चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (5)



                        अगर हम एक लड़की के नाते सपनों की कसक देखते हैं तो बस यही समझ आता है की हमने सपने देखे थे एक लड़की होने के नाते लेकिन उसके पूरा होने में हमारा लड़की होना ही आड़े आया। कहीं बहार भेज कर नहीं पढ़ना , कहीं शादी पहले कर दो, कहीं घर के वातावरण के मारे लेकिन कारन कभी वो खुद नहीं रही। सपने देखने की हक़दार तो थी लेकिन उन्हें पूरा करने में इच्छा दूसरों की थी। 
          इसा बार अपनी कसक लिए सामने हैं विभा रानी श्रीवास्तव जी .





अधूरे सपनों की कसक
कहाँ से शुरू करूँ ...........................................
जिन्दगी के हर पड़ाव पर एक ,खुली आँखों का सपना ................
शुरू से ही शुरुआत करती हूँ ............
मुझे हमेशा से शौक था .... विज्ञान विषय लेकर पढ़ाई पूरी करने की क्यों कि कला के कोई विषय में मुझे रूचि नहीं थी ..... लेकिन बड़े भैया के विचारों का संकीर्ण होना कारण रहे .... मुझे कला से ही स्नातक करने पड़े ..... ऐसा मैं आज भी सोचती हूँ .... कभी-कभी इस बात से खिन्न भी होती है....
जब मैं स्नातक की पढ़ाई शुरू की तो सपना शुरू हुआ वकालत करने का ......... लेकिन बड़े भैया के विचार बने कि मेरी शादी कर दी जाए .......... माँ थी नहीं जिसके आगे कोई सुनवाई भी हो पाती ....
उस समय शादी के मामले में लड़कियों से कोई राय मेरे घर में नहीं ली जाती थी .....
खैर ! एक जगह शादी की बात करने भैया गए तो पता चला लड़के की ईच्छा है ,लड़की शिक्षा(बी.एड) में स्नातक हो .... तो भैया की ईच्छा हो गई मुझे आगे पढ़ने देने का ,वो भी बी.एड करवाने का .... चलो तो शुरू हुआ सपना शिक्षिका बनने का ..........
दो साल लगे स्नातक करने और बी.एड में नामांकन करवाने में ............
इन दो साल में ना मेरी शादी और न उस लड़के की शादी कहीं और तैय हुई .... पूरी कोशिश तो दोनों परिवार वालों ने की थी .............. ऊपर वाले ने जोड़ी बना कर भेजी थी frown
शादी हो कर ,मैं ससुराल आ गई ........... यहाँ पूरा परिवार और काम करने वाली मैं अकेली ....
न पढ़ने का समय मिलता और न पढ़ने का मन करता ........... कुछ साल गुजर गए मैं गर्भवती भी हो गई .... सोचती ............. भइल बियाह अब क र ब का ..... लेकिन सब का उलाहना चलता रहता था मेरे पढ़ाई को लेकर .... एक दिन मेरे पति बोले कि तुम दोनों भाई-बहन धोखा दिए पढ़ाई के नाम पर ...... तब मैं ठानी और बेटे के जन्म के समय के तीन महीने के बाद परीक्षा दी और बी.एड. पूरा कर दी ....... और जब शिक्षिका के लिए सरकारी स्कूल में चुन ली गई तो सवाल उठा छोटे से बेटे का देख-भाल कौन करेगा ...... तब निर्णय हुआ कि बेटा जब बड़ा हो जाए तो नौकरी हो .... तब तक मैं चाहू तो अपने सपने पूरा कर लूँ .... Law की पढ़ाई पूरी की .... बेटे के बड़ा होते-होते ......... बहुत समय निकल गया और आज अफसोस नहीं है .... लेकिन एक कसक तो है !!आज अपने वृद्ध बीमार (कैंसर) ससुर की सेवा पूरी निष्ठा से कर रही हूँ वो भी अकेले !!

अधूरे सपनों की कसक (4)

           सबके अपने अपने  होते हैं  वे बड़े हों या फिर छोटे उन तक  न पहुँच पाने   का दर्द सभी को होता है .  उसकी कसक सपने जिसके  होते हैं उसको ही महसूस होती है। इस कड़ी में आज मुकेश कुमार सिन्हा अपने  संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं। 


बदलते दौड़ के कई मंजर देखे 
मेरे आँखों ने कई समंदर देखे
सैलाब न रोके रुका है कभी 
मैंने किनारों पर ढहते रेत के महल देखे 
वक्त दौड़ रहा है, साथ दौड़ रहे हैं 
हसरत और ख्वाइश की इस दौड़ में
मैंने झीलों में डूबते कमल देखे .............
.
उपरोक्त पंक्ति मेरी नहीं है, पर मुझे अच्छी लगी....! 

सच कहूँ तो मैं कल्पना में जीने वाला व्यक्ति हूँ, यानि वही कल्पनाएँ मेरे सपने का आधार बन जाती है . पर जब मैं सोचता हूँ की क्या उन सपनो को पूरा करने के लिए मैंने सच्ची कोशिश की? तो पता हूँ बेशक अभाव व परेशानियों की जिंदगी से रु-ब-रु रहा, बेशक मैं अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ा था, बेशक मेरे पास जिम्मेवारियां रही है . पर ये भी इतना ही सच है  मेरी कोशिश जो कुछ पाने की  जिजीविषा के लिए होनी चाहिए थी, वो नहीं थी, या नहीं कहेँ, पर कम जरुर थी . आज जब मैं खुद से जो पा  हूँ, उस पर गौर करता हूँ तो लगता है 
"थोड़ा है, थोड़े और की जरुरत थी "

बिहार के एक बहुत ही साधारण से परिवार में मेरा जन्म हुआ, यानि पैसे की जरुरत, जब से समझ में आया कि  ये सिक्का है, तब से रही. तो सपने बेशक बड़े-बड़े देखे, लेकिन जो सच्चा सपना था, जो पूरा करने की आकांक्षा थी वो ये था की मैं कोई सरकारी नौकरी पाऊं (क्योंकि उस समय बस इतनी ही समझ थी, एक छोटे से गाँव में पाले बढे बच्चे ने यही सुना था की सरकारी नौकरी पाना ही सबसे बड़ा सुख है) जिंदगी धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी. पढाई में, क्लास में हर जगह सबसे आगे तो नहीं पर ठीक ठाक ही था . हाँ मैट्रिक पास करते ही मेरी नौकरी की कोशिश शुरू हो गयी, और मुझे याद है मैंने अपने I .Sc . फ़ाइनल के साथ Airforce  Technical grade(airman) के परीक्षा में सफल भी रहा, पर medically unfit हो गया. S.Sc., Banking, TTE, , UPPCS, BPSC, UPSC जैसी पता नहीं, कितने एक्साम्स की तैयारियां चलती रही, विश्वास नहीं होगा, पर ये सच्चाई है की मैं १३ परीक्षाओं में सफल भी रहा, पर अडंगा लगता रहा, कहीं न कहीं, मैं वो नहीं कर पता था, जो चाहिए था, जब स्नातक(विज्ञान, गणित) के अंतिम वर्ष में था, साथ साथ मैंने अपने आय के साधन ढूँढने के साथ परीक्षा के लिए तैयारी कर रहा था क्योंकि सपना था एक अदद बेहतरीन सरकारी नौकरी का .. पर फिर एक बड़ा सा अवरोध आ गया, भागलपुर दंगा के कारण मेरा विश्वविद्यालय ४-५ साल तक बंद हो गया  उन्ही दिनों मैं All Bihar Quiz Championship में Runners up रहा, साथ है ढ़ेरों अवार्ड जीते इस क्षेत्र में .. पर भगवान ने मुझे स्नातक स्तर के परीक्षा के लिए और इंतज़ार करने कह दिया, साथ ही मेरे पास समय भी कम रह गए . तो कभी कभी मुझे लगता है क्या विश्वविद्यालय  नहीं बंद हुआ होता तो कोई और बेहतरीन नौकरी पाता जो मैं चाहता था . पर....? अगर....? यही......? से कहाँ कुछ संभव है . और अंततः मैं अपनी छोटी से पाई हुई नौकरी और परिवार से खुश हूँ !

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (3)


                                सपने अपने अपने विचारों और सोच के अनुरूप ही देखते हैं हम और फिर उनको साकार होने की कमाना करना भी उचित ही है। आज की कड़ी में मैं प्रतिभा सक्सेना जी के अधूरे सपने की कसक को देख रहे हैं जो सबसे अलग है . ज्यादातर जीवन में अपने निजी जीवन से जुड़े सपने हम देखा करते हैं लेकिन वह निजी सपना कब और कहाँ से जुडा इस बात का अधिक महत्व है। प्रतिभा जी को लगा की शायद  ये मेरे विषय से इतर है लेकिन नहीं हमारा सपना कभी हमारे जीवन के पवन उद्देश्यों से जुदा भी हो सकता है और ऐसी एक भावना से जुदा ये सपना है। आज की कड़ी में मैं  प्रतिभा सक्सेना जी के सपने को लेकर आई हूँ .

स्वप्नो का क्षऱण 

आज जिसे मध्य प्रदेश कहते हैं ,पहले यह क्षेत्र मध्य भारत कहलाता था .धरती की अंतराग्नि की फूत्कार से रचित रमणीय पठारी भूमि ! मालवा का क्षेत्र उसी का एक भाग है - भारत का हृदय स्थल ,सपनों के समान ही ऊबड़-खाबड़,जिसे सींचते रहे जीवनदायी पयस्विनियों के सरस प्रवाह !.उर्वर काली माटी , मां का  काजल-पुँछा स्नेहांचल हो जैसे . लोगों में प्रकृति के  प्रति विशेष लगाव यहाँ की,विशेषता है  ,प्रायः ही वन-भोजन के लिये वनों में पहुँच जाना ,वहीं का  ईंधन बटोर ,दालबाटी (चूरमा भी) बनाना और चारों ओर के सघन ढाक-वनों से प्राप्त पर्णों के दोने-पत्तल बना कर जीमना . पानी की कोई कमी नहीं . आये दिन
कोई आयोजन .कभी मंगलनाथ की यात्रा ,कभी शरद्-पूर्णिमा का मेला कभी घट्या की जातरा .वनों में सीताफल (शरीफ़ा) और घुँघचियों के ढेर .- बड़े होने तक यहीं रही-बढ़ी. शिक्षा-दीक्षा भी संदीपनि गुरु के आश्रम वाले उज्जैन नगर में .
अपने दायित्व पूरे होने तक फिर-फिर इस रमणीयता का आनन्द लूँ ,कुछ समय वहां के निवास कर नई ऊर्जा सँजो लूँ ,यही चाहा था.कोई बड़ी कामना नहीं - जीवन के उत्तर काल में ऐसे ही स्वच्छ-स्वस्थ जल-वायु वाले प्राकृतिक परिवेश में बहुत सीधा-सरल जीवन हो. पर समय के प्रवाह में परिवर्तन की गति बहुत तेज़ हो गई.जैसे सब-कुछ भागा जा रहा हो. आँखों के सपने भी कहाँ टिकें !
अब कुछ भी वैसा नहीं .जिन जंगलों में टेसू के फूल के अंगार डाल-डाल दहकाते थे ,काट डाले गये. नदियों की निर्मल जल-रागिनी ,भीषण प्रदूषण की भेंट चढ़ गई.अमरकंटक की वह दिव्य छटा श्री-हीन हो चुकी है .
वही हाल  उत्तरी  भारत का - सरिताओं केप्रवाह बाधित ,दूषित. श्रीनगर की डल झील दुर्गंध और कीचड़ से भरी ,नैनी झील पॉलिथीन के थैलों  से पटी ,सब कुछ सूखता जा रहा ..पर्वतों की रानी मसूरी पर हरियाली के वस्त्र नाम-मात्र को रह गये .शृंखलाबद्ध रूप से पूरे शीर्ष पर किरीट से सजे  हिमगिरि के  ,गंगा-यमुना-सिंधु से युक्त  संपूर्ण उत्तरी भूमि के बहुत गुण-गान पुरातन काल से गूँजते  हैं .पर आज देखतूी हूँ उस सब पर दूषण की घनी छायायें घिरी  है . कभी सोचा नहीं था जीवन-पद्धति इतनी बदल जायेगी .
गंगा-यमुना को नभ-पथ का  दिव्य जल-प्रदान करती  हिमानियाँ लगातार सिमट रही हैं, धरती पर आते ही उन्हें बाँधने का ,अवशोषित करने का ,क्रम शुरू हो जाता है. महाभारत काल की अनीतियाँ सह न पा सरस्वती विलुप्त हुईं  ,आज मानव नाम-धारियों की दुर्दान्त तृष्णा सभी सरिताओं में विष घोल रही है .
 बिना गंगा-यमुना के (सरस्वती तो औझल हैं ही ),शिप्रा -नर्मदा ,गोदावरी कावेरी के ,भारत ,भारत रह पायेगा क्या?वनों-पर्वतों का उजड़ता वैभव आगे जीवन पर क्या प्रभाव डालेगा,सोचना भी मुश्किल लगता है .
जो सपना बीस बरस तक देखती रही थी ,इधऱ पाँच दशाब्दियों से निरंतर उसका क्षरण देख रही हूँ , वह सब काल की रेत में मृगतृष्णा बन कर रह जायेगा क्या ?

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (2)

                               कितनी अजीब होती है अपने सपनों की पूरी होने की अभिलाषा कि  हम अपने जीवन में उनकी उम्मीद नहीं छोड़ते हैं। आखिर छोड़ें भी क्यों ? हम अपनी सामाजिक सीमाओं की बलि चढ़ गए तो गया उसके  फलीभूत होने की आशा तो कर ही सकते हैं और फिर इस एक आशा ने ही तो जीवन की डोर को बाँध रखा है . अपने एक सपने की डोर थामे राजेश कुमारी जी आज भी अपना सफर पूरा कर रही हैं और मेरी यही कमाना है की वो सपना जरूर जरूर पूरा हो।
                            आज  की कड़ी में राजेश कुमारी जी की बात हो रही है --





चलो सपनों की बात करें !
 कौन से  सपनों की बात करें जो बंद  आँखों से देखे जाते हैं या फिर खुली आखों से ??  बंद आखों का सपना एक छलावा है आँख खुली और छू मंतर . चलिए उस सपने की बात करती हूँ , जो खुली आँखों से  देखा जाता है - जाग्रत और चेतन  मष्तिष्क के साथ . हाँ कभी मैंने भी देखा था एक सपना जो पूरा न हो सका क्यूं ?  भी जान लीजिये  उम्र  महज छः बच्चा खेल खेल में कुछ सपने बुनना सीखता  है ,  तब एक्टिंग के माध्यम से कल्पना लोक में एक स्वप्न का बीज स्फुटित होने लगता है। उसी उम्र में जब मैं अपने पिताजी को मरीजों को इंजेक्शन लगाते  हुए , पट्टी बाँधते  हुए, दवाई देते हुए, टूटी हड्डियों पर प्लास्टर करते हुए देखती थी तो मेरे नन्हे मष्तिष्क में उन्ही की तरह अर्थात डॉक्टर बनने का सपना जन्म लेने लगा . जब भी हम सब बच्चे मिलकर घर घर खेलती तो मैं हमेशा डॉक्टर का रोल प्ले करती . लकड़ी तोड़कर उसका इंजेक्शन बनाती और बच्चों को लगाने की एक्टिंग करती। उसी तरह से दिन बीतते गए और मैं बड़ी होती गयी . मेरे साथ मेरा सपना भी बड़ा होता गया क्योंकि बड़े लोग कहते हैं कि  डॉक्टर बनने के लिए पढाई में सबसे होशियार रहना है, अतः मैं जी तोड़ कर मेहनत करके कक्षा में हमेशा अव्वल आती और सबसे शाबाशी पाती इस तरह से मैं आठवीं पास कर गयी। 
                            यहाँ मैं एक बात बताना जरूरी समझती हूँ कि  उस वक्त हमारे पाठ्यक्रम के अनुसार  कक्षा में अपने मनपसंद के विषय श्रेणी चुननी होती थी अर्थात कोई आर्ट विषय और कोई  साइंस विषय और कोई होम साइंस आदि विषय चुनता था। आठवीं पास करने के बाद गर्मियों की दो महीने की छुट्टियों में अपने बड़े भाई (जो दसवीं पास कर चुका था उन्हीं दिनों) की पुस्तकें  लेकर पढ़ना शुरू कर दिया और छुट्टियाँ इसी उत्साह में इन्तजार में बीतती रहीं . यहाँ एक बात और बताना चाहूंगी -- मैं जिस स्कूल में (आर्य कन्या पाठशाला इंटर कॉलेज , मुजफ्फर नगर ) में पढ़ रही थी , उसमें में विज्ञान / गणित विषय आठवीं के बाद नहीं थे , अतः अगर
 विज्ञान आदि विषय लेने होते तो  के दूसरे स्कूल में  यानि  को-एड में  एडमिशन लेना होता था . 

                           उन्हीं दिनों मेरे दादाजी घर आये हुए थे। कॉलेज  खुलने ही वाले थे, मेरे पिताजी ने दादा जी से भी विचार विमर्श  किया और दादाजी ने निर्णय सुना दिया गया कि कॉलेज नहीं बदलना है . उसी कॉलेज में आर्ट विषय लेकर पढ़ना है , मानो दिल पर एक आघात लगा था। कुछ दिन विद्रोह किया लेकिन बाद में उनका फैसला मानना ही पड़ा। उनके निर्णय के पीछे कारण  था - उनको को-एड कालेजों का ख़राब वातावरण , प्रतिदिन अखबारों में कई कई घटनाओं का आना और उस पर दादाजी के विचारों का संकीर्ण होना कुछ यही कारण रहे होंगे . ऐसा मैं आज सोचती हूँ। कभी इस बात से खिन्न होती थी तो पिताजी मजाक में कहते थे कि डॉक्टर से शादी कर देंगे तो अपनी मम्मी  की तरह डाक्टरनी तो कहलाओगी  और मैं गुस्से से पैर पटकते हुए वहां से भाग जाती थी। 
                 आज  भी मेरे साथ की कुछ लड़कियाँ फेमस डॉक्टर हैं। बच्चे हुए तो फिर इस सपने ने सिर  उठाया कि  कोई सा बच्चा नाना जी की तरह से डॉक्टर बने वहां भी ये सपना हार गया . बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर और  बेटी एम बी ए . पर वह सपना अभी भी हारने वाला नहीं - सोचती हूँ कि  कोई सी नातिन या पोता जरूर मेरा सपना साकार करेगा . कहते हैं न  कि जब तक सांस है तब तक आस है।

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (1 )

अधूरे   सपनों की कसक (1)


                     नींद में देखे गए सपने तो मिथ्या होते है , आँख खुली और वे भी ओझल हो गए लेकिन कुछ सपने हम जागती आखों से भी देखते हैं और वे सपने हमारे जीवन की दिशा को निर्धारित करने वाले होते हैं . फिर भी जीवन के प्रारंभिक चरण में देखे गए सपने मन मष्तिष्क पर ऐसे बैठे होते हैं की उन्हें पूरा करने के लिए प्रयास तो हम करते हैं लेकिन फिर भी कभी कभी वे हमारे वश में  रह जाते हैं और हम उनके टुकड़ों को लेकर दूसरी दिशा में चल देते हैं। ऐसा लगभग सभी के साथ होता होगा कुछ लोगों के साथ न भी हुआ होगा , कुछापने सपनों के अवशेष को अपने दिल में छिपाए ही रहना चाहते हैं। फिर चलिए आज रूबरू होते हैं साधना वैद जी के सपने से ---

 साधना वैद


वो सपना जो साकार न हो सका

कैसी दुखती रग छेड़ दी है आपने आज ! हर रोज ही तो ये आँखें ना जाने कितने सपने देखती हैं और हर रोज ना जाने कितने सुकुमार सपने साकार होने से पहले ही काल कवलित हो जाते हैं ! कुछ इतनी गहरी और स्थाई टीस देकर जाते हैं कि जीवन भर के लिये वे ज़ख्म हरे ही रह जाते हैं और कुछ इतनी खामोशी से चले जाते हैं कि उनके टूटने की आवाज़ तक सुनाई नहीं देती !
वह सपना जिसके साकार न हो पाने का दर्द समय के इतने लंबे अंतराल के दौरान तिल भर भी कम नहीं हो सका वह मैंने अपने कैरियर के सन्दर्भ में देखा था ! बच्चों के लिये सबसे बड़े आदर्श उनके माता-पिता होते हैं ! माँ का नाम अपने समय के प्रसिद्ध साहित्यकारों में सम्मान के साथ लिया जाता था और वे उन दिनों प्रचलित कवि सम्मेलनों में मंच पर सुशोभित कवियों में एक परिचित नाम हुआ करती थीं ! बाबूजी न्यायाधीश के पद पर आसीन थे ! वे एक बहुत ही रौबदार एवं आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे ! काला कोट, सफ़ेद पतलून, टाई और हैट लगा कर जब वे रास्ते पर निकलते थे तो लोग अदब से सर झुका कर सामने से हट जाया करते थे ! उनका यह सम्मान और रुआब मुझे बहुत चमत्कृत करता था ! और तभी से मन में इस सपने ने आकार ले लिया था कि मैं भी बड़ी होकर बाबूजी की तरह जज ही बनूँगी !
हमारा एक छोटा सा परिवार था उन दिनों ! माँ, बाबूजी, मेरी बड़ी दीदी, मेरे बड़े भाई और स्वयं मैं ! बाबूजी की लाड़ली बेटी होने के कारण मैं अक्सर उनके साथ कोर्ट चली जाती थी और उनके चैंबर में बड़ी सी आरामकुर्सी पर लेटे-लेटे या तो चन्दा मामा, नंदन, पराग आदि पढ़ती रहती थी या फिर कागजों पर उन दिनों प्रचलित लाल नीली पेंसिलों से आड़ी तिरछी लकीरें खींच चित्रकला का शौक पूरा किया करती थी ! चैंबर से सटे हुए बड़े से हॉल में बाबूजी का कोर्ट रूम हुआ करता था जहाँ ऊपर डायस पर एक बहुत बड़ी सी मेज़ के साथ बाबूजी की कुर्सी होती थी ! मेज़ पर ढेर सारी फाइलें, क़ानून की किताबें, कलमदान, ढेर सारे होल्डर्स, अर्धचंद्राकार ब्लौटर और भी ना जाने कितनी तरह की चीज़ें सजी रहती थीं ! जो मुझे सबसे अधिक आकर्षित करता वह था एक हथौड़ा ! उसका उपयोग मेरे सामने बाबूजी ने कभी किया या नहीं मुझे याद नहीं है लेकिन बड़े होने पर फिल्मों में ‘ऑर्डर-ऑर्डर’ कर फ़िल्मी जजों को मेज़ पर ठोकते हुए खूब देखा है ! बीच-बीच में जब मैं बोर हो जाती तो कुर्सी बाबूजी के कोर्ट रूम के दरवाज़े के पास खींच परदे की आड़ से मुकदमें की कार्यवाही को बड़े ध्यान से देखती रहती ! वकीलों की धुआँधार बहस, वादी प्रतिवादियों से उनका क्रॉस एग्जामिनेशन, गवाहों के बयान सब कुछ मुझे बड़ा दिलचस्प लगता ! बीच-बीच में अगर बहस पटरी से उतरती दिखती तो अनुशासन में रहने के लिये और मुद्दे से ना भटकने के लिये बाबूजी सख्त लहजे में सबको चेतावनी देते और फ़ौरन कोर्ट रूम में सन्नाटा छा जाता ! तब मुझे अपने बाबूजी पर बहुत अभिमान होता था ! बड़े-बड़े लोग उनसे डरते थे और उनका बहुत आदर करते थे ! तभी से मेरे मन में बड़े होकर जज बनने की ख्वाहिश ने जन्म लिया ! जज का कार्य बहुत ही ईमानदारी और जिम्मेदारी वाला होता है ! सच्चे को न्याय मिले और अपराधी को सज़ा इससे बढ़ कर और सामाजिक न्याय क्या हो सकता है ! मैंने सारी-सारी रात बाबूजी को एकाग्र होकर जजमेंट्स लिखते देखा है ! जब घर में सभी सदस्य आराम से नींद के आगोश में लुढ़के होते बाबूजी मोटी-मोटी क़ानून की किताबों में मुकदमें से जुड़े मुद्दों के सन्दर्भ ढूँढते और दत्तचित्त हो शांत मन से उनका तार्किक विश्लेषण कर अपना फैसला लिखते ! सुबह जब हम जागते देखते बाबूजी अपने काम में लगे हुए हैं ! बाबूजी का वह रूप हमेशा से मेरे लिये बहुत प्रेरक रहा है ! मेरे मन में भी तब से यही सपना आकार ले रहा था कि मैं भी बड़ी होकर जज बनूँगी और किसीके प्रति अन्याय नहीं होने दूँगी !
लेकिन वह कहते हैं ना ‘अपने मन कछु और है कर्ता के कछु और’ ! चाहने मात्र से ही भला क्या होता है ! अपने सपने को साकार करने के लिये मैंने ग्रेजुएशन के बाद उज्जैन में विक्रम यूनीवर्सिटी में एम ए इंग्लिश लिटरेचर में और माधव कॉलेज की ईवनिंग क्लासेज़ में एल एल बी में दोनों में एक साथ एडमीशन लिया ! दोनों कोर्सेज़ में मेरी पढाई बढ़िया चल रही थी ! मुझे पढ़ाने वाले मेरे प्रोफेसर्स मेरी प्रगति से बहुत संतुष्ट थे और मुझे बहुत प्रोत्साहित भी करते थे ! लेकिन उन्हीं दिनों मेरे विवाह के लिये भी कई जगह बात चल रही थी ! बाबूजी रिटायर हो चुके थे ! ससुराल वालों के इस आश्वासन के साथ कि विवाह के बाद मेरी पढ़ाई जारी रखी जायेगी मुझे शादी का जोड़ा पहना कर विवाह मंडप में बैठा दिया गया ! लेकिन उसके बाद मेरी पढ़ाई में जो ब्रेक लगा वह स्थाई हो गया ! इसके लिये किसीको दोष देना अनुचित होगा ! शायद परिस्थितियाँ ही ऐसी विषम थीं कि मेरी पढ़ाई को जारी रख पाना संभव नहीं था ! मेरी माँ और बाबूजी भी बहुत दुखी हुए ! हालात इस तरह से यू टर्न ले लेंगे यह कल्पना तो उन्होंने भी नहीं की थी ! एक न्यायाधीश की बेटी, और हर अन्याय के खिलाफ लड़ने का संकल्प धारण करने वाली लड़की अपने प्रति होने वाले इस अन्याय का प्रतिकार नहीं कर पाई और जीवन भर अपनी हार का यह ज़ख्म अपने सीने में छिपाये रही ! यह सपना मेरे दिल के इतना करीब था कि आज भी मैं हर बात को, हर घटना को, हर किस्से को उसी नज़र से देखती हूँ कि अगर मेरे बाबूजी के कोर्ट रूम में यह मुकदमा चल रहा होता तो इसका क्या स्वरुप होता और वे क्या करते ! स्वयं को कभी जज के रूप में, तो कभी वकील के रूप में, कभी वादी प्रतिवादी के रूप में तो कभी गवाह के रूप में पाती हूँ और उसी आधार पर हर बात का विश्लेषण करने लगती हूँ ! मैं वास्तविक जीवन में तो जज नहीं बन पाई लेकिन आज भी हर पल हर क्षण मेरे अंदर मेरा सपना साँस लेता है शायद इसीलिये ना तो मैंने कभी किसीके प्रति खुद अन्याय किया ना होते हुए देख सकी और शायद अपने सपने को इसी रूप में प्रतिफलित होते देख मैं सुख से जी पा रही हूँ !


अधूरे सपनों की कसक !

      कुछ सपने इंसान के जीवन  बचपन से ही बनते बिगड़ते रहते हैं। कभी हालात , कभी घर वालों की मर्जी, कभी नियति के प्रहार कुछ भी कर सकते हैं। वो सपने जो किशोरावस्था के साथ कुछ बनने के सपने- हर मन में सजने लगते हैं, यह जरूरी नहीं है कि  वे सपने किसी व्यवसाय से जुड़े हों , घर परिवार से जुड़े हों या फिर खुद अपने से जुड़े हों। हाँ वे सपने जीवन में कहीं गहरी पैठ रखते हैं और यह भी होता है कि कभी कभी वे सपने अधूरे रह जाते हैं लेकिन उन अधूरे सपनों की कसक जब किसी और के उस सपने को पूरा होते देखते हैं तो अपने मन में उठती है . इसमें  उससे इर्ष्या का भाव नहीं होता है बल्कि अपने अधूरे सपने की याद ताजा हो जाती है। वैसे उनके अधूरे रह जाने से यह नहीं कि  जीवन की गति रुक जाए या फिर जीवन में दूसरी उपलब्धियां नगण्य हो जाएँ। फिर हम जो भी बन जाते हैं उसमें भी सपनों की जगह होती है लेकिन वो बालपन के सपने या युवा मन के सपने जब याद आते हैं तो कुछ अन्दर से दरकने की आवाज आती है, कसकने की आवाज आती है। ऐसे ही अपने कुछ लोगों के सपनों की एक श्रंखला लेकर आपके सामने आ रही हूँ। 
                     इस श्रंखला के लिए आप सभी को खुला आमंत्रण भी दे रही हूँ की आप इसमें शामिल होकर हमें अनुग्रहीत करें। अपने साथियों के सहयोग से ही इसको मैं आगे बढ़ने का सपना देख रही हूँ और फिर आप सभी भी इसमें अपने साथियों से सपनों की कसक को महसूस कर सकते हैं।  इसके लिए आपको कल तक का इन्तजार करना पड़ेगा . कल इसके लिए पहली कड़ी लेकर आ रही हूँ .

गुरुवार, 16 अगस्त 2012

संबोधन, रिश्ते और अपनत्व !

                              परिवार और रिश्तों का जो सम्बन्ध  है वह प्रेम , स्नेह और सामीप्य से जुड़ा  है। हम आधुनिक बनने की लालसा में और उससे अधिक खुद को माडर्न देखने की झूठी शान में डूबते हुए वह खोते चले जा रहे हैं , जो हमारी शान रही है और जिसे पाने के लिए सब तरसते हैं।  
                              भारत में परिवार और विवाह जैसी संस्था विदेशों में एक सुखद आश्चर्य के रूप में देखी  जाती है और उसमें बसने वाला प्रेम और एकसूत्र में बंधे रहने की भावना तो और भी अधिक अनुकरणीय समझी जाती है। वह बात और है कि  अब हम उनके पीछे दौड़ कर अपने को आधुनिक कहलाने में ज्यादा गर्व महसूस करने लगे हैं। वह यहाँ आकर हमारी संस्कृति के अनुसार शादी करना चाहते हैं और हमारे परिवार में आकर उसकी परम्पराओं को अपनाने के लिए लालायित रहते हैं।
                                आज सुबह ही ऐसा कुछ सामने आया कि  मन किया कि  हम अपने आपको ही सुधारें और उनको सुधारने का प्रयास करें जो अपने संस्कृति और संस्कारों से भटक रहे हैं। समझाना हमारा काम है और मानना उनका। सुबह मेरी पारिवारिक मित्र परिवार की पोती मेरे पास आई और बोली दादू आपको "पुंटी " ने बुलाया है। पहले मुझे कुछ समझ नहीं आया फिर मैंने पूछा ये 'पुंटी ' कौन है?  अरे दादू पूनम आंटी को हम ही पुंटी  कहते हैं।एक तो एक साथ रहते हुए चाची को आंटी कहना और फिर वह भी नाम लेकर।  घर के बड़े लोगों ने भी रोकने या टोकने की जरूरत नहीं समझी , जबकि वे लोग बहुत अधिक आधुनिक नहीं है।  हाँ आधुनिकता ओढ़ने का काम जरूर करते हैं। 
                               वह तो कह कर चली गयी लेकिन मेरे लिए एक सवाल छोड़ गयी कि उस परिवार में अभी सिर्फ दो बेटों की शादी हुई है . मेरे लिए अपने ही परिवार की तरह से है। बड़े बेटे के बच्चे हैं छोटे की पत्नी को आंटी कहने के लिए नाम जोड़ कर उन लोगों ने उसे 'पुंटी ' बना दिया और घर वाले उसको उसी रूप में स्वीकार कर लिए कभी टोका नहीं . आंटी शब्द हमने अंग्रेजी भाषा से ही लिया है और अंकल भी क्योंकि उनके यहाँ चाहे जो रिश्ता हो वह अंकल और आंटी में ही निहित होता है और हमारे यहाँ के संबोधन रिश्तों की अलग परिभाषा ही नहीं देता है बल्कि उसकी गरिमा भी बताता है साथ ही पैत्रिक परिवार या मातृ परिवार किस से सम्बंधित रिश्ता है इसको भी स्पष्ट करता है। और ये शब्द बच्चे घर से बाहर  जाकर नहीं सीखते हैं बल्कि इन्हें तो घर में बाबा, दादी, नाना , नानी , माता पिता ही उनको वाणी ज्ञान होते ही सिखाते हैं कि  ये आपके ये हैं। अगर हम बच्चों को चाहे चाचा हो, मामा हो या फिर मौसा या फूफा जो सबको अंकल ही कहने की शिक्षा देते हैं तो ये हमारी कमी है। जो अपनत्व अपने भारतीय संबोधन में है वह विदेशी या अंग्रेजी से आये संबोधन में नहीं है। 
      हम आधुनिक बनें लेकिन किस दृष्टि से -- अपनी कुरीतियों के बहिष्कार के लिए, अपने बच्चों में लिंग भेद को छोड़ कर सबको समान प्यार और हक देने के लिए , उनकी समान शिक्षा और अधिकार देने के लिए और उनकी तरह से ही  स्वयं अपने कामों के लिए आत्मनिभर होने के लिए बने। ये नहीं कि  आप छोटे छोटे कामों के लिए पत्नी या बहू पर निर्भर रहें  , उसे भी इंसान समझ कर उसके काम में हाथ बंटा लें तो आपकी भारतीयता कम नहीं होती। हम दोहरी मानसिकता पाल कर आधुनिक और विदेशी संस्कृति के अनुयायी बन रहे हैं तो यह तो वह हुआ  'दोऊ  दीन  से गए पांडे , हलुआ मिला न मांडे  '
                      शायद मैं विषय से भटक रही हूँ , इन संबोधन में भी एक प्यार और अपनत्व झलकता है जो सिर्फ भारतीय संस्कृति में ही मिलता है और कहीं भी ये देखने को नहीं मिलेगा। अगर बड़े छोटों को बेटा और बेटी कहकर बुलाते हैं तो  ही वह हमारा रक्त सम्बन्धी न हो लेकिन एक अपनत्व से जोड़ने का अहसास जरूर दे जाता है। हमारी ग्रामीण संस्कृति में आज भी चाहे वह जाति  का कोई भी हो, छोटा और बड़ा सब एक रिश्ते से बंधे और संबोधन से बंधे होते हैं। हमारे बुंदेलखंड में तो ये आज भी है। नाम लेकर बुलाना तो बहुत कम होता है। बड़े हैं तो चाचा और दादा और महिला हुई हुई तो चाची  या दादी कह कर संबोधन करते हैं चाहे वह परिचित हो या न हो। हमारे मुंह से उतने ही शब्द निकलते हैं चाहे हम ए बुढ़िया कहें या चाची  या अम्मा कहें . लेकिन इन शब्दों में हमारी तहजीब  और तमीज छिपी रहती है जो मुंह से निकलते ही  जाहिर  हो जाती है।आज की पीढ़ी यह भी कह कर बड़ों को झिड़क देती है।  एक घटना मुझे याद है - मैं बैंक में खड़ी थी और मुझसे आगे एक वृद्ध जिन्हें शायद खड़े होने में तकलीफ भी हो रही थी क्योंकि वह बार बार आकर खड़े हो जाते और फिर बेंच पर बैठ जाते।  कई पीछे के लोग काम करवा कर चले गए तो वह काउंटर पर आकर उस लड़की से बोले बेटा मैं बहुत देर से खड़ा हूँ मेरा काम कब होगा ? ये बुढऊ यहाँ रिश्तेदारी बनाने का काम मत करो , जो काउंटर पर आगे खड़ा होगा उसका ही काम होगा। मैं सुनकर अवाक रह गयी।  मानवता के आगे कोई रिश्ता या धर्म नहीं होता है।  एक बुजुर्ग को इस तरह से बोलना शायद हमारे संस्कारों की छवि दिखा रहा था।  ये तो हमारी भारतीयता का प्रतीक नहीं है।  इन रिश्तों में कोई खून का संबंध जरूरी नहीं है बल्कि अपनेपन की जरूरत होती है और यही अपनापन समाज की डहरी नींव का प्रतीक है ।
                      अगर हम कम शिक्षित लोगों की बात करें तो वो आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए मिल जायेंगे। लेकिन हम चाहे आधुनिक न भी हों, उच्च शिक्षित  न भी हों लेकिन खुद को आधुनिकता के लिबास में लपेटे हुए बच्चों को अंकल आंटी, ग्रांड माँ , ग्रांड पा बोलना जरूर सिखा देते हैं। फिर बच्चे अगर भावनात्मक रूप से न जुड़ पायें तो इसमें हम उनको दोष क्यों दें? हम ही उनके मन में दूर रहने वाले संबोधनों के बीज बो रहे हैं फिर कल को वे हमें भी उस नजर से देखना शुरू कर देते हैं तो हमें कष्ट क्यों होता है? आज जिस जगह पर हमारे बुजुर्ग या बराबर के लोग खड़े हैं कल वहीँ हम भी खड़े होंगे और तब शायद ये अनुभव करें कि हमने ही गलत सिखाया।  
                     अगर हम अपने सदियों से चले आ रहे रिश्तों की गहन बंधन और उसमें बसे प्यार को देखे तो वह बंधन सदैव अटूट रहता है। भले ही हम दो घरों में रहे लेकिन वो संबोधन हमें बांधे रहने में पूरी तरह से सक्षम हैं। चलो हम ही कुछ बच्चों में कैसे ही ये संस्कार डालें कि  कम से कम हम संबोधन  तो अपने रख ही सकते हैं। मैं तो परिवार की बात कर रही हूँ लेकिन हमारे मित्रों के बीच भी अंकल और आंटी कहने का रिवाज नहीं है।  बच्चे चाचा चाची या फिर मामा और मामी और मौसा मौसा ही कहते हैं और फिर हम आपस में जितना जुड़े हैं वो कहने की बात नहीं है। इसमें कोई  पैसा या स्तर कभी भी आड़े नहीं आया क्योंकि बचपन के मित्र एक स्तर के नहीं होते हैं लेकिन परिवारों के बीच वही अपनत्व है।  यही भारतीयता है और इसको कायम रखना हमारे हाथ में है।