गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (5)



                        अगर हम एक लड़की के नाते सपनों की कसक देखते हैं तो बस यही समझ आता है की हमने सपने देखे थे एक लड़की होने के नाते लेकिन उसके पूरा होने में हमारा लड़की होना ही आड़े आया। कहीं बहार भेज कर नहीं पढ़ना , कहीं शादी पहले कर दो, कहीं घर के वातावरण के मारे लेकिन कारन कभी वो खुद नहीं रही। सपने देखने की हक़दार तो थी लेकिन उन्हें पूरा करने में इच्छा दूसरों की थी। 
          इसा बार अपनी कसक लिए सामने हैं विभा रानी श्रीवास्तव जी .





अधूरे सपनों की कसक
कहाँ से शुरू करूँ ...........................................
जिन्दगी के हर पड़ाव पर एक ,खुली आँखों का सपना ................
शुरू से ही शुरुआत करती हूँ ............
मुझे हमेशा से शौक था .... विज्ञान विषय लेकर पढ़ाई पूरी करने की क्यों कि कला के कोई विषय में मुझे रूचि नहीं थी ..... लेकिन बड़े भैया के विचारों का संकीर्ण होना कारण रहे .... मुझे कला से ही स्नातक करने पड़े ..... ऐसा मैं आज भी सोचती हूँ .... कभी-कभी इस बात से खिन्न भी होती है....
जब मैं स्नातक की पढ़ाई शुरू की तो सपना शुरू हुआ वकालत करने का ......... लेकिन बड़े भैया के विचार बने कि मेरी शादी कर दी जाए .......... माँ थी नहीं जिसके आगे कोई सुनवाई भी हो पाती ....
उस समय शादी के मामले में लड़कियों से कोई राय मेरे घर में नहीं ली जाती थी .....
खैर ! एक जगह शादी की बात करने भैया गए तो पता चला लड़के की ईच्छा है ,लड़की शिक्षा(बी.एड) में स्नातक हो .... तो भैया की ईच्छा हो गई मुझे आगे पढ़ने देने का ,वो भी बी.एड करवाने का .... चलो तो शुरू हुआ सपना शिक्षिका बनने का ..........
दो साल लगे स्नातक करने और बी.एड में नामांकन करवाने में ............
इन दो साल में ना मेरी शादी और न उस लड़के की शादी कहीं और तैय हुई .... पूरी कोशिश तो दोनों परिवार वालों ने की थी .............. ऊपर वाले ने जोड़ी बना कर भेजी थी frown
शादी हो कर ,मैं ससुराल आ गई ........... यहाँ पूरा परिवार और काम करने वाली मैं अकेली ....
न पढ़ने का समय मिलता और न पढ़ने का मन करता ........... कुछ साल गुजर गए मैं गर्भवती भी हो गई .... सोचती ............. भइल बियाह अब क र ब का ..... लेकिन सब का उलाहना चलता रहता था मेरे पढ़ाई को लेकर .... एक दिन मेरे पति बोले कि तुम दोनों भाई-बहन धोखा दिए पढ़ाई के नाम पर ...... तब मैं ठानी और बेटे के जन्म के समय के तीन महीने के बाद परीक्षा दी और बी.एड. पूरा कर दी ....... और जब शिक्षिका के लिए सरकारी स्कूल में चुन ली गई तो सवाल उठा छोटे से बेटे का देख-भाल कौन करेगा ...... तब निर्णय हुआ कि बेटा जब बड़ा हो जाए तो नौकरी हो .... तब तक मैं चाहू तो अपने सपने पूरा कर लूँ .... Law की पढ़ाई पूरी की .... बेटे के बड़ा होते-होते ......... बहुत समय निकल गया और आज अफसोस नहीं है .... लेकिन एक कसक तो है !!आज अपने वृद्ध बीमार (कैंसर) ससुर की सेवा पूरी निष्ठा से कर रही हूँ वो भी अकेले !!

8 टिप्‍पणियां:

Neelima ने कहा…

Vibha .............bahut tej dard hota hain jab sapne toote hain unke tootne ki awaz koi nhi sunta .lahuluhaan se ham bas ...... ander ander rote hain apno ke diye ghav se ........ sabse bari bat is bat ki shikayat bhi nhi kar sakte kyuki hamare sapno ki bisat bahut choti hoti hain sabke samne .......... aaj yeh sab parhkar meri aankho mai ansu aa gye ............. k sirf ham hi nhi tanha .................

expression ने कहा…

यही तो जीवन है....
कोई न कोई कसक रह ही जाती है....
फिर भी जीवन चलता रहता है....

सादर
अनु

DINESH PAREEK ने कहा…

dard ko chipan hi to orat ki pahchan hai

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

हर नारी के अधूरे सपने की कसक

Sadhana Vaid ने कहा…

विभाजी ऐसा लगता है दर्द की इस राह में और भी कई हमसफ़र मिलेंगे हमारी व आपकी तरह तो रास्ता आसानी से कट जाएगा ! शुभकामनायें स्वीकार करें !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

सपनो की दुनिया से परे.... जिंदगी सच्चाई की भी है..... jayan bahut pyar mila tumhe:)

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजे !

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 29/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!