शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक !

      कुछ सपने इंसान के जीवन  बचपन से ही बनते बिगड़ते रहते हैं। कभी हालात , कभी घर वालों की मर्जी, कभी नियति के प्रहार कुछ भी कर सकते हैं। वो सपने जो किशोरावस्था के साथ कुछ बनने के सपने- हर मन में सजने लगते हैं, यह जरूरी नहीं है कि  वे सपने किसी व्यवसाय से जुड़े हों , घर परिवार से जुड़े हों या फिर खुद अपने से जुड़े हों। हाँ वे सपने जीवन में कहीं गहरी पैठ रखते हैं और यह भी होता है कि कभी कभी वे सपने अधूरे रह जाते हैं लेकिन उन अधूरे सपनों की कसक जब किसी और के उस सपने को पूरा होते देखते हैं तो अपने मन में उठती है . इसमें  उससे इर्ष्या का भाव नहीं होता है बल्कि अपने अधूरे सपने की याद ताजा हो जाती है। वैसे उनके अधूरे रह जाने से यह नहीं कि  जीवन की गति रुक जाए या फिर जीवन में दूसरी उपलब्धियां नगण्य हो जाएँ। फिर हम जो भी बन जाते हैं उसमें भी सपनों की जगह होती है लेकिन वो बालपन के सपने या युवा मन के सपने जब याद आते हैं तो कुछ अन्दर से दरकने की आवाज आती है, कसकने की आवाज आती है। ऐसे ही अपने कुछ लोगों के सपनों की एक श्रंखला लेकर आपके सामने आ रही हूँ। 
                     इस श्रंखला के लिए आप सभी को खुला आमंत्रण भी दे रही हूँ की आप इसमें शामिल होकर हमें अनुग्रहीत करें। अपने साथियों के सहयोग से ही इसको मैं आगे बढ़ने का सपना देख रही हूँ और फिर आप सभी भी इसमें अपने साथियों से सपनों की कसक को महसूस कर सकते हैं।  इसके लिए आपको कल तक का इन्तजार करना पड़ेगा . कल इसके लिए पहली कड़ी लेकर आ रही हूँ .

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