही न हो...

नीरज

राजेश उत्‍साही ने कहा…

बात तो कुछ हद तक सही है। आपका मन तो किसी को दिखता नहीं है और विचार जब तक आप जाहिर न करें पता नहीं चलते तो ऐसे में यह एक अच्‍छा तरीका है कि आप अपने नाम के साथ ऐसा कोई शब्‍द न लगाएं जो आपको किसी जातिविशेष के दायरे से जोड़ता हो। मेरे अपने नाम के आगे उत्‍साही साहित्यिक उपनाम है। मैंने अपना जाति सूचक नाम केवल सरकारी दस्‍तावेज के लिए रखा है। क्‍योंकि वे स्‍कूल प्रमाणपत्र के हिसाब से चलते हैं। पर यह मेरा अपना निजी निर्णय है।और इस बात को 30 से भी ज्‍यादा साल हो गए हैं। बच्‍चों के नाम के साथ जाति सूचक शब्‍द अभी तो चल रहे हैं क्‍योंकि वे पढ़ रहे हैं। अपनी निजी जिंदगी में वे तय करेंगे। पर हां मैं इसे आदर्शवाद या उसका ढोंग तो नहीं कहूंगा।

निर्मला कपिला ने कहा…

विचारणीय पोस्ट। । आपसे सहमत हूँ। नाम के पीछे जाति लगाने का अर्थ ये नही कि हम जाति पाति के भेद भाव को मानते हैं। गाँधी जी का उदाहरण इसका जवाब है। शुभकामनायें।

निर्मला कपिला ने कहा…

विचारणीय पोस्ट। । आपसे सहमत हूँ। नाम के पीछे जाति लगाने का अर्थ ये नही कि हम जाति पाति के भेद भाव को मानते हैं। गाँधी जी का उदाहरण इसका जवाब है। शुभकामनायें।

P.N. Subramanian ने कहा…

आपसे सहमत हैं.

shikha varshney ने कहा…

विचार मजबूत होने चैये जाती सूचक लगाने से क्या फरक पड़ता है .आपसे सहमत.

राम त्यागी ने कहा…

विचारणीय पोस्ट पर ये भी कटु सत्य है कि हम क्यों नहीं शुरुआत करते अपने नाम से जाती हटाने की ?
ना रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी !

शायद वो महाशय कह रहे होंगे कि विचार तो सब देते हैं - why dont you act !!

veena ने कहा…

insaan ki soch hi uski jaati hai.jitni achhi soch.wahi uski jaati hai.hamare vyaktitva ka jaati se koi lena dena nahin hai humjo dikhte hain wahi hon.kathni aur karni main phark na ho wahi hamari vastvik jaati hai.

सुनील गज्जाणी ने कहा…

mem pranam !
ek vicharniya aalekh hai , magar es me se kitne insaan h sakte hai ki jaati gat bhawnaon se uppar utha hua hai yaa apne dharm se ? shayad ungaliyon pe ho sakte hai . prerna daayak hai aalekh ki aise insaan sab le .
badhai ,

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सब कुछ अपनी सोच पर निर्भर करता है ... मुझे लगता है चरित्र का निर्माण होना जरूरी है ....

उस्ताद जी ने कहा…

5/10

विचारणीय मुद्दा
भारत जैसे देश में जहाँ बेहिसाब जातिगत संकीर्णताएँ हों और सामाजिक समरसता में अवरोधक उत्पन्न करती हों. यहाँ बहुत ही जातियां अहंकार के साथ ही जन्म लेती हैं. ऐसे में कहीं से तो शुरुआत करनी पड़ेगी न ?

हमारे दादा-परदादा ने क्या किया, इससे क्या मतलब ? नाम के साथ जाति लगाने का कोई मतलब नहीं. इस मसले पर बुद्धिजीवी वर्ग को पहल करने की सख्त जरूरत है.

हरीश प्रकाश गुप्त ने कहा…

असल मायने तो व्यक्तित्व ही रखता है। जाति वर्ग और सम्प्रदायों में बंटी सोच संकीर्णता की परिचायक है और यह भारतीय समाज की प्रगति की गति को धीमी कर रही है।

"पलाश" ने कहा…

रेख जी मै आप्के विचारों से पूर्ण रूप से सहमत हूँ , क्योकि बचपन में अपने विधालय में प्रार्थना में रोज यह कहती थी कि
लिस दिश जाति में जन्म लिया , बलिदान उसी पर हो जाये
तो जाति शब्द बहुत ही विस्तॄत है, हाँ चंद लोगो ने अपने स्व्वर्थ के लिये इसे संकीर्ण करने की हमेशा ही कोशिश की है

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post .
औरत की बदहाली और उसके तमाम कारणों को बयान करने के लिए एक टिप्पणी तो क्या, पूरा एक लेख भी नाकाफ़ी है। उसमें केवल सूक्ष्म संकेत ही आ पाते हैं। ये दोनों टिप्पणियां भी समस्या के दो अलग कोण पाठक के सामने रखती हैं।
मैं बहन रेखा जी की टिप्पणी से सहमत हूं और मुझे उम्मीद है वे भी मेरे लेख की भावना और सुझाव से सहमत होंगी और उनके जैसी मेरी दूसरी बहनें भी।
औरत सरापा मुहब्बत है। वह सबको मुहब्बत देती है और बदले में भी फ़क़त वही चाहती है जो कि वह देती है। क्या मर्द औरत को वह तक भी लौटाने में असमर्थ है जो कि वह औरत से हमेशा पाता आया है और भरपूर पाता आया है ?

smshindi By Sonu ने कहा…

आपसे सहमत हैं

smshindi By Sonu ने कहा…

मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है !

भाग कर शादी करनी हो तो सबसे अच्छा महूरत फरबरी माह मे