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शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (13) !

                         ये अपनी अपनी सोच है कि सपने  पूरे नहीं होते और अगर पूरे 
हो गए तो फिर सपना नहीं रहता वह तो यथार्थ बन जाता है।उसके स्वरूप 
के बयान से हमारी भावनाएं जुडी रहती हैं। मुझे ख़ुशी इस बात की है कि 
सतीश जी ने मेरे अनुरोध को स्वीकार कर कुछ तो  कर भेजा और हम सब को और   उनके कुछ गहन विचार जानने का मौका मिला 

                            आज अपने विचारों के साथ है -- सतीश सक्सेना जी .



परिचर्चाओं में, मैं भाग न लेने का प्रयत्न करता हूँ , मुझे लगता है, शायद ही कोई सच कहने का साहस कर पाता हो !सत्य कहने वाला या तो वेचारा होगा अथवा बहुत सारी अचंभित आँखों का आकर्षण ....

स्वप्न ....शायद किसी के पूरे नहीं होते और जिन स्वप्नों को पूरा बताया जाता है मेरे विचार से वे स्वप्न नहीं, मात्र इच्छाएं होती हैं, जो कभी अपने किये गए कर्मों अथवा कभी संयोग से पूरे होते पाए जाते हैं !

मानव जीवन में शायद इंसान सबसे अधिक मन से, भरपूर साथ देने वाले, जीवनसाथी का स्वप्न देखता है जो अक्सर सपना ही सिद्ध होता है ! पूरे जीवन, हम दुनिया के आगे, एक मधुर मुस्कान के साथ, उस सपने के साकार होने का, भ्रम दिलाते रहते हैं और मरते दम तक यह नहीं कह पाते कि  हम जीवन में अपने आपको कितना बड़ा धोखा देते रहे ! शायद हम में से किसी की यह हिम्मत नहीं कि हम अपना दुःख , अपने परिवार में भी बाँट सकें कि जिसके साथ बरसों से, मरने जीने की कसमें खायीं हैं उनके साथ जीवन मात्र एक दिखावा है वास्तविक प्यार कहीं दूर तक नहीं नज़र आता ! 

इसी तरह कभी बच्चों के कारण और कभी परिवार के बड़ों के सहारे हम लोग जीवन भर नाटक करते हुए, अपने दिन, पूरे करने में सफल हो जाते हैं ! किसी शायर की एक शेर याद आ गया सुनिए ...

अभी से क्यों छलक आये तुम्हारी आँख में आंसू ?
अभी छेड़ी  कहाँ है ? दास्तानें - ज़िन्दगी  हमने !

सो लोगों से आवाहन करें कि  सच सच बताएं कि जीवन के सपने , कितने पूरे , कितने अधूरे हैं ! सत्य में आकर्षण है मगर कहेंगे कितने ? 
मुझे संशय है :)
अधिकतर महिलायें अपने पतियों की तारीफें करेंगी और पति किसी और विषय पर अधूरा सपना सुनायेंगे ! 

स्वप्न पूरे न भी हों तब भी इंसान हँसते हँसते, दुनिया में अपने कार्य पूरे करे और निराश लोगों को हंसा कर, विदा ले, तब उसे मानव जीवन योग्य माना जाए !

खैर यह सब स्वप्नों की बाते हैं अब आपके अनुरोध के बारे में कुछ सुनाने का प्रयत्न करता हूँ !
गौर करें रेखा जी !    
आज की रात में , 
कुछ नया सा लगा 
थक गया था बहुत 
आंख बोझल सी थी 
स्वेद पोंछे,  किसी हाथ  ने,  प्यार  से  !
फिर भी लगता रहा कुछ,अधूरा अधूरा !

कुछ पता ही नहीं, 
कौन सी गोद थी ,
किसकी थपकी मिली 
और  कहाँ  सो गया !
एक अस्पष्ट चेहरा  दिखा    था,   मुझे    !
पर समझ  न  सका, सब  अधूरा अधूरा !


आज   सोया, 
हजारों बरस बाद मैं ,
जाने कब से सहारा,
मिला ही  नहीं  ,
रंग गीले अभी,  विघ्न  डालो नहीं ,
है अभी चित्र  मेरा, अधूरा अधूरा !

स्वप्न आते नहीं थे,
युगों से  मुझे   !
आज सोया हूँ मुझको 
जगाना नहीं  !
क्या पता ,आज  राधा मिले नींद में 
है अभी स्वप्न मेरा, अधूरा अधूरा  !

इक मुसाफिर थका  है ,
यहाँ   दोस्तों   !
जल मिला ही नहीं 
इस बियाबान में  !
क्या पता कोई भूले से, आकर मेरा  
कर दे पूरा सफ़र जो, अधूरा अधूरा !

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (12) !

                     क्या आज से पहले छोटे शहरों की जमीन पर सारे भय लड़कियों के लिए पला करते थे, माता-पिता की आँखों में एक सपना होता था की वह जो करे अपनी ससुराल जाकर करे लेकिन   में वाही करे जो उनको सही लगा . तब अधिक् प्रतिरोध करने की हिम्मत भी लड़कियाँ नहीं जुटा पाती थी ,  तो कुछ न कुछ जाती ही थीं लेकिन वो सपना जो अपने मन में संजो कर रखती थी कितने बार पूरा हो पाया नहीं जानती . अभी तक की कड़ियों में अधूरे सपनों को सिर्फ नारी ने ही सहा है और बांटा है . अब आगे आगे देखते हैं की क्या पुरुष भी ऐसे हैं जहाँ उनके सपने अधूरे रह गए हों। 
                 आज अपने सपने को साझा कर रही है -- सोनल रस्तोगी।



जो अधूरे रह जाते है वह ही तो स्वप्न होते है पूरे होने के बाद तो सच्चाई बन के हमारे जीवन का हिस्सा बन जाते है। बचपन से सपनो की दुनिया में उडती फिरती थी घर में बड़ों का साथ और आशीर्वाद ..अपने मन से राह चुनने की आज़ादी और क्या चाहिए सब कुछ अपनी मर्ज़ी से एक पल को तो ऐसा लगता था जो चाहूंगी वो पा लूंगी ... सब प्राप्य था . एक रोज़ मेरी जन्मपत्री एक रिश्तेदार ने देखी ..बस उन्होंने जो कहाँ वो सपना बनकर मेरी आँखों में पलने लगा ... "बिटिया का सूर्य बहुत प्रबल है सत्ता में या प्रशासनिक सेवा में जाने का योग है " 
इसी को आधार बनाकर पढ़ाई की  मोड़ दी प्रतियोगिता दर्पण और ऐसी ही कितनी किताबों के साथ तैयारी में जुट गई शहर छोटा था ज्यादा  सुविधायें नहीं  थी तो 12  के बाद इलाहबाद में कोचिंग लेने का तय किया ...अब ये सपना नहीं ध्येय सा बन गया था।  समाचार को गहराई से पढ़ना सूचनाये एकत्र करना ,समाचारों को बड़ो के साथ बाटना उनके विचार जानना ..इन सब में पढ़ाई को भी बहुत अहमियत देने लगी जिसका प्रभाव अंको पर दिखाई दे रहा था। कई बार अपने आप को प्रशासक के रूप में देखती और सोचती कहाँ कहाँ क्या सुधार सकती हूँ ... सुश्री किरण बेदी   कब मेरी मॉडल बन गई मैं जान नहीं पाई ...पढ़ाई के साथ स्काउट गाइड में काफी सक्रिय रूप से भाग लेने लगी ... मेरे भविष्य की तैयारी वर्तमान की ज़मीन पर चल रही थी 12वीं  की परीक्षा के साथ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी ...सब कुछ उसी पर निर्भर था ..दिन रात एक कर दिए थे ... परिणाम आया ..सफल हुई थी मै ...सब कितना सहज था ..पर 

पता नहीं हमेशा मेरा साथ देने वाले पापा उस दिन कुछ अलग सी बात कह रहे थे ..जब बी ए  ही करना है तो यहीं से करो .. मैंने बहुत समझाया ...मुझे बी ए नहीं करना है वो तो एक रास्ता है मेरी मंजिल तक जाने का पर उस दिन एक बेटी के पिता के मन में असुरक्षा घर कर गई ..घर की सबसे बड़ी बेटी को बाहर  भेजने की हिम्मत नहीं कर पाए ...और मैं उनकी आँखे देखकर बहस ... 

पता नहीं किस जिद में बी।कॉम  में एडमिशन ले लिया 12थ तक आर्ट्स  के बाद कामर्स ...खुद को ऐसे झोंका पढ़ाई में के वो सपना फिर सर ना उठा सके ...बहुत पीछे छुटा सपना आज आपके याद दिलाने पर सामने आकर खड़ा हो गया ... 
पर वो पहली और आखिरी बार था जब पापा ने मुझे रोका था ...उसके बाद मेरे हर फैसले में मेरा साथ दिया ..पर आज भी कहीं ना कहीं कलफ लगी साड़ी पहने सोनल सामने खड़ी हो जाती है। आज जहाँ हूँ सफल हूँ करियर भी अच्छा है पर ये वो मंजिल नहीं थी .......


कई राहे मुड़ा  करती है मंजिलो से पहले 
यूँ हर मोड़ को मंजिल नहीं समझा करते 
भाप बन आँखों से उड़ते है ख्वाब अक्सर 
हर अश्क पर अपनों से नहीं उलझा करते

अधूरे सपनों की कसक (11)

           सपने तो  सपने है जिन्हें मन में सजाना मानव जाति का स्वभाव है , कुछ सपने ऐसे ही होते हैं जिन्हें देखते देखते बहुत कुछ पा जाते हैं और फिर भी मन में कहीं न कहीं कोई कसक शेष रह जाती है भले ही वह बहुत महत्वपूर्ण न हो फिर वक्त के साथ या फिर दूसरे को उस कलेवर में देख कर सर उठाने लगते हैं कुछ पुराने सपने। 

                      आज अपने संस्मरण से दो चार हो रही हैं - शिखा वार्ष्णेय 




मनुष्य का सपनो से बहुत गहरा नाता है। जब तक जीवित रहता है सपने देखता है।कुछ पूरे होते हैं कुछ नहीं होते .जो पूरे हो जाते हैं तो कोई नया सपना आँखों में पलने लगता है . वक़्त दर वक़्त करवटें बदलते सपनो के साथ हम चलते रहते हैं .ऐसे ही मेरे सपने थे। एक नहीं अनगिनत। जो साल दर साल बदल जाया करते। पर सबमें एक भावना अहम् रहती कि कुछ ऐसा करना है जो मम्मी पापा को बेटी पर नाज हो .हम पर कभी किसी चीज़ को लेकर बंदिश नहीं थी . न विषयों को चुनने की, न कैरियर की, तो समाज में व्याप्त कुरीतियों और बुराइयों के प्रति आक्रोश रहता था। बचपन और लड़कपन का मन, हमेशा सोचा करता कोई ऐसा पॉवर फुल कैरियर हो कि इसके बारे में कुछ किया जा सके ।तो मन चाहे विषय चुन लिए यह सोच कर कि आई ए  एस में बैठेंगे। फिर धीरे धीरे यह मन पत्रकारिता और लेखन की तरफ मुड़ गया।और नया सपना जन्म लेने लगा की पत्रकारिता से सबके परदे फाश कर देंगे।परन्तु फिर हालातों ने करवट बदली और वही हुआ जो भारतीय समाज में होता है शादी करो , फिर बच्चे हो गए तो उन्हें पालो, इसी सबके साथ साथ सपने बदलते गए और मेरा अपना सपना पिछली सीट पर जा बैठा। मुझे हमेशा लगता रहता की वो तो अब टूट गया है।परन्तु वह मुझे गाहे बगाहे कचोटता रहता, उकसाता रहता। मुझे कहता सपने कांच के नहीं मिटटी के होते हैं टूट भी गए तो फिर से गला कर आकार दे दो, कोशिश तो करो!! हो सकता है पहले जैसा आकार न आये परन्तु कुछ न कुछ तो जरुर बन ही जायेगा। थोड़ी जिम्मेदारियां कम हुईं तो मन की मानी और शुरू किया टूटे सपनो को पुन: आकार देना। जाहिर है जो टूट गया वो तो फिर से नहीं बन पाया,और वो एक कसक शायद हमेशा रहेगी, पर जो बना वो भी बहुत प्यारा है और मैं खुश हूँ। आज भी हर रोज़ एक नया सपना देखती हूँ। और किसी न किसी रूप में वह पूरा भी हो जायेगा यह यकीन खुद को दिलाती हूँ। कहते हैं न ईश्वर और कहीं आपके अपने अन्दर ही होता है और सच्चे दिल से की गई आरजू जरुर उसतक पहुँचती है।
तो- 
मैंने माँगा तो था चाँद 
ताकि फैला सकूँ चांदनी 
वहां जहाँ अँधेरा है बहुत 
परन्तु शायद उड़ान में ही 
रह गई कुछ कमी 
न मिला चाँद 
तो क्या 
एक दिया ही जला लो 
कुछ तो राहें रोशन होंगी।

बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (10)

                                सपना तो  सपना होता   है , किसका सपना किस चीज से जुडा हो नहीं कह सकते हैं।  सपने अपने भविष्य से जुड़े  होते हैं,  कुछ बनने का सपना या कुछ पाने का सपना लेकिन एक ऐसा सपना जो अंजू  जी ने देखा , उसके बारे में सुनकर आत्मा सिसक पड़ी . ऐसा सपना जिसे न कोई बयां कर सकता है और न वह कोई और दे सकता है। अनजाने में तो हो सकता है या फिर उसके प्रति किसी को उस ललक का अहसास   हो  और वह उस प्यार में अपनेपन और पितृत्व के भाव को दे सके . अभी जीवन बहुत है कब कौन सी आत्मा तुम्हारे उस अहसास को समझ ले और बेटी पर अपने आशीष भरा हाथ सर पर रख दे। आज अपने सपने को बता रही हैं  -- अंजू चौधरी।

 

अधूरे सपने ...क्या लिखूँ कुछ समझ नहीं आ रहा ...जिंदगी में बहुत कुछ ऐसा रहता है जो अधूरा होता है ...ख्याबों के पीछे पीछे भागते भागते उम्र निकल जाती है पर अधूरा सपना फिर भी कभी पूरा नहीं होता ...उसकी कसक मन की भीतर कहीं बहुत गहरे दब कर दम थोड़ देती है ये सोचते हुए कि अब वक्त गया ...और कुछ ऐसा ही सपना मेरा भी है था और रहेगा ....ये सपना शायद  मेरी जिंदगी का सबसे अजीब सपना है ( कम से कम मुझे ऐसा लगता है ) या लोग सच कहने को डरते हैं  इस लिए कह नहीं पाते ...पर आज जब मन की और अधूरे सपने की बात आई है तो मैं बस इतना ही कहूँगी पापा के गुज़र जाने के बाद एक अधूरी इच्छा मन में कहीं छिपी रही और वक्त के साथ मैं तो बड़ी हो गई और उसके साथ साथ मेरा सपना भी साल दर साल बड़ा होने लगा ...कि शायदा कोई होगा  जो कभी ना कभी उनकी जगह लेगा .....वो भाई हो ....पति हो या फिर कोई ऐसा दोस्त जो मुझे किसी भी रूप में अपना सके | इस अधूरी इच्छा की सबसे बड़ी वजह मुझे ये लगती है कि किसी भी लड़की के पापा को उसकी छोटी उम्र में नहीं जाना चाहिए . एक वक्त था जब पढाई अधूरी रह गई थी ...जो आगे चल कर मेरी लगन और पति  के साथ से पूरी हो पाई ...आगे पढ़ने की अब भी इच्छा है ...पर मैं जानती हूँ ये अब इस उम्र में बहुत मुश्किल है पर मैंने अभी हिम्मत नहीं हारी है . आज भी जब सोचती हूँ कि पता नहीं क्यों वो ऊपर वाला भी इस जिंदगी से ऐसे खेल क्यों खेलता है कि जो गोद एक बार खो गई ...वो फिर क्यों नसीब नहीं हो पाई ...मेरी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा  सिर्फ अपने सपने के पीछे भागते हुए ही बीत गया ..मेरे इस अधूरे सपने के लिए ,मेरे पास बहुत अधिक शब्द या सोच नहीं हैं ....फिर भी मन में ये जरुर है कि ''हां कोई ऐसा होता जो मुझे उसी रूप में स्वीकार करने की हिम्मत करे/ या करता , जिस रूप में मैं हूँ '' पर ऐसा हुआ नहीं है आज तक .....भाई अपना फर्ज़ बहुत अच्छे से निभा रहे हैं ...पति ,पति है वो दोस्त तो है पर वो गोद नहीं दे पाए इसके लिए जीवन में भटकाव की स्थिति बनती है...पर फिर भी मेरी जिंदगी में पति से ऊपर और कोई नहीं है और उनके साथ और प्यार के साथ मेरी ये जिंदगी सिर्फ उनसे ही बंधी है ,पूरे मान सम्मान के साथ ......और दोस्त ???????? कोई ऐसा है ही नहीं | एक अजीब से अपने अधूरे सपने के साथ ये पगली अंजु (अनु)....||

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (9)

                      वाकई  सपने तो सपने   हैं और वह जरूरी नहीं की हमारी इच्छा के  पूरे हो जाएँ . किसी के  सपने अधूरे ही रहकर कुछ  और  करने की प्रेरणा देते रहते हैं। लेकिन  एक मुकाम नहीं मिला तो क्या मंजिले और  हैं,   चलते  रहिए -    उनके टूटने से सब  ख़त्म नहीं  जाता . नए रास्ते  और भी  हैं जो उनसे बेहतर मंजिलों तक  जाते  हैं। आज  सपनों से  परिचय  करा रही हैं - अर्चना चावजी .



सपने तो सब देखते हैं और पूरा करने की कोशिश भी करते हैं ...लेकिन मैंने सपने बदलने शुरू कर दिये उनके टूटते रहने पर ....सबसे पहले जब सपना देखा तो खुद को एक खिलाड़ी पाया ....लेकिन अच्छे कोच की सुविधा के अभाव में राज्य स्तर से आगे नहीं बढ पाई ..हालांकि खेल बदलती रही ,शायद लड़की होना भी एक वजह रही लेकिन घर से भरपूर प्रोत्साहन मिला...
पढ़ाई करते करते कब वकालात की पढ़ाई कर ली पता ही नहीं चला पिताजी वकील थे तो सोचा था वकील बन सकती हूँ पर कहाँ ....तो लड़की होने से लड़का मिलते ही शादी  हो गई और घर आ गये हम नये .....यहाँ नया घर....नई भाषा...सपना देखा घर पर रहकर घर की मालकिन बनने का.... एक अच्छी पत्नी ..अच्छी माँ ..और गृहिणी बनने का ..वो भी ईश्वर को रास नहीं आया ..कुछ ऐसे हालात बने कि घर से बाहर नौकरी की तलाश करना जरूरी हो गया गुजर-बसर करने को ....
तो पहले बन गए टीचर ...यहाँ भुनाने की कोशिश की अपना सपना ढेर सारे बच्चों की माँ बनने का मौका मिला वार्डन के रूप में ......फ़िर तलाश हुई छत की और आ गये एक नये घर पर यहाँ आकर पहले और दूसरे सपने को पूरा करने की कोशिश करती रही ...
तो काम आज तक जारी है और खेल भी ...कभी हार मिलती है तो कभी जीत........
सपने तो अब भी देखती हूं ...सबको खुश रखने के ...सबके चेहरे पर मुस्कान लाने के ....पर जाने कब वो दिन आए जब कोई दुखी न हो....और मेरा सपना पूरा हो .....

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (8)

                 अपनी बात कहने का सबका अपना अलग अंदाज होता है और वो ही उसके व्यक्तित्व और सोच को दर्शाती है। रश्मि प्रभा जी का अंदाज मुझे बहुत पसंद आता है .  उनके हर उत्तर में एक दर्शन छिपा रहता है और हो भी क्यों न? वे पन्त जी के सानिंध्य में पली बढ़ी हैं तो उसका ही प्रभाव है उनका छायावादी होना . इस दर्शन से उसका अर्थ निकालने का काम हमारा ही है। आज  की कड़ी रश्मि प्रभा जी के नाम --



अधूरे के साथ पूरा सपना -

सपना ! कितना अपना,कितना सलोना होता है .... कई सपने समय के फंदे में भगतसिंह की तरह बेवक्त खत्म हो जाते हैं - दुःख होता है,पर अनुभवों की कई पगडंडियाँ,कई शाखें - अनगिनत सपनों के साथ यह मानने पर विवश करती है और सच भी है कि यदि कुछ सपनों के टूटने का दुःख न हो,तो स्वभाव के कुछ पहलू सशक्त नहीं हो पाते . और सशक्त रास्तों के सपने मन को सुकून देते हैं कि जो हुआ अच्छा हुआ .... 
हुबहू कई सपने पन्नों पर उतरने से मना करते हैं,इसलिए नहीं कि कोई डर है या झिझक....बल्कि इसलिए कि सच का मूल्य भीड़ में हल्का हो जाता है...सारी तपस्या हास्यास्पद बना दी जाती है . मैंने अपरोक्ष से जो सत्य कहा है,उसे समझदार,अनुभवी लोग समझेंगे .

शनिवार, 13 अक्टूबर 2012

अधूरे सपनों की कसक (6)

                           हम लोग जिन्होंने अपने जीवन के इतने दशक जी लिए हैं जितने कि  शेष नहीं है और हम आज भी अपने उन अधूरे सपनों की कसक नहीं भूल पाए हैं लेकिन  आज की युवा पीढी भी तो इस दंश को 
उसी शिद्दत से जी रही है। क्योंकि मन वही है और संवेदनाएं भी वही है। उम्र से इसमें कोई फर्क नहीं आता है। 
इस कड़ी में युवा कवी सत्यम शिवम अपने संस्मरण से अवगत करा रहे हैं।





सपने ही तो है जो जीने की वजह देते है।शायद सच में अगर ये सपने ना होते तो भला किसको पूरा करने के लिये हम रात के घनघोर अंधेरों को चीर कर फिरसुबह की अलसायी धुन पर जागते और हर रोज अपने लक्ष्य की ओर एक-एक कदम बढ़ाते रहते हैं । इस दुनिया में बस सपने ही हमे वो मुकाम दिखलाते है जहां हम खुद को जो चाहे वो बना सकते है।सपनों को देखने के लिये हर व्यक्ति स्वतंत्र है और सपनों में वो खुद को देश का राष्ट्रपति भी बना सकता है।झूठा ही सही पर यथार्थ का एक अनोखा स्वांग रचती  है यह स्वप्न  नगरी।सपनों की वो दुनिया जहां बस हम होते है और होती है हमारी लालसाएं,अतृप्त इच्छाएं  और ना जाने जिंदगी के कितने वैसे फलसफे जो हमे हर पल जीने के लिये प्रेरित करते रहते है।

      मै शायद आज उम्र के उस पडाव पर हूँ जहां मै खुद को युवा कह सकता

हूँ।बचपन की मासूमियत से निकलकर अभी तुरंत ही संघर्ष के नये धरातल परमैने पावं रखे है।मै शुरु से काफी महत्वकांक्षी रहा हूँ।नींद के सपने तो दूर  मै तो जागती आँखों से भी कई बार स्वप्न देखता रहता  हूँ। जानते है क्यूं?क्योंकि मै बस उस तात्कालिक हर्ष से अपने सारे वर्तमान,भूत के विषादों को भूल जाता हूँ और ऐसा लगता है सामने स्वर्णिम भविष्य बाहें पसारे मुझे आमंत्रित कर रहा है स्वयं में विलीन   होने को।पर अगले ही पल जब आँखे खुलती है तो आभास होता है सच्चाई का और मेरे नींद के कारवां के मुसाफिर मुझसे काफी दूर  चले जाते है।मै दौड़ना चाहता हूँ उनके पीछे पर शायद मेरी विवशताएं  मुझे रोक देती है और मै फिर अपनी पलकों के सिरहाने कही स्वप्नों  को छुपा कर अपनी दैनिक दिनचर्या में व्यस्त हो जाता हूँ।पर फिर जब भी उस दौर से गुजरता हूँ जहां मेरे सपने मेरी खातिर प्रतीक्षारत होते है।मै भागदौड़  भरी जिंदगी के सारे थकानों को भूलाकर बड़ी ही सुकुन की साँस लेता हूँ उन सपनों के साथ।ऐसे है मेरे सपने,जो मुझे दर्द नहीं देते बस हमेशा मुझे आने वाले कल की एक अनोखी झलक देते है।

          अब तक की मेरी छोटी जिंदगी में कई अधूरे सपने भी है जो मन में कही टीस सा  पैदा करते है,क्योंकि वे अपूर्ण है।मै असफल रहा उन्हें मँजिल तक पहुँचा पाने में इसकी कसक आज भी दिल के किसी कोने में दफन  है जो मेरी असमर्थता व विवशता की ओर इंगित करती है।मेरे जीवन के अधूरे सपने बस दो चीजों से जुड़े है एक कैरियर व दूसरा मोहब्बत। क्योंकि इन दोनों के लिये मैने स्वप्न देखे और कुछ को पूरा कर सका और कुछ अधूरे रह गये...जो आज भी मेरे एहसासों के उस अंधेरे कमरे में एक तस्वीर बन कर टंगे है जिसपर अब धुल जम गया है।मै शुरु से पढ़ाई में एक होनहार छात्र था।मैने हाई स्कूल में काफी मेहनत की और यहां तक की अपने जिला स्कूल में टाप भी आया पर एक कसक तब भी मन में रह  गयी।मेरी शुरु से इच्छा थी कि  मै ८० प्रतिशत मार्क्स के साथ मैट्रिकुलेसन पूरा करुँ।जिससे पटना साइंस कालेज या किसी बेहतरीन कालेज में मेरा दाखिला हो सके।पर बस १० नम्बरों के अभाव ने मुझे इससे वंचित कर दिया।मै अव्वल होकर भी खुद को सबसे निचले पायदान पर देखने लगा।मेरे सपने अधूरे रह गये और मै अपने शहर मोतिहारी के ही प्रतिष्ठित महाविद्यालय  से इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने लगा।यहां भी मेरा लक्ष्य कुछ अच्छा करने का ही था और मैने अपने टूटे सपनों की मरम्मत की।मै पूरे जिले में अव्वल आया बहुत ही अच्छे नम्बरों के साथ।मेरी पिछली कसक मेरी इस सफलता में कही दब सी गयी और मै हर दिन कुछ नये सपनों को दिल में पाले आगे बढ़ता रहा।मै भी और लड़कों की तरह आई.आई.टी व एन.आई.टी जैसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेजों से स्नातक करना चाहता था।पर यहां फिर भाग्य ने मुझे मात दे दिया।मेरी तैयारी बखूबी होने के बावजूद भी घरवालों से अलगाव व मेरी दादी के देहावसान ने मुझे पूरी तरह तोड़ दिया और मै कई मानसिक बीमारियों  का
शिकार हो गया।डाक्टर ने मुझे ३ महीने की बेड रेस्ट को कहा और चौथे महीने मेरी इंजीनियरींग की सारी परीक्षाएं थी.जिनपर मेरे कैरियर का एक टर्निंग प्वाइंट केंद्रित था। मै असफल हो गया पर ये असफलता मेरे अधूरे सपनों की कसक नहीं थी।कसक तो यह थी कि मै आई.आई.टी में बस एक सब्जेक्ट में क्वालीफाइ नहीं हो पाया था और मेरे सपने टूट गये थे।पर शायद भगवान को कुछ और ही मँजूर था।मैने ए.आई.ई.ई.ई में अच्छे रैंक्स पाये थे और मेरा दाखिला वि.आई.टी में हो गया।मेरी गाड़ी फिर सामान्य सी अपने पटरी पर दौड़ने लगी।

      मै फिर सपने देखने लगा और अब मेरे सपनों में कुछ विशेष ही रोचकता थी।मै अपने स्वप्नों में अपनी स्वप्नसुंदरी को ढ़ूँढ़ने लगा।जो गलत नहीं था यह तो बस इस उम्र का असर था।पर मुझे ये नहीं पता था कि इन सपनों के टूटने का दर्द कुछ ज्यादा ही हो सकता है क्योंकि ये दिल से जुड़े मुद्दे थे।मै न चाह कर भी उस समंदर की गहराई में डूबता गया।मेरी हर दिन एक नये एहसास के साथ शुरु होती और हर रात बस यह उम्मीद कि शायद कल वो मेरा होगा।मेरी प्रेम कहानी कुछ अलग थी,सबसे जुदा थी।जहां ना था कोई सामिप्य और ना ही कोई अलगाव।वह हर पल मेरे साथ थी मेरे सपनों की दुनिया में।मै खुश था सपनों को अपने करीब अपने हमसफर के रुप में पाकर।सब कुछ सामान्य सा बढ़ा जा रहा था।अचानक मेरी जिंदगी में एक तूफान सा आया और उसने बस मुझे ही नहीं मेरे सपनों को मेरे संवेदनाओं को और मेरे दिल सबको तोड़कर,झकझोर कर रख
दिया।मै शांत हो गया...बहुत शांत.......एक घनघोर चुप्पी...जो शायद तूफान के बाद की होती है।मै अब ख्वाब नहीं देखता था।मै अब कुछ भी नहीं सोचता था।क्योंकि मेरे मुकद्दर ने मेरे सबसे सुहाने सपने को मुझसे छीन लिया था और मुझे उदास कर दिया था।इस अधूरे सपने की कसक अब कभी खत्म होने वाली नहीं थी और मै अब अपनी जिंदगी में प्रैक्टीकल होना चाहता था।मेरी इंजीनियरींग खत्म हो चुकी थी और मै अब देश के एक बहुत बड़े मल्टीनेशनल कम्पनी में साफ्टवेयर इंजीनियर के रुप में काम कर रहा था।साथ ही मै अपने अधूरे सपनों की कसक को अपने शब्दों में ढ़ाल कर कुछ लिखने की कोशिश भी कर रहा था।जिसने मेरे सृजन में "मेरे बाद" व "तुम्हारे बाद" की नींव रखी।मेरे अधूरे सपनों ने मुझे ताकत दिया अपने मँजिल को प्राप्त करने का और मै कुछ खाश रातों के सुहाने सपनों की यादों को दिल में सजाये जीता रहा..........किसी के ना होने पर भी हरदम किसी के साथ........ऐसे है मेरे अधूरे सपने.....एक युवामन के अंतरमन के उद्गार और उसकी मुस्कुराहटों के पीछे दबे किसी कसक की टीस से................।