बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (17)

                   रवीन्द्र  जी का सपना हमारे विषय से थोडा सा इतर है क्योंकि इस समय ये सपना  उनके पिता का था और उन्होंने देखा था फिर किस रूप में पूरा हो रहा है? ये प्रसंग मुझे बहुत ही अच्छा लगा इस लिए इसको मैंने प्रस्तुत करने का फैसला लिया है . हमारे बुजुर्ग भी अपने सपनों को कैसे अपने बच्चों के बाद फिर पोते और पोतियों में खोजने लगते हैं। एक ख़ुशी जो उन्हें उर्वशी के निर्णय से मिली होगी .

                         आज का संस्मरण है रवीन्द्र प्रभात जी का 



पिता जी का वह सपना........

"अंजाने में -
फिर भी अंजान नहीं, दबे पाँव आहट
मन-मस्तिस्क को रौंदती आगे बढ़ी
घोर निद्रा,फिर अधजगे में
वह सपना
मन में उठे आवेग को
शायद सुलाने का प्रयत्न किया
उसकी ही याद में -
फिर एकबार तंद्रा भंग हुयी
और भूल गया, कि मैं कौन हूँ ?"

यह मेरे जीवन की पहली कविता है , जिसे कभी प्रकाशन के लिए नहीं भेजा । बस बालपन का एहसास समझकर  डायरी के पन्नों में सजा दिया था । बहुत बाद में जब मेरा पहला संग्रह हमसफर आया तो इस कविता को प्रसंगवश प्रस्तुत कर दिया । 

तरुणा अवस्था के ऐसे सपने जब युवा अवस्था में करवट लेने लगते हैं तो व्यक्ति कुछ बनने का सपना सँजोता है , क्योंकि सपने हमारी मानसिक स्थिति  का प्रतिविम्ब होते हैं । एक सैनिक हमेशा विजय के सपने देखना चाहता है और एक व्यापारी हमेशा मुनाफे का । लेकिन ना तो हमेशा विजय मिलती है और न हमेशा मुनाफा होता है । सपनों की दुनिया में उठते-बैठते व्यक्ति को परिस्थितियों का अंदेशा होता चला जाता है । सपने है तो दुनिया है दुनिया है तो सपने है  ।

बात उन दिनों की है जब मेरे पिताजी की पहली शादी हुयी थी और दो वर्ष के भीतर ही उनकी पहली  पत्नी चल बसी । काफी प्रयासों के बाद भी उन्होने अपनी कैंसर से पीड़ित पत्नी को नहीं बचा सके । मेरे पिता जी की पहली पत्नी से कोई संतान न था इसलिए परिवारवालों के काफी मान मनौवल के पाश्चात उन्होने दूसरी शादी करने का फैसला किया और उस समय कडवे-मीठे अनुभवों के आधार पर उन्होने यह संकल्प लिया कि मैं अपने किसी बच्चे को डाक्टर जरूर बनाऊँगा । मुझसे बड़ी मेरी बहन थी जिसे डाक्टर बनाने में कोई दिलचस्पी न थी और मुझे भी नहीं । पर वे इस विषय पर काफी सख्त थे कि मुझे डाक्टर बनना ही चाहिए । हाई स्कूल के बाद उन्होने जबर्दस्ती मुझे बायोलॉजी विषय के साथ इंटर में दाखिला दिलवाया और मैं एक महीने बाद ही अपना विषय परिवर्तित कर लिया था । इस बात को जानने के बाद मेरे पिता जी मुझसे काफी दिनों तक नाराज रहे । मगर उन्होने कभी भी किसी को भी एहसास नहीं कराया कि वे क्यों अपने बच्चे को डाक्टर के रूप में देखना चाहते हैं ।
समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती गयी और मेरे सभी भाई-बहनों ने डाक्टर बनने से तौबा कर लिया था । फिर भी पिताजी ने कभी किसी के  ऊपर दबाब नहीं डाला कैरियर के चुनाव में ।  बात आई-गयी हो गयी मगर उनका यह अधूरा सपना मस्तिस्क में करबट लेता रहा पर कभी जाहीर न होने दिया उन्होने ।

मेरी शादी हुयी, बच्चे हुये । मेरे तीन बच्चों में सबसे छोटी बिटिया उर्वशी अपने दादा से भावनात्मक रूप से काफी जुड़ी रही बचपन में । खेल-खेल में ही उसने एक बार अपने दादा से कहा कि मैं बड़ी होकर डाक्टर बनूँगी । फिर क्या था उनकी आँखों में चमक बढ़ गयी और वे अपने अधूरे सपने को पूरा करने के लिए कोई कसर बाकी न रखा । पहले, दूसरे, तीसरे कलास या फिर आगे जब भी वह अच्छे अंकों से पास करती मेरे पिता जी उसे  यह बताना नहीं भूलते कि आखिर उसका उद्देश्य क्या है । वे हमेशा उसे डाक्टर बिटिया कहकर पुकारते और उसका हौसला बढ़ते रहे । एक दिन वह समय आ ही गया जब उसने इंटर की पढ़ाई पूरी की मगर सी पी एम टी की परीक्षा में वह इतना अंक नहीं ला सकी जिससे उसे सरकारी कालेज मिल सके । मैं प्राईवेट कालेज में डोनेशन देकर पढ़ाने के पक्ष में नहीं था ।

फिर एक दिन मेरी बिटिया ने मुझसे कहा कि पापा मैं विदेश चली जाती हूँ  इंडिया के प्राईवेट कालेज से कम खर्च आयेगा मगर मैं और मेरी श्री मातीजी उसे विदेश भेजने के पक्ष में नहीं था । फिर एक दिन यह बात मेरे पिताजी के कानों तक पहुँचने में बिटिया उर्वशी सफल हो गयी । यह सुनते ही उन्होने पूरे घर को सिर पे उठा लिया, क्यों नहीं जाएगी ? क्या दिक्कत है ? लड़कियां चंद पर जाने लगी है , यह तो मात्र 9 घंटे का सफर है ।  काफी नोंक झोंक के बाद जब मैंने उनसे पूछा कि आप क्यों उसे विदेश भेजने का मेरे ऊपर दबाब बना रहे हैं तो यह सुनकर उनकी आँखों से आँसू छलकने लगे और उन्होने कहा कि तुम नहीं समझोगे ...जमाना हो गया मुझे एक सपना देखे हुये ....कम से कम जीवन के आखरी समय में तो पूरा हो जाने दो ....!

काफी उकसाने पर भरे गले से जब उन्होने इस सपने की पूरी दास्तान सुनाई तो मैं उन्हें देखता ही रह गया । इतना भावुक हो गया कि फिर मना नहीं कर पाया  और उर्वशी को एम बी बी एस की पढ़ाई के लिए यूक्रेन भेजने का फैसला कर लिया । मेरे पिता जी काफी खुश हैं अपने सपने को पूरा होते देखकर और आश्वस्त भी हैं कि "उसकी पढ़ाई पूरी होने से पहले मैं नहीं मरने वाला ।" 

8 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

सच्चे मन से देखे सपने जरूर पूरे होते हैं और उनका भी हो गया ………समझ सकते हैं उनकी मन की पीडा।

shikha varshney ने कहा…

मोरल ऑफ दी स्टोरी ....आस न छोड़ी जाये तो सपने पूरे होते हैं किसी न किसी रूप में.

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

बहुत अच्छा लगा -दादा जी का सपना पोती ने साकार किया !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सपनों को पूरा करने के लिए किसी का साथ हो तो सपने भी उतरना नहीं छोड़ते,न हकीकत की खुशियाँ बेरंग होती हैं ..... उर्वशी की कामयाबी दादा जी के सपनों की लहलहाती फसल है

Rajesh Kumari ने कहा…

आपके पिताजी का सपना मेरे सपने जैसा ही है फर्क इतना है की मैं खुद डाक्टर बनना चाहती थी जो बन नहीं सकी अब भावी पीढ़ी में ढूंढ रही हूँ वो सपना बहुत अच्छा लगा आपका सपना पढ़ कर बहुत बहुत शुभकामनाएं बेटी के लिए रेखा जी का आभार

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

:) khud na sahi, aapne me bhi na sahi aapke bachcho me hi sapna pura hota dekh... aapke papa ko khushi mil rahi hogi...hai na..

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

रविन्द्र जी आज आपको पहली बार इतने करीब से पढ़ा है ........आप यूँ ही अपने और सबके सपने पूरे करते रहे ...

Neelima ने कहा…

सपने अपने जब न पूरे हो तो अपनों के लिए सपने देखने चाहिए ...... कभी कभी हौसला मिलता हैं हमारे सपनो को ..........इश्वेर भी सच्चे सपने जरुर पूरे करता हैं नमन आपके पिताजी के सपने को